Monday, 23 June 2014

चाईनीज फूड और मुंबई


अबसे 2 दशक पहले तक आम भारतीयों के लिये नूडल्स का मतलब था-मैगी नूडल्स। वो मैगी नूडल्स जिसके विज्ञापन दूरदर्शन पर आते थे और जिसमें दावा किया जाता था कि वो 2 मिनट में तैयार हो जाते हैं। अब दौर है हक्का नूडल्स का, सिजवान नूडल्स का, सिंगापुर नूडल्स का वगैरह वगैरह..। 2 दशक पहले तक चाईनीज फूड (चीनी खाना) मुंबई के सिर्फ धनाढ्य या ऊपरी मध्यम वर्ग के लोगों की पसंद हुआ करता था या ये कहें कि सिर्फ उनकी जेबें ही चाईनीज खाने की इजाजत देतीं थीं। शहर में चाईना गार्डन या फ्लौरा जैसे गिने चुने ही रेस्तरां थे जहां इन वर्गों के लोग चाईनीज फूड का लुत्फ उठाने के लिये जाते थे। 90 के दशक के मध्य में चाईनीज फूड मुंबई के स्टालों पर मिलना शुरू हुआ और धीरे धीरे शहर के खानपान का हिस्सा बन गया। मुंबई में अब शायद ही कोई दक्षिण भारतीय व्यंजन पेश करने वाले उडीपी रेस्तरां हो जिसके मेन्यू में चाईनीज फूड का अलग पन्ना न हो। मंचाऊ सूप, चाऊमीन, ट्रिपल सिजवान, मशरूम मंचूरियन अब घर घर का नाम बन चुके हैं। घर में चाईनीज फूड बनाने के लिये अब शॉपिंग मॉल्स में भी चाईनीज मसालों के अलग सैक्शन खुलने लगे हैं।

मुंबई में चाईनीज फूड को आम लोगों तक पहुंचाया गहनों के बंगाली कारीगरों ने। दक्षिण मुंबई के जवेरी बाजार, कालबादेवी और भुलेश्वर जैसे इलाकों में बडे पैमाने पर बंगाली कारीगर रहते हैं जो बडे ज्वेलरों के लिये गहनों की कारीगरी का काम करते हैं। नब्बे के दशक की शुरूवात में इनमें से ही कुछ ने सडक किनारे चाईनीज फूड के स्टॉल लगाने शुरू किये। ये लोग पूर्वी कोलकाता के चाईना टाऊन में चाईनीज फूड चख चुके थे और चीनी व्यंजन बनाना भी इन्होने सीख लिया। “हक्का नूडल्स” का शब्द “हक्का” उन चीनी मजदूरों के लिये था जो 19वीं सदी में चीन से आकर बंगाल में बसे थे। शुरूवात में इन चाईनीज स्टाल्स के ग्राहक ज्यादातर बंगाली मजदूर और कारीगर ही हुआ करते थे, लेकिन धीरे धीरे मुंबई के दूसरे बाशिंदों के बीच भी ये लोकप्रिय होने लगे। मराठियों, गुजरातियों और मारवाडियों को भी चाईनीज फूड पसंद आने लगा।1995-96 तक मुंबई भर में करीब सौ से ज्यादा सडक किनारे चाईनीज फूड के स्टाल खुल गये। ये स्टाल अमूमन शाम 7 बजे से शुरू होते थे और रात 2-3 बजे तक चलते थे। ज्यादातर स्टाल चलाने वाले किसी नेपाली या पूर्वोत्तर भारत के किसी शख्स को बतौर खानसामा रखते थे ताकि चाईनीज फूड का अहसास आ सके। भडकीले लाल रंग के इन छोटे छोटे स्टॉल्स पर खूब भीड लगती। कई लोग शराब की बोतलें लेकर भी साथ आते थे और एक तरह से ये स्टॉल्स सडक किनारे बियर बार के रूप में भी तब्दील हो गये थे, बस शराब ग्राहक को खुद लानी पडती थी। रात की गश्त पर लगे पुलिसकर्मियों के लिये भी ये स्टॉल्स देर रात मुफ्त खाने का एक जरिया बन गये।

अब मुंबई में हर जगह चाईनीज फूड उपल्बध है। किसी भी रेस्तरां में चले जाईये, शॉपिंग मॉल में चले जाईये या फिर मुंबई से बाहर हाईवे पर किसी ढाबे पर जाईये। चाईनीज फूड आपको मिलेगा। आज मुंबई में जिस तरह वडापाव के जगह जगह पर स्टॉल्स लगते हैं उसी तरह से बीते 4-5 सालों में चाईनीज भेल के स्टॉल लगने भी शुरू हो गये हैं। चाईनीज भेल यानी चीनी मसालों के रसे से तैयार किये गये घोल में तले हुए नूडल्स का मिश्रण। 7 से 10 रूपये प्रति प्लेट मिलने वाली चाईनीज भेल जल्द ही लोकप्रिय हो गई और लोग इसे शाम के वक्त हलके फुलके स्नैक्स के तौर पर खाते हैं। सर्दी, खांसी से राहत पाने के लिये लोग चीनी मंचाऊ सूप को दवाई की तरह भी पीते हैं जिनमें अदरक, लहसुन, प्याज और मिर्च के अलावा कई ऐसे मसाले पडे होते हैं जो शरीर में गर्मी पैदा करते हैं। इन दिनों एक और चीनी डिश मुंबई के सडकों पर आई है-मंचूरियन पाव। भजिये (पकौडे) की तरह दिखने वाले मंयूरियन को पाव में रख कर बेचा जाता है।

एक मुख्य कारण जो चाईनीज फूड को भारतीय व्यंजनों से अलग करता है वो है उनमें Monosodium Glutmate (MSD) नामक नमक का होना। तमाम जापानी और चीनी पकवानों में इसका इस्तेमाल होता है। अजीनोमोटो नाम की कंपनी दुनियाभर में इसका कारोबार करती है। भारत में चाईनीज फूड में MSD का इस्तेमाल विवादास्पद भी रहा है। कईयों का मानना है कि इसको लंबे वक्त तक खाने से कई तरह की बीमारियां हो सकतीं हैं और छोटे बच्चों को तो इसे बिलकुल नहीं खाना चाहिये। वहीं कुछ का मानना है कि ये एक आम नमक की तरह है और आम नमक ज्यादा खाने पर जिस तरह का नुकसान शरीर को पहुंचाता है MSD से भी वैसा ही नुकसान होता है। मेरा चीनी मूल का एक स्कूली दोस्त है हू शिह फॉंग जो भारत के अलग अलग शहरों में चीनी रेस्तरां शुरू करने के लिये बतौर कंसलटंट का काम कर चुका है। फॉंग के मुताबिक लोगों को ये बात पता नहीं होगी, लेकिन अब तो तमाम भारतीय रेस्तरां भी अपने व्यंजनों में स्वाद बढाने के लिये MSD का इस्तेमाल करते हैं मसलन अगर आप छोले या राजमा का आर्डर देते हैं तो उसमें भी आपको वही MSD मिलेगा जो चाईनीज फूड में इस्तेमाल होता है। वैसे फॉंग का कहना है कि मुंबई में चंद गिने चुने रेस्तरां को छोडकर कहीं भी असली चाईनीज फूड नहीं मिलता। सब जगह चीनी फूड का भारतीयकरण हो चुका है। फॉंग के मुताबिक ये अच्छा है क्योंकि असली चाईनीज फूड शायद ही भारतियों को पसंद आये। भारतियों के लिये चीनियों जैसा चाईनीज फूड पचा पाना मुश्किल होगा।  


चीन भले ही भारत की उत्तर-पूर्वी सीमा पर आये दिन घुस्पैठ कर फिर वापस हट जाता हो, लेकिन भारतीयों के एक बडे तबके के स्वाद में उसने अब स्थाई कब्जा जमा लिया है।

Thursday, 19 June 2014

केदारनाथ : डर के आगे आस्था है !


बीते हफ्ते केदारनाथ से लौटा। साढे 11 हजार की ऊंचाई पर इस बात की रिपोर्टिंग करने गया था कि बीते एक साल में वहां क्या क्या बदला है? क्या मंदिर में फिर से शिवभक्तों का तांता लगने लगा है? सरकारी इंतजाम क्या हैं? पुनर्निमाण का काम कितना हुआ है और क्या केदारनाथ में फिर पहले जैसी रौनक लौट सकेगी? गुप्तकाशी के पास फाटा नामक के कस्बे से मैं सिर्फ 8 मिनट में ही हेलिकॉप्टर के जरिये पहुंच गया। वहां एक रात गुजारने के बाद मैने पैदल ही वापस उतरना तय किया। उतरते वक्त कई तरह के भाव मन में थे- आश्चर्य के, दुख के, गुस्से के, प्रशंसा के और उम्मीद के।

डर के आग आस्था है।
बीते साल केदारनाथ में जो तबाही मची उसकी दिल दहला देने वाली तस्वीरें पूरी दुनिया ने टेलिविजन के जरिये देखीं। उन तस्वीरों को देखकर ऐसा लगा कि प्रकृति की ओर से किये गये इतने बडे नरसंहार के बाद शायद अब लोग केदारनाथ नहीं आयेंगे। जान सबसे बडी चीज है...लेकिन ऐसा हुआ नहीं। केदारनाथ में इन दिनों रोजाना 1 हजार के करीब लोग दर्शन करने आ रहे हैं। 700 लोग पैदल 21 किलोमीटर की चढाई करके और 300 के करीब लोग हेलिकॉप्टर से। ज्यादातर लोग भकितभाव से वहां आये थे, कुछ लोग जिज्ञासा के कारण वहां पहुंचे ये देखने के लिये कि किस तरह से तबाही हुई थी, कुछ लोग अपनी ज्योत्रिलिंगों की यात्रा पूरी करने के लिये आये थे, जैसे एक सज्जन ने 11 ज्योत्रिलिंगों के दर्शन करने लिये थे, सिर्फ यहीं के दर्शन बचे थे इसलिये वे डरावनी तस्वीरों को देखने के बावजूद और खतरों को नजरअंदाज करते हुए यहां पहुंचे।
सभी ज्योत्रिलिंगों में केदारनाथ ज्योत्रिलिंग की यात्रा सबस कठिन है। अगर हेलिकॉप्टर से सफर के पैसे नहीं हैं तो 21 किलोमीटर की पैदल चढाई करनी पडती है। चढाई का रास्ता भी सरल नहीं है। कहीं सीधी चढाई है, कहीं बर्फ पर चलना पडता है तो कहीं ऊबड-खाबड पथरीला रास्ता है। केदारनाथ की वादियों में मौसम अचानक ही बदल जाता है। देखते देखते धूप की जगह बारिश और ओले ले लेते हैं। मई-जून जैसे महीनों में भी रात के वक्त तापमान शून्य से नीचे चला जाता है। अक्सर ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। उत्तराखंड में एक कहावत है- मुंबई का फैशन और केदारनाथ का मौसम कभी भी बदल जाता है। इन तमाम दुष्वारियों के बावजूद मैने देखा कि 80 साल तक की बूढी महिलाएं भी पैदल केदारनाथ के दर्शन करने पहुंच रहीं थीं। वैसे अब चढाई से पहले सभी श्रद्धालुओं को सेहत की जांच करवाना जरूरी है। डॉक्टर की ओर से फिटनेस प्रमाणपत्र मिलने के बाद ही केदारनाथ तक जाने की इजाजत मिलती है।

केदारनाथ में कितने मरे ?
केदारनाथ में मरने वालों का आंकडा अब भी एक रहस्य है और सरकार जो आंकडा दे रही है उस पर विवाद है। सरकार के मुताबिक केदारनाथ त्रासदी में पौने 4 हजार लोग मारे गये।आप सोचेंगे कि सरकार इस आंकडे पर कैसे पहुंचीं। दरअसल उस तबाही में जो लोग लापता हुए ऐसे पौने 4 हजार लोगों के रिश्तेदारों को सरकार ने डेथ सर्टिफिकेट जारी किये। सरकारी आंकडे के साथ पेंच ये है कि उस हादसे में कई पूरे के पूरे परिवार बह गये, जिनका कोई नहीं बचा जो सरकार के पास डेथ सर्टिफिकेट के लिये आवेदन करता। कई मामलों में लापता लोगों के रिश्तेदारो ने डेथ सर्टिफिकेट लेने की जरूरत नहीं समझी। जिन लोगों ने हादसे को अपनी आंखों से देखा उनका भी मानना है कि मरने वालों की तादाद सरकारी अनुमान से कहीं ज्यादा हो सकती है।

केदारनाथ की तबाही में लापता लोगों को मृत माना जायेगा, उत्तराखंड सरकार की इस नीति का कई लोगों ने गलत फायदा उठाने की भी कोशिश की। मुआवजे के लालच में कई ऐसे लोगों के रिश्तेदार भी डेथ सर्टिफिकेट मांगने के लिये आये जो कि केदारनाथ की तबाही के महीनों पहले ही लापता हो गये थे।
बहरहाल अब तक उन सभी पौने 4 हजार लोगों के शव भी नहीं मिले हैं जिन्हें सरकार मृत मान रही है। चश्मदीदों के मुताबिक अब भी हजारों शव केदारनाथ से लेकर गौरीकुंड के बीच बडे बडे पत्थरों और मलबे के ढेरों में दबे पडे हैं।

एक साल बाद क्या है हाल ?
अगर ये कहें कि सालभर में उत्तराखंड सरकार ने कुछ नहीं किया तो नाइंसाफी होगी। पिछले साल की तबाही को देखकर लगा था कि फिरसे यहां यात्रा शुरू होने में कई साल लग जायेंगे, लेकिन यात्रा शुरू हो गई है और यहां आने वालों को कोई खास असुविधा भी नहीं हो रही है। नेहरू इंस्टीट्यूट और माउंटेरियंग की मदद से केदारनाथ धाम के पुननिर्माण का काम किया जा रहा है। मंदिर के पीछे से गुजरने वाली मंदाकिनी नदी की धारा को बदला जा रहा है ताकि उसमें फिरसे बाढ आने पर केदारनाथ कस्बे को कोई नुकसान न पहुंचे। एक बडा हेलिपैड बनाया जा रहा है जिसपर एक साथ कई बडे हेलिकॉप्टर उतर सकते हैं। पैदल यात्रा के मार्ग को दुरूस्त किया जा रहा है। सारा काम उत्तराखंड पुलिस के एक डीआईजी जी.एस.मर्तोलिया की देखरेख में हो रहा है।
जो यात्री केदारनाथ पहुंचे रहे हैं उनके तीनों वक्त के खाने और चायपान का मुफ्त इंतजाम गढवाल मंडल की ओर से किया जा रहा है। खाना सादा लेकिन स्वादिष्ट और शुद्ध होता है। खाने के बाद बर्तन आपको खुद साफ करके वापस लौटाने हैं। रात को सोने के लिये टेंट की व्यवस्था है। मुसाफिरों को स्लीपिंग बैग दिये जाते हैं। सुबह नहाने के लिये गर्म पानी भी उपलब्ध रहता है। गौरीकुंड से लेकर केदारनाथ तक करीब 5 कैंप बनाये गये हैं जहां यात्री रूककर आराम कर सकते हैं, खा, पी सकते हैं। रास्तेभर जगह जगह पर पुलिस की मौजूदगी रहती है। हर कैंप में डॉक्टरों की एक टीम भी तैनात रहती है जो बीमार मुसाफिरों की मुफ्त जांच करती है और उन्हें दवा देती है।
चाहे सरकारी कर्मचारी हो या गैर सरकारी स्वयंसेवक, जो भी यहां दिखा, दिल से काम करता दिखा। हर कोई यही कहता कि इस बहाने वो भोलेनाथ की सेवा कर रहा है। इन तमाम लोगों ने बीते सालभर में जो कुछ भी किया है या जो कुछ कर रहे हैं मुझे वो प्रशंसनीय लगा।

मंदिर के इर्द-गिर्द है एक बहुत बडा कब्रिस्तान।
पिछले साल जब सैलाब आया तो केदारनाथ मंदिर के इर्द-गिर्द बनीं तमाम इमारतें धाराशायी हो गईं। सैकडों लोग उनके मलबे में दब गये। सरकारी टीमों ने बाद में ऊपर ऊपर जो भी लाशें नजर आईं उनका तो अंतिम संस्कार कर दिया लेकिन मलबे के भीतर अब भी सैकडों शव दबे पडे हैं। वहां मौजूद पंडों ने मंदिर से महज 200 मीटर के दायरे में मुझे कई ऐसे ठिकाने दिखाये जहां से शवों के सडने की बदबू अब भी आ रही थी और जहां इंसानी हड्डियां पडीं थीं। मैं जिस दिन केदारनाथ से निकला उसी दिन गरूडचट्टी नाम की जगह से बडे पैमाने पर शव बरामद हुए, जिसके बाद सरकार ने फिरसे शवों को खोजने के लिये एक अभियान शुरू कर दिया।

मंदिर को बचाने वाला पत्थर
केदारनाथ में शिवमंदिर के बाद अब दूसरा सबसे बडा आकर्षण उस मंदिर को बचाने वाला एक बडा पत्थर बन गया है जो मंदाकिनी नदी में बाढ आने पर पहाडों से बहकर नीचे आया और ठीक शिवमंदिर के पीछे आकर रूक गया। इसी पत्थर की वजह से बाढ का पानी मंदिर की नींव को नुकसान नहीं पहुंचा सका। लोग इसे एक चमत्कारिक पत्थर मानते हैं और इसके भी दर्शन करते हैं।
मंदिर के इर्द गिर्द साधुओं की भीड लगी रहती है जिनमें से कई गांजे का कश लगा रहे होते हैं। शाम की आरती के वक्त माहौल देखते ही बनता है। मंदिर में घंटे बज रहे होते हैं और उसी वक्त बाहर मौजूद तमाम साधु एक साथ अपने अपने डमरू बजा रहे होते हैं।

सरकार और पंडों में विवाद
मैं जैसे ही केदारनाथ हेलिपैड पर उतरा तो ये जानकर कि मैं पत्रकार हूं तमाम पंडों ने मुझे घेर लिया और बताने लगे कि सरकार उनके साथ नाइंसाफी कर रही है। केदारनाथ के जिन मकानों को बाढ में नुकसान पहुंचा है, सरकार ने उनपर चिन्ह लगा दिये हैं। ज्यादा क्षतिग्रस्त भवन, कम क्षतिग्रस्त भवन और क्षतिग्रस्त भवन, इन 3 श्रेणियों में सभी इमारतों को बांटा गया है। सरकार चरणबद्ध तरीके से खतरनाक हो चुकी इन इमारतों को गिराना चाहती है, लेकिन स्थानीय पंडे इसका विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार के इस कदम से उनके सिर छुपाने का ठिकाना छिन जायेगा।

लुआनी गांव की कहानी
केदारनाथ से लौटते वक्त मैं लुआनी गांव गया। इस गांव मैं पिछले साल भी तबाही के बाद गया था। गांव के 16 मर्द जो कि केदारनाथ में पंडे का काम करते थे, तबाही में लापता हो गये। कई ऐसे परिवार थे जिनमें कोई भी मर्द न बचा। गांव में मैं 11 महीने के सौम्य नाम के एक बच्चे से मिला। हंसते और किलकारियां मारते सौम्य को ये नहीं पता कि उसके पिता दुनिया में उसके आने से पहले ही चल बसे। पिछले साल पिता संदीप बगवाडी के तबाही में मारे जाने के 7 दिनों बाद उसका जन्म हुआ था। संदीप और उनके बडे भाई बाढ में बह गये थे। परिवार में अब दोनो की विधवाएं उनकी बूढी मां, एक 5 साल की बच्ची और लडका सौम्य है। सरकार ने विधवाओं को सवा 5 लाख रूपये का मुआवजा तो दिया है, लेकिन बगवाडी परिवार इस आर्थिक मदद को नाकाफी पाता है। लुआनी गांव को किसी गैर सरकारी संगठन ने गोद भी नहीं लिया है।


बहरहाल, केदारनाथ में जो कुछ भी देखा और जो कुछ भी अनुभव किया उसके बाद यही पंकित बार बार दिमाग में घूम रही है- डर के आगे आस्था है। जर्मन अर्थशास्त्री कार्ल मार्कस की कही एक बात याद आ रही है- Religion is the opium of masses यानी धर्म लोगों का नशा है और नशे के प्रभाव में इंसान को जोखिम, खतरे और दुख की परवाह नहीं होती।

#Bombayphile - Company of Woman : David Headley's Secret Girlfriend

Have you watched Ram Gopal Verma's 1998 movie Satya? Urmila Matondar plays the role of Singer Vidya, who is jolted when she learns that ...