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Monday, 17 November 2008

समझौते के तहत हुई राज की गिरफ्तारी

अचानक खबर आई कि राज ठाकरे सरेंडर करने जा रहे हैं। 2 बजे खबर आई कि वो मजगांव की अदालत में सरेंडर करने के लिये निकले, 3 बजे खबर आई कि मुंबई पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया और ठीक 4 बजे खबर आई कि उन्हें जमानत मिल गई। 2 घंटे में पूरा खेल खत्म हो गया। राजनीतिक पटल पर "सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे " वाली कहावत की ये एकदम ताजा मिसाल है। उत्तरभारतियों के खिलाफ भडकाऊ भाषण देने के आरोप में जमेदपुर की अदालत में एक वकील ने मामला दर्ज कराया। कोर्ट ने राज के खिलाफ नोटिस जारी किया। जब वो नहीं लौटे तो उनके खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया गया। ये वारंट पहुंचा मुंबई पुलिस के पास जिसे वारंट की तामील करते हुए राज ठाकरे को पकड कर जमशेदपुर की अदालत के सामने हाजिर करना था।महाराष्ट्र सरकार के लिये ये दुविधा वाली हालत थी क्योंकि राज की गिरफ्तारी का मतलब था फिरसे राज्य में हिंसक वारदातों का होना, कानून व्यवस्था की हालत का खराब होना। सरकार अगर राज के खिलाफ कार्रवाई न करती तो न केवल न्यायिक प्रक्रिया की अवमानना होती बल्कि सरकार को केंद्र की ओर दबाव का भी सामना करना पडता, क्योंकि केंद्र सरकार खुद बिहारी नेताओं की ओर से राज के खिलाफ कार्रवाई के लिये दबाव में थी। इसलिये सरकार ने राज ठाकरे से समझौता किया। इस समझौते के तहत राज को गिरफ्तार करने कोई पुलिस अधिकारी उनके घर नहीं पहुंचा, राज अपनी ही कार में अदालत पहुंचे, उनके साथ उनकी पत्नी और खास नेता थे। सरकार ने राज को आश्वस्त किया कि अदालती कार्रवाई जल्दी ही खत्म हो जायेगी और उन्हें जमानत दिलाने में मदद करेगी। पुलिस की ओर से भी पहले की तरह एमएनएस के कार्यकर्ताओं की ऐहतियातन कोई गिरफ्तारी नहीं हुई, न ही कोई खास फोर्स मुंबई में लगाई गई। बदले में राज से सरकार ने वादा लिया कि वो पूरी कार्रवाई को लो प्रोफाईल रखेंगे, कोई बयानबाजी नहीं करेंगे, कार्यकर्ताओं की भीड अपने घर और अदालत पर नहीं बुलाएंगे और राज्य में कहीं भी हिंसक प्रतिक्रिया नहीं होने देंगे। दोनो ने समझौते की शर्तों का पालन किया और सारी कार्रवाई झटपट हो गई। पूरा मामला फिर एक बार संकेत दिलाता है कि कांग्रेस एनसीपी आज शिवसेना के पछाडने के लिये राज ठाकरे को बढावा देने के लिये वही रणनीति अपना रही है, जो 60 के दशक में कांग्रेस ने वाम पार्टियों को ठडा करने के लिये शिवसेना को बढावा देकर अपनाई थी।

Tuesday, 11 November 2008

कायरता का जवाब कायरता है हिंदू आतंकवाद

मुंबई, हैद्राबाद, जयपुर, बैंगलोर, अहमदाबाद, दिल्ली में जब भी बम धमाके हुए हमने कई राजनेताओं, धर्मगुरूओं, समाजसेवकों के मुख से बार बार यही वाक्य सुना - "ये एक कायरतापूर्ण कृत्य है।" मैं बिलकुल इस कथन से सहमत हूं। धर्म के नाम पर इस तरह से बेगुनाह लोगों की जान लेना वाकई में धिक्कारने योग्य है। मैं ये मानता हूं कि जो लोग अदालत के सामने इन बमकांड के लिये दोषी पाये जाएं उन्हें बिना किसी दया के फांसीं पर लटका दिया जाना चाहिये (वैसे फांसीं की सजा भी ऐसे लोगों के लिये कम ही नजर आती है) मानवाधिकार का राग अलापने वाले मृत्यूदंड विरोधियों को तनिक भी तरजीह नहीं दी जानी चाहिये...लेकिन यही सलूक सभी के साथ होना चाहिये...चाहे वो आतंकी किसी भी धर्म में विश्वास रखने वाला हो...वे लोग जो हाल ही में मालेगांव बम धमाकों के बाद ये कह रहे हैं कि ये धमाका हिंदुओं का जवाब था...प्रतिक्रिया थी...गुस्सा था...तो उनसे मैं सहमत नहीं हूं। इस मामले में दोगली सोच नहीं हो सकती। साध्वी, ले.कर्नल पुरोहित और उनके सहआरोपियों ने मालेगांव में धमाके किये या नहीं इसका फैसला न्यायिक प्रक्रिया करेगी..लेकिन मान लीजिये कि ये या फिर इनकी जगह किन्ही और हिंदुओं ने मालेगांव में बम रखा था तो वे भी माफी के काबिल नहीं हैं। अगर इस्लामी आतंकी की ओर से देश के अलग अलग हिस्सों में किये गये धमाके कायरतापूर्ण हरकतें थीं तो मालेगांव, पूर्णा, जालना और परभणी के धमाकों को भी उसी तराजू में तौला जाना चाहिये।
जो लोग हिंदू आतंकवाद के हिमायती हैं या फिर आक्रमक हिंदुत्व के नाम पर अपना गला फाडते या कागज रंगते हैं...उनसे मैं सिर्फ यही कहूंगा कि हिंदू की सशक्त प्रतिक्रिया उसे ही माना जायेगा जब वे उन संगठनों को निशाना बनायें जो कि देश भर में आतंकी वारदातों को अंजाम दे रहें हैं, उन संगठनों की पोल खोलें जो आतंकियों को चोरी छुपे पैसे, साहित्य और लोग मुहैया करा रहे हैं या फिर कुछ ऐसा करें जिससे कि ये संगठन फिर बेगुनाहों की जान लेने में नाकाबिल हो जायें। इस्लामी आतंकियों ने कायरता दिखाते हुए चोरी छुपे बम रखकर नरमेध किया, आपने भी वही किया...आप में उनमें फर्क क्या? दोनो ही कायर...

Monday, 10 November 2008

हिंदू आतंकवाद - नांदेड धमाके से मिले थे संकेत

हिंदू आतंकवाद अपने पैर पसार रहा है ये बात एटीएस और सीबीआई जैसी जांच एजेंसियों को साल 2006 में ही पता चल गई थी। उस वक्त नांदेड में हुए बम धमाके की तहकीकात में ही ये बात साफ हो गई थी कि कई कट्टरपंथी एक समुदाय विशेष को निशाना बनाने की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन उस घटना से हासिल जानकारी को अनदेखा किया गया और नतीजतन कट्टरपंथी अपने मंसूबे में कामियाब हो गये। इसका सबूत है नांदेड धमाके के एक गवाह का बयान, जिसके मुताबिक उसने नागपुर के भोसला मिलिटरी स्कूल में कट्टरपंथियों की ट्रेनिंग देखी और पाया कि युवाओं में नफरत का जहर भरने में फौज और आईबी के पूर्व अफसर भी साथ दे रहे थे।
ये बयान है नांदेड धमाके के गवाह समतकुमार भाटे का जो उन्होने एटीएस को दिया था। भाटे फिलीपिंस की लडाकू कला शॉर्ट स्टिक के जानकार हैं। साल 2000 में उन्हें बजरंग दल की ओर से बुलावा आया कि भाटे उनके कार्यकर्ताओं को भी इस कला कि ट्रेनिंग दें। ट्रेनिंग का ठिकाना था नागपुर का भोसला मिलिट्री स्कूल। भाटे ट्रेनिंग के लिये चले तो गये, लेकिन वहां जाकर उन्होने जो कुछ भी देखा उसने उन्हे हिलाकर रख दिया।)
“ मई 2000 में मैं बजरंग दल के शिविर में मिलिंद परांडे (बजरंग दल के नेता) के कहने पर 300 लाठियों और अपने 3 साथियों के साथ नागपुर के भोसला ट्रेनिंग स्कूल में गया। मुझे लगा था कि वहां सिर्फ मेरी कला का प्रशिक्षण देने के लिये ही ये शिविर लगाया गया है, लेकिन वहां जाकर पता चला कि कराटे इत्यादि जैसी कलाओं के प्रशिक्षण के भी वहां दिये जा रहे थे। प्रशिक्षण देनेवालों में 2 पूर्व सैनिक और एक पूर्व वरिष्ठ आईबी अफसर भी थे । उस ट्रेनिंग में देश के अलग अलग राज्यों से 115 प्रशिक्षणार्थी आये थे और ये कैंप 40 दिनों तक चला। कैंप में मैं हिमांशु पानसे से पहली बार मिला (नांदेड ब्लास्ट का आरोपी जो मारा गया) ट्रेनिंग को गौर से देखने पर पता चला कि युवाओं को गलत राह पर ले जाया जा रहा था और उनका भविष्य खराब है। ये देखकर मैं ट्रेनिंग खत्म होने के एक दिन पहले ही लौट आया। न मैने उनसे कोई मानधन लिया और विचार न मिलने के कारण न ही उन्होने मुझे वापस बुलाया”
अपने बयान में भाटे जिस हिमांशु पानसे की बात कर रहे हैं दरअसल वो नांदेड में 4 अप्रैल 2006 को हुए बम धमाके का एक प्रमुख आरोपी है। उस धमाके में हिमांशु और उसका साथी नरेश मारे गये थे, जबकि 4 अन्य आरोपी घायल हो गये। धमाका आरोपी नरेश राजकोंडवार के घर में ही हुई थी। शुरूवात में धमाके को फटाखों के विस्फोट की शक्ल देने की कोशिश की गई, लेकिन एटीएस की तहकीकात में साफ हो गया कि नरेश के घर में रखा बम एक आतंकी साजिश में इस्तेमाल होना था।

गवाह भाटे का बयान तो ये बताता ही है कि कट्टरपंथियों की ओर से युवाओं को आतंकी ट्रेनिंग दी जा रही है, लेकिन इस बयान के अलावा राहुल पांडे और संजय चौधरी के नार्कोएनेलिसिस टेस्ट भी इस बात को विस्तार से बताते है कि हिंदू कट्टरपंथियों के क्या मंसूबे थे, उन्हें बम बनाने की ट्रेनिंग कौन देता था और विस्फोटक कौन मुहैया करा रहा था.

अपने नार्कोएनेलिसिस टेस्ट में आरोपी राहुल पांडे ने बताया कि- “हिमांशु पानसे ने ही जालना, पूर्णा और परभणी के धमाकों को अंजाम दिया था, जिसमें जालना के धमाके में मैने खुद हिमांशु का साथ दिया। कुछ राजनेता और आरएसएस, वीएचपी और बजरंग दल जैसे संगठनों के सदस्य हिमांशु का साथ दे रहे थे। हिमांशु को बम बनाने की ट्रेनिंग 2 लोगों ने दी थी, जिसमें एक का नाम मिथुन चक्रवर्ती है जो कि पुणे का रहनेवाला है।“

राहुल की तरह ही आरोपी संजय चौधरी का नार्कोएनेलिसिस भी कट्टरपंथियों के मंसूबों की कहानी कहता है- “मिथुन चक्रवर्ती जो कि लंबा चौडा और दाढी रखने वाला आदमी था ने 2 से 3 दिन तक बम बनाने की ट्रेनिंग दी। ये ट्रेनिंग पुणे के पास शिवगड में हुई जहां हिमांशु और उसके साथियों ने 3 तरह के बम बनाने सीखे। ट्रेनिंग से लौटते वक्त मिथुन ने एक बैग दिया जिसमें क बम बनाने का सामान था।“
नांदेड के जिस घर में धमाका हुआ वहां से पुलिस ने पुलिस ने 10 जीवित कारतूस भी बरामद हुए। आरोपियों ने इस बात की तैयारी भी कर ऱखी थी कि अगर कोई हादसा होता है तो उसे पटाखों के विस्फोट की शक्ल दी जाये। इसीलिये घर में बडे पैमाने पर पटाखे लाकर रखे गये। अब सत्तारूढ दल के ही विधायक सरकार से जवाब मांग रहे कि जब नांदेड के वक्त कट्टरपंथियों की साजिश का पता लग चुका था तो सरकार ने ढिलाई क्यों बरती।
अंग्रेजी में एक कहावत है- ए स्टिच इन टाईम सेव्स नाईन...यही सीख अगर सरकार ने नांदेड धमाकों से ली होती तो शायद आगे होनेवाली साजिशों को रोका जा सकता था। एटीएस ने न तो भोसला मिलिट्री स्कूल की ट्रेनिंग में शामिल नेताओं से पूछताछ की और न ही अब तक मिथुन चक्रवर्ती नाम के उस शख्स का पता चल सका है जो कि बम बनाने क ट्रेनिंग देता था।

Thursday, 16 October 2008

बच्चे हैं डॉन के, छूना चाहते हैं आसमान

हर बाप चाहता है कि उनके बच्चे पढ-लिखकर अच्छा इंसान बने, अपने पैरों पर खडे हों और ऐसी चाहत हमारे आप के अलावा अंडरवर्लड डॉन भी रखते हैं। मुंबई अंडरवर्लड के सभी डॉन भले ही अपने आपराधिक करियर में अथाह खूनखराबा कर चुके हों, लेकिन अपने बच्चों को वे अपने जैसा नहीं बनाना चाहते। अगर इन गुनाह के खिलाडियों के बच्चों पर हम नजर डालें तो पायेंगे कि मां बाप भी इन्हें समाज में सम्मानजनक जगह दिलाना चाहते हैं। कोई अपने बच्चे को पायलट बनाना चाहता है, कोई डॉक्टर, कोई बिजनेस मैनेजर तो कोई राजनेता।
अंडरवर्लड डॉन दाऊद इब्राहिम ने अपने करीब 30 साल के आपराधिक करियर में भले ही सैकडों जाने लीं हों, लेकिन वो चाहता है कि उसका बेटा लोगों को जिंदगी देने का काम करे। दाऊद का बेटा मोईन दाऊद कासकर ब्रिटेन में मेडिकल की पढाई कर रहा है और दाऊद उसे डॉक्टर बनाना चाहता है। साहब जादे की उम्र है करीब 25 साल । दाऊद के 4 बच्चों में मोईन तीसरे नंबर पर है। सबसे बडी बेटी माहरूख की शादी साल 2005 में जावेद मियांदाद के बेटे जुनैद से की गई थी। बाकी बेटियां अभी पढाई कर रहीं हैं।
मोईन कासकर दाऊद का इकलौता बेटा है और सभी बच्चों में सबसे ज्यादा चहेता भी। दाऊद ने कराची के क्लिफ्टन इलाके में अपने बंगले का नाम भी बेटे पर रखा है-मोईन पैलेस। बताते हैं कि दाऊद ने मोईन को काले कारोबार से बिलकुल अलग रखा और उसे पढाई के साथ साथ धार्मिक शिक्षा भी दी। दाऊद अब मोईन की शादी की तैयारी कर रहा है और चाहता है कि पढाई खत्म होने के बाद वो ब्रिटेन में ही बस जाये।
मुंबई अंडरवर्लड के दूसरे खिलाडी छोटा राजन का भले ही दाऊद से 36 का आंकडा हो, लेकिन बच्चों की परवरिश के मामले में उसकी सोच भी दाऊद की तरह ही है। छोटा राजन भी चाहता है कि उसके बच्चे गुनाह की दुनिया से दूर एक साफ सुथरी जिंदगी बितायें। छोटा राजन की 3 बेटियां हैं, जिनमें सबसे बडी है अनीता निखालजे। हाल ही राजन की पत्नी सुजाता ने अदालत को बताया कि अनीता सिंगापुर मैनजमेंट यूनिवर्सिटी से एमबीए का कोर्स करना चाहती है इसलिये एडमिशन की औपचारिकताएं पूरी करने के लिये अदालत सुजाता निकालजे को उसके साथ जाने की अनुमति दे। सुजाता को अदालत का दरवाजा खटखटाने की जरूरत इसलिये पडी क्योंकि उसे 3 साल पहले अपने पति छोटा राजन की खातिर जबरन वसूली के आरोप में गिरफ्तार किया गया था और अदालत ने उसके विदेश जाने पर पाबंदी लगा दी थी। राजन की बाकी 2 बेटियां मुंबई के विद्याविहार इलाके के एक स्कूल से पढाई की है।

दाऊद के एक दुश्मन छोटा राजन की तरह ही उसका दूसरा दुश्मन अरूण गवली भी चाहता है कि उसके बच्चों का करियर अपराध की दुनिया में न बने। गवली ने खुद राजनीति में कदम ऱखा और विधायक बनने में कामियाब भी रहा। अब वो अपने बच्चों को भी इसी राह पर लाना चाहता है।

फरवरी 2007 में मुंबई महानगरपालिका के जो चुनाव हुए उसमें गवली ने अपनी बेटी गीता को चिंचपोकली इलाके से बतौर उम्मीदवार उतारा। गीता भारी मतों से चुनाव जीतकर पार्षद बन गई और अब गवली का इरादा उसे विधानसभा का चुनाव लडाने का है। गवली का लडका महेश फिलहाल मुंबई के सिद्धार्थ कॉलेज में पढाई कर रहा है।
गवली की तरह ही अडरवर्लड के एक और खिलाडी अश्विन नाईक भी अपने बच्चों की अलग पहचान बनाना चाहता है। अ नाईक की बेटी निकिता दांत का डॉक्टर बनना चाहती है और डेंटेस्ट्री की दूसरे साल की पढाई कर रही है। अश्विन नाईक के पहले उसके गिरोह की कमान बडे भाई अमर नाईक के हाथों थी। अमर नाईक तो एनकाउंटर में मारा गया लेकिन उसकी बेटी श्वेता अमेरिका के फ्लोरिडा से पायलट का कोर्स कर रही है। उसने अब तक 80 घंटो की उडान भरी है और 250 घंटे पूरे करने के बाद उसे professional pilot’s licence मिल जायेगा।

Thursday, 18 September 2008

मुंबई में बेफिक्र घूम रहा है दाऊद

दाऊद इब्राहिम इन दिनों मुंबई की सडकों पर बेफिक्र घूम रहा है। उसे न तो छोटा राजन से डर है और न ही पुलिस से। वो अपने साथ पंटरों को भी नहीं रखता। लोग भी उससे नहीं डरते... अगर आप समझ रहे हैं कि हम किसी फिल्मी या फिर दाऊद जैसे दिखने वाले किसी शख्स की बात कर रहे हैं तो आप गलत हैं।
आप सोच रहे होंगे कि दाऊद इतना बेखौफ होकर मुंबई में क्यों घूम रहा है, क्या उसने अंडरवर्लड में अपने दुश्मनों से सुलह कर ली है और क्या भारतीय जांच एजेंसियों ने दाऊद के तमाम काले कारनामों की फाईल बंद कर दी है।आखिर माजरा क्या है?

शेक्सपियर ने कहा था कि नाम में क्या रखा है, लेकिन इस व्यकित के नाम ने इसकी जिंदगी में फर्क ला दिया है। मुंबई के मसजिद बंदर इलाके में रहनेवाले इस वय्कित का नाम है दाऊद और अंडरवर्लड वाले दाऊद की तरह ही इसके पिता का भी नाम इब्राहिम ही है, यानी कि ये भी है दाऊद इब्राहिम। 1980 के दशक तक इस शख्स की जिंदगी में सब ठीक ठाक था, लेकिन उसके बाद दाऊद इब्राहिम जब मुंबई अंडरवर्लड का बहुत बडा नाम बन गया और दुबई से बैठ कर अपना कालाकारोबार चलाने लगा तो नतीजतन इस दाऊद की जिंदगी में भी दिक्कतें पेश आनें लगीं। मुंबई पुलिस अपराधी दाऊद के चक्कर में कई बार इनको शक के घेरे में ले लेती। मतदान बूथ पर भी जब ये वोट डालने जाते तो अधिकारी इनका नाम सुनकर चौंक जाते।

इन दाऊद के एक रिश्तेदार दुबई में थे और जिन दिनों मोबाईल फोन का आगमन नहीं हुआ था, ये पीसी बूथ से दुबई फोन करते थे। एक बार इन्हें पता चला कि इनके फोन करने के बाद पुलिस अपराधी दाऊद इब्राहिम का सुराग पाने के लिये उस पीसीओ वाले को ही पकड ले गई।

मुंबई के इस सीधे सादे दाऊद इब्राहिम और पाकिस्तान में छुपे बैठे भगोडे दाऊद इब्राहिम के चरित्र में भले ही जमीन आसमान का अंतर हो, लेकिन दोनो में कई समानताएं भी हैं।
दोनों की उम्र 50 के करीब है। दोनों के पिता का नाम इब्राहिम है, दोनों की बहन का नाम हसीना है, दोनों के 6 भाई हैं, दोनों के एक-एक भाई की असमय मौत हो चुकी है, दोनों महाराष्ट्र के रत्मागिरी जिले के हैं और दोनों की मातृभाषा कोंकणी है। एक और बात भी दोनों में समान है। दोनों का लेना देना पिस्तौल है। एक दाऊद इब्राहिम पिस्तौल से लोगों पर गोलियां बरसवाता है तो मुंबई का ये दाऊद इब्राहिम पहले पिस्तौल रिपेर के निजी कारखाने में काम करता था।

Friday, 12 September 2008

लालबाग के राजा के दरबार में भक्तों से भेदभाव

लोग घंटों कतार में खडे रहकर लालबाग के राजा के दरबार में उनकी एक झलक पाने के लिये पहुंचते हैं, लेकिन मूर्ति के पास पहुंचते ही आसपास खडे कार्यकर्ता उनके साथ जानवरों जैसा बर्ताव करते हैं। महिला और बच्चों का भी ख्याल नहीं किया जाता। जो कार्यकर्ता किसी फिल्मी सितारे या राजनेता के पहुंचने पर उनकी आवभगत में जुट जाते हैं, वे ही आम श्रद्धालुओं को जरा सी भी देर होने पर धक्के मारकर पंडाल से बाहर कर देते हैं।
एक महिला घंटो कतार में खडी रहकर लालबाग के राजा के दर्शनों के लिये आई थी॥राजा के दर्शन तो उसने कर लिये लेकिन उसके बाद जो सलूक उसके साथ हुआ वो इंसानियत को शर्मसार करता है। बडे अपमानजनक तरीके से एक कार्यकर्ता ने महिला को धक्के देकर मंच से बाहर कर दिया। महिला के साथ बदसलूकी करने वाल उस कार्यकर्ता के तेवर किसी गुंडे से कम नहीं थे। वो ये भी भूल गया कि ये गणपति का दरबार है और भक्त यहां बडी श्रद्धा के साथ आते हैं। ये तो था गणेशजी के एक आम भक्त के साथ कार्यकर्ताओं की ओर से किया जाने वाला सलूक, लेकिन जहां कोई फिल्मी हस्ती या राजनेता यहां पहुंचा नहीं कि मंडल के बडे पदाधिकारियों समेत यही कार्यकर्ता उसकी आवभगत के लिये दौड पडते हैं..मानो उस राजनेता या फिल्मी हस्ती ने लालबाग के राजा के पास आकर इनपर बडा अहसान कर दिया हो। इस भेदभाव के कई श्रद्धालु शिकार हो चुके हैं और कडवे अनुभवों के साथ लालबाग के राजा के दरबार से लौटे हैं
लालबाग के राजा के दरबार में तैनात इन कार्यकर्ताओं के गुरूर की कोई की कोई सीमा नहीं। फिल्मी सितारों की भीड के बीच खुद को पाकर ये खुद को भी किसी स्टार से कम नहीं समझते। इसी नशे में श्रद्धालुओं से बदतमीजी करते वक्त वे न तो उनकी उम्र का ख्याल करते हैं और न ही महिलाओं से शालीनता बरतते हैं। इस बारे में मंडल के पदाधिकारियों ने बस अपनी सफाई में यही कहा कि लालबाग के राजा के दर्शनों के लिये लाखों लोग आते हैं। कार्यकर्ता दिन रात एक करके भीड को नियंत्रित कर रहे हैं। ऐसे में इस तरह की बातों को नजरअंदाज करना चाहिये। प्रबंधन भले ही अपने कार्यकर्ताओं की करतूतों को नजरअंदाज कर रहा हो, लेकिन जिनके साथ बदसलूकी हुई है उनके लिये अपने अनुभव को भूलना आसान नहीं।
लालबाग के राजा के दरबार में आनेवालों के मन में अब सवाल उठ रहा है कि क्या लालबाग के राजा सिर्फ फिल्मी सितारों या राजनेताओं के ही राजा बन गये हैं और क्या आम लोगों के साथ होने वाली बदसलूकी के मद्देनजर यहां का प्रबंधन सरकार को अपने हाथों में नहीं ले लेना चाहिये।

Friday, 5 September 2008

मुंबई पुलिस का गैंगवार

गैंगवार। मतलब अंडरवर्लड की काली दुनिया के बीच गिरोहों की आपसी जंग...लेकिन ये गैंगवार सिर्फ अब अंडरवर्लड में ही नहीं होता। अंडरवर्लड के दुश्मन यानी कि पुलिस महकमें में भी एनकाउंटर स्पेलिस्ट अफसरों के बीच चलता है आपसी गैंगवार।हाल ही में मुंबई पुलिस के एनकाउंटर स्पेसलिस्ट अफसर प्रदीप शर्मा की वर्दी उतारे जाने के पीछे इस पुलिसिया गैंगवार की भी एक भूमिका मानी जा रही है।
मुंबई की सडके कई बार खून से सन चुकीं हैं, कई बार यहां जीते जागते इंसान ढेर में बदले गये हैं, कई बार यहां हो चुकी है गोलियों की बौछार। वजह रही है गैंगवार। अंडरवर्लड पर दबदबा हासिल करने के लिये गिरोहों के बीच चलने वाला खूनी खेल। पहले ये गैंगवार दाऊद इब्राहिम और अरूण गवली के गिरोहों के बीच चलता था और फिर छोटा राजन का गिरोह दाऊद का नया दुश्मन बनकर उभरा। सभी एक दूसरे के खून के प्यासे थे।दाऊद इब्राहिम, छोटा राजन, अरूण गवली या फिर अश्विन नाईक भले ही आपस में भी लड मरें लेकिन इन सभी की एक ही दुश्मन है-मुंबई पुलिस। पर खुद क्या मुंबई पुलिस भी गैंगवार से अछूती है। मुंबई के तमाम क्राईम रिपोर्टर भी जानते हैं कि मुंबई पुलिस में भी पिछले डेढ दशक से एक गैंगवार चल रहा था दो एनकाउंटर स्पेसलिस्ट अफसरों के बीच।

प्रदीप शर्मा उर्फ बाबा- रविवार को पुलिस सेवा से बर्खास्तगी से पहले ये 112 एनकाउंटर कर चुके थे। एक एनकाउंटर स्पेसलिस्ट अफसर के तौर पर पहचाने जाने वाले शर्मा पुलिस महकमें में होने वाले गैंगवार के भी अहम खिलाडी रहे हैं। 1983 में इन्होने विजय सालस्कर उर्फ महाराज के साथ पुलिस भर्ती की परीक्षा पास की और सब इंसपेक्टर नियुक्त हुए। 90 के दशक की शुरूवात तक दोनों ने साथ काम किया। कई गुनहगारों को यमलोक पहुंचाया और कईयों को सलाखों के पीछे, लेकिन शर्मा और सालस्कर का साथ ज्यादा दिनों तक नहीं टिका। दोनों में तमाम बातों को लेकर मनमुटाव शुरू हो गया दोनो ने अलग होकर अपने खास अफसरों के अलग गुट बनाये। आला अफसरों के पास दोनो गिरोह एक दूसरे के कान भरते, एक दूसरे के खबरियों का एनकाउंटर करते या एक दूसरे के करीबियों को सलाखों के पीछे पहुंचाते। ये भी बताया जाता है कि दोनों अपने दुश्मन गुटों के फोन भी टेप करते थे। जब सालस्कर और शर्मा अलग हुए तो 1995 से प्रदीप शर्मा ने सब इंस्पेकटर दया नायक को साथ ले लिया। दोनो ने मिलकर करीब 83 एनकाउंटर किये। इस बीच शर्मा की टीम में एंट्री हुई सचिन वाजे की। इसी दौरान शर्मा की टीम में फूट आई। वाजे बमकांड आरोपी ख्वाजा यूनूस की हत्या के मामले में गिरफ्तार हुए और उसी के चंद दिनों बाद दया नायक भी शर्मा से मनमुटाव के चलते अलग हो गये। बताते हैं कि जब नायक आये से ज्यादा संपत्ति के मामले में गिरफ्तार हुए तो शर्मा से उन्हे कोई मदद नहीं मिली।

इस पुलिसिया गैंगवार का एक और पहलू था। जो भी आईपीएस अफसर क्राईम ब्रांच का मुखिया बनता वो अपने कास एनकाउंटर स्पेलिस्ट अफसरो को उसकी मनचाही पोस्टिंग देता था। न केवल क्राईम ब्रांच की प्राथमिकताएं इन एनकाउंटर स्पेसलिस्ट अफसरों की सलाह पर तय की जातीं बल्कि सभी अहम पदों पर ट्रांसफर्स भी इन्ही की सिफारिश पर होते।प्रदीप शर्मा पुणे के पुलिस कमिश्नर डॉ सत्यपाल सिंह के काफी करीबी माने जाते रहे हैं, जबकि विजय सालस्कर क्राईम ब्रांच के मौजूदा प्रमुख राकेश मारिया के। क्राईम ब्रांच की सबसे ताकतवर ईकाई होती है एंटी एक्टोर्शन सेल। सत्यपाल सिंह के वक्त इस सेल के मुखिया शर्मा थे तो अब मारिया के वक्त हैं विजय सालस्कर। शर्मा की बर्खास्तगी को मुंबई पुलिस के गलियारों में सालस्कर खेमें की जीत के तौर पर भी देखा जा रहा है।

मोनिका बेदी का सच

मोनिका बेदी ने हाल ही में कुछ पत्र पत्रिकाओं में इंटरव्यू देकर बताया था कि किस तरह से वो अंडरवर्लड डॉन अबू सलेम के चंगुल में फंस गई। पर मुंबई पुलिस की क्राईम का मानना है कि इसमें थोडी हकीकत और काफी फसाना है। एक ऐसे शख्स का बयान पुलिस के पास है जो मोनिका बेदी को उस वक्त से जानता है जब बॉलीवुड में उसकी एंट्री हुई थी। इस बयान के मुताबिक मोनिका को अच्छी तरह से मालूम था कि वो काली दुनिया के एक बेहद खतरनाक आदमी से रिश्ते बढा रही थी।

मुकेश दुग्गल के साथ पहला अफेयर
मोनिका बेदी का पहला अफेयर मुकेश दुग्गल के साथ हुआ था। मोनिका और दुग्गल एक दूसरे के साथ पति पत्नी की तरह रहते थे। ये बात मुकेश दुग्गल की बीवी को पता थी इसलिये उनके बीच आये दिन झगडे होते रहते थे। मुकेश दुग्गल की हत्या हुई तो मोनिका और मुकेश की बीवी के बीच प्रोपर्टी के किसी पेपर्स को लेकर काफी बहस हुई थी। मुकेश दुग्गल की पत्नी को शक था कि उसके पत्नी ने मौत से पहले प्रोपर्टी के पेपर्स को दिये थे। मुकेश दुग्गल की बीवी के कारण अबू सलेम ने मोनिका बेदी को उन पेपर्स के सिलसिले में जानकारी के लिये फोन किया था। इस तरह से मोनिका पहली बार अबू सलेम के संपर्क में आई और धीरे धीरे उनमें दोस्ती बढती गई। मोनिका को शुरू से ही पता था कि वो किससे दोस्ती कर रही है और अबू सलेम कौन था।

अंडरवर्लड की प्रॉब्लम मोनिका ने संभाला
उन दिनों फिल्म इंडस्ट्री में बॉलीवुड का बडा दबदबा था और गैंगस्टर से दोस्ती होना एक बडी बात थी। जब मोनिका और सलेम के बीच फोन पर बातों का ये सिलसिला चल रहा था तब मोनिका एक फिल्म की शूटिंग में जुटी थी। उस फिल्म के प्रोड्यूसर डाईरेक्टर का अंडरवर्लड से जो प्रॉब्लम हुआ था उसे मोनिका ने ही संभाला था।
(अबू सलेम पहले दाऊद इब्राहिम के लिये ही काम करता था। 1997 में गुलशन कुमार की हत्या के बाद सलेम, दाऊद इब्राहिम के गिरोह से अलग हो गया, लेकिन अलग होने से पहले दाऊद को सलेम और मोनिका के चक्कर की जानकारी थी।)

सलेम के साथ मोनिका की पाकिस्तान में मिलती थी।
मोनिका बेदी अबू सलेम से मिलने पाकिस्तान गई थी। उस वक्त सलेम डी कंपनी के लिये काम करता था। दाऊद इब्राहिम को भी मोनिका बेदी का पाकिस्तान आकर सलेम के साथ होटल में रूकना पता था। सलेम कई बार मोनिका से भारत के बाहर मिला। कभी दुबई में तो कभी पाकिस्तान में। आने-जाने ठहरने का सारा खर्च सलेम देता था। मोनिका हर बार उसके पास से महंगे गिफ्ट जैसे डायमंड ज्वेलरी वगैरह लेकर वापस लौटती थी।

संजय दत्त की भाभी मोनिका बेदी
जब मोनिका अबू सलेम से शादी करने के लिये अमेरिका जा रही थी, तब उसकी गोविंदा और संजय दत्त के साथ जोडी नंबर वन फिल्म की आखिरी शूटिंग जूहू के एक होटल में हो रही थी। वहीं मोनिका ने एक ज्वेलर से 10 लाख रूपये का डायमंड मंगवाया था। वो उसे सलेम को शादी के तोहफे के तौर पर देना चाहती थी। जोडी नंबर वन की पूरी यूनिट को सलेम और मोनिका के रिश्तों के बारे में पता था। इसी वजह से शूटिंग पर संजय दत्त मोनिका को भाभी कहकर पुकारता था।

मां-बाप से झूठ बोलती थी मोनिका
मोनिका की मां को लकवा मार गया था। मोनिका अपने मांबाप से भी झूठ बोलती थी। उसने अपने मांबाप से भी अबू सलेम के साथ शादी की बात छुपाकर रखी थी। जब मीडिया के जरिये मोनिका के मां बाप तक उनकी शादी की खबर पहुंची तो उसने अपने मां बाप से कहा कि ये सब झूठ है।
जब मोनिका की फिल्मे भारत में रिलीज हुईं तो मोनिका सलेम के साथ बाहर थी। वो वापस भारत आना चाहती थी, लेकिन जब सलेम के साथ उसके रिश्तों की खबरे मीडिया में छपीं तब उसे लगा कि वो वापस भारत नहीं लौट सकेगी।वहीं जाकर उसे अपनी गलती का अहसास हुआ।

मोनिका को पीटता था सलेम
इस दौरान सलेम और मोनिका के बीच काफी झगडे होने लगे और सलेम मोनिका को काफी पीटता था। सलेम दुनिया के जिस भी देश में जाकर रहता वो मोनिका को अडोस पडोस के लोगों के संपर्क में बिलकुल नहीं आने देता।

मोनिका की अंग्रेजी
सफर के दौरान सलेम हमेशा मोनिका को अपने साथ रखता था।मोनिका को अच्छी अंग्रेजी आती थी, जबकि सलेम ढंग से अंग्रेजी नहीं बोल पाता था। अधिकारियों से कोई बात करनी हो तो मोनिका ही करती थी। मोनिका एक अच्छे घर की लडकी दिखती थी इसलिये एयरपोर्ट पर कोई ज्यादा पूछताछ नहीं करता था। मोनिका की वजह से सलेम के कई काम आसान हो गये थे।

सलेम की पहली पत्नी और मोनिका की मुलाकात
अमेरिका में मोनिका की मुलाकात सलेम की पहली पत्नी समीरा से भी हुई थी। बातचीत में दोनों ने आपस में एक दूसरे को ये बात बताई कि सलेम उन्हे पीटता है और वो औरतों की जरा भी इज्जत नहीं करता। एक बार मोनिका, सलेम के चंगुल से निकल भागने में कामियाब भी हुई और नॉर्वे अपने घर पहुंच गई। समीरा ने उसे भागने में मदद की थी और भागने के बाद भी वो समीरा के संपर्क में थी। अबू सलेम तब उसे लेने के लिये नॉर्वे पहुंचा। वो काफी असुरक्षित महसूस कर रहा था। वो मानता था कि मोनिका के एकाउंट में 2-3 करोड रूपये हैं और उसके पास 1 करोड रूपये की ज्वेलरी है। सलेम, समीरा को फोन करके कहता था कि वो मोनिका को मार देगा। बाद में मोनिका और सलेम के बीच सुलह हो गई और दोनो साथ रहने लगे।

Sunday, 27 July 2008

टार्गेट मुंबई

इंडियन मुजाहिदीन ने अब अपना निशाना मुंबई को बनाने की धमकी दी है।देश की आर्थिक राजधानी मुंबई पहले भी आतंकवादियों का निशाना बन चुकी है। पिछले 15 साल में मुंबई के लगभग सभी प्रमुख इलाकों में बम धमाके हो चुके हों। चाहे लोकल ट्रेनें हो, बेस्ट की बसें हों, बाजार हों या फिर टूरिस्ट सेंटर हो आतंकवादियों ने हर जगह पर खूनी साजिशों को अंजाम दे चुके हैं।

12 मार्च 1993 को आतंकवादियों ने मुंबई में सिलसिलेवार धमाके किये थे, जिनमें 257 लोग मारे गये, जबकि करीब 700 लोग घायल हुए थे। उस हमले के बाद भी मुंबई को आतंकवादियों ने 7 बार अपना निशाना बनाया।

2 दिसंबर 2002- घाटकोपर रेल स्टेशन के बाहर एक बेस्ट की बस में विस्फोट होता है। इस धमाके में 2 लोग मारे गये जबकि दर्जभर लोग घायल हुए। धमाकों के लिये प्रतिबंधित संगठन सिमी को जिम्मेदार माना गया। कुछ महीने पहले ही केंद्र सरकार ने सिमी पर बैन का ऐलान किया था।

6 दिसंबर 2002- घाटकोपर बस धमाके के 4 दिन बाद ही मुंबई सेंट्रल रेल स्टेशन पर मैक डॉनाल्ड रेस्तरां में जोरदार धमाका होता है। एयरकंडिश्नर डक्ट में छुपाये गये इस बम के विस्फोट से 25 लोग घायल हुए। इस हमले के पीछे भी सिमी का हाथ माना गया।

27 जनवरी 2003- विलेपार्ले रेस स्टेशन के बाहर सब्जी बाजार में साईकिल पर रखे एक बम में धमाका होता है। 30 लोग घायल होते हैं, जबकि 1 की मौत होती है। इस धमाके में भी मुंबई पुलिस सिमी के सदस्यों को गिरफ्तार करती है।

13 मार्च 2003- मुलुंद रेल्वे स्टेशन पर पहुंच रही एक लोकल ट्रेन के एक डिब्बे में जोरदार विस्फोट हुआ जिसमें 11 लोग मारे गये और 65 लोग घायल हुए। ये धमाका भीड के वक्त हुआ था, जब लोग कामकाज की जगह से अपने घर लौट रहे थे।

28 जुलाई 2003- मुंबई के घाटकोपर इलाके में बेस्ट की बस में फिर एक बार धमाका हुआ। इस हमले में 3 लोग मारे गये, जबकि आधा दर्जन लोग घायल हुए।

25 अगस्त 2003- दोपहर के वक्त दक्षिण मुंबई के जवेरी बाजार और गेटवे औफ इंडिया पर जबरदस्त धमाके हुए। इन धमाकों में 60 लोग मारे गये जबकि 200 लोग घायल हुए। धमाकों के लिये लश्कर ए तैयबा को जिम्मेंदार

11 जुलाई 2006 को मुंबई की लोकल ट्रेनों में हुए धमाकों को इस दशक में हुए देश के सबसे बडे आतंकवादी हमलों में से एक माना जा रहा है। आतंकी संगठन लश्कर ए कहर ने खार, बांद्रा, माहिम, माटुंगा, जोगेश्वरी, बोरिवली और मीरा रोड में लोकल ट्रेनों के पहले दर्जे के डिब्बों में धमाके किये जिनमें 187 लोग मारे गये और 700 के करीब लोग घायल हुए। हर धमाके के बाद मुंबई पुलिस ने जिम्मेदार लोगों की गिरफ्तारी का दावा किया, लेकिन पुलिस को शक है शहर में आतंकी संगठनों के स्लीपर सेल भी मौजूद हैं, जो हरकत में आने के लिये अपने आकाओं के आदेश का इंतजार करते हैं।

वक्त के साथ साथ आतंकवादियों ने अपने काम करने का तरीका भी बदला है। अब वे समझ चुके हैं कि किसी भी आतंकी हमने के बाद जांच एजेंसियां कैसे रिएक्ट करतीं हैं। आतंकवादी अब इन्ही बातों का ध्यान रख अपनी साजिशों को अंजाम देते हैं।

Saturday, 12 July 2008

डी कंपनी का नया पैंतरा - रिश्तों की रणनीति

डॉन के घर फिर बजी शहनाई। फिर हुआ जश्न। फिर जुटे अपने...लेकिन गुपचुप।
अंडरवर्लड डॉन दाऊद इब्राहिम ने अपने मरहूम भाई साबिर के बेटे रज्जाक उर्फ जाकिफ की शादी पिछले महीने कराची में एक आईएसआई अफसर की बेटी से करवाई। दाऊद रज्जाक को अपना बेटा मानता है। रज्जाक के पिता साबिर की 80 के दशक में दुश्मन पठान गैंग ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। चूंकि दाऊद अमेरिका और भारत की खुफिया एजेंसियों के निशाने पर है इसलिये ये सब हुआ बिलकुल गुपचुप.

२६ जून २००८ को रज्जाक की शादी एक आईएसआई अफसर की बेटी नसरीन से हुई। ये एरेंजड मैरेज थी। रिश्ता खुद दाऊद ने ही तय किया था। निकाह के मौके पर छोटा शकील और फहीम जैसे गिरोह के कुछ खास गुर्गों के अलावा दाऊद का भाई अनीस, हुमांयू, मुस्तकीम और नूरा मौजूद थे।मुंबई में रह रही दाऊद की बहन हसीना और भाई इकबाल कासकर ही 2 ऐसे करीबी रिश्तेदार थे, जो इस मौके पर गैरहाजिर थे। लडकी वालों की ओर से भी सगे संबंधियों के अलावा कुछ चुनिंदा आईएसआई अफसरों को ही बुलाया गया।

फरवरी 1980 में मुंबई के प्रभादेवी इलाके में साबिर की पठान गैंग ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। साबिर की हत्या के बाद उसकी पत्नी शहनाज ने दूसरी शादी कर ली, लेकिन साबिर का बेटा रज्जाक दाऊद के साथ दुबई चला गया और 2001 में दुबई से कराची। बिना बाप के रज्जाक की परवरिश दाऊद ने खुद की। दाऊद उसे अपना बडा बेटा मानता है।दाऊद ने ही अपने इस भतीजे री परवरिश की, उसकी जरूरतें पूरी कीं, उसकी पढाई-लिखाई करवाई।

दाऊद की ये दिली चाहत थी कि वो अपने इस भतीजे की शादी पूरी शान-ओ-शौकत से करे।23 जुलाई 2005 में अपनी बेटी महारूख की शादी के वक्त दाऊद ने कोई कसर नहीं छोडी थी। दुबई और कराची के पांच सितारा होटलों में दावते आम रखी गई थी। मेहमानों के ठहरने के लिये महंगे कमरे बुक कराये गये थे, लेकिन इस बार वैसा कुछ नहीं था। चूंकि पाकिस्तान दुनिया के सामने यही कहता है कि दाऊद उसकी जमीन पर नहीं है इसलिये शादी गुपचुप तरीके से बिना किसी धूमधडाके के हुई जिसमें सिर्फ परिवार के सदस्य और गैंग के खास लोग ही शरीक हुए। अब धीरे धीरे करके मुंबई के नाते रिश्तेदारों और गिरोह के सदस्यों को दावत के लिये पाकिस्तान बुलाया जा रहा है।हालांकि शादी की खबर डी कंपनी ने छुपाने की बहुत कोशिश की, लेकिन खुफिया एजेंसियों को भनक लग ही गई और अब ये पता किया जा रहा है कि कौन कौन लोग दाऊद की दावत खाने कराची जा रहे हैं।

अपने नाते रिश्तेदारों की शादी में भी दाऊद की एक रणनीति छुपी है। उसने अपनी बेटी की शादी जावेद मियांदाद के बेटे से करवाई। भतीजे की शादी आईएसआई अफसर से। पाकिस्तान के बडे लोगों से इन पारिवरिक रिश्तों के जरिये दाऊद पाकिस्तान में अपनी सलामती की गारंटी ले रहा है। दाऊद के एक बेटा अभी और भी हैं। ये जानना दिलचस्प होगा कि उसकी शादी किससे होती है।

Friday, 11 July 2008

डी कंपनी का नया पैंतरा - रिश्तों की रणनीति

डॉन के घर फिर बजी शहनाई। फिर हुआ जश्न। फिर जुटे अपने...लेकिन गुपचुप।अंडरवर्लड डॉन दाऊद इब्राहिम ने अपने मरहूम भाई साबिर के बेटे रज्जाक उर्फ जाकिफ की शादी पिछले महीने कराची में एक आईएसआई अफसर की बेटी से करवाई। दाऊद रज्जाक को अपना बेटा मानता है। रज्जाक के पिता साबिर की 80 के दशक में दुश्मन पठान गैंग ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। चूंकि दाऊद अमेरिका और भारत की खुफिया एजेंसियों के निशाने पर है इसलिये ये सब हुआ बिलकुल गुपचुप.२६ जून २००८ को रज्जाक की शादी एक आईएसआई अफसर की बेटी नसरीन से हुई। ये एरेंजड मैरेज थी। रिश्ता खुद दाऊद ने ही तय किया था। निकाह के मौके पर छोटा शकील और फहीम जैसे गिरोह के कुछ खास गुर्गों के अलावा दाऊद का भाई अनीस, हुमांयू, मुस्तकीम और नूरा मौजूद थे।मुंबई में रह रही दाऊद की बहन हसीना और भाई इकबाल कासकर ही 2 ऐसे करीबी रिश्तेदार थे, जो इस मौके पर गैरहाजिर थे। लडकी वालों की ओर से भी सगे संबंधियों के अलावा कुछ चुनिंदा आईएसआई अफसरों को ही बुलाया गया।फरवरी 1980 में मुंबई के प्रभादेवी इलाके में साबिर की पठान गैंग ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। साबिर की हत्या के बाद उसकी पत्नी शहनाज ने दूसरी शादी कर ली, लेकिन साबिर का बेटा रज्जाक दाऊद के साथ दुबई चला गया और 2001 में दुबई से कराची। बिना बाप के रज्जाक की परवरिश दाऊद ने खुद की। दाऊद उसे अपना बडा बेटा मानता है।दाऊद ने ही अपने इस भतीजे री परवरिश की, उसकी जरूरतें पूरी कीं, उसकी पढाई-लिखाई करवाई।दाऊद की ये दिली चाहत थी कि वो अपने इस भतीजे की शादी पूरी शान-ओ-शौकत से करे।23 जुलाई 2005 में अपनी बेटी महारूख की शादी के वक्त दाऊद ने कोई कसर नहीं छोडी थी। दुबई और कराची के पांच सितारा होटलों में दावते आम रखी गई थी। मेहमानों के ठहरने के लिये महंगे कमरे बुक कराये गये थे, लेकिन इस बार वैसा कुछ नहीं था। चूंकि पाकिस्तान दुनिया के सामने यही कहता है कि दाऊद उसकी जमीन पर नहीं है इसलिये शादी गुपचुप तरीके से बिना किसी धूमधडाके के हुई जिसमें सिर्फ परिवार के सदस्य और गैंग के खास लोग ही शरीक हुए। अब धीरे धीरे करके मुंबई के नाते रिश्तेदारों और गिरोह के सदस्यों को दावत के लिये पाकिस्तान बुलाया जा रहा है।हालांकि शादी की खबर डी कंपनी ने छुपाने की बहुत कोशिश की, लेकिन खुफिया एजेंसियों को भनक लग ही गई और अब ये पता किया जा रहा है कि कौन कौन लोग दाऊद की दावत खाने कराची जा रहे हैं।अपने नाते रिश्तेदारों की शादी में भी दाऊद की एक रणनीति छुपी है। उसने अपनी बेटी की शादी जावेद मियांदाद के बेटे से करवाई। भतीजे की शादी आईएसआई अफसर से। पाकिस्तान के बडे लोगों से इन पारिवरिक रिश्तों के जरिये दाऊद पाकिस्तान में अपनी सलामती की गारंटी ले रहा है। दाऊद के एक बेटा अभी और भी हैं। ये जानना दिलचस्प होगा कि उसकी शादी किससे होती है।

Wednesday, 11 June 2008

हाई टाईड आने की आशंका !

एक बार फिर कुछ शब्द न्यूज चैनलों पर मुंबईया बारिश के कवरेज को लेकर....
4 दिनों पहले एक राष्ट्रीय चैनल पर लाईव हो रहा था। रिपोर्टर मुंबई के एक समुद्र तट पर खडा था और एंकर उससे बारिश से शहर के जनजीवन पर होने वाले असर को लेकर सवाल पूछ रहा था। अचानक एंकर ने रिपोर्टर से एक सवाल पूछा जिससे मै चौंक पडा – क्या पुणे में भी हाई टाईड आने की आशंका है ?
इस सवाल से मुझे हंसी भी आई और गुस्सा भी।
एंकर महोदय को कौन समझाये कि हाईटाईड कोई भूकंप या चक्रवात नहीं है, जिसके की आने की आशंका हो। ये तो समुद्र में होने वाली दैनिक क्रिया है , जिसका संबंध चांद की गुरूत्वाकर्षण शकित से जुडा है। जिस तरह हम सांसे लेते हैं उसी तरह से समुद्र में रोज ज्वार भाटा आता है। हाई टाईड यानी ज्वार से मुंबई में दिक्कत सिर्फ तब ही होती है जब भारी बारिश के साथ इसका मेल हो जाये। हाई टाईड के वक्त ऊंची लहरें उठतीं हैं और इससे होता ये है कि मुंबई के मल निकासी सिस्टम से जो गंदा पानी समुद्र की ओर जाना होता है वो निकल नहीं पाता और इसकी वजह से शहर में जगह जगह पानी भर जाता है, ट्रेन सेवाओं पर असर पडता है और लोगों को कई तरह की परेशानियां झेलनीं पडतीं हैं। खासकर भारी बारिश वाले जिस दिन 4.50 मीटर से ऊंची लहरें उठतीं हैं उसी दिन मुंबई में दिक्कत होती है।

दूसरी बात कि हाईटाईड पुणे में नहीं आता क्योंकि वहां तो कोई समुद्र है ही नहीं।

उस रिपोर्टर ने एंकर के मूर्खतापूर्ण सवाल को अपने जवाब से संभाल लिया और पूरी बात उसे ऑन एयर समझाई।
बहरहाल, जब तक संपादक टीवी पत्रकारों की बौद्धिक क्षमता आंके बगैर अपने चाटुकारों और कन्याओं को महज उनकी खूबसूरती के आधार पर एंकर बनाते रहेंगे, न्यूज चैनलों पर मनोरंजन के ऐसे मौके आते रहेंगे। वैसे भी अब न्यूज चैनलों पर न्यूज के बजाय सिर्फ मनोरंजन ही तो मिलता है। एऩजॉय द शो।

Tuesday, 10 June 2008

सावधान! ये बारिश फर्जी है

मुंबई में अगर कोई एक मौसम तकलीफ देता है तो वो है मानसून। हर साल जून से लेकर अगस्त के बीच आपको तमाम टीवी चैनलों पर एक जैसी तस्वीरें देखने मिलेंगीं। वही सडकों पर भरा पानी, उसमें फंसे वाहन, वही पटरियों पर फंसीं लोकल ट्रेनें और छाता लगाकर उसके किनारे चलते लोग। मिलन सबवे, खार सबवे, मालाड सबवे जैसी जगहों के नाम राष्ट्रीय चैनलों पर इतनी बार पिछले चंद सालों में चल चुके हैं कि लगता है जल्द ही वे कुतुब मिनार की तरह मशहूर हो जायेंगे। आज सुबह 8 बजे के करीब भी मैने एक राष्ट्रीय चैनल पर ऐसी ही तस्वीरें चलतीं देखीं। तस्वीरों के साथ रिपोर्टर का फोनो भी चल रहा था कि मुंबई में सबकुछ अस्तव्यस्त हो गया है, त्राही त्राही मच गई है, लोकल ट्रेन लेट हो गई है। सारे सबवे भर चुके हैं वगैरह वगैरह.....उस चैनल पर ये खबर देख मैने इस ख्याल के साथ एक लंबी सांस ली कि लगता है आज भी बारिश के कवरेज पर ही रिपोर्टरों की पूरी फोर्स लगानी होगी। दूसरी खबरों पर काम नहीं हो पायेगा।
इसी उलझन के साथ मैं घर की बालकनी में पहुंचा। बाहर देखा तो चौंक पडा। सडक गिली थी, लेकिन भारी बारिश हुई हो ऐसा बिलकुल नहीं लग रहा था। कुछ देर पहले हल्की फुहारें पडी होंगीं बस इसका अंदाजा आ रहा था।

मैने अपने नाईट रिपोर्टर को फोन किया।
क्या रात को बहुत बरसात हुई ?
नहीं सिर्फ हल्की फुल्की बारिश सुबह के वक्त हुई थी।
क्या ट्रेनें और बसें देर से चल रहीं हैं ?
नहीं। कंट्रोल चैक किया। सब सामान्य है। सुबह की शिफ्ट के सारे कर्मचारी भी वक्त पर पहुंचे हैं। किसी को कोई दिक्कत नहीं हुई।

मेरे रिपोर्टर की जानकारी उस राष्ट्रीय चैनल पर दिखाई जा रही तस्वीरों के बिलकुल विपरीत थी। तसल्ली के लिये मैने विलेपार्ले में रहने वाले एक और रिपोर्टर को फोन किया।
क्या तुम्हारे इलाके में भारी बारिश हो रही है और पानी भरा है ?
नहीं तो...यहां तो अब धूप निकली है
ट्रेन लेट है क्या ?
नहीं टाईम पर है। मैं ऑफिस आने के लिये स्टेशन पर खडा हूं।

मैने टीवी पर फिर वही चैनल लगाया। ध्यान से देखने पर पूरा माजरा समझ में आ गया। दरअसल ये तस्वीरें पिछले शनिवार की थीं, जब वाकई में बारिश ने मुंबई में कहर बरपाया था। इस चैनल ने आज वही तस्वीरें दिखाई ये बताते हुए कि ये आज की तस्वीरें है। झूठ, अविश्वनीयता और धोखेबाजी का उस चैनल पर “लाईव प्रसारण” हो रहा था। लोगों को बेवजह डराने का गुनाह कर रहा था ये चैनल और अक्सर ऐसा करने वाले करने वाले कई और भी चैनल हैं।

टीआरपी की अंधी दौड में कुछ न्यूज चैनलों की ऐसी हरकतें ही टीवी पत्रकारों और चैनलों के समाज में सम्मान और विश्वनीयता को मटियामेट कर रहीं है। ऐसी करतूतों की वजह से ही न्यूज चैनल मजाक का विषय बनते जा रहे हैं। इन्हीं की वजह से महाराष्ट्र सरकार को इतनी हिम्मत आ गई है कि वो बात बात पर टीवी चैनलों को धमकाती है। परसों ही सरकार की ओर से ये चेतावनी आई कि अगर कोई टीवी चैनल बारिश की पुरानी तस्वीरों को बिना फाईल का स्लग दिये चलाता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जायेगी और जिम्मेदार व्यकित को जेल में ठूंसा जायेगा। आखिर ऐसी नौबत आई ही क्यों ???जाहिर है हम टीवी पत्रकारों की बीच ही कुछ ऐसी ओछी मानसिकता के लोग भर गये हैं जिन्हें न तो इस व्यवसाय की गरिमा की कोई परवाह है और न ही समाज की। एक टीवी पत्रकार होने के नाते मैं ऐसे पाप का विरोध करता हूं और अपने आप से ये वादा करता हूं कि कम से कम अपने कार्यक्षेत्र में ऐसी हरकतों की गुंजाईश नहीं बनने दूंगा।