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Friday, 2 October 2009

5 things I Hate & Like about Raj thackeray.

Hate:
1) He is dividing Indians at crucial time when the country needs to stand together against external enemies.
2) He is weakening Hindus by dividing them on regional lines & justifies his actions by citing egs of Mayawati, Lalu, Mulayam etc.
3) He has no original idea. Copies uncle Balasaheb in terms of ideas & style of oratory.
4) Preach, but don’t practice formula. Betrayed political mentor Balasaheb, but talks about loyalty for Maharshtra. Invited Michael Jackson but isn’t ashamed to claim himself as protector of Marathi culture.
5) Fooling people of Maharshtra by fanning emotional issues for personal growth & deviating them from real issues.

Like:
1) He is an excellent cartoonist.
2) He has good dressing sense & presents himself before public appropriately.
3) Does good homework & makes detailed study of issues before making a public speech.
4) Has excellent quality of copying others eg.Bal Thackeray.The self righteous attitude. Doesn’t care a bit for negative criticism & moves ahead with own agenda

Friday, 29 May 2009

दाऊद इब्राहिम के हथियारखाने में सेंध मारने वाला चोर

दाऊद इब्राहिम भले ही अंडरवर्लड का डॉन हो, लेकिन खुद उसका अपना हथियारखाना चोरो से महफूज नहीं है। मुंबई पुलिस ने पकडा है एक ऐसे चोर को जिसने सीधे दाऊद इब्राहिम के हथियारखाने में सेंधमारी। इस चोर के पास से करीब एक हजार जिंदा कारतूस मिले हैं, जिनका इस्तेमाल दाऊद गिरोह करने वाला था।

पुलिस के मुताबिक मकसूद खान का पेशा है चोरी। हाल ही में पुलिस ने इसे तब पकडा जब ये कुछ कारतूस बेचने की कोशिश कर रहा था। जब हवालात में इससे कडी पूछताछ की गई तो इसने जो जानकारी उगली उससे पुलिस अधिकारी भी चकरा गये। मकसूद खान को ये कारतूस मिले थे दक्षिण मुंबई के दो टाकी इलाके की एक मिल से। सालों से बंद पडी अहमद उमर मिल का इन दिनों दाऊद गिरोह बतौर हथियारखाना इस्तेमाल कर रहा था। सीधे दाऊद के हथियारखाने पर हाथ मारा था मकसूद खान ने। पकडे जाने पर मकसूद पुलिस की टीम को यहां लेकर आया जहां से पुलिस ने कुछ और कारतूस बरामद किये।

मकसूद खान ने न तो कभी डी कंपनी के लिये काम किया था और न ही उसे मालूम था कि यहां कारतूस रखे हैं। वो इस मिल में घुसा था कबाड चुराने के इरादे से, लेकिन इसी दौरान इसके हाथ लग गये कारतूस जो कि मिल के एक कोने में छुपा कर रखे गये थे। मकसूद को लगा कि इनसे उसे मोटी रकम मिल सकती है। वो इन्हें बेचने निकला और पक़डा गया। जिस इलाके में ये मिल है दरअसल वो दाऊद इब्राहिम का गढ माना जाता है। दाऊद इब्राहिम का पुस्तैनी घर जिस पाकमोडिया स्ट्रीट में है, वो यहां से बमुश्किल आधा किलोमीटर भी दूर नहीं। छोटा शकील का अड्डा टेमकर मोहल्ला भी पास ही में है।

जिस मिल का इस्तेमाल दाऊद गिरोह बतौर हथियारखाना कर रहा था वो तेल की मिल थी। पार्टनरों के आपसी विवाद की वजह से ये मिल अबसे चंद साल पहले ये मिल बंद हो गई। भले ही मिल अब एक खंडहर में तब्दील हो रही हो, लेकिन दाऊद इब्राहिम के गिरोह के लिये ये जगह बहुत ही फायदेमंद थी। सूत्र बताते हैं कि गिरोह की गैरकानूनी गतिविधियों को चलाने के लिये जो भी हथियार और कारतूस मुंबई आते थे उन्हें इस जर्जर मिल में छुपाया जाता था और जरूरत पडने पर यहां से हथियार निकाल कर शूटरों को बांटे जाते। आमतौर पर अंडरवर्लड के गिरोह ऐसी जगहों पर ही अपने हथियार छुपाते हैं, जो सुनसान होती है और जहां ज्यादा लोगों का आना-जामा नहीं होता।
डी कंपनी को ऐसा विश्वास था कि यहां हथियार छुपाने से उनपर पुलिस की नजर नहीं पडेगी..उनका अंदाजा ठीक भी था, लेकिन पुलिस के बजाय डी का खेल बिगाडा एक चोर ने। मकसूद से पुलिस ने कुल 916 जिंदा कारतूस बरामद किये हैं, जिनमें 0.30, 0.22, 9 एमएम और 12 बोर के कारतूस शामिल हैं। पुलिस और दूसरी एजेंसियां अब इस मिल की खाक छान रहीं हैं कि मिल के दूसरे कोनों में भी हथियार नहीं छुपे हैं।

पहली नजर में आपको शायद ही लगे कि एक बंद पडी, जर्जर मिल में खतरनाक हथियारों का जखीरा हो सकता है। अंडरवर्लड का स्टाइल ही ऐसा है,कि वो अपने तौर तरीकों से सभी को चौकां देता है लेकिन एक अदने से चोर ने जो हरकत की है उससे अंडरवर्लड भी सकते में है। मयांक भागवत के साथ जीतेंद्र दीक्षित, स्टार न्यूज, मुंबई।

Saturday, 23 May 2009

गवली के बाद अब अश्विन नाईक की राजनीति में दस्तक

अंडरवर्लड डॉन अश्विन नाईक भी बनना चाहता है राजेनता और इसलिये जेल से छूटने के बाद वो लगा रहा है राजनेताओं के घरों के चक्कर। इसी सिलसिले में आज उसने शिवसेना का कार्यकारी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे से मुलाकात की।
अश्विन नाईक अपनी पत्नी की हत्या समेत तमाम आपराधिक मामलों में जेल में कैद था और चंद महीनों पहले ही उसकी रिहाई हुई।
अंडरवर्लड डॉन अश्विन नाईक वैसे तो व्हील चैयर के बिना हिल भी नहीं सकता, लेकिन उसके मंसूबे राजनीति में हडकंप मचाने के हैं। नाईक चाहता है कि वो भी महाराष्ट्र की राजनीति में जोर आजमाईश करे और इसी सिलसिले में उसने मुलाकात की शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे से। शिवसेना से वैसे अश्विन नाईक की करीबी नई नहीं है। नाईक की मृत पत्नी नीता नाईक शिवसेना की नगरसेविका यानी कि पार्षद रह चुकीं हैं। पिछले हफ्ते ही खबर आई थी कि नाईक ने एमएनएस नेता राज ठाकरे से मुलाकात की है, लेकिन दोनो लोग इस बारे में खुलकर कुछ नहीं रहे।

अश्निन नाईक राजनेताओं के चक्कर क्यों लगा रहा है ? सूत्रों की मानी तो नाईक अब अपने पुराने प्रतिद्वंदवी अंडरवर्लड डॉन अरूण गवली के पैटर्न पर अपना करियर बनाना चाहता है। गवली ने अंडरवर्लड से राजनीति में कदम रखा और विधायक बन गया। उसने अपनी बेटी और भाभी को भी नगरसेविका बनवा दिया। गवली को देखकर अश्विन नाईक को भी लगता है कि राजनीति में आने के बाद वो फिरसे ताकतवर हो सकेगा और सुरक्षित भी रहेगा।

व्हील चेयर के सहारे अपनी जिंदगी बिता रहे अश्विन नाईक को लाचार न समझिए। मुंबई अंडरवर्लड में इसकी इमेज के बहुत ही क्रूर और खतरनाक डॉन की रही है। मुंबई में दाऊद इब्राहिम के गिरोह के बाद जो 3 दूसरे बडे गिरोह हैं उनमें से एक है अश्विन नाईक का गिरोह। इस गिरोह की कमान पहले अश्विन के बडे भाई अमर नाईक के हाथ में थी। अश्विन नाईक वैसे तो पेशे से इंजीनियर था, लेकिन 1997 में शहीद इंस्पेक्टर विजय सालस्कर के हाथों अमर नाईक एक एनकाउंटर में मारा गया. जिसके बाद गिरोह की कमान अश्विन नाईक के हाथ आ गई। अश्विन पर जेल में रहकर भी अपना गिरोह चलाने का आरोप था। 13 नंवबर 2000 को अश्विन नाईक की पत्नी नीता नाईक की उसके घर में हत्या कर दी गई। पुलिस का कहना था कि हत्या की सुपारी अश्विन नाईक ने ही जेल में रहकर दी थी क्योंकि उसे शक था कि पत्नी नीता के एक पुलिस कांस्टेबल के साथ अनैतिक रिश्ते हैं..पर पुलिस अदालत में नीता की हत्या समेत अश्विन पर लगे तमाम आरोपो को साबित नहीं कर पाई और इसी साल वो तमाम मामलों से बरी हो गया।

जेल से छूटने के बाद अब अश्निन नाईक राजनीति में कदम जमाने की कोशिश तो कर रहा है, लेकिन ये जानना दिलचस्प होगा कि कौनसी राजनीतिक पार्टी अश्विन को जगह देती है। ताजा चुनावी नतीजों ने बाहुबलि उम्मीदवारों को धूल चटा दी और ये बात राजनीतिक दल अच्छी तरह से जानते हैं।

Thursday, 21 May 2009

डायरी 26 नवंबर 2008 (भाग-1)

(26 मई को मुंबई पर हुए आतंकी हमले के 6 महीने पूरे हो रहे हैं। उसीपर आज से 8 भागों में ये लेख)
26 नवंबर की काली रात

26 नवंबर की रात करीब 9.30 बजे होंगे। मैने मोहम्मदअली रोड से सीएसटी रेल स्टेशन के सामने प्रेस क्लब में अपने एक सूत्र से मुलाकात करने के लिये टैक्सी पकडी। टैक्सी कुछ ही मीटर आगे बढी होगी कि तभी एक खबरी का फोन आया – कोलाबा के लिओपोल्ड कैफे में फायरिंग चल रही है। लगता है कि किन्ही ग्रुप्स में झगडा हुआ है, जिसके बाद 2 लोग सब पर फायरिंग कर रहे हैं। अब तक 100 राउंड फायर हो चुके हैं

50 राउंड फायर की बात सुनकर मेरा माथा ठनका। आमतौर पर मुंबई में गैंगवार के चलते हुए शूटआउट्स में भी इतनी गोलियां नहीं चलीं। मामला गैंगवार का नहीं लगता।मैने तुरंत दफ्तर में फोन करके ओबी वैन और एक रिपोर्टर को लिओपोल्ड कैफे की ओर रवाना करने को कहा और टैक्सीवाले को भी वहीं चलने का निर्देश दिया।

खबर को कन्फर्म करने के लिये मैं स्थानीय डीसीपी विश्वास नागरे पाटिल को फोन लगाने लगा, लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो पा रहा था। टैक्सी जब क्रॉफर्ड मार्केट के पास एमआरए मार्ग पुलिस थाने के पास पहुंची तो मैने देखा कि कई हथियारबंद पुलिसकर्मी दौडते हुए की एक वैन में बैठ रहे हैं। मुझे लगा कि शायद इन्हें भी कोलाबा की फायरिंग वाले मामले के लिये भेजा जा रहा है।

एमआरए मार्ग से कुछ मीटर आगे ही सीएसटी रेल स्टेशन था...मुझे वहां से पटाखों की आवाज सुनाई देने लगी। जैसे जैसे टैक्सी आगे बढी ये आवाज भी तेज होने लगी। जैसे ही मैं सीएसटी के मुख्य दरवाजे के पास से गुजरा तो वहां का मंजर देख कर दंग रह गया। सैकडों लोग बेतहाशा भाग रहे थे। कुछ सडक किनारे लेटे हुए थे। चीख पुकार मची थी। समझ में आ गया कि पटाखों की आवाज दरअसल फायरिंग की आवाज थी। उसी वक्त एक दोस्त ने फोन करके बताया कि नरीमन पॉइंट पर होटल ओबरॉय में भी फायरिंग हो रही है। मेरा शक पुख्ता हो गया था। मुंबई शहर पर आतंकियों ने हमला किया है और आतंकी भीडभाड वाले और शहर के अहम ठिकानों को अपना निशाना बना रहे हैं।

रीगल सिनेमा से लिओपोल्ड कैफे की तरफ जानेवाली सडक पूरी तरह जाम थी। इसलिये मैने टैक्सी रीगल सिनेमा के पास ही छोड दी और लिओपोल्ड कैफे की ओर पैदल दौड पडा। लिओपोल्ड के बाहर हाहाकार मचा हुआ था। कैफे के बाहर काफी भीड जमा थी। सडक पर खून ही खून था। लोगों के चप्पल जूते पडे हुए थे। कुछ लोग रो रहे थे तो कुछ सरकार और पुलिस को गालियां दे रहे थे। कुछ लोग लाशें और घायलों को निकाल रहे थे। कैफे के अंदर का मंजर और भी भयानक था। फर्श पर खून से सने खाली कारतूस पडे हुए थे। टेबल-कुर्सीयां, शराब और कोल्ड ड्रिक की बोतले और प्लेटें यहां-वहां बिखरी पडीं थीं। दीवारों पर गोलियों के निशान थे। इस लिओपोल्ड कैफे में एक बार पहले भी अपने कुछ दोस्तों के साथ आ चुका था। बडी रौनक हुआ करती थी यहां, लेकिन उस वक्त का मंजर देखकर यकीन नहीं हुआ कि ये वही लिओपोल्ड कैफे है।

इस दौरान मेरा रिपोर्टर सचिन भिडे और कैमरामैन वहां पहुंच चुके थे।पहले मैने वहां मौजूद कुछ चश्मदीदों से बात की और पूछा कि क्या वो आंखों देखी हमारे कैमरे पर बता सकेंगे।उनकी मंजूरी के बाद हमने उनकी बाईट्स ली और साथ ही एक वाक थ्रू के जरिये वहां का हाल बयां किया। चश्मदीदों ने बताया कि हमला करनेवाले 2 लोग थे, जिनकी उम्र 22-23 साल के करीब होगी। उनके पास बैग थे और दोनों ही एके-47 जैसे दिखनेवाले हथियारों से फायरिंग कर रहे थे। वो खासकर गोरे पर्यटकों को अपना निशाना बना रहे थे। फायरिंग करने के बाद दोनो शूटर ताज होटल की ओर भागे।

ताज होटल की ओर भागे हैं...मतलब की वहां भी दोनो इसी तरह का कत्लेआम कर रहे होंगे। मैं भी अपने कैमरामैन के साथ ताज की तरफ दौडा जो कि लिओपोल्ड कैफे के पिछवाडे की गली में ही है। ओबी वैन को भी मैनै ताज की ओर ही लगाने को कहा क्योंकि अब तक जो कुछ भी शूट किया गया था उसे नोएडा अपलिंक भी करना था। पुराने ताज के अपोलो बंदर की तरफ वाले कोने पर मुझे अपनी ओबी वैन खडी मिली। मैने तुरंत ओबी वैन पर अपना टेप दिया और कैमरामैन के साथ ताज टॉवर के मेन गेट की तरफ भागा मेन गेट के बाहर सन्नाटा था..न तो वहां हमेशा मौजूद रहने वाले सिख दरबान थे और नही किसी तरह की चहल पहल थी। मुझे आशंका थी कि अगर आतंकवादी यहां पहुंचे होते तो यहां भी लिओपोल्ड कैफे या सीएसटी की तरह कोहराम मचा होता, लोग भाग दौड रहे होते..लेकिन यहां तो बिलकुल शांति थी। मेन गेट के बाहर कुछ दूरी पर एक पुलिस वैन जरूर खडी थी, जिसमें से लगातार वायरलैस की बातचीत सुनाई दे रही थी। यहां आतंकी हमला हुआ है या नहीं इसी उधुडबुन में मैने ताज टॉवर के मेनगेट का कांच का दरवाजा खोला और दरवाजा खोलते ही मेरे होश उड गये। होटल का रिसेप्शन एरिया खून से सना था। हर ओर लाशें ही लाशें पडीं थीं। पुराने ताज को नये ताज से जोडने वाले गलियारे में भी 2 लाशें पडीं थीं। नीचे मारे जानेवालों में 3 लोग होटल के कर्मचारी ही थे। जिन्होने सफेद रंग की यूनीफॉर्म पहन रखी थी। इसके अलावा कुछ विदेशी मेहमानों के शव पडे थे। साफ हो गया कि ये उन्ही आतंकियों की करतूत है मैने तुरंत अपने कैमरामैन को कहा रोल करना शुरू करो...पर कैमरामैन ने कहा कि अब उसके पास टेप नहीं है। जल्दबाजी में वो दफ्तर से एक ही टेप लेकर निकला था, जिसे हम लिओपोल्ड कैफे की वारदात को शूट करने के बाद ताज के दूसरे कोने पर खडी ओबी वैन पर छोड आये थे...मैने कैमरा मैन और सचिन भिडे को कहा कि वे दोनो मेन गेट के बाहर ही रूकें मैं टेप लेकर आता हूं। इसी बीच मुझे कई फोन आये जिसमें चश्मदीदों के अलावा परिचित पुलिस वालों के भी फोन थे। उनसे मुझे पता चला कि सीएसटी के आसपास और होटल ओबरॉय की ओर भी फायरिंग हो रही है।

ओबी से टेप लेकर मैं ताज की पुरानी बिल्डिंग के किनारे किनारे दौडकर वापस लौट ही रहा था कि अचानक मेरे पीछे एक जोरदार धमाके की आवाज आई। आतंकियों ने इमारत की ऊपरी मंजिल से मेरी ओर हथगोला फैंका था। मैंने थोडी और तेज रफ्तार से आगे भागा..लेकिन 5 से 6 सेकंड के भीतर उन्होने फिर एक हथगोला फैंका इसी के साथ 3 राउंड फायर की आवाज भी सुनाई दी। हालांकि हथगोले के छर्रे मुझे नहीं लगे, लेकिन उनके विस्फोट से पैदा होनेवाली गर्मी मेरी पीठ ने महसूस की। मेरी लिये ये उस रात का सबसे डरावना वाकया था। मैं शायद आतंकियों का निशाना बनने से बाल बाल बचा था। खैर तभी मुझे नोएडा स्टूडियो से फोन आया और पूरी मुंबई में हो रही फायरिंग की वारदातों पर फोनों देने को कहा गया। काम के दबाव के आगे डर, दुख और गुस्से जैसे भाव अपने आप ही दब गये। दिमाग में बस एक ही बात थी कि शहर में एक बडी घटना हुई है और एक कडे व्यवसायी कि तरह इसके कवरेज में पूरी जान लगा देनी है और सबसे बेहतर कवरेज करना है। मुंबई का ब्यूरो चीफ होने के नाते मेरे ऊपर दोहरी, जिम्मेदारी थी। मुझे न केवल ताज में हुए आंतकी हमले की रिपोर्टिंग करनी थी, बल्कि साथ साथ अपने सारे रिपोर्टरों को भी कॉर्डिनेट करना था। सभी रिपोर्टरों को तुरंत वापस ड्यूटी पर आने के लिये कहा गया..वैसे ज्यादातर रिपोर्टर जो कि दफ्तर से घर के रास्ते में थे, हमले की खबर सुनते ही खुद ब खुद वापस दफ्तर की ओर लौट पडे।

Saturday, 3 January 2009

सलीम लंगडे को किसने मारा ?

उसे ये मालूम था कि आतंकी अमेरीकी कंसूलेट को निशाना बनाने वाले हैं। उसी की मदद से इस काम के लिये इंडोनेशिया से आये 2 आतंकियों को पकडा गया। उसे मुंबई में हुए ताजा आतंकी हमले की भी भनक लग चुकी थी, लेकिन इससे पहले कि वो इस राज को जाहिर कर पाता उसे खत्म कर दिया गया। ये कहानी है मुंबई पुलिस के उस खबरी सलीम लंगडे की जो आतंकियों को उनकी साजिश में मदद कर रहा था, लेकिन बीच में ही उसकी वतनपरस्ती ने उसे झकझोरा और उसने सारा कुछ खुफिया एजेंसी के सामने उगल दिया...लेकिन इसकी कीमत उसे अपनी जान देकर चुकानी पडी।
सलीम के 3 बच्चे अब अनाथ हो चुके हैं। सालभर पहले ही सलीम और उसकी बीवी की एक सडक हादसे में मौत हो गई...पर क्या वो मौत वाकई में सडक हादसे की वजह से हुई थी या फिर दोनों किसी साजिश का शिकार हुए थे? इस सवाल का जवाब ढूंढने की कोशिश जब हमने की तो कई चौंकानेवाली जानकारी हाथ आई...लेकिन इससे पहले सलीम के काम और उसकी शख्सियत पर एक नजर डालना जरूरी है।अबसे करीब डेढ साल पहले तक दक्षिण मुंबई के कोलाबा की गलियों में घूमने वाले इस शख्स को लोग सलीम लंगडे के नाम से भी जानते थे। एक एक्सीडैंट में उसके पैर में चोट लग गई थी जिसकी वजह से वो लंगडा कर चलता था।सलीम पहले मुंबई बंदरगाह में विदेश से आये जहाजों में सेंधमारी का काम करता था। इस सिलसिले में उसे कई कई बार जेल भी जाना पडा। जेल में उसकी जान पहचान कई ड्रग्स के तस्करों से हुई। कुछ दिनों तक सलीम ने उनके लिये काम किया और फिर वो पुलिस और नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो का खबरी बन गया। सलीम को सबसे बडी कामियाबी मिली साल 2001 में जब उसने फिल्मस्टार फरदीन खान को कोकेन खरीदते रंगेहाथ पकडवाया था। सलीम हवालात में फरदीन के साथ निकाली गई तस्वीरों को बडी शान से दिखाता था। उसे उन तमाम सर्टीफिकेट्स पर भी बडा नाज था जो ड्रग्स के बडे कंसाईनमेंट पकडवाने पर तमाम सुरक्षा एजेंसियों की ओर से उसे मिले थे। नशे के काले कारोबार की जानकारी के मामले में सलीम नंबर वन खबरी बन गया था। उसका घर भी कंसाईनमेंट पकडवाने पर मिलने वाले सरकारी ईनाम से चलता था।
सलीम नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो और मुंबई पुलिस के लिये तो काम करता ही था, उसके ताल्लुकात एक ऐसे आदमी से भी थे जो एक तेल माफिया था और दाऊद गिरोह के लिये काम करता था। 2007 में इस तेल माफिया ने उसकी मुलाकात 2 विदेशियों से कराई। दोनों इंडोनेशिया से आये थे।सलीम को एक मोटी रकम देते हुए तेल माफिया ने उससे कहा कि वो इनकी मदद करे
सलीम भले ही पुलिस और नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के लिये काम कर रहा था, लेकिन पैसों के लालच ने उसे ये पूछने से रोक दिया कि दोनो किस मकसद से मुंबई आये थे और क्या करना चाहते थे। उसे यही लगा कि शायद ड्रग्स या तेल के काले कारोबार के सिलसिले में दोनो मुंबई आये हैं। दोनो इंडोनेशियाई नागरिक दक्षिण मुंबई के ताज प्रेसीडेंट होटल में ठहरे। उनके पास सोनी का एक लैप टॉप और सैटेलाईट फोन थे। उन्होने काले रंग की एक एसयूवी कार भी किराये पर ली और हर रोज दक्षिण मुंबई के कोलाबा इलाके से लेकर मध्य मुंबई के वर्ली समुद्र तट तक चक्कर मारते और रास्ते में रूक रूक कर तस्वीरें लेते। बाद में इन्ही तस्वीरों को वे किसी को ईमेल करते।

सलीम हर वक्त उनके साथ होता। जिस नरीमन हाऊस में आतंकियों के साथ एनएसजी का एनकाउंटर हुआ, उसी के पास दोनो ने उसे एक घर भी किराये पर लेने को कहा थे। सलीम ने उनके कहने पर अपनी पत्नी मुमताज के नाम पर यहां एक घर किराये पर ले लिया। प्रेसीडेंट होटल को छोडकर फिर दोनो इंडोनेशियाई यहां रहने लगे।
कुछ दिनों में सलीम उनके भरोसे का आदमी बन चुका था। अब दोनो शख्स उसके सामने बात करने से भी नहीं हिचकिचाते और उन्होने मुंबई में अपने मिशन के बारे में भी उससे चर्चा करनी शुरू कर दी। उनसे बातचीत में जो कुछ भी सलीम ने सुना उससे उसके होश उड गये। जिनको वो अंडरवर्लड का आदमी समझ रहा था, दरअसल वे आतंकवादी थे। सलीम को उनकी बातों से संकेत मिला कि दोनो दक्षिण मुंबई के ब्रीच कैंडी इलाके में अमेरीकी कंसूलेट पर समुद्र के रास्ते हमला करने की तैयारी कर रहे हैं। चूंकि अमेरीकी कंसूलेट समुद्र के किनारे है, उनका इरादा था कि वे एक विस्फोटको से लदी एक बोट लाकर उससे टकरा दें। इस काम के लिये वो सलीम की ही मध्यम आकार की मोटरबोट का इस्तेमाल करने वाले थे जो उसने मार्च 2005 में अपनी पत्नी मुमताज के नाम खरीदी थी। दक्षिण मुंबई के कई और ठिकाने भी उनके टार्गेट पर थे। इसी साजिश को अंजाम देने के लिये दोनो मुंबई आये थे और यहां सलीम उनके एक मोहरे के तौर पर इस्तेमाल हो रहा था। उसे ये भी पता चला कि दोनो शख्स अक्टूबर 2002 में बाली में हुए धमाकों के आरोपी के रिश्तेदार थे।
सलीम अब सोच में पड गया था कि आखिर वो क्या करे। एक तरफ भारी रकम का लालच था तो दूसरी ओर देश से गद्दारी। काफी सोचने के बाद उसने ये फैसला किया कि वो वतन से गद्दारी नहीं करेगा और सबकुछ इंटैलिजैंस ब्यूरो का बता देगा।
दक्षिण मुंबई के एक गुप्त ठिकाने पर सलीम ने आईबी अधिकारियों के साथ मीटिंग की और दोनों इंडोनेशियाई नागरिकों के बारे में सबकुछ उन्हें बता दिया। आईबी के अफसर तुरंत हरकत में आये। उन्होने सलीम से कहा कि वो उन दोनों आतंकियों के साथ बना रहे और उनकी जानकारी देता रहे। कुछ दिनों बाद ही दक्षिण मुंबई के कोलाबा इलाके से आईबी ने दोनों इंडोनेशियाई नागरिकों को उठा लिया और कडी पूछताछ करने के बाद गुपचुप उन्हें भारत से डीपोर्ट कर दिया गया। ये पूरी कार्रवाई मुंबई पुलिस के स्पे्शल ब्रांच की मदद से की गई और इसमें पूरी गोपनीयता बरती गई। न तो दोनो इंडोनेशियाई नागरिकों के नाम कभी सामने आये और न ही उन्हें डीपोर्ट किये जाने या उनके मंसूबों की खबर किसी अखबार में छपी।
आईबी का ये पूरा ऑपरेशन कामियाब हो सका था सलीम लंगडे की वजह से जिसने पैसों के आगे वतनपरस्ती को तरजीह दी और दोनों इंडोनेशियाई नागरिकों को पकडवाया...लेकिन ये ऑपरेशन बतौर खबरी उसकी जिंदगी का आखिरी ऑपरेशन था।
8 सितंबर 2007 को मुंबई बंदरगाह के पास दारूखाना इलाके से सलीम जब अपनी पत्नी मुमताज के साथ एक स्कूटर पर गुजर रहा था तो सामने से आये एक ट्रक ने उसकी स्कूटर को टक्कर मार दी। मौके पर ही ट्रक से कुचल कर सलीम और मुमताज की मौत हो गई। शिवडी पुलिस थाने ने मामला दर्ज किया और सडक हादसे का साधारण मामला दर्ज करके ट्रक ड्राईवर को गिरफ्तार कर लिया। भले ही सलीम की मौत की वजह सडक हादसा बताया गया हो लेकिन उसके करीबियों को ये पूरा यकीन है कि उसकी हत्या हुई है। सलीम अपनी बीवी से बेहद प्यर करता था और वो उसकी राजदार भी थी..लेकिन इस वारदात में दोनों के साथ सारे राज भी दफन हो गये।
अब तक दाऊद गिरोह का वो शख्स भी पुलिस के हत्थे नहीं चढा है जिसने सलीम की मुलाकात उन दोनो इंडोनेशियाई नागरिकों से करवाई थी। खासकर ये बात इसलिये भी अहमियत रखती है क्योंकि जो दस आतंकी 26 नवंबर की रात समुद्र के रास्ते कोलाबा पहुंचे थे, उन्हें एक लोकल आदमी ने ही मदद की थी। ऐसे में ये जानना जरूरी हो जाता है कि आखिर सलीम लंगडे को किसने मारा?