Search This Blog

Wednesday, 30 December 2015

If you cherished Salman verdict, you must also know Ajay Chaurasia!


Do you know Ajay Chaurasia?
Most likely you have no idea who he is.
…but you certainly know who is Salman Khan.
You also know that recently Salman was acquitted from Bombay High Court.
Last May Sessions Court sentenced him for 5 years imprisonment and within 7 months his appeal was heard and he walked free.
Now you may ask, how is Ajay Chaurasia related to Salman’s case?
The only thing common between Salman Khan’s case and Ajay Chaurasia’s story is that both had appealed in Bombay High Court against their convictions by the lower courts.
However, Salman Khan got justice in just 7 months. Guess since how long Ajay Chaurasia’s appeal is pending with Bombay High Court?
Since 7 YEARS! Yes the same figure 7 ! Salman is fortunate that his case was disposed off in 7 MONTHS  & Ajay is making rounds of court since last 7 YEARS.

This Ajay Chaurasia doesn’t earn in millions like Salman Khan. He works as a decorator for wedding parties and hardly manages to earn around 10 to 12 thousands rupees per month.
He doesn’t stay in plush Galaxy Apartment at the sea face of Bandra. Ajay resides in a small room of a chawl at Kalyan, 60 kilometres away from Mumbai.
What crime Ajay has committed?
He is not charged with drunken driving causing death of somebody sleeping on footpath.
His story begins in 2006 when he fell in love with a girl from neighbourhood.
As the girl’s family was against the marriage, both ran away and got married.
The girl was few days short to attain marriageable age.
Girl’s family registered a complaint with cops & Ajay’s brother was picked up.
When Ajay got the news of torture to his brother by cops, he decided to surrender.
After returning, the girl decided to leave him & toed the line of her parents.
Police charged Ajay with kidnapping and rape.
Next year in 2007, he was sentenced to jail for 7 years.
In 2008 while Ajay was in Nasik Jail, he filed an appeal against his conviction in Bombay High Court and this appeal is yet to be disposed even after 7 years.
Out of 7 years which Ajay has been sentenced, he has already spent 5 years in jail as he was able to get bail only in 2011 after a social organisation took over his case.
Remember, when Salman was sentenced for 5 years jail, he didn’t go behind the bars even for a moment. Moreover, that day the clerk’s office closed 3 hours later than the regular time.

Like Salman Khan, Ajay is also still unmarried. (His earlier marriage was declared illegal)
The only difference is that Salman is not marrying willingly whereas nobody wants to get their daughter wed to Ajay who has been stamped as a criminal and who doesn’t know what’s in store for his future. He still makes rounds of court date after date in hope of justice. Sometimes he makes over 20 rounds a year.
There are many like Ajay who are hoping for justice in our heavily burdened judicial system. There are over 40 lakhs cases in various High Courts across the country. Around 10 % of these cases are pending over 10 years.  Just in Bombay High Court there are over 3,75,000 pending cases. In lower courts of Maharashtra there are around 30 lakhs pending cases. But, fortunately for Salman, the speed of justice was different! Fast!

When you compare Salman’s case with Ajay’s, certain questions arise in your mind. However, I have full faith on our judiciary. Everybody is equal in the eyes of law. Everybody is equal as per our constitution. Ajay Chaurasia should also understand this. 

Thursday, 17 December 2015

सलमान खान: इंसाफ की रफ्तार!

सलमान खान को हिट एंड रन केस में बॉम्बे हाई कोर्ट से बरी हुए आज हफ्ताभर हो गया है। इस दौरान मेरी कई वकीलों से बातचीत हुई जो कि इस केस से जुडे हुए नहीं थे, लेकिन न्यायिक प्रकिया पर नजर रखे हुए थे। ऐसे तमाम वकील मुझे हतप्रभ और गुस्से से भरे हुए नजर आये।...नहीं..नहीं..ये गुस्सा सलमान खान को इस तरह से छोड दिये जाने को लेकर नहीं था, न ही सलमान को बरी करने जाने वाले जज के खिलाफ था। ये गुस्सा था न्यायिक प्रक्रिया की उस तेज रफ्तार को लेकर जो सिर्फ सलमान के मामले में ही नजर आई।

अगर किसी आरोपी को निचली अदालत दोषी करार देकर सजा सुनाती है और 6 महीने में ऊपरी अदालत यानी कि हाई कोर्ट उसकी अपील पर फैसला सुना देती है तो ये अभियुक्त के नजरिये से एक अच्छी बात है। अभियुक्त अपने भविष्य को लेकर सस्पेंस में नहीं रहता। उसे ज्यादा कोर्ट के चक्कर नहीं लगाने पडते, तारीख दर तारीख इंतजार नहीं करना होता, वकीलों को ज्यादा फीस नहीं देनी होती। सलमान हिट एंड रन केस में बरी हो गये ये तो उनके लिये एक अच्छी खबर थी ही, लेकिन उससे ज्यादा अहम बात ये थी कि वो उस तकलीफदेह न्यायिक प्रकिया से भी बच गये जो कि आम लोगों को अदालत में झेलनी पडती है। मई 2015 में सेशंस कोर्ट सलमान को शराब पीकर गाडी चलाने और एक शख्स की मौत का जिम्मेदार होने के आरोप में 5 साल की जेल के सजा सुनाता है और करीब 7 महीने बाद ही दिसंबर में उसकी अपील पर फैसला भी आ जाता है। सेशंस कोर्ट की ओर से दोषी ठहराये जाने के बाद सलमान ने एक रात भी सलाखों के पीछे नहीं गुजारी। सलमान ने जब हाई कोर्ट में अपील दायर की तो उन्हें जमानत देते वक्त जज अभय ठिपसे ने आदेश दिया था कि उनकी अपील पर जल्द सुनवाई हो। इसके पीछे मकसद ये था कि ये न समझा जाये कि सलमान खान जमानत लेकर लंबे वक्त तक आजाद रह सकेंगे और कोर्ट में मामला चलता रहेगा।

सलमान खुशनसीब थे कि उनके मामले का निपटारा 7 महीनें में ही हो गया...लेकिन बाकी लोगों के साथ क्या होता है ?
एक वकील दोस्त के मुताबिक सलमान जैसे या सलमान से कम गंभीर मामलों में भी अगर कोई आरोपी दोषी ठहराया जाता है तो उसकी अपील पर फैसला आते आते कम से कम 4-5 साल लग ही जाते हैं और कई मामलों में तो 7 से 8 साल तक। सोचिये...कहां 7 महीने और कहां 7 से 8 साल !!! अदालत में तारीख पर तारीख पडतीं जातीं हैं। जो बडे वकील होते हैं वे तो तारीखों पर अपने जूनियर को खडा कर देते हैं, लेकिन आम वकीलों को तारीख के वक्त अदालत में खुद मौजूद रहना होता है और अपने मामले का नंबर आने का इंतजार करना पडता है और फिर मिल जाती है एक और तारीख! वकीलों को फीस तो देनी ही है। हर तारीख पर मुवक्कील का पैसा भी खर्च होता जाता है। कई मामलों में तो ऐसा भी हुआ है कि किसी आरोप में निचली अदालत ने आरोपी को दोषी करार देकर सजा सुना दी, उसे जेल भेज दिया। सालों बाद बॉम्बे हाई कोर्ट ने उसकी अपील पर फैसला सुनाते हुए उसे बरी कर दिया, लेकिन निचली अदालत के फैसले और हाई कोर्ट के फैसले के बीच का वक्त इतना लंबा था कि आरोपी ने जेल में उस सजा की अवधि पूरी कर ली जिसके लिये बाद उसे हाई कोर्ट ने बरी कर दिया। ऐसे मामले अंग्रेजी की उस कहावत का सटीक उदाहरण हैं- Justice delayed is justice denied. कई ऐसे भी मामले हैं जिनमें निचली अदालत की ओर से दोषी ठहराये जाने के बाद हाईकोर्ट ने आरोपी को जमानत दे दी हो, लेकिन इस जमानत को हासिल करने तक उसे काफी वक्त जेल में गुजारना पडा, जबकि सलमान के मामले में जमानत पर सुनवाई तुरंत हो गई थी और आपको याद होगा कि उस दिन अदालती लिपिक का दफ्तर भी नियत वक्त से काफी देर से बंद हुआ था।


ये बात सच है कि मुंबई समेत देशभर की अदालतें अपनी क्षमता से ज्यादा मामलों से दबीं हुईं हैं। अकेले बॉम्बे हाईकोर्ट में इस वक्त पौने 4 लाख मामले लंबित हैं। महाराष्ट्र की निचली अदालतों में 30 लाख के करीब मामले लंबित हैं। लॉ कमीशन ने सिफारिश की थी हर 10 लाख की आबादी पर 200 जज होने चाहिये, लेकिन हकीकत में सिर्फ 17 ही हैं। हमारी न्यायिक व्यवस्था ऑवरलॉडेड है और उससे नागरिक त्रस्त हैं, लेकिन ऐसे हालात में भी सलमाऩ जैसे लोग इस व्यवस्था से प्रभावित नहीं होते। बॉम्बे हाईकोर्ट में वकालत कर रहे जिन वकीलों से मेरी बात हुई उनका मानना है कि जो मापदंड सलमाऩ खान के मामले के निपटारे के लिये अपनाया गया वही मापदंड सभी मामलों में अपनाया जाना चाहिये। फिलहाल सभी यही चर्चा कर रहे हैं कि सलमाऩ के मामले में इंसाफ ने जो रफ्तार दिखाई उसने देश को क्या संदेश दिया ?

Monday, 7 December 2015

चेन्नै: त्रासदी दर त्रासदी...वही सवाल, वही ख्याल।


कहते हैं कि एक ही चीज बार बार देखने-सुनने से उसके प्रति संवेदना खत्म हो जाती है। 17 साल की उम्र में पत्रकारिता शुरू की थी और 37 साल की उम्र तक पहुंचते पहुंचते न जानें कितनी और किस किस तरह की मौतें देखीं। कुदरती और मनुष्यजनित हादसों में होने वाली मौतें, पुलिस और गैंगस्टरों की गोलियों से होने वाली मौतें, दहशतगर्दों की ओर से किये गये बम धमाकों में इंसानी शरीर के चिथडे उडा देने वाली मौतें...मुझे कभी कभी डर लगता है कि मेरी हालत सरकारी अस्ताल में पोस्टमार्टम के लिये रोजाना लाशों की चीरफाड करने वाले संवदेनहीन डॉक्टर की जैसी न हो जाये...लेकिन शायद अभी वो नौबत नहीं आई है। संवेदना बची हुई है...मन सोचता है...दुखी होता है...और लिखने को मजबूर करता है।

ये ब्लॉग मैं चेन्नै से बाढ की त्रासदी कवर करके वापस लौटते वक्त लिख रहा हूं। इस बार भी वही सवाल और वही ख्याल मेरे जेहन में हलचल मचा रहे हैं जो बीते डेढ दशक में दुनिया की अनेक बडी कुदरती आपदाओं के कवरेज के दौरान मुझे घेरे हुए थे। 2004 में हिंद महासागर में सुनामी लहरों की हैवानियत, 2005 में मुंबई को डुबा देने वाली बारिश, 2011 में जापान को हिला देनेवाली सुनामी लहरों का कहर, 2013 उत्तराखंड के केदारनाथ में हुई जलप्रलय। भले ही ये तमाम त्रासदियां दुनिया के अलग अलग हिस्सों में कवर की हों, लेकिन इन सबके कवरेज के दौरान मैने कई समानताएं पाईं। कुदरत के कहर की ऊपरी तस्वीरें हर जगह एक जैसी ही नजर आतीं थीं। बर्बाद हो चुकीं बस्तियां, अपनों को खो चुके रोते-बिलखते लोग, लापता लोगों को ढूंढते बदहवास रिश्तेदार, राहत सामग्री के लिये तरसते लोग...इन तस्वीरों के अलावा एक और बात भी सभी त्रासदियों में समान है। वो है इन त्रासदियों के लिये खुद इंसान का जिम्मेदार होना। इस बात को समझने के लिये ज्यादा गहरे शोध की जरूरत नहीं है। आपदाओं के ठिकानों पर पहुंचकर पहली नजर में ही बात समझ में आ जाती है। उत्तराखंड में मंदाकिनी नदी को पाटा गया और उसकी चौडाई कम की गई, मुंबई में मीठी नदीं की भी गहराई और चौडाई अतिक्रमण की वजह से कम हुई, चैन्नै में हुई तबाही के लिये अध्यार नदीं को जिम्मेदार माना जा रहा है जिसे इंसानी लालच ने 50 फीसदी से भी ज्यादा समेट दिया और जहां से किसी वक्त नदीं की धारा बहती थी वहां अब रईसों की बस्तियां बना दी गईं। जापान में भी समुद्र को पाटा गया और मुंबई में भी। प्रकृति के हमले का शिकार बने इन ठिकानों पर की गईं ये बडी भूलें थीं और जब इनका मेल अन्य कारणों के साथ हुआ तो विस्फोट तो होना ही था।

इन त्रादियों को कवर करते वक्त मैने जो कुछ भी देखा और इनसे जुडी हुई जो भी सामग्री मैने पढी है उससे मैं चिंतित हूं। ये भयानक सच स्वीकार करने के लिये तैयार हो जाईये कि आने वाले वक्त में हमें मुंबई, चैन्नै, उत्तराखंड, जापान जैसी या इनसे भी कई गुना ज्यादा भयंकर तबाहियां देखनीं होंगीं और ये आने वाला वक्त ज्यादा दूर नहीं है। अगले 10-15 सालो के भीतर ही देखिये कि क्या क्या होता है। ग्लोबल वार्मिंग इन दो शब्दों को हरगिज हल्के में नहीं लिया जा सकता। हमने बीती सदी में ही अपनी पृथ्वी को इस हद तक नुकसान पहुंचाया है कि अब कुदरत के पलटवार को रोकना नामुमकिन हो गया है...सिर्फ उससे बचने के तरीके सोच सकते हैं और ज्यादा नुकसान न होने देने के प्रयास कर सकते हैं। हाल ही में पेरिस में जो सम्मेलन हुआ उसमें दुनियाभर के देशों ने इस बात को समझा जरूर, लेकिन सभी देशों को अपने स्वार्थ के साथ समझौता करके जो गंभीर कदम उठाये जाने चाहिये थे, वो नहीं हुआ।


चलते चलते चेन्नै में इंडियन एयरफोर्स के एक पायलट के वो शब्द यहां मैं काबिल ए जिक्र समझता हूं जो आसमान से शहर की तबाही देखकर हतप्रभ था और जिसे मैने खुद को कहते सुना – “If you screw up the nature..the nature knows how to screw you up back…”

Tuesday, 24 November 2015

दाऊद की प्रोपर्टी नीलामी के पीछे की असली कहानी !!!


खबर आई है कि एक बार फिर अंडरवर्लड डॉन दाऊद इब्राहिम की संपत्ति की नीलामी होने जा रही है। बीते 16 सालों में दाऊद की संपत्ति की ये चौथी बार नीलामी हो रही है। मैं इससे पहले दाऊद की संपत्तियों की 3 नीलामियां कवर कर चुका हूं और मेरा मानना है कि ऐसी नीलामी एक ड्रामे से ज्यादा कुछ नहीं होती। साल 2000 में सबसे पहली बार नीलामी कोलाबा इलाके के इस होटल डिप्लोमैट में हुई थी...लेकिन तब किसी की हिम्मत नहीं हुई कि वो डॉन की संपत्ति पर बोली लगाये। उसके अगले साल 28 मार्च 2001 को दूसरी बार फिरसे नीलामी की गई जिसमें दिल्ली के शिवसैनिक अजय श्रीवास्तव ने नागपाडा इलाके की जयराजभाई लेन में 2 दुकाने खरीदीं। उसी साल 20 सितंबर को फिरसे तीसरी नीलामी हुई। उस नीलामी में दिल्ली के ही एक व्यापारी पीयूष जैन ने दाऊद की ताडदेव इलाके की एक संपत्ति खरीदी। इन दोनो ही लोगों ने संपत्ति के पैसे तो चुका दिये लेकिन आज तक संपत्ति का कब्जा हासिल नहीं कर सके हैं।

दिल्ली के शिवसैनिक अजय श्रीवास्तव पेशे से वकील हैं।1999 में श्रीवास्तव पहली बार तब चर्चा में आये थे जब उन्होने पाकिस्तान के साथ क्रिकेट मैच खेले जाने के विरोध में फिरोजशाह कोटला मैदान की पिच खोद डाली थी। अजय श्रीवास्तव ने संपत्ति तो खरीद ली, लेकिन उसके बाद उनका सामना हुआ दाऊद इब्राहिम की बहन हसीना पारकर से। हसीना पारकर ने संपत्ति का कब्जा देने से इंकार कर दिया। अजय श्रीवास्तव ने कब्जा हासिल करने के लिये मुंबई के स्मॉल कॉसेस कोर्ट में अर्जी दायर की। 10 साल तक चले मुकदमें के बाद साल 2010 में फैसला उनके पक्ष में ही आया लेकिन इसके बावजूद हसीना कब्जा छोडने को तैयार नहीं हुई।
भले ही कोर्ट की चारदीवारी में अजय श्रीवास्तव दाऊद के खिलाफ मुकदमा जीत गये हों, लेकिन दाऊद गिरोह के लिये ये उसकी नाक का सवाल था।हसीना पारकर ने स्मॉल कॉसेस कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील कर दी। हसीना पारकर की पिछले साल हार्ट अटैक से मौत हो गई, लेकिन अब उसके बच्चे मुकदमा आगे चला रहे हैं। कुल मिलाकर बीते 15 सालों से अजय श्रीवास्तव कब्जा हासिल करने के लिये दिल्ली से मुंबई का चक्कर काट रहे हैं। इस बीच उत्तर प्रदेश से पुलिस ने छोटा शकील गिरोह के कुछ शूटरों को गिरफ्तार किया जिनसे पूछताछ में पता चला कि उन्हें अजय श्रीवास्तव को अपना निशाना बनाना था। अजय श्रीवास्तव का कसूर था कि उसने दाऊद की संपत्ति पर बोली लगाने की हिम्मत की। इसके बाद दिल्ली पुलिस ने अजय श्रीवास्तव को सुरक्षा मुहैया करा दी। श्रीवास्तव का कहना है कि उन्होने अंडरवर्लड के खौफ के खिलाफ संदेश देने के लिये दाऊद की संपत्ति खरीदी थी। उन्होने मुंबई पुलिस को भी पेशकश की वे उनकी खरीदी हुई संपत्तियों का कब्जा ले ले और उस जगह अपनी चौकी बना दें, लेकिन मुंबई पुलिस ने दिलचस्पी नहीं दिखाई।

वैसे श्रीवास्तव के कुछ पुराने साथी जो अब उनसे अलग हो चुके हैं दबी जुबान से ये भी आरोप लगाते हैं कि उन्होने दाऊद की संपत्ति सिर्फ पब्लिसिटी की खातिर खरीदी थी। श्रीवास्तव की असली मंशा थी कि ऐसा करके वे शिवसेना में अपना कद बढा पायेंगे, लेकिन संपत्ति खरीदने के बाद जब वे मातोश्री बंगले पर बाल ठाकरे से मिलने पहुंचे तो ठाकरे ने उनसे मिलने से इंकार कर दिया।

दाऊद की संपत्ति को नीलामी में खरीदने वाले शख्स पीयूष जैन भी आज तक उसका कब्जा हासिल नहीं कर सकें हैं। जोश में आकर पीयूष जैन ने संपत्ति खरीद तो ली लेकिन उसके बाद डर के मारे उनकी हालत खराब हो गई। संपत्ति खरीदने के बाद पीयूष जैन ने दिल्ली में रहना छोड दिया और अब एक दूसरे शहर में रहने के लिये चले गये हैं। संपत्ति पर कब्जा हासिल करने किलेय पीयूष जैन ने कोई कोर्ट केस भी नहीं किया लेकिन जब उनसे मैने पूछा किया संपत्ति हासिल करने के लिये आपने क्या किया तो उनका जवाब था कि जब अटलबिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे तो मैने उनको खत लिखकर गुहार लगाई थी कि वे संपत्ति पर कब्जा हासिल करने में उनकी मदद करें।

अलग अलग केंद्रीय जांच एजेंसियों ने दाऊद इब्राहिम की करीब 12 संपत्तियों को जब्त कर रखा है और आज की तारीख में बाजार में उनकी कीमत 100 करोड के करीब आंकी जा रही है। सूत्रों के मुताबिक दाऊद के पास कई बेनामी संपत्तियां भी हैं जिनकी कोई आधिकारिक जानकारी इन जांच एजंसियों के पास नहीं है। ऐसी संपत्तियों की देखभाल का काम पहले दाऊद की बहन हसीना पारकर करती थी और अब उसका छोटा भाई इकबाल कासकर करता है।

14 साल बाद फिर एक बार दाऊद की संपत्ति की नीलामी तो हो रही है। हो सकता है कि फिर एक बार कोई न कोई हौसला जुटाकर बोली लगाने के लिये नीलामी में पहुंच जाये...लेकिन उसके आगे उस संपत्ति पर कब्जा हासिल करने के लिये उसे खुद ही दाऊद के रिश्तेदारों से कानूनी लडाई लडनी होगी। बीते हए मामले यही बताते हैं कि पुलिस और सरकार इसमें कोई मदद नहीं करेगी।


(इस विषय का वीडियो यहां देखें- https://www.youtube.com/watch?v=pwGiMOTAKWs )

Saturday, 14 November 2015

7 समानताएं पेरिस और मुंबई हमलों के बीच !


मुंबई में हुआ आतंकी हमला भी नवंबर में हुआ था और पेरिस  में हुआ हमला भी नवंबर में हुआ है लेकिन महीने की समानता के अलावा अगर हम बारीकी से गौर करें तो पाएंगे कि पेरिस और मुंबई के हमलो के बीच करीब 7 समानताएं है।

१)  Crowded Locations.
पहली समानता यह है कि दोनों शहरों में आतंकियों ने भीड़ भाड़ वाले इलाको  को चुना था अपने टारगेट के तौर पैर।   मुंबई में हुए हमले का सबसे बड़ा टारगेट था CST  रेलवे स्टेशन जहां पर अजमल कसाब और उसके साथी इस्माइल  ने  ट्रेन पकड़ने के लिए आए मुसाफिरों  पर अंधाधुंध गोलियां बरसाई।   अकेले CST रेलवे स्टेशन पर ही 56 लोगों की मौत हो गई जिसमें रेलवे मुसाफिर भी थे और पुलिस कर्मचारी भी।

२) Eating Places
पेरिस  और मुंबई के हमलो के बीच दूसरी समानता ये है कि दोनों ही  हमलो में  खाने पीने के  रेस्टोरेंट्स को आतंकियों ने अपना निशाना बनाया जैसे कि मुंबई में उतरे आतंकियों के पहले गुट ने सबसे पहले कोलाबा इलाके के इस मशहूर लियोपोल्ड  कैफ़े में अंधाधुंध फायरिंग की जिस में की 11 लोग मारे गए।

३) Multiple Targets
तीसरी समानता यह है कि आतंकियों ने एक ही शहर मे हमला करने के लिए एक से ज्यादा ठिकाने चुने।फ्रांस में आतंकियों ने 6 अलग-अलग ठिकानों पर हमला किया जबकि मुंबई में  भी आतंकियों ने ७ ठिकानो पर हमला किया था।

४) Fidayeens
चौथी समानता यह है कि पेरिस और मुंबई दोनों ही शहर के हमलो में शामिल आतंकवादी फिदाइन थे यानी कि वो मरने के लिए तैयार होकर ही आए थे। अजमल कसाब ने जो अपना बयान दिया था उसमे उसने बताया था कि उन्हें उनके  handler ने निर्देश दिए थे कि जब तक मारे ना जाओ तब तक मारते रहो, लड़ते रहो।

५) Hostages
पांचवी  समानता।दोनों ही हमलो में आतंकियों ने कई लोगों को बंधक बना लिया था और उन्हें चुन-चुन कर मारा गया जैसे कि Trident होटल में घुसे दो आतंकियों ने तमाम लोगों को बंधक बनाया था।   उन्हें एक कतार में खड़ा किया गया और फिर चुन-चुन कर उन्हें गोली मार दी गई।

६) Sophisticated Weapons
मुंबई और पैरिस के हमलो के बीच छठवीं समानता यह है कि दोनों हमलो में एक ही जैसे हथियारों का इस्तेमाल हुआ।मुंबई में भी आतंकी अपने साथ AK-47 जैसे हथियार लेकर आए थे और पेरिस में भी  AK 47  का इस्तेमाल हुआ जिससे की मिनटों में तमाम लोगों को ढेर किया जा सकता है।

७) Number of attackers
दोनों शहर में हुए हमलो के बीच सातवीं समानता यह है कि दोनों ही हमलो में आतंकियों की संख्या लगभग बराबर ही रही। जब मुंबई में हमला हुआ था तो पाकिस्तान से 10 आतंकी यहां पर आए थे और पेरिस के हमले में भी आठ आतंकी शामिल हुए।

कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि पेरिस में हुआ आतंकी हमला उतना ही बड़ा था जितना कि 26 नवंबर 2008 को मुंबई में हुआ हमला। दोनों ही हमने अपने अपने देशों के सबसे बड़े आतंकी हमले थे पर इतिहास में काली स्याही से दर्ज किए जाएंगे।

Saturday, 7 November 2015

सफरनामा: बाली, इंडोनेशिया (Travelogue-Bali, Indonesia)


बीते हफ्ते इंडोनेशिया के बाली में हुई माफिया छोटा राजन की गिरफ्तारी के सिलसिले में बाली जाना हुआ। एक क्राईम रिपोर्टर की नजर से बाली में छोटा राजन से जुडा एक ब्लॉग मैं पहले ही लिख चुका हूं। छोटा राजन के पकडे जाने के बाद कुछ दिनों तक बाली का जिक्र भारतीय मीडिया में होता रहा, लेकिन इंडोनेशिया का ये प्रांत एक बेहद खूबसूरत पर्यटन स्थल भी है जो दुनियाभर से पर्यटकों को अपनी ओर खींचता है। मेरा ये ब्लॉग एक घुम्मकड की नजर से है और उन लोगों के लिये है जो भविष्य में बाली घूमने की हसरत रखते हैं।

बाली में दाखिल होते वक्त...
अगर बाली में लैंड करते वक्त आप विमान की खिडकी वाली सीट पर बैठे हैं तो समझिये कि आप खुशनसीब हैं। बाली के नुआरा राय एयरपोर्ट का रनवे बिलकुल समुद्र से सटा हुआ है और जैसे जैसे विमान नीचे उतरता है आप को लगेगा कि विमान पानी पर लैंड करने जा रहा है। मुझे और बाकी के सहयात्रियों को ये बेहद रोमांचक अनुभव लगा। हवाई अड्डा ज्यादा बडा नहीं हैं। विमान से उतरने के चंद पलों बाद ही आप इमीग्रेशन की कतार में खडे हो जाते हैं। भारतियों के लिये बाली में आना उतना ही आसान है जितना भारत के किसी एक शहर से दूसरे शहर में पहुंचना। बाली में भारतियों के लिये पहले से वीजा लेने की जरूरत नहीं है और न ही वीजा के लिये एक पैसा देना पडता है। इमीग्रेशन पर 30 दिनों का टूरिस्ट वीजा का ठप्पा लगवाइये और बेधडक आगे बढ जाईये। यहां एक तख्ती जरूर आपको दिखाई देगी कि गलत वीजा पर बाली में दाखिल होने वालों को 5 साल तक की कैद होगी।

शहर के भीतर...
जब आप कार में बैठकर एयरपोर्ट से शहर में दाखिल होते हैं तो आपको पहली नजर में शायद ये लगेगा ही नहीं कि आप किसी दूसरे देश में आये हैं। कभी आप महसूस करेंगे कि आप दक्षिण भारत के किसी शहर में हैं तो कहीं आपको बाली गोवा के जैसा लगेगा...लेकिन थोडा गौर से देखने पर फर्क मालूम पडने लग जाता है। सडक पर वाहनों की आवाजाही बेहद अनुशासित है। यहां भी भारत की तरह सडक की बायीं ओर से वाहन चलते हैं। सडकें भीडभरी न होने पर भी शहर के भीतर कोई भी वाहन 30 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से ज्यादा नहीं चलाता। ।भारत की तरह यहां भी कई दुपहिया वाहन चालक आपको ट्रैफिक नियम तोडते दिख जायेंगे। यहां भी दुपहिये पर सवार दोनों लोगों को हेलमेट पहनना जरूरी है और इस नियम पर सख्ती से अमल होता है। सिटी बसें सडक पर बिलकुल नजर नहीं आयेंगी और न ही यहां लोकल ट्रेनें और मेट्रो रेल चलतीं हैं। हर किसी के पास खुद की गाडी है। बुझी हुई सिगरेट के टुकडों के अलावा यहां सडकों पर और किसी तरह की गंदगी नहीं दिखाई देगी। हमारे देश के चौक चौबारों पर नेताओं और राजनेताओं की प्रतिमाएं लगीं दिखतीं हैं लेकिन बाली के चौराहों पर आपको रामायाण, महाभारत और पौराणिक पात्रों जैसे कृष्ण, अर्जुन, गरूड की प्रतिमाएं जगह जगह दिखाई देंगीं। कई इमारतों के दरवाजे भी आपको भारतीय शैली में बनाए दिखाई देंगे।

नकद नारायण।
अगर मैं ये कहूं कि मैने बाली में पानी की एक बोतल 5 हजार रूपये में खरीदी तो शायद आपको लगेगा कि मुझे ठग लिया गया। दरअसल इंडोनिेशिया की करंसी का नाम भी भारत की तरह ही रूपया है लेकिन इस रूपये का मूल्य भारतीय रूपये की तुलना में काफी कम है। एक अमेरीकी डॉलर में आपको 13100 इंडोनिशियाई रूपये से लेकर 13600 इंडोनेशियाई रूपये तक मिल सकते हैं। मेरी सलाह है कि बाली में उतरने पर एयरपोर्ट पर करंसी एक्सचेंज कराने के बजाय शहर के भीतर करंसी एक्सचेंज कराएं जहां आपको डॉलर का ज्यादा मूल्य मिलेगा। इंडोनेशियाई करंसी की इस हालत के मद्देनजर आपको हर चीज यहां हजार या लाख में खरीदनी पडेगी। मसलन अगर आपने इंडोनेशियाई करंसी में अगर 1 लाख रूपये का खाना खाया है तो इसका मतलब आपने 7 या 8 अमेरीकी डॉलर खर्च किये हैं। वैसे एक पर्यटन के ठिकाने के तौर पर बाली तुलनात्मक रूप से काफी सस्ता है बस खर्च करते वक्त हजार और लाख जैसे शब्दों को ज्यादा गंभीरता से मत लीजिये।

जुबान और शाहरूख खान।
तुम पास आये...यूं मुसकुराए...तुम ने न जाने क्या सपने दिखाये...”- फिल्म कुछ कुछ होता है का ये गीत बाली में बेहद लोकप्रिय है। ये बात हमें तब पता चली जब कार में सफर करते वक्त मेरे सहकर्मी गणेश ठाकुर ने अपने मोबाईल पर ये गाना लगाया तो हमारा स्थानीय ड्राईवर गदेय भी साथ गुनगुनाने लगा। हमें ये देखकर बडा ताज्जुब हुआ। उसने हमें बताया कि शाहरूख का ये गाना बाली में बेहद लोकप्रिय है और लोग मतलब न जानते हुए भी इसकी प्यारी धुन की वजह से इसको गुनगुनाते हैं। उसकी इस बात की पृष्टि कई और बालीवासियों ने भी की। बाली के लोग शाहरूख खान को काफी पसंद करते हैं। वैसे बाली में भाषा एक छोटी सी समस्या है। ज्यादातर लोगों को अंग्रेजी समझ नहीं आती और जिनको आती है उनको टूटीफूटी ही आती है। बेहतर होगा कि बाली पहुंचने से पहले थोडे-बहुत बाली के शब्द सीखकर जायें। वैसे ज्यादा घबराने की बात नहीं है कामचलाऊ अंग्रेजी हर कोई समझ ही लेता है।

धरम-करम।
इंडोनेशिया एक मुसलिम देश है, लेकिन बाली उसका एक हिंदू बहुल प्रांत है। यहां 83 फीसदी हिंदू हैं और बाकी लोगों में मुसलिम, इसाई और बौद्ध धर्म को मानने वाले लोग हैं। इनके बीच किसी भी तरह की सांप्रदायिक कटुता बाली में नजर नहीं आती है। जगह जगह पर हिंदू मंदिर और धर्म के प्रतीक दिखाई देंगे। बाली के हिंदू बडे धार्मिक हैं और आमतौर पर दिन में तीन बार पूजा करते हैं। सुबह सुबह घरों-दुकानों के बाहर फूलों से सजी थाली लेकर लोग पूजा करते नजर आयेंगे। अक्सर कार ड्राईवर छोटी सी एक पूजा की थाली अपने कार के डैश बोर्ड पर भी रख लेते हैं, जहां हम भगवान की मूर्ति लगाते हैं। उस थाली से चावल की एक अलग तरह की महक पूरी कार में फैल जाती है। आपको ये महक पसंद भी आ सकती है और कई लोग इससे परेशान भी हो सकते हैं। आमतौर पर लोगों को देवी देवताओं से जुडे संस्कृत के मंत्र कंठस्थ हैं। हमारे ड्राईवर ने हमें गायत्री मंत्र से लेकर शिव स्तोत्र तक पढकर सुनाया। शुक्रवार के दिन यहां भी नमाज के लिये कई सडकें बंद कर दी जातीं हैं।

गुनाह और पुलिस।
बाली एक शांतिपूर्ण जगह है और यहां अपराध लगभग न के बराबर हैं। ज्यादातर अपराधी जो पकडे जाते हैं वो ड्रग्स के गुनाहों से जुडे होते हैं। पर्यटकों के साथ लूटपाट, ठगी वगैरह जैसी वारदातें यहां नहीं होतीं। एक वक्त था जब बाली पुरूष वेश्यावृत्ति यानी जिगैलो के लिये जाना जाता था, जिनकी ज्यादातर ग्राहक ऑस्ट्रेलिया और यूरोप से अकेले आने वाली महिलाएं होतीं थीं। मसाज की आड में वेश्यावृत्ति यहां भी होती है। होटल से शाम को बाहर निकलते वक्त हल्की आवाज में गुड मसाज?” “गुड गर्ल?” बुदबुदाते हुए दल्ले आपके पीछे लग जायेंगे...लेकिन एक बार आपने आवाज कडक करके मना कर दिया तो आपको तंग नहीं करेंगे।
बाली में जगह जगह पर पुलिस की मौजूदगी है। ज्यादातर पुलिसकर्मी मिलनसार हैं। आम पुलिसकर्मी को आप हथियारों या फिर लाठी के साथ भी नहीं देखेंगे।
भले ही वैसे अपराध के मामले में बाली सुरक्षित हो, लेकिन आतंकवाद यहां भी अपना रंग दिखा चुका है। साल 2002 में यहां के 2 नाईट क्लबों में इमाम समुद्र नाम के आतंकी ने बम धमाके किये थे, जिनमें पश्चिमी देशों से आये 100 से ज्यादा पर्यटक मारे गये। साल 2005 में भी जिंबारन और कुटा बीच पर बम धमाके हुए थे जिनमें कई लोगों की मौत हो गई। आतंकवाद का शिकार होने के बावजूद आज भी बाली में सुरक्षा व्यवस्था भारत जैसी नजर नहीं आती और ये एक चिंता की बात है।(कहने का मतलब ये भी नहीं कि भारत में आतंकवाद से निपटने के संतोषजनक इंतजाम हैं)

खानपान।
बाली की सबसे लोकप्रिय डिश है नासी गोरेंग (Nasi Goreng) । ये डिश हलके फ्राई किये हुए चावल के साथ तैयार की जाती है और इसे चिकन, अंडा, मछली, केकडा, गोश्त या सब्जी के साथ पेश किया जाता है। नासी गोरेंग को इंडोनेशिया की राष्ट्रीय डिश माना जाता है। जिस तरह से भारत में शाम के वक्त जगह जगह चाट वगैरह के ठेले खुल जाते हैं उसी तरह से यहां शाम को सी फूड से बनाई गई चाट बेची जाती है। वैसे बाली के लोग तले हुए खाने के बजाय उबाला गया खाना ज्यादा पसंद करते हैं और यहां की कई स्थानीय डिश भारतियों को स्वादहीन या खराब लगें।
यहां पर कई भारतीय रेस्तरां भी हैं जैसे गणेश, सितारा, क्वींस ऑफ इंडिया वगैरह जहां भारतीय शैफ खाना तैयार करते हैं। ये रेस्तरां भारतियों के अलावा यूरोपियन पर्यटकों में भी खासे लोकप्रिय हैं।
 
नासी गोरेंग- इंडोनेशिया की राष्ट्रीय डिश।
बिंतांग और बाली हाई यहां की सबसे लोकप्रिय बियर हैं और इनकी यहां वही हैसीयत है जो भारत में किंगफिशर की। यहां की एक विशेष प्रकार की कॉफी भी दुनियाभर में मशहूर है और जो काफी महंगी आती है। उसे लुवाक कॉफी कहते हैं और ये बिल्ली जैसे एक जानवर के मल से बनाई जाती है। (हमने नहीं पी)

सैर सपाटा
बाली की सबसे बडी खासीयत यहां के खूबसूरत और साफसुथरे बीच हैं। लगभग सभी बीचों पर वॉटर स्पोरट्स का इंतजाम है जैसे स्कूबा डाईविंग, अंडर सी वॉक, पैराग्लाईडिंग, जेट स्की वगैरह। दक्षिण बाली का नूसा दुआ बीच खास इसी के लिये जाना जाता है। कुटा बीच पर शाम के वक्त सैकडों लोग सूर्यास्त देखने के लिये जुटते हैं। जिंबारन बीच नाईट लाईफ के लिये जाना जाता है। सानूर बीच शहर से सटा हुआ है जहां स्थानीय पर्यटक ज्यादा दिखाई देते हैं।

अक्टूबर में यहां का अधिकतम तापमान 30-35 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है। नवंबर के आखिर तक बारिश का मौसम शुरू होता है, लेकिन वैसी बारिश नहीं होती जैसी कि हम मुंबई में देखते हैं।
बाली के देनपसार से करीब घंटेभर की दूरी पर उबुद नाम की जगह है। यहां का वानर वन (मंकी फोरेस्ट) काफी मशहूर है जिसमें कई प्रजातियों के बंदर देखने मिलते हैं। ऊबुद थोडा ऊंचाई पर है और यहां मौसम ठंडा रहता है। खरीददारी, अध्यात्म, योगा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिये भी उबुद जाना जाता है।
हवाई अड्डे के करीब कृष्णा नाम का एक मार्केट है जहां बाली के कपडे, खिलौने और स्म़ृति चिन्ह पर्यटकों को ठीकठाक दामों पर मिल जाते हैं। लोग बाली से वापस लौटते वक्त अक्सर यहां खरीददारी करने के लिये कुछ देर रूकते हैं।

आम लोग।
बाली के ज्यादातर लोग शांतिप्रिय और भोले भाले हैं, पर्यटकों का सम्मान करते हैं और किसी तरह के विवाद से बचते हैं। ये भारतियों को काफी पसंद करते हैं और उन्हें अपने से ऊंचा समझते हैं क्योंकि इन्हें लगता है कि भारतीय उनके आराध्य भगवानों के देश से आये हैं।

Thursday, 5 November 2015

How Chhota Rajan Was A Sitting Duck in Bali For 11 Days !


Although,  I wanted to write this blog earlier,  I was waiting for Chhota Rajan to be deported from Indonesia. I did not want to give any idea to his enemies on how easy it was to kill him in Bali. For 11 days that Chhota Rajan spent in the custody of Bali police he was a sitting duck for his adversaries. It would not have been a big challenge for the shooters of Chhota Shakeel to bump him off and I'm saying this on the basis of my observations during those 5 days which I had spent in Bali. There was absolutely nil security to him considering his stature in the underworld and the magnitude of threat to his life. Cops in Bali in general had no idea of how big Chhota Rajan was a criminal in India & this was reflected in the behaviour meted out to him by Bali cops.

In India wide security arrangements are being made for him. Arthur Road prison's highly secured Anda Cell is being readied for his arrival, as per reports dialysis machine is to be installed so that he is not required to go to hospital. Videoconferencing facility is arranged so that he is not taken out for physical presence in court. His cell is to be guarded by numerous armed cops. Compare this with the scene at Bali & you will be shocked to know how loosely one of India's most wanted gangster & publicised as an "asset" for Indian intelligence agencies against Dawood was kept.

Scenario Outside Lockup:
At Bali Chhota Rajan was kept in the lockup of police headquarters located at Polda Bali of Denpasar area. There is no security check at the time of entry into the police hqs. No entry is made of the vehicles entering the premises. Vehicles could be parked just 20 metres close to the lockup where Chhota Rajan is kept. At a time only 3 cops guard the lockup & they are without any weapons. It was surprising to see that some cops had brought their kids also while on duty & were playing with them. On Thursdays & Fridays relatives of inmates are allowed to meet them through a small window adjacent to the lockup.

Scenario Inside Lockup:
There are total 3 cells in the lockup of area approx 300 sqft each . One cell is for female prisoners & other 2 are for male ones. There were total 43 prisoners including Chhota Rajan. Most of the criminals were locals arrested for narcotics trade & other crimes. Sunlight couldnt penetrate the lockup & cells were dimly lit. A television set was kept inside the cells.

While being taken around:
Chhota Rajan was being taken out briefly from the lockup for 2 reasons-one for medical treatment and secondly for interaction with Bali Police officers in the adjacent building which is few yards away. On 28th October he was taken to Trijata Police Hospital which is about a kilometre away from Polda Bali. As per my colleague Ganesh Thakur who was the only journo to get his visuals at the hospital, only 3 unarmed cops accompanied him there. Fourth person was his local lawyer Franciscus Passar.
After this he was taken out on 29th October to be interrogated by Bali Police officers in tha adjacent room. This time also only 3 unarmed policemen accompanied him while he walked in and out of the adjacent building. 4 days later on 2nd November he was taken out again to face the CBI led team arrived from India in the same building. Again, there were just 3 unarmed cops for his security while being taken to and fro. ( It was only on his last day in Bali that is today that he was escorted with 10 armed guards to Bali airport for deportation to India.)

So the above was just a general assesment of the negligible security which Chhota Rajan got in Bali. Now my further writing is purely hypothetical & based on imagination.


Dawood's henchman Chhota Shakeel had been desperately searching Rajan since he survived an attack by Shakeel's shooters at Bangkok in September 2000. Earlier this year, Shakeel was successful in tracing out Rajan's hideout in Australia. Rajan escaped on the basis of a last moment tip supposedly by Indian intelligence agencies. Now, when the news of Chhota Rajan's arrest broke out and his visuals were being shown live right from the lockup, the question is were 11 days not enough for Shakeel to send shooters to Bali? Visa is not an issue for most of Asian visitors in Indonesia. Secondly, he could have outsourced the job by hiring shooters locally. In peaceful Bali it would have been difficult to get shooters or weapons, but this seems possible in capital Jakarta which is just 2 hrs flight or 10 hrs drive from Bali and where criminals gangs are very much active.
The shooters of Shakeel would have met with very little resistance if they intended to target Rajan while in lockup or at the time of being taken out. True, that the lockup is inside the police hqs and more number of cops with weapons would have been rushed in but I believe the response time by cops would have allowed the shooters to do their job.

Chhota Rajan was being served prison food in the lockup. Sometimes he also shared food that came from homes of fellow inmates. It was only on Nov 1 that he got Indian food for himself after First Secretary from Indian embassy Sanjivkumar Agrawal met him in the lockup. But before that it was not difficult for anybody to conspire for a poison laced food for him.

It is either that Chhota Shakeel dropped the plan of killing Rajan after his arrest or he overestimated the security of Bali Police.


By the way Bali is not immune to terrorist attacks. In 2002 two night clubs were bombed by a terrorist named Imam Samudra in which more than 100 foreign tourists were killed. Another bombing took place in a night club at Jimbaran beach in 2005. Still looking at the general security scenario in Bali and attitude of cops it seems that no lessons have been learnt. Especially, for an Indian who sees so many things done in the name of security, the experience in Bali is surprising.

Monday, 5 October 2015

Talvar: Shocking similarities between Arushi Talvar & Sheena Bora murder cases!


You must have read writeups on shocking similarities between Abraham Lincoln & J.F.Kennedy's assassinations. We have a similar story in India also, not related to murder of any politicians but of 2 young ladies in different parts of the country.Just viewed movie "Talwar" & the story made me compare Arushi Talwar's murder case with Mumbai's Sheena Bora murder case. I was following newsreports  of this case till few years back and "Talwar" helped me to get back on the chronology and do some supplementary reading on the case. Those crime reporters who have seen "Talwar" & covered Sheena Bora murder case may notice following parallels between the 2 cases :

1) The 1st investigative team was negligent:
In Arushi's case it was UP Police & in Sheena's case it was Raigadh Police. If both had done their basic work sincerely in the beginning both cases would have been detected much earlier.

2) Second investigative team did the solid investigation:
In Arushi's case it was CBI director Arun Kumar's team which got new facts & made fresh arrests and in Sheena's case it was Rakesh Maria's team which detected the case & made all the arrests.

3) The second investigation team was removed before filing of chargesheet:
In Arushi's case Arun Kumar's team was removed & case was given to another team of CBI.Similarly in Sheena's case firstly police commissioner Rakesh Maria was removed & later on the investigation was transferred from Mumbai Police to CBI. It means both the cases were handled by 3 different investigating teams.

4) Motive of murder is still not clear in both the cases.

5) In Arushi's case parents were accused of murder & in Sheena's case also one of the parent is accused of murder.

6) In both the cases drivers of the families were also named as accused.

Wednesday, 9 September 2015

Memoir: A cop like Maria!


“The journey of a Bandra boy from wearing chappals and playing cricket in the streets to becoming an IPS officer and police commissioner of Mumbai is like a dream come true”.
These words spoken by Rakesh Maria on the day he took charge as police chief of Mumbai are still echoing in my ears.  That was one of the most joyous moment for Maria and that time nobody had a thought that his dream will culminate in such an distasteful manner. I am personally saddened by the treatment meted out to Maria by Maharashtra government. An officer who has given so much to the city didn’t deserve such conduct at the zenith of his glorious career.

Most of crime journalists who have seen Maria for years have certain observations to make and events to remember. I too have a few. When I commenced my career as a tv journo in 1999, Rakesh Maria was chief of railway police, which was equivalent to the rank of additional commissioner in Mumbai police. During past 16 years, I have been able to see his professional ups and downs as well as got an idea of human qualities in Maria which were distinct from others in the world of cops.

Elephantine Memory:
Comparing Rakesh Maria with Albert Einstein will be absurd and inappropriate, but there is something very exceptional in Maria’s brain which makes him a man with superb memory. During press conferences as railway police chief, Maria used to provide details of 4 to 5 different criminal cases which were detected by his force. Each case had 2 to 3 accused persons who were paraded before the media. Rakesh Maria never looked even once towards his diary while describing details of each accused like when did which accused committed his first crime, how many times he was arrested in the past, who were his family members, how many residences he had changed etc. All such details of accused paraded in the press conferences were on his tip of tongue. He could also tell the details of over 150 accused arrested in 1993 Mumbai bombing case without referring to the papers.

Trusting People: His Weakness.
Whether Rakesh Maria was a DCP or the top cop of Mumbai police, he was always very approachable, gentle, soft spoken and friendly while dealing with his subordinates, journalists and public. Although, ironical it may sound for a sharp and intelligent cop like Rakesh Maria, he was quick to trust people and often took them on their face value. This turned out to be one of his weaknesses and landed him in trouble few times. I remember two instances here.

While award winning author Suketu Mehta was writing his famous book “Maximum City: Mumbai”, he approached Rakesh Maria through his relative’s reference. He told Maria that he was writing a book on Mumbai and also needed inputs on Mumbai underworld from him. What Suketu didn’t tell Maria was that he was making Maria himself a character in his book. Maria trusted him and showered him with ample information. He even allowed Suketu access to interrogation of criminals and shared his views on the dirty politics prevalent in Maharashtra police and nexus between IPS officers and politicians. Suketu was often invited at his home by Maria. When the book was published, there was a whole big chapter on Rakesh Maria and what Maria thought about the police force he was serving in. Only thing what Suketu did was that he changed Maria’s name in the book as Ajay Lal. However, he gave so many details about the personality and career of Rakesh Maria that it became obvious that Ajay Lal was none else other than Rakesh Maria. Once, at ATS office when I asked Maria whether he was in touch with Suketu Mehta his face turned red with anger- “I trusted that @#$% and he cheated me.”

In 2000, when Rakesh Maria was railway police chief, he met a journalist from a web portal on a friend’s request. The journalist told Maria that he was working on a story focussing on the nexus between underworld and cricketers. Maria agreed to help him with relevant information on the condition that he will not be quoted. Trusting the journalist, Maria spoke freely to him and explained how an ex captain of Indian cricket team was linked with Dawood Ibrahim’s gang. While talking to that journo, Maria didn’t realise that he was recording everything in a camera fitted in his handbag which was placed right in front of Maria. The web portal got a big scoop and publicised the sting operation claiming that a senior IPS officer has revealed cricket-underworld nexus. Maria was in a big trouble after that.

Criminal Investigation: A Passion.
Lawyer Mahesh Jethmalani & few others have questioned why Mumbai police chief Rakesh Maria is personally investigating Sheena Bora murder case? Well those who know Rakesh Maria since years will not be surprised. Criminal investigation has been his passion. Apart from cracking 1993 blast case as a DCP, he personally investigated few railway crime cases as railway police chief. When he was crime branch chief he personally investigated Esther Anuhaya murder case & Neeraj Grover murder case.
His ex boss MN Singh confirms that Maria is an enthusiast of criminal investigations & gets personally involved in complicated cases.

Response to embarrassing situations :
In Novemeber 2009 then police commissioner D.Sivanandhan and Rakesh Maria who was joint commissioner of crime branch launched my book on 26/11 terrorist attacks on Mumbai.
The venue was heritage hall of Wilson College and one of the guests invited on stage was Smitha Salaskar, widow of late inspector Vijay Salaskar who died fighting with terrorists during the attack. When she began her speech, everybody present in the hall was taken aback. Mrs.Salaskar targeted Maria and used very harsh and bitter words against him. Smitha Salaskar’s anger against Maria was due to her belief that Maria who was handling the control room was unable to send rescue team quickly to the spot where Salaskar was lying injured for several minutes after being hit by bullets. Any other officer of his rank would have left the gathering in anger after hearing such words addressed to him, but Maria maintained his calm. When it was Maria's turn to speak, he began with words – “I can understand emotions of Mrs.Salaskar…under those circumstances we did our best…” with this he moved on to focus his speech on the content of my book.
Rakesh Maria, Dr.Sirwaiya, Jitendra Dixit, D.Sivanandhan, Smitha Salaskar, Prem Shukla.


I felt guilty that in my function Maria had to face such an embarrassing situation. I should have not invited both of them on stage together. I called Rakesh Maria  at around 9pm that night – “I am sorry that you had to face this in today’s function.” He responded calmly – “Don’t worry Jitendra. She has lost her husband. We must understand her emotions. Such things happen and we must not be affected by them.”

Last Tuesday when Rakesh Maria was transferred from Mumbai Police Commissioner’s post and promoted as D.G of Homeguards, I alongwith few other journalists met him at his new office in the evening. He was visibly angry and upset at the sudden turn of events in his life. However, while leaving he brought a smile on his face and told us – “Today I will surprise my wife by reaching home at 6pm and will tell her that I have become a good boy.”


There are several other incidents which give an idea of Rakesh Maria’s professional abilities and his persona, but all those cant be covered in this brief blog. In Rakesh Maria I see a dedicated police officer with excellent detective skills and a down to earth human being. Truly, there is no other cop like Maria.

Friday, 4 September 2015

UK cops can go to this extent to investigate unidentified dead body!

Lancashire cops Graham Coates and Al Yusuf with an officer of Mumbai Police.

Sheena Bora was killed in 2012 and her murder case got detected only 3 years later. One of the causes for this delay was the unprofessional conduct of Raigarh cops who did not investigate the case of unidentified dead body found in their jurisdiction. Although, the body which was recovered by them was burnt and concealed in a travelling bag, they skipped to register a murder case. Raigarh cops also didn’t care to collect the report from anatomy department of Sir.J.J.Hospital where the skeletal remains were sent. Such conduct of Raigarh cops is an example of how cops treat the cases of unidentified dead bodies reported to them. This case has reminded me of “Operation Complex” of UK police. That operation demonstrated to which extent cops in UK go to investigate a case of unidentified dead body, no matter how much money has to be spent, how much manpower is to be employed and how much time it takes.

On July 26, 2002 a woman reported about the dead body to the Lancashire cops whose dog got hold of a bone from a rural drainage ditch. Lancashire cops initiated their investigations to ascertain the dead person’s identity. A preliminary examination by the official pathologist confirmed the bones to be human and it was also confirmed that the victim was murdered and he died due to injuries on his head. Following more detailed tests from Human Identification Unit of Glasgow University, it was established that the victim was of Asian origin, possibly from India, aged between 20 and 40 when he died. He was 5ft 6inches tall and of slender built. A facial reconstruction was also made from the skull. It was assumed that the body might be of some illegal immigrant.

Lancashire police conducted an exhaustive investigation throughout the UK. Police teams were sent to different cities who checked with Asian neighbourhoods if any person of the available description was missing. This continued for over 9 months, but Lancashire cops didn’t get any success. Then Lancashire police then decided to send teams to those countries which could be possibly the origin of the deceased. It was an arduous task to ascertain the identity of the victim and then find out his killers, hence, it was codenamed as “Operation Complex”. Under this operation two officers named Graham Coates and Altaf Yusuf visited India.

On reaching India in September 2003, both the officers met ex police commissioner of Mumbai Dr.Satyapal Singh, who was chief of crime branch then. The team had brought clay model and computer sketch of the deceased with them. On their request Satyapal Singh called a press conference to decimate information throughout the country with an attempt to identify the victim. Mumbai cops were amazed to see the efforts taken by Lancashire police to investigate a case of unidentified dead body so seriously. Some had sarcastic smile on their faces. Apart from Mumbai, Lancashire cops approached Gujarat and Punjab cops also for similar help. They also roped in cricketer Virendra Sehwag playing for the county to make an appeal to the public for identification of the victim.

These officers of Lancashire Constabulary became good friends of mine and they were impressed with the coverage which Star News gave to the case. In 2005 officer Al Yusuf came back to India and met me. Yusuf requested me that as Star News was very popular among Indian origin residents of UK, I must highlight “Operation Complex” in my weekly crime show “Red Alert” as this could help them. The fact that a police team from a small town in Britain was taking so much effort in pursuing the case of unidentified dead body was pleasantly surprising and interesting. I aired a whole episode of “Red Alert” on the operation appealing the viewers to reach out to Lancashire cops if they have any info about the victim. Lancashire police was impressed with our co-operation and sent a letter of appreciation to me.

Letter received by Jitendra Dixit from Lancashire Police, UK.


It has been over 12 years that “Operation Complex” was launched. Recently, when I spoke to Al Yusuf, he informed that “Operation Complex” is still on. So far the victim’s dead body has not been identified. In many cases it will be unfair to compare police of India and UK as cops in UK are better off in many ways than their Indian counterparts. However, our cops can still learn from them on how to pursue cases of unidentified dead bodies. “Operation Complex” of Lancashire Constabulary is inspiring and worth appreciation.

Thursday, 3 September 2015

ऑपरेशन कॉम्प्लैक्स: लावारिस लाश मिलने पर इस हद तक जाती है ब्रिटेन की पुलिस!

लैंकशायर पुलिस के अधिकारी ग्राहम कोट्स और अल यूसुफ मुंबई पुलिस के अधिकारी के साथ।

शीना बोरा की हत्या 2012 में हुई और 3 साल बाद ही उसकी हत्या का पता लग पाया। ऐसा क्यों हुआ इसके पीछे एक कारण ये भी है कि रायगढ पुलिस ने उसी साल अपने इलाके में मिली एक लावारिस लाश की तहकीकात नहीं की। न तो पुलिस ने बैग में बंद जली हुई लाश मिलने पर हत्या का मुकदमा दर्ज किया और न ही उसके अंगों के सैंपल जांच के लिये जे.जे.अस्पताल भेजने के बाद उसकी रिपोर्ट हासिल करने की सुध रखी। रायगढ पुलिस की ये लापरवाही एक मिसाल है कि हमारे देश में पुलिस लावारिस लाशों के मिलने पर उनकी जांच में कितनी दिलचस्पी लेती है। इस मामले ने मुझे याद दिला दी ब्रिटेन की पुलिस के ऑपरेशन कॉम्प्लैक्स की। उस ऑपरेशन से ये पता चलता चलता है कि ब्रिटेन की पुलिस किसी लावारिस शव के मिलने पर उसकी तहकीकात के लिये किस हद तक जा सकती है, फिर चाहे उसके लिये कितना भी पैसा, कितने भी लोग और कितना भी वक्त क्यों न लगाना पडे।

26 जुलाई 2002 को ब्रिटेन के लैंकशायर नाम के कस्बे से सटे ग्रामीण इलाके में एक महिला अपने कुत्ते को टहला रही थी। अचानक कुत्ता सडक के किनारे झाडियों में पडी हड्डियों के कुछ टुकडों को खींचने लगा। उस महिला ने जब करीब जाकर देखा तो उसके होश उड गये। वहां एक पूरा नरकंकाल पडा था।खबर मिलने के बाद लैंकशायर पुलिस ने मामले की जांच शुरू की। शव की शिनाख्त हो सके, ऐसी कोई निशानी शव के पास से नहीं मिली। शव को ग्लासगो यूनिवर्सिटी के ह्यूमन आईडेंटीफिकेशन यूनिट के पास फोरेंसिक जांच के लिये भेजा गया। जांच रिपोर्ट से पता चला कि ये कंकाल एशियाई मूल के किसी आदमी का है, जिसकी उम्र 40 साल के करीब है, जिसका कद 5 फुट 6 इंच लंबा है। जांच में ये भी पता चला कि उसके सिर पर भारी चीज से हमला करके उसे मारा गया था। पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज किया और अनुमान लगाया कि ये किसी गैरकानूनी अप्रवासी का शव हो सकता है।

सबसे पहले लैंकशायर पुलिस ने पूरे ब्रिटेन में मारे गये शख्स की पहचान तलाशने की कोशिश की। पुलिस की टीमें अलग अलग शहरों में गईं और वहां एशियाई लोगों की बस्तियों में जाकर पूछताछ की क्या उनके बीच का कोई गुमशुदा है। ये सिलसिला करीब 9 महीने तक चला, लेकिन वहां लैंकशायर पुलिस को कोई कामियाबी नहीं मिली। इसके बाद पुलिस ने तय किया कि वो उन एशियाई देशों में भी टीमें भेजेगी जहां से मारे गये शख्स के आने की संभावना थी। एक लावारिस लाश की पहचान का पता लगाना और फिर उसके कातिल को पकडना एक बेहद पेचीदा काम था और इसी के मद्देनजर पुलिस ने अपने इस मिशन को नाम दिया ऑपरेशन कॉम्प्लैक्स। इस ऑपरेशन के तहत 2 अधिकारियों की टीम जिनके नाम ग्राहम कोट्स और अलताफ युसुफ थे भारत आये।

सितंबर 2003 में भारत आकर उन्होने मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर डॉ.सत्यपाल सिंह जो तब क्राईम ब्रांच के ज्वाइंट कमिश्नर थे से मुलाकात की। दोनो अधिकारियों की टीम अपने साथ मारे गये शख्स का क्ले मॉडल और कंप्यूटर स्केच भी लाई थी। उन अधिकारियों की गुजारिश पर सत्यपाल सिंह ने एक प्रेस कंफ्रेंस रखी, जिसमें दोनो ब्रिटिश अधिकारियों ने भारत की जनता से अपील की कि अगर किसी को मृत शख्स के बारे में जानकारी हो तो वे उनसे संपर्क करें। एक लावरिश लाश की जांच के लिये ब्रिटेन की पुलिस इतना सिर खपायेगी, ये जानकर मुंबई के पुलिस के अधिकारी भी हैरान थे और कुछ के चेहरों पर दोनो ब्रिटिश अधिकारियों का मजाक उडाने वाली मुस्कराहट भी थी। मुंबई के अलावा गुजरात और पंजाब की पुलिस से भी इन अधिकारियों ने इसी तरह की मदद मांगी। पंजाब में उन्होने क्रिकेटर विरेंद्र सहवाग के जरिये मदद की अपील करवाई जो कि उस वक्त इंग्लैंड में काउंटी क्रिकेट खेलते थे।

लैंकशायर पुलिस के इन अधिकारियों से मेरी अच्छी दोस्ती हो गई थी और वे स्टार न्यूज पर ऑपरेशन कॉम्प्लैक्स को दिये गये कवरेज से प्रभावित थे। साल 2005 में अल यूसुफ नाम का अधिकारी फिर एक बार वापस भारत आया और इस बार उसने सिर्फ मुझसे मुलाकात की। यूसुफ ने कहा कि ब्रिटेन में भारतीय मूल के लोगों में स्टार न्यूज काफी लोकप्रिय है और अगर मैं फिर एक बार अपने साप्ताहिक क्राईम शो रेड अलर्ट में ऑपरेशन कॉम्प्लैक्स के बारे में जानकारी दूं तो उन्हें मदद मिल सकती है क्योंकि मारे गये शख्स की अब तक पहचान नहीं हो सकी है। ब्रिटेन के एक छोटे से कस्बे की पुलिस एक लावारिस लाश की तहकीकात के लिये इतनी मेहनत कर रही है, ये बात हमारे लिये चौंकाने वाली भी थी और दिलचस्प भी।मैने रेड अलर्ट में पूरे ऑपेरशन की जानकारी दी और लावारिस शव का पूरा ब्यौरा दिया। हमारी ओर से मिले सहयोग से खुश होकर लैंकशायर पुलिस ने मुझे एक पत्र भी भेजा।
 
लैंकशायर पुलिस की ओर से जीतेंद्र दीक्षित को भेजा गया पत्र।

ऑपरेशन कॉम्प्लैक्स को शुरू हुए 12 साल बीत चुके हैं। मेरी हाल ही में अधिकारी अल यूसुफ से बात हुई तो उसने बताया कि ऑपरेशन कॉम्प्लैक्स अब भी जारी है। लाश की पहचान अब तक नहीं हुई है। कई मामलों में भारतीय पुलिस और ब्रिटेन की पुलिस में तुलना करना गलत होगा क्योंकि वहां कि पुलिस फोर्स को कई ऐसी सुविधाएं मिली हुईं हैं, जिनसे कि हमारी पुलिस वंचित है, लेकिन कोई लावारिस लाश मिलने पर उसकी जांच कैसे की जाये, ये सीख तो उनसे ली ही जा सकी है। लैंकशायर पुलिस का ऑपेरेशन कॉम्प्लैकस प्रशंसनीय भी है और प्रेरणादायी भी।  

Thursday, 27 August 2015

Cops tried to hide it but this is how news of Indrani Mukherjea's arrest broke!


It was around 7pm on the evening of August 25. I was busy discussing next day’s stories with my reporters when a call came on my cell phone. On the other end was an old source who was screaming at the top of his voice – “ Your ex boss Peter Mukherjea’s wife Indrani has been arrested by Khar police. She killed her sister Sheena Vora and disposed off her dead body in the forests of Raigadh. She has been remanded to police custody till August 31”. I was shocked to listen to these words and at the same time I understood that I was going to break a very big story. However, I wasn’t aware that this story will be full of so much drama and complexities. I never met Indrani, but in 2003 when I joined Star News as its Principal Correspondent, Peter Mukherjea was CEO of Star India. I never had any official interaction with him but whenever we came across each other in Mahalaxmi office of Star India, he used to ask me about Mumbai underworld and appreciate my crime show “Red Alert” which was aired on Star News at those days. The source who tipped me about the arrest of Indrani was a trusted one and his information was always accurate, however, it was very much necessary to officially confirm this information before airing it on the news channel.

I immediately asked my colleague Ganesh Thakur who covers crime beat to get the information confirmed from Mumbai Police. He called up a senior cop, but instead of providing any detail he reverted by asking Ganesh – Who gave you this information? The case was related to a very high profile media personality. Police was not willing to take any risks and made all efforts to prevent information from leaking to media. Actually cops intended to reveal about this case few days later. All officers of Khar police station had switched off their phones. Police commissioner Rakesh Maria himself was not taking any calls. His constable received our calls only to tell that Mr.Maria was busy into something. Staff of Bandra court was also instructed that the copy of remand application must not reach hands of media. SP of Raigadh Police was also told not to speak about the case with any journalist. However, after struggling for around 2 hours, we managed to confirm the information and I broke the news at 9pm with a live chat saying that Media Mogul Peter Mukherjea’s wife Indrani has been arrested on charges of killing her sister Sheena Vora. She has disposed off her dead body in Raigadh. Bandra court has remanded her to police custody till August 31. Till then it was not clear that Sheena Vora in reality was Indrani’s daughter whom she introduced as her sister to the world including her husband Peter.


Meanwhile, Ganesh Thakur rushed to Khar police station. He got some more information. Ganesh got to know that Indrani was assisted by her driver Shyam Rai in the murder and a third person was also involved in the case. By morning we were able to reach that location on Pen-Khopoli road in Raigadh district where Sheena’s body was disposed off. Since that day consistently new information is flowing in on the case which is shocking as well as dramatic. We are coming across such a story which you see only in crime fictions. It is developing as a story which has greed, hatred, passion and ambition. 

ऐसे ब्रेक हुई इंद्राणी मुखर्जी की गिरफ्तारी की खबर!



25 अगस्त की शाम 7 बजे के करीब एबीपी न्यूज के दफ्तर में अगले दिन की खबरों को लेकर मैं अपने रिपोर्टरों से चर्चा कर रहा था, तभी एक पुराने सूत्र का फोन आया तुम्हारे पुराने बॉस पीटर मुखर्जी की बीवी इंद्राणी मर्डर केस में गिरफ्तार हो गई है। खार पुलिस स्टेशन ने आज ही पकडा है उसको। अपनी बहन शीना वोरा को ही मारा उसने और उसकी बॉडी को रायगढ के जंगल में जाकर जला दिया। 31 अगस्त तक रिमांड हुई है। फोन पर उस सूत्र के इन शब्दों ने बडा झटका दिया और इसका अंदाजा उसी वक्त मुझे आ गया कि शायद मैं एक बहुत बडी खबर ब्रेक करने जा रहा हूं...लेकिन इस खबर में इतना ड्रामा होगा, इतने पहलू होंगे, इतनी उलझन होगी इसका अंदाजा उस वक्त नहीं था। इंद्राणी से मैं कभी नहीं मिला था, लेकिन साल 2003 में जब मैने स्टार न्यूज बतौर प्रधान संवाददाता ज्वाइन किया था तब पीटर मुखर्जी स्टार इडिया के सीईओ थे। आधिकारिक तौर पर मेरा उनसे कोई सीधा ताल्लुक नहीं था, लेकिन महालक्ष्मी में स्टार के दफ्तर में आमना सामना होने पर अक्सर वे मुझसे मुंबई अंडरवर्लड से जुडे सवाल पूछा करते थे और उस वक्त चलने वाले मेरे क्राईम शो रेड अलर्ट की सराहना करते थे। जिस सूत्र ने मुझे मुखर्जी की पत्नी की गिरफ्तारी की खबर दी थी वो बडे ही भरोसे का आदमी था और उसकी खबर हमेशा पक्की रहती थी, फिर भी इतनी बडी खबर अच्छी तरह से ठोक बजाकर और आधिकारिक पृष्टि के बाद ही चलाना ठीक था।

मैने तुरंत अपने सहकर्मी क्राईम रिपोर्टर गणेश ठाकुर को मुंबई पुलिस से इस खबर की पृष्टि करने को कहा। गणेश ने जब एक आला पुलिस अधिकारी को फोन पर इस बारे में पूछा तो वो चौंक पडा और उलटा उसने गणेश से सवाल किया कि तुम्हें ये जानकारी किसने दी? मामला मीडिया से जुडी एक बहुत ही हाई प्रोफाईल शख्सियत का था और पुलिस ने इस खबर को लीक होने से रोकने के पूरे इंतजाम कर रखे थे। दरअसल पुलिस इस मामले को एक दो दिन बाद बताना चाहती थी। खार पुलिस थाने के तमाम अफसरों ने अपने फोन बंद कर रखे थे। पुलिस कमिश्नर राकेश मारिया खुद अपना फोन रिसीव ने करके कांस्टेबल से फोन रिसीव करवाते और व्यस्त होने का बहाना बनाकर बात नहीं करते। बांद्रा कोर्ट में भी स्टाफ को हिदायत दे दी गई थी कि रिमांड अर्जी की कॉपी मीडिया के हाथ न लगे। रायगढ पुलिस के एसपी को कहा गया था कि इस बारे में किसी से कोई बात न करे। बहरहाल 2 घंटे की मशक्कत के बाद जैसे तैसे खबर की आधिकारिक पृष्टि हो गई और मैने 9 बजे एबीपी न्यूज पर लाईव चैट करते हुए खबर ब्रेक कर दी कि मीडिया जगत की एक बडी हस्ती पीटर मुखर्जी की पत्नी इंद्राणी अपनी बहन शीना वोरा की हत्या के आरोप में गिरफ्तार हो गई है। रायगढ में जाकर उसने शीना के शव को ठिकाने लगाया। उसे 31 अगस्त तक के लिये बांद्रा कोर्ट ने पुलिस हिरासत में भेज दिया है। उस वक्त तक ये बात सामने नहीं आई थी कि इंद्राणी अपनी बेटी शीना को दुनिया के सामने बहन बताकर पेश करती थी और ये राज उसने अपने पति पीटर से भी छुपाये रखा था।


इस बीच मैने गणेश ठाकुर को खार पुलिस थाने रवाना कर दिया। थोडी ही देर में उसके पास काफी और भी जानकारी आ गई। गणेश को पता चला कि इंद्राणी ने हत्या अपने ड्राईवर श्याम राय के साथ मिलकर करवाई थी और इस मामले में एक तीसरा शख्स भी शामिल है। सुबह होते होते हमें रायगढ के पेण-खोपोली रोड पर वो ठिकाना भी मिल गया जहां शीना की लाश को ठिकाने लगाया गया था। इसके बाद से लगातार इस मामले में नये नये खुलासे हो रहे हैं, जो चौंकाने वाले भी हैं और इतने नाटकीय भी हैं कि जिनसे कोई फिल्म नहीं बल्कि कई दिनों तक चलने वाला टीवी धारावाहिक बनाया जा सकता है। ऐसी जानकारियां हाथ लग रहीं हैं जिनपर यकीन कर पाना मुश्किल लग रहा है या फिर जो आपराधिक उपन्यासों में ही पढने मिलतीं हैं। ये एक ऐसी कहानी बनकर उभर रही है जिसमें लालच भी है, नफरत भी है और चाहत भी है।