Tuesday, 28 April 2015

भूकंप : टोक्यो का तजुर्बा


15 मार्च 2011, टोक्यो, रात के करीब 11.30 बजे। शिंजुकू इलाके के सनराईज होटल की तीसरी मंजिल के अपने कमरे में मैं दिनभर कवर की गई खबरों की स्क्रिप्ट लैपटॉप पर टाईप कर रहा था। टेबल के बगल में लगे बेड पर कैमरामैन हाशिब खान सो रहा था। दिनभर खबरों के लिये मेरे साथ भटकने के बाद थकान के मारे उसे बेड पर लेटते ही नींद आ गई थी। मैने सोचा था कि स्क्रिप्ट भेज देने के बाद खाना खाने के लिये उसे जगाऊंगा। अचानक मेरा लैपटॉप अपनी जगह से हिलने लगा। मैं अक्षर कुछ और टाईप करने जाता, उंगलियां किसी और अक्षर पर पडतीं। मुझे लगा शायद नींद या थकान की वजह से ऐसा हो रहा है, लेकिन कुछ पलों में लैपटॉप अपनी जगह से पीछे खिसकने लगा। ऐसा लगा कोई अदृश्य शख्स उसे अपनी ओर खींच रहा है। किसी हॉरर फिल्म के जैसा माजरा लग रहा था। पहले तो कुछ समझ नहीं आया फिर महसूस किया कि कमरे की हर चीज हिल रही थी। टेबल, उसपर रखा गुलदस्ता, चाय के कप, लैंप...सबकुछ। समझते देर न लगी कि ये भूकंप के झटके हैं। मैने हाशिब को हिलाकर जगाया – उठ हाशिब! चल भाग जल्दी! भूकंप आया है!
हाशिब ने तुरंत कैमरा उठाया, मैने एक छोटे बैग में दोनो के पासपोर्ट और भारत वापसी के टिकट डाले और हम सीढियों से नीचे की ओर भागे। नीचे स्वागत कक्ष पर नाईट शिफ्ट में आया रिशेप्शनिस्ट बैठा जम्हाई ले रहा था।
मैने अलर्ट करने के इरादे से उससे कहा – Everything is shaking! Its earthquake!

Yes…yes…It is earthquake…रिशेप्शनिस्ट ने बेफिक्री से कहा।

Then run…Move out fast. मैने उससे साथ चलने की गुजारिश की।

No need…no need…उसने मुस्कराते हुए कहा।

मुझे रिशेप्शनिस्ट बेवकूफ लगा। अभी चार दिन पहले ही जापान के इतिहास का सबसे बडा भूकंप आया था। उसकी तीव्रता रिक्टर स्केल पर 9 थी और जब से भूकंप की तीव्रता दर्ज करने की दुनिया में शुरूवात हुई तबसे धरती पर आया वो चौथा सबसे बडा भूकंप था। इसके बावजूद ये मूर्ख जापानी अपनी जान की फिक्र किये बिना होटल में ही बैठा है। मरने दो साले को...जब खुद ही अपनी जान नहीं बचाना चाहता तो कोई क्या करे...ये सोचकर मैं होटल से बाहर सडक पर आ गया और चैनल के नोएडा स्थित मुख्यालय में फोन करके खबर दी कि टोक्यो में फिरसे भूकंप के झटके महसूस किये गये। हाशिब तस्वीरें लेने में व्यस्त हो गया। मुझे लगा था कि सडक पर भीड हो जायेगी और इमारतों में मौजूद तमाम लोग भूकंप के डर से बाहर निकल आयेंगे...लेकिन वैसा कुछ नहीं हुआ। रात के उस वक्त सडक पर सन्नाटा था। हमारी तरह ही चंद विदेशी अपने होटल के कमरों से बाहर आये थे और वे भी बदहवास लग रहे थे, लेकिन भूकंप से बचने के लिये कोई जापानी नागरिक सडक पर नजर नहीं आया। सडक किनारे लगी टैक्सियों में सिर्फ उनके जापानी टैक्सी ड्राईवर ही नजर आ रहे थे और वे भी बेफिक्र थे।

जापान में कुछ और दिन रूकने और वहां भूकंप के इतिहास का थोडा और अध्ययन करने के बाद मुझे होटल के रिशेप्सिनिस्ट के आत्मविश्वास और निश्चिंतता का पता चला। जापान भूकंप वाला देश है ये तो मैं बचपन से ही पढता आया था, लेकिन भूकंप के अभिशाप से निपटने के लिये जापान ने क्या किया और क्यों अब जापानियों को भूकंप से डर नहीं लगता उसे वहीं जाकर जाना।

दरअसल भूकंप के ये झटके 11 मार्च को जापान के पूर्वी ओर प्रशांत महासागर में आये भूकंप के आफ्टर शॉक्स थे। प्रशांत महासागर में आये भूकंप की वजह से ही जापान के उत्तर-पूर्वी इलाके में सुनामी की लहरों ने तबाही मचाई थी जिसमें सबसे ज्यादा नुकसान सेंदई और मियागी इलाकों को पहुंचा था। जापान में 90 फीसदी तबाही सुनामी की वजह से हुई थी, न कि भूकंप की वजह से। टोक्यो के रेल नेटवर्क को थोडा बहुत नुकसान पहुंचा था, लेकिन 4-5 दिनों के भीतर ही रेल नेटवर्क सौ फीसदी काम करने लगा। 11 मार्च को जिस वक्त जापान में भूकंप आया उस वक्त प्रभावित इलाके के पास से 5 शिंकानसेन ट्रेने (बुलैट ट्रेन) 270 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से दौड रहीं थीं, लेकिन भूकंप की वजह से कोई भी ट्रेन पटरी से नहीं उतरी और भूकंप को भांप लेने वाली तकनीक के चलते अपने आप ही रूक गईं।

जापान में रिपोर्टिंग के दौरान मेरी मुलाकात गौतम बिल्लौरे से हुई जो टोक्यो में अपनी पत्नी और 5 साल की बेटी के साथ रहते हैं और स्टेट बैंक औफ इंडिया के जापानी कारोबार से जुडे हैं। उन्होने बताया कि वैसे तो आये दिन जापान में भूकंप के झटके आते रहते हैं लेकिन 11 मार्च को जब भूकंप आया तो उसके झटके सबसे ज्यादा तेज थे।ऊंची-ऊंची इमारतें हिल रहीं थीं, घर का सारा सामान गिरकर यहां वहां बिखर गया था। ऐसा लग रहा था जैसे मनोरंजन पार्क की किसी राईड पर बैठे हों...लेकिन इसके बावजूद कोई भी इमारत गिरी नहीं और न ही जानमाल का कोई नुकसान हुआ। कुछ पाईपलाईनें जरूर फट गईं और रेल पटरियों को मामूली नुकसान हुआ।

इस वक्त जापान में जो भी इमारतें मौजूद हैं वो सभी 1981 में तैयार किये गये भूकंप अवरोधक निर्माण मानकों को ध्यान में रखकर बनाई गईं हैं। इन मानकों के आधार पर बनाई गई इमारतें रिक्टर स्केल 7 की तीव्रता से आये हुए भूकंप को बडी आसानी से झेल सकतीं हैं। इनसे भूकंप आने पर इमारतें हिलेंगी जरूर लेकिन गिरेंगीं नहीं। कई रिहायशी इमारतों की बनावट भी ऐसी थी कि भूकंप आने पर इमारत से निकल भागने में आसानी हो मसलन इमारत की सीढियां बीचोंबीच के बजाय इमारत के किनारे की ओर बनाई जातीं हैं ताकि इमारत का नुकसान पहुंचने की हालत में सीढियों को नुकसान न हो और लोग उन तक जल्द पहुंच सकें।

जापान में भूकंप आते रहेंगे, जापानियों ने इस कडवी हकीकत को जाना और उसके लिये खुद को तैयार किया। हम भी ये जानते हैं कि भारत के तमाम बडे शहर भूकंपीय जॉन 2 से लेकर 5 के बीच आते हैं। जॉन 2 कम खतरे वाला क्षेत्र और जॉन 5 सबसे ज्यादा खतरे वाला क्षेत्र माना जाता है। मुंबई और दिल्ली जैसे शहर जॉन 4 में आते हैं। ये शहर अब समतल (horizontal) बढने के बजाय सीधे (vertical) ज्यादा बढ रहे हैं यानी अब ऊंची ऊंची इमारतों का निर्माण ज्यादा हो रहा है। ऐसे में भूकंप रोधी तकनीक का अपनाया जाना जरूरी है। अब तक देश में ऐसी इमारतों को बनाने के लिये कोई ठोस नीति नहीं है। कागजों पर कई इमारते भूकंप रोधी जरूर बताईं गईं है, लेकिन भ्रष्टाचार और सरकारी लापरवाही के चलते इनपर कितना यकीन किया जाये। इसी साल ठोस नीति बनाये जाने की उम्मीद है, अगर ईमानदारी से उसपर अमल हो तब ही हम भूंकप के आतंक से खुदको महफूज रखने की उम्मीद कर सकते हैं।  

Tuesday, 21 April 2015

मन की रेल न हो सकी मोनोरेल !

दिल्ली के रेल संग्रहालय में भारत की पहली यात्री मोनोरेल

रेल सफर और रेलगाडियों में बचपन से खास दिलचस्पी रही है। साल 2008 में जब मैं वडाला के भकित पार्क में रहने गया तो ये जानकर खुशी हुई कि यहां से मोनोरेल लाईन गुजरने वाली है जो मुंबई के उत्तर-पूर्वी उपनगर चेंबूर को दक्षिण मुंबई के सात रास्ता तक जोडेगी। मोनोरेल की सवारी मैं क्वालालुमपुर में मलेशिया के सफर के दौरान कर चुका था और वो मुझे पसंद आई। मुझे लगा कि मोनोरेल रोजाना मेरे घर से दफ्तर आने जाने का माध्यम बन जायेगी। ट्रैफिक जाम में वक्त और कार के ईंधन की बर्बादी नहीं होगी और न ही मानसिक थकान झेलनी होगी। मेरा दफ्तर सातरास्ता के करीब महालक्ष्मी में था। खैर 2014 मे मोनोरेल शुरू होने के 2 साल पहले ही यानी 2012 में ही एबीपी न्यूज का दफ्तर महालक्ष्मी से अंधेरी आ गया। सात रास्ता तक लाईन अभी भी शुरू नहीं हुई है। मोनोरेल तो मेरे काम की नहीं निकली लेकिन अंधेरी में दफ्तर पहुंचने के लिये मेट्रो रेल का इस्तेमाल करने मुझे मिल रहा है।   

हाल ही में एबीपी न्यूज के लिये स्पेशल रिपोर्ट पर काम करते हुए मोनोरेल की सवारी का मौका मिला। उसकी तमाम खामियां मैं उस रिपोर्ट में दिखा चुका हूं। जो नहीं दिखाया वो यहां लिख रहा हूं। मोनोरेल पर मैं वडाला से चढा और अपना शूट खत्म करके आखिरी स्टेशन यानी चेंबूर पहुंचने का बैठकर इंतजार करने लगा। टप...टप...टप.. अचानक पैंट पर पानी की बूंदें गिरी। मैं सोच में पड गया कि पानी कहां से आया। क्या छत से पानी टपक रहा था? बाहर बारिश नहीं हो रही थी। गौर से देखने पर पता चला कि पानी कोच के एयरकंडिश्नर से टपक रहा था। पानी न केवल जिस जगह मैं बैठा था वहां टपक रहा था, बल्कि कोच में कई दूसरी जगह भी टपक रहा था। इसके अलावा एक और बात मुझे अखरी। अगर आप आंख बंद करके कुछ देर के लिये मोनोरेल में सफर करें और ये भूल जायें कि आप मोनोरेल में बैठें हैं तो यकीन मानिये आपको मोनोरेल की सवारी और किसी दूर दराज के गांव में पथरीली कच्ची सडक पर चलने वाली बैलगाडी की सवारी के अनुभव में कोई फर्क नहीं महसूस होगा। बैलगाडी और मोनोरेल में बैठकर आप एक जैसे ही हिलेडुलेंगे और खड...खड..खड..की आवाज भी वैसी ही आयेगी। मोनोरेल सफर का ये वर्णन अतिश्योकित नहीं है। मुंबई मोनोरेल की सवारी वैसी बिलकुल नहीं थी जैसी मैने मलेशिया में की थी। दिलचस्प बात ये है कि मुंबई में भी वही मलेशियाई स्कोमी कंपनी लार्सन एंड टूब्रो के साथ मोनोरेल चला रही है जो क्वालालुमपुर में चलाती है।

मुंबई मोनोरेल को पाईलेट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरू किया गया था यानी अगर ये मुंबई में कामियाब होती है तो भारत के दूसरे शहरों में भी इसे शुरू किया जा सकता है। वैसे भारत में पिछली सदी में पहले भी 2 बार मोनोरेल के प्रयोग हो चुके हैं। केरल की कुंदला घाटी में 1902 से लेकर 1924 के बीच मोनोरेल चलती थी, लेकिन वो वैसी नहीं थी, जैसी हम आज देखते हैं। मोनोरेल का एक पहिया लोहे की पटरी पर होता था और दूसरा जमीन पर। डिब्बों को बैल खींचते थे। उस मोनोरेल का इस्तेमाल चाय और दूसरे माल को ढोने के लिये किया जाता था। मुसाफिरों के लिये पहली मोनोरेल 1907 में Patiala State Monorail Trainway (PSMT) ने शुरू किया था और ये करीब 20 साल तक चली। उस मोनोरेल का एक मॉडल दिल्ली के रेल संग्रहालय में रखा हुआ है। पटियाला का प्रयोग नाकामियाब होने के बाद मोनोरेल के बारे में सीधे 21वीं सदी में सोचा गया जब मुंबई में बढती आबादी को देखते हुए यातायत के नये माध्यम की जरूरत हुई। मोनोरेल से उम्मीद थी कि ये कार इस्तेमाल करने वाले लोगों को आकर्षित करेगी जिससे सडक पर ट्रैफिक कम होगा और वायु और ध्वनि प्रदूषण में भी कमी आयेगी।

मोनोरेल का जो पहला चरण मुंबई में चल रहा है उसे देखकर निराशा होती है। 9 किलोमीटर के इस चरण में 7 स्टेशन आते हैं जिनमें से 3 स्टेशन आबादी की सहूलियत को ध्यान में रखकर नहीं बनाये गये। सुरक्षा को लेकर भी बडे सवाल हैं कि अगर मोनोरेल किसी हादसे का शिकार होती है तो मुसाफिरों को कैसे बचाया जायेगा। एक मिसाल हम 15 मार्च को देख चुके हैं जब 11 मुसाफिर मोनोरेल की बिजली गुल हो जाने की वजह से फंस गये थे। खुशनसीबी से तब जान और माल का कोई नुकसान नहीं हुआ, लेकिन फायर ब्रिगेड ने भविष्य में सुरक्षा को लेकर चिंताएं जताईं हैं। सीएजी ने भी अपनी रिपोर्ट में मोनोरेल के निर्माण के दौरान 21 तरह की खामियों के बताया है। मोनोरेल मुसाफिरों के लिये तरस रही है। रोजाना महज 5 हजार लोग ही इसमें सफर करते हैं जिनसे सिर्फ 50 हजार रूपये की आमदनी होती है, जबकि मोनोरेल चलाने का प्रतिदिन का खर्च 7 लाख रूपये के करीब है।


बहरहाल, मोनोरेल का दूसरा चरण इस साल के आखिर तक शुरू होने की उम्मीद है जिसके बाद पूरा नेटवर्क 20 किलोमीटर लंबा हो जायेगा और मुंबई के उत्तर-पूर्वी उपनगर दक्षिण और मध्य मुंबई के इलाकों से जुड जायेंगे। उम्मीद है कि तब मोनोरेल अपने अस्तित्व को सार्थक कर सकेगी और बीती गलतियों से सीखकर जरूरी सुधार कर सकेगी...तब तक मुंबई के बाहर से आये मेहमानों की जॉय राईड के लिये मोनोरेल की सवारी करवाई जा सकती है।

Wednesday, 15 April 2015

किसने दी नारायण राणे को चुनाव लडने की सलाह?


श्रीरामचरितमानस में एक चौपाई है-

"जानबूझि जे संग्रह करिहि
कहो उमा ते काहे न मरहि"

नारायण राणे की हार के बाद अब इस सवाल का विश्लेषण हो रहा है कि आखिर वे क्यों हारे, लेकिन मेरी नजर में उससे बडा सवाल ये है कि आखिर उन्होने ये चुनाव ही क्यों लडा? किसीकी सलाह थी या फिर कोई मजबूरी? राणे ने क्यों अपने सियासी करियर के साथ एक बडा जुआं खेला?

मुंबई के उपनगर बांद्रा पूर्व की विधानसभा सीट, महाराष्ट्र की सत्ताधारी पार्टी शिवसेना का गढ रही है। बीते विधानसभा चुनाव में यहां से शिवसेना के बाला सावंत विधायक चुने गये थे। चंद दिनों पहले वे अचानक चल बसे, जिसके बाद यहां उपचुनाव घोषित हुआ। चुनाव में शिवसेना ने बाला सावंत की पत्नी तृप्ति सावंत को टिकट दिया।नारायण राणे जिस कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार थे, उसकी हालत साल 2014 के विधानसभा चुनाव में इस सीट पर काफी खराब थी। करीब 12 हजार वोट पाकर कांग्रेस यहां चौथे नंबर पर थे। चुनाव जीतने वाले शिवसेना के दिवंगत उम्मीदवार बाला सावंत को 41388 वोट मिले थे, दूसरे नंबर पर बीजेपी थी जिसे 25791 वोट मिले और तीसरे नंबर पर ओवैसी बंधुओं की पार्टी आल इंडिया मजलिस इत्तेहादुल मुसलमीन थी जिसने 23 976 वोट जुटाये। ऐसे में राणे को क्यों लगा कि इस चुनाव में अपनी कांग्रेस पार्टी को वे चौथे नंबर से पहले नंबर पर पहुंचा पायेंगे।

कांग्रेस की प्रतिदवंदवी एनसीपी ने तो राणे के समर्थन में अपना उम्मीदवार नहीं उतारा, लेकिन दूसरी तरफ बीजेपी और राज ठाकरे की पार्टी एमएनस ने भी इस बार अपने उम्मीदवार नहीं उतारे। इसका फायदा शिवसेना को मिला और राणे के लिये इसने मुकाबला और कडा कर दिया।

इस सीट पर 80 हजार मुसलिम वोट हैं, जबकि 50 हजार दलित वोट हैं, लेकिन कांग्रेस के इन पारंपरिक वोटों को हासिल करने के लिये एआईएमआईएम जी तोड कोशिश की। हैद्राबाद के ओवैसी बंधु यानी की पार्टी के अध्यक्ष असददुद्दीन ओवैसी और उनके छोटे भाई अकबरउद्दीन ओवैसी ने बांद्रा में ही अपना डेरा जमा लिया था। दोनो पूरी आक्रमकता के साथ अपने उम्मीदवार रहबर खान के लिये चुनाव प्रचार कर रहे थे। राणे उनके पहले निशाने पर थे।

शिवसेना भी अपने प्रचार में ये कहकर राणे पर निशाना साध रही थी कि वे इस इलाके से बाहर के हैं और स्थानीय नागरिकों की समस्याएं नहीं समझ सकेंगे।

62 साल के नारायण राणे एक मंझे हुए राजनेता हैं, सियासी खेल के अनुभवी खिलाडी हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सोच कर उन्होने यहां से चुनाव लडने का जुआं खेला जब राजनीति में उनका बुरा दौर चल रहा है। पहली नजर में ही ये सीट कांग्रेस के लिये आसान सीट नजर नहीं आती। राणे बीता विधानसभा चुनाव कोंकण की कुडाल सीट से हार गये। वो अपने बडे बेटे निलेश को भी बीता लोकसभा चुनाव जीता नहीं सके। अशोक चव्हाण को महाराष्ट्र कांग्रेस और संजय निरूपम को मुंबई कांग्रेस का अध्यक्ष चुने जाते वक्त भी उन्हें नजरअंदाज किया गया।

ये चुनाव नारायण राणे के लिये भी अहम था और कांग्रेस पार्टी के लिये भी। राणे को लगा था कि इस चुनाव को जीतकर वे अपने सियासी करियर में नई जान डाल देंगे। कांग्रेस ने भी सोचा था कि राणे की शक्ल में पार्टी का कोई आक्रमक प्रतिनिधि विधानसभा में जायेगा जो कि फिलहाल नहीं है...लेकिन चुनाव नतीजों ने सब पर पानी फेर दिया। इन नतीजों ने भले ही कांग्रेस को कुछ मिला न हो, लेकिन उसका कुछ गया भी नहीं। कांग्रेस की स्थिति जस की तस है। सवाल ये है अब आगे क्या करेंगे राणे?


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