Friday, 17 June 2011

J Dey Assasination Case: CBI enquiry is not a prudent option.

The federation of journalists in Mumbai has urged a probe by Central Bureau of Investigation (CBI) in veteran journalist J.Dey’s murder case.
Intending no offence to the sentiments & emotions of fellow journalists I wish to highlight that an enquiry by CBI in this case will not be prudent.
The demand for a CBI enquiry in Dey’s murder case seems to be a knee jerk decision & influenced by emotions. While, it is true that the incident was shocking to the whole journalist fraternity across the nation & led to an emotional response, I feel that the further strategy to nab the culprits & to secure a safe environment for journalists in Mumbai, emotions must not be allowed to dominate.

Being a crime reporter for over 13 years I have closely observed the functioning of various investigating agencies like Mumbai Police, Narcotics Control Bureau, Central Investigation Bureau, Enforcement Directorate & so on. My experience says that investigation of J.Dey’s murder by CBI will fetch no good & this is likely to become just another instance of red taped case. We should not demand CBI enquiry for the following reasons:

1)       CBI no longer holds its image of premier investigating agency of India having goofed up in so many high profile cases like Arushi murder case, Purulia arms drop case, Telgi case & so on. What merit CBI attracts to investigate J.Dey’s murder?
2)        CBI doesn’t have the required expertise to investigate cases of Mumbai underworld. Most of the investigators from CBI are inducted on deputation from various other agencies like Central Excise etc who don’t have any experience, network of sources & informants in the underworld. In the absence of these skills how can we expect them to reveal the truth & that also swiftly?
3)       Thirdly, CBI has already bitten more than it can chew. The investigating agency is heavily understaffed. As per a report the number of staffers in CBI are 25 % less than the required. In such a sordid scenario I don’t think it will be wise to handover the investigation to CBI. The case will just prolong with no credible results. Maharashtra is number 2 in the list of largest number of pending cases with CBI & Delhi holds the position of number 1.
4)       Mostly, the cases which have been referred to CBI are those in which some amount of investigation has been already done, chargesheets have been filed, few accused have been arrested etc. Such cases are referred to CBI only if the state police’ investigation is doubtful or not satisfactory.

Some of my friends may contest my views by asking that how can we rely on Mumbai Police when some of its officers are seen to be hand in glove with the underworld. The recent examples also enunciate that few corrupt police officials are targeting journalists by various means. Apart from the nexus with the underworld, there also seems to be an infight among the Mumbai cops & lack of co-ordination between various units is adding salt to the wounds. Yes, I observe & agree that the scenario is disgusting, but then also CBI doesn’t seem to be a better alternative. Then what is the better alternative? How could we find out, who killed our friend J.Dey? Who will nab the killers? My response to these questions is that we should wait & watch for sometime. If we are over pressurizing the police then they may come up with some cooked up story & show those people as accused who didn’t play any role in J.Dey’s assasination. (Remember they have done that earlier also…the serial train blast case of 2006) If cops are unable to crack the case in a reasonable time then we should approach the judiciary with a plea to set up a Special Investigation Team (SIT) just like the one which investigated Telgi scam. We should urge the court to monitor the investigation & SIT should comprise of officers who have earned a name as good detectives & have a clean service record.

Sunday, 12 June 2011

इस हफ्ते की जिंदगी: हत्या एक पुराने दोस्त की

“ अरे यार जरा चैक करो जे.डे. पर फायरिंग हुई है क्या?”
शनिवार की दोपहर करीब साढे तीन बजे एक परिचित पत्रकार के फोन पर पूछे इस सवाल ने होश उडा दिये। मैने तुरंत जे.डे के ही मोबाइल नंबर पर फोन लगाया, लेकिन उनका फोन बंद था। मेरी चिंता बढ गई। मैने मन ही मन प्रार्थना की कि ये खबर गलत निकले। मोबाइल फोन न लगने पर मैने उनके घाटकोपर वाले घर के लैंड लाईन पर फोन किया, जो उनकी मां ने उठाया।

“आंटी मैं जीतेंद्र बोल रहा हूं। डे कहां है?”
“अभी थोडी देर पहले ही वो घर से निकला है..घंटाभर हुआ होगा..”
मेरी आवाज की हडबडाहट सुनकर उन्हें कुछ गडबडी का शक हुआ। उन्होने मुझसे सवाल किया- “क्यों पूछ रहे हो ऐसा?”
….अब मैं उन्हें क्या बताता कि किस अनहोनी की आशंका की वजह से मैने उन्हें फोन किया है।
“डे का मोबाइल नहीं लग रहा है इसलिये इधर फोन किया था आपको...कोई बात नहीं”।
“…और कैसे हो तुम? सिर्फ टी.वी पर ही दिखते हो… कभी घर पर भी आओ”।
“जी आंटी जरूर आऊंगा”।
इतना कहकर मैने फोन रख दिया।
कुछ देर बाद खबर आई कि जे.डे. नहीं रहे। फायरिंग के बाद उन्हें हिरानंदानी अस्पताल लाया गया था, जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।

अबसे कुछ देर पहले ही मैं उनके अंतिम संस्कार में शरीक होकर घर लौटा हूं फिर भी यकीन नहीं हो रहा कि जे.डे. अब हमारे बीच नहीं हैं।

जे.डे. से मेरी पिछली बातचीत में ये तय हुआ था कि हम आज सुबह चाय पीने के लिये मिलेंगे..लेकिन जे.डे. से मेरी मुलाकात इस हालत में होगी ऐसा अंदेशा बिलकुल भी न था। पिछले हफ्ते जे.ड़े ने बातोंबातों में मुझे बताया था कि उनके पास एक ऐसी तस्वीर है जिसमें अंडरवर्लड डॉन दाऊद इब्राहिम का भाई इकबाल कासकर दाऊद के दुश्मन छोटा राजन के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खडा है। मैने जे.डे से कहा कि वो तस्वीर वे मुझे दें दे। मैं अपने चैनल पर अंडरवर्लड से जुडी किसी खबर में उसका इस्तेमाल कर लूंगा। उसी तस्वीर को लेने के लिये आज सुबह का वक्त तय हुआ था।

जे.डे यानी ज्योतिंद्र डे से मेरी दोस्ती करीब 12 साल पुरानी थी। 1999 में जब मैने आज तक के लिये क्राईम रिपोर्टिंग करनी शुरू की तो इस क्षेत्र के जिन रिपोर्टरों से मेरा शुरूवाती परिचय हुआ था उनमें से एक थे जे.डे। जे.डे का इंडियन एक्सप्रैस में छपने वाला साप्ताहिक कॉलम “Notes from the underworld” मुझे बडा पसंद था और अपने कॉलेज के दिनों से ही मैं इस कॉलम को नियमित पढता था। क्राईम रिपोर्टरों की बिरादरी में मैं बिलकुल नया था और जे.डे उस वक्त तक इस क्षेत्र में एक बडा नाम बन चुके थे...लेकिन अपने रूतबे का गुरूर उनमें जरा भी नहीं दिखा। अपने से जूनियर क्राईम रिपोर्टरों की वे बेहिचक मदद करते थे। किसी अधिकारी का नंबर चाहिये या किसी गुनहगार का बैकग्राउंडर जानना हो जे.डे बिना किसी हिचकिचाहट जानकारी दे देते। यही वजह थी कि वे जूनियर क्राईम रिपोर्टरों के बीच कैप्टन साहब नाम से मशहूर हो गये थे, वैसे भी अपनी लंबी चौडी कद काठी की वजह से जे.डे किसी कमांडो की तरह ही दिखते थे और कई बार किसी आपराधिक वारदात के मौके पर कुछ पुलिसवाले उन्हें अपने ही बीच का समझ लेते। धीरे धीरे मैं और जे.डे काफी गहरे दोस्त बन गये। कई सालों तक दिनभर की खबरों के लिये एक दूसरे से सुबह फोन पर बात कर लेना हमारा रूटीन बन चुका था। कसारा के जंगल में चलने वाली गैरकानूनी आरा मिल, खदान माफिया, दाऊद इब्राहिम की रत्नागिरी में पुश्तैनी हवेली, अहमदनगर में चलनेवाली गैरकानूनी आरा मिलें वगैरह कुछ ऐसी बेहतरीन खबरें थीं जो हमने एक साथ की थीं।चूंकि वे अंग्रेजी अखबार में काम करते थे और मैं एक हिंदी न्यूज चैनल में इसलिये हमारे बीच सीधे तौर पर कोई प्रतिद्वंदिता नहीं थीं। कई खबरें हमने साथ में कीं जिनमें ज्यादातर खबरें ऐसीं थीं जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले लोगों के खिलाफ थीं। इस तरह की खबरें हमारी पसंदीदा खबरें थीं क्योंकि कॉलेज के दिनों से ही मैं पर्यावरण संरक्षण के अभियान का समर्थन करता रहा हूं और जे.डे ने भी अपने पत्रकारिता के करियर की शुरूवात इस क्षेत्र की रिपोर्टिंग से की थी। कई बार ऐसा होता कि उनके पास कोई सामग्री हाथ लगती जो अखबार में छपने लायक नहीं होती, लेकिन टीवी के लिये बेहतरीन स्टोरी हो सकती थी तो वे उसे मुझे दे देते। इसी तरह अगर मुझे कुछ ऐसा मिलता जो टीवी में दिखाने लायक नहीं रहता लेकिन अखबार के लिये अच्छी स्टोरी हो सकती थी तो वो मैं उन्हें दे देता।

जे.डे को ये बात अच्छी तरह से मालूम थी कि क्राईम रिपोर्टिंग के क्षेत्र में कामियाबी के साथ साथ साईड इफैक्ट के तौर पर नये दुश्मन भी मिलते हैं। यही वजह है कि अपनी सुरक्षा को लेकर वे हमेशा सचेत रहते थे। जे.डे को कैमरे पर आना बिलकुल पसंद नहीं था। कई टी.वी पत्रकारों ने अनेक बार क्राईम की कोई बडी खबर होने पर बतौर जानकार उनसे बाईट देने के लिये कहा लेकिन हर बार वे ये कहकर मना कर देते -“ बॉस अपनी शक्ल तो टीवी पर आने लायक है ही नहीं।” आमतौर पर भी वे अपने चेहरे का एक बडा हिस्सा टोपी पहनकर छुपाये रखते। किसी से बातचीत करते वक्त हमेशा उनकी नजर इर्द गिर्द घूमती रहती। मोटर साईकिल पर सफर करते वक्त हमेशा उनका ध्यान पीछे चल रहे वाहनों पर होता। जे.डे को अगर जरा भी शक होता कि कोई उनका पीछा कर रहा है तो वे तुरंत अपना रास्ता बदल देते। वैसे भी घर से दफ्तर के बीच आने जाने के लिये वे कभी एक रास्ते का इस्तेमाल नहीं करते थे।

हाल के सालों में मेरा उनसे मिलना कुछ कम हो गया था। ब्यूरो चीफ बनने के बाद फील्ड पर निकलने का मौका अब बहुत कम ही मिल पाता है, लेकिन फोन पर हम नियमित संपर्क में रहते। हर दो चार दिन में हमारी बात होती थी। आखिरी बार मेरी मुलाकात उनसे तब हुई थी जब मिड डे के पत्रकार टी.के. दिवेदी उर्फ अकेला की गिरफ्तारी के विरोध में सभी पत्रकार संगठनों ने प्रैस क्लब से लेकर मंत्रालय तक मोर्चा निकाला था।

जे.डे. दोस्तों के दोस्त थे और उनकी चिता को आग भी एक दोस्त ने ही दी। जे.डे के परिवार में उनकी बीमार मां, बहन और पत्नी के अलावा कोई नहीं है और ऐसे में अंतिम संस्कार के लिये कोई पुरूष सदस्य नहीं था। DNA अखबार के मुंबई ब्यूरो चीफ और हमारे दोस्त निखिल दीक्षित ने ये काम किया।

जे.डे तो चले गये लेकिन उनकी हत्या ने यही संदेश दिया है कि आनेवाला वक्त पत्रकारों के लिये और खतरनाक होने वाला है, ज्यादा चुनौतीपूर्ण होने वाला है और अपराध की दुनिया के राक्षस फिर एक बार बेखौफ होकर मुंबई को अपनी गिरफ्त में लेने के लिये निकल पडे हैं।

Tuesday, 7 June 2011

10 things I like & dislike about Baba Ramdeo.


Like:
1)      Baba Ramdeo with his communicative skills made optimum use of modern media(television per se) to popularize Yoga among masses.
2)      Baba Ramdeo contributed to the popularity of Indian Yoga at the international sphere.
3)      He intends to channelise his popularity for bringing about a socio-political change in the country.
4)      He uses non-violent means to convey his message & press his demands.
5)      He intends to become a politician & seems to be a cleaner new comer in the existing sordid scenario.

Dislike:
1)      Baba Ramdeo’s unsubstantiated claims to cure any illness known in this universe through Yoga.
2)      His act of running away from Ramleela Maidan when police came & by making himself an article of ridicule by attiring as a woman. If he would have followed Gandhian style of Satyagraha, he should have surrendered to the cops & then continued the fast behind the bars.
3)      His statements after the Ramleela Maidan incident that “5000 people are missing..”, “ Police was going to kill me in encounter..”, “The police action was like Jalianwala Baug..” etc. Such statements seem to be examples of hyperbole & simplistic. They damage his credibility.
4)      His loose attitude of letting politicians share his stage at Ramleela Maidan. Like Anna Hazare he should have strictly kept politicians away.
5)      Some of his demands like doing away with high denominations notes & capital punishment to the black money offenders. ( When we are not sure whether terrorists like Ajmal Kasab & Afzal Guru who have beeen found guilty of carnage will face the hangman in our life time, such demand seems ridiculous.)

Monday, 6 June 2011

इस हफ्ते की जिंदगी: शैतान Narco Terrorism का।

इस हफ्ते हम बात करेंगे Narco Terrorism पर जो हमारे देश के बच्चों से उनका बचपन छीन रहा है।हाल ही में बडे दिनों बाद मेरी मुलाकात हुई डॉक्टर यूसुफ मर्चंट से जो कि मुंबई में Drugs Abuse Information Research & Rehabilitation  नाम का संगठन चलाते हैं। उनका बेटा समीर विल्सन कॉलेज में मेरा सहपाठी था। समीर के जरिये ही मेंरी दोस्ती उसके पिता डॉ.मर्चंट से हुई थी। डॉक्टर मर्चंट से गुफ्तगू करते हुए ड्रग्स की दुनिया के बारे में कई ऐसी बातें पता चलीं जो कि चौंकाने वालीं हैं, डरावनीं हैं।

मुंबई के कई स्कूली बच्चे ड्रग्स की गिरफ्त में हैं। डॉक्टर मर्चंट कई ऐसे बच्चों का इलाज कर रहे हैं जो कि दूध के दांत गिरने के चंद साल बाद ही ड्रग्स के खतरनाक जाल में फंस गये। अब तक आप शायद ये मान रहे होंगे कि कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के छात्र ही ड्रग्स के शिकार बनते हैं, लेकिन नशीले पदार्थों की काली दुनिया से अब ये एक और हकीकत सामने आई है। ड्रग्स के कारोबारी अब स्कूल जाने वाले बच्चों को जहर की पुडिया बेच रहे हैं और उनका जाल दिन ब दिन फैलता ही जा रहा है। मुंबई और दिल्ली के कई बडे और नामचीन स्कूल के छात्र ड्रग्स के आदी बन रहे हैं। जो लोग ड्रग्स के शिकार लोगों के पुनर्वसन और सुधार का काम कर रहे हैं उनके मुताबिक पहले उनके पास आनेवाले ज्यादातर मरीजों की उम्र 20 से 30 साल के बीच होती थी, लेकिन अब उनके पास 12 साल तक की उम्र के बच्चे इलाज के लिये आ रहे हैं। अगर आंकडों की बात करें तो हर सौ में से 25 ड्रग्स के शिकार शख्स की उम्र 18 साल से कम है।

90 की दशक की शुरूवात से लेकर साल 2005 तक भारत के बडे शहरों में ड्रग्स का गैरकानूनी कारोबार काबू में था। नशीले पदार्थ बिकते जरूर थे लेकिन आज की तुलना में बहुत ही कम..लेकिन साल 2005 के बाद हालात बिगड गये। सरकारी एजेंसियां ढीली पड गईं और ड्रग्स माफिया से जुडे लोग मजबूत होते गये। वक्त के साथ बाजार में बिकने वाले ड्रग्स भी बदले और उनको खरीदने वाले भी। 90 के दशक के पहले तक ड्रग्स के बाजार में हेरोईन की खूब मांग थी। नशेडी युवाओं के बीच हेरोईन सबसे लोकप्रिय ड्रग्स मानी जाती थी लेकिन अब हेरोइन बाजार से गायब है, हेरोईन की मांग लगभग खत्म सी हो गई है। हेरोइन की जगह अब ले ली है कोकेन और एलएसडी ने। ड्रग्स लेने वाले स्कूली बच्चे ज्यादातर कोकेन और एलएसडी के आदी हैं।

इन दिनों ड्रग्स के बाजार में कोकेन और एलएसडी का शुमार प्रीमियम ड्रग्स में किया जाता है लेकिन हशीश और चरस की बात करें तो वे बाजार में इतने आम हो गये हैं जैसे सिग्रेट और तंबाकू। जो बच्चे कोकेन और एलएसडी नहीं खरीद पाते वो इन सस्ते ड्रग्स का सेवन करते हैं।
सवाल ये है कि आखिर बच्चों तक कैसे पहुंचते हैं ये ड्रग्स? बच्चों की जान से खेलकर कौन मुनाफा कमा रहा है? क्या हमारे कानून के हाथ उन तक नहीं पहुंच रहे? डॉक्टर मर्चंट के मुताबिक पडोसी मुल्क पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई न केवल आतंकवाद के जरिये हमारे देश में खून खराबा कराती रही है बल्कि उसने नार्को टेरेरिज्म की शक्ल में भी हमारे देश के खिलाफ जंग छेड रखी है। हाल के सालों में पाकिस्तान की ओर से भारत में ड्रग्स की बडे पैमाने पर तस्करी शुरू की गई है। नाईजीरियाई और दूसरे अफ्रीकी देशों के नागरिक इस काम में बिचौलिये की भूमिका निभाते हैं और इसलिये पाकिस्तान पर से नकाब नहीं उठ पाता।
अब सवाल ये उठता है कि आप अपने बच्चों को ड्रग्स का आदी होने से बचाये कैसें और कैसे पता करें कि वो नशे का आदी बन रहा है। जानकारों के मुताबिक ये काम ज्यादा मुश्किल नहीं। कुछ ऐसी बातें हैं जो संकेत देती है कि बच्चा ड्र्ग्स का आदी हो गया है जैसे-
-          नींद के पैटर्न में अचानक बदलाव।अगर वो रात को देर से सोता है और सुबह काफी देर से उठता है।
-          बातचीत करते वक्त नजर मिलाने से कतराता है।
-          अचानक से उसके पैसों की मांग बढ गई है या फिर वो घर से पैसे चुरा रहा है।
-          अचानक उसके दोस्तों की संख्या बढ गई है।
-          अगर वो चरस लेता है तो खूब खायेगा, लेकिन अगर वो कोकेन या कोई दूसरा ड्रग्स ले रहा है तो उसकी खुराक बिलकुल कम हो जायेगी।
-          अगर वो बाथरूम में असामान्य रूप से ज्यादा वक्त बिता रहा है।
-          घर में अगर कई सारी जली हुई माचिस की तीलियां मिलतीं हैं।
-          पढाई और खेलकूद से उसकी दिलचस्पी कम हो रही है।

अगर माता –पिता को अपने बच्चे में इस तरह के बदलाव दिख रहे हैं तो उन्हें सावधान रहने की और बच्चे की निगरानी करने की जरूरत है। Narco Terrorism के शैतान की नजर आपके बच्चे पर है।



"No Nonsense Blog" is now "Address to the Nation."

Although, the name has changed but the content will still adhere to its "No Nonsense" character & will continue to focus on issues which make sense for Indian urban citizens. Henceforth, the attempt will be to make this blog more vibrant & disciplined with regular entries. The address remains the same: www.jitendradiary.blogspot.com.
Happy reading.

Saturday, 4 June 2011

मुंबई के रिपोर्टर का मानसून (कविता)

आई आई आई जमकर बरसात,
छाता, रेनकोट अब ले लो साथ,
बूम माईक को टोपी पहनाओ
पाकिट, मोबाइल पर प्लास्टिक चढवाओ
पानी भरने कि खबर जो आये,
ट्रेन, सडक जब बंद हो जाये
निकल कर औफिस से सरपट भागो
हिंदमाता, परेल पर ओबी मांगो
कुर्ला, सायन भी छूट न जाये
मिलन सबवे को भी दिखलायें
भीग भीग कर करो रिपोर्टिंग
काले बादलों से हो गई है सेटिंग
स्टोरी आईडिया देने का टेंशन नहीं आये
जब बादल रिमझिम कृपा बरसाये
खाओ गर्मागरम वडापाव, भजिया प्लेट
संभल कर रहना गडबड न हो पेट
भीगने में आता है खूब मजा
तबियत को मिल जाती है खराब होने की वजह
जब सर्दी, खांसी, सिरदर्द सताये
विक्स, बाम और ब्रांडी काम आये
यहां गिरी बिजली, वहां उखडा पेड
लगातार चेक करते रहो फायर ब्रिगेड
अगर बडी कोई बिल्डिंग गिर जाये
दिन और रात एक हो जाये
मीठी नदी बडी है कडवी
नजर रहे उसकी सरहद भी
लाईव चैट और वाक थ्रू गिरवाओ
वक्त मिले तो पैकेज कटवाओ
बीएमसी, सरकार को बचने न देना
2005 की 26 जुलाई याद कर लेना
वीकेंड पर पिकनिक को जाना
झरनो में फिर खूब नहाना
भीगा भागा सा है न्यूज रूम
सभी रिपोर्टरों को हैप्पी मानसून
-महाकवि जीतेंद्र दीक्षित J

Saturday, 28 May 2011

इस हफ्ते की जिंदगी: गैंगवार का मीडिया माध्यम।

17 मई की रात मुंबई की पाकमोडिया स्ट्रीट पर हुई फायरिंग की वारदात ने फिर एक बार न्यूज चैनलों पर अंडरवर्लड और गैंगवार से जुडी खबरों का दौर वापस ला दिया । फिर से एक बार दाऊद इब्राहिम, छोटा राजन और छोटा शकील के वही सालों पुराने फाईल शॉट्स सभी चैनल दिखाने लगे। ज्यादातर चैनल इसी सवाल के साथ खबर दिखा रहे थे- क्या मुंबई में फिर छिडेगा गैंगवार? क्या अपने इलाके में हुए शूटआउट का दाऊद बदला लेगा? मीडिया की पहुंच और मीडिया की ताकत ने अंडरवर्लड के खिलाडियों का भी ध्यान अपनी ओर खींचा और जैसा कि वे हर चीज में अपना फायदा खोजते हैं, मीडिया को भी अपने फायदे के लिये इस्तेमाल करने की गुंजाइश उन्हें नजर आई। जाने-अनजाने मीडिया ने भी उनका मकसद पूरा करने में मदद की। उनका मकसद था अपने दुश्मनों तक संदेश पहुंचाना, लोगों के बीच अपने खौफ को बरकरार रखना और अपनी ताकत की नुमाइश करना।
शूटआऊट के तीसरे दिन मुझे छोटा राजन का फोन आया। राजन ने कहा कि शूटआउट का टार्गेट दाऊद का भाई इकबाल कासकर नहीं था, लेकिन इलाके में उसकी गतिविधियां बहुत बढ गईं थीं इसलिये इकबाल को चेतावनी देने के लिये ये शूटआउट करवाया गया। राजन के मुताबिक शूटआउट नागपाडा के एक युवक उमेद ने करवाया था, जो कि उसके प्रति वफादार है। राजन के मुताबिक उमेद ने उसको जानकारी देने के बाद ही पाकमोडिया स्ट्रीट में फायरिंग करवाई थी। उमेद के निशाने पर इकबाल कासकर नहीं बल्कि मारा गया आरिफ और हनीफ तलवार नाम का एक शखस था। राजन का कहना था कि उमेद दोनो को इसलिये मारना चाहता था क्योंकि अगर वो उन्हें नहीं मारता तो दोनो उमेद को मार देते। उमेद के शूटरों ने उस रात आरिफ नाम के शख्स को तो मार दिया लेकिन हनीफ तलवार बच गया। आरिफ और हनीफ, उमेद को इसलिये मारना चाहते थे क्योंकि पिछले साल उमेद ने नागपाडा इलाके में ही दाऊद के 2 लोगों पर अलग अलग वारदातों में फायरिंग करवाई थी। एक वारदात में दाऊद का गुर्गा छोटे मियां मारा गया जबकि दूसरी फायरिंग दाऊद के गुर्गे आसिफ दाढी पर करवाई गई थी। दाढी उस फायरिंग में बच गया था, लेकिन 2 बेगुनाह लोगों की उसमें मौत हो गई थी।

मुझे फोन करने वाला छोटा राजन ही है इस बात का मुझे यकीन था क्योंकि इसके पहले भी मैं राजन की आवाज सुन चुका हूं और मेरे पास राजन की आवाज के सैंपल भी मौजूद हैं जो कई साल पहले मुझे एक पुलिस अधिकारी दोस्त ने दिये थे। राजन मुझे इस शूटआउट के बारे में ये जानकारी इसलिये दे रहा था क्योंकि इस जानकारी को वो टी.वी पर देखना चाहता था। शूटआउट की जिम्मदारी लेकर वो ये साबित करना चाहता था कि उसका गिरोह कमजोर नहीं है और वो आज भी दाऊद के गढ में घुसकर वारदातों को अंजाम दे सकता है और अगर चाहे तो दाऊद के भाई तक को अपना निशाना बना सकता है। मैने उसकी ओर से दी गई सारी जानकारी नोट कर ली लेकिन उसे ये बता दिया कि उसका इंटरव्यू मेरे चैनल पर नहीं दिखाया जायेगा। जो भी जानकारी उसने दी है उसे टीवी पर मैं खुद बताऊंगा। दरअसल हमारे चैनल ने News Broadcaster Association (NBA) के उस नियम को अपनाया है जिसमें किसी भी अंडरवर्लड डॉन या भगोडे आरोपी को अपनी बात रखने के लिये या फिर किसी को धमकाने के लिये न्यूज चैनल माध्यम नहीं बनेंगे। अगर इस तरह कोई शख्स कोई जानकारी दे रहा है तो वो चैनल पर दिखाई जा सकती है, लेकिन फोन पर लाईव इंटरव्यू या फिर उसकी आवाज को रिकॉर्ड कर सुनाना प्रतिबंधित है।

छोटा राजन से बातचीत खत्म होने के बाद मैने मुंबई पुलिस की क्राईम ब्रांच में अपने सूत्रों और कुछ आला अधिकारियों से फोन पर बात की। उन्होने इस बात की पृष्टि की कि पाकमोडिया शूटआउट के मामले में उन्हें उमेद की तलाश है और उमेद छोटा राजन के लिये काम करता है। खबर की पृष्टि होने के बाद मैने चैनल पर एक लाईव चैट दिया और खबर उतार दी कि पाकमोडिया शूटआउट छोटा राजन गिरोह की ओर से करवाया गया।
मेरा अपना आंकलन ये है कि छोटा राजन इस शूटआउट के बाद सिर्फ बहती गंगा में हाथ धो रहा है। उमेद ने अपनी व्यकितगत दुश्मनी के चलते इस शूटआउट को अंजाम दिलवाया था लेकिन चूंकि वो राजन के लिये काम कर चुका है और शूटआउट राजन के कट्टर दुश्मन दाऊद के आंगन में हुआ इसलिये राजन ने क्रेडिट लेने का मौका नहीं छोडा।
बहरहाल ये शूटआऊट राजन की मर्जी से हुआ हो या नहीं, मेरे चैनल पर खबर के उतरने के घंटेभर के भीतर ही एक प्रतिदवंदवी हिंदी चैनल पर दाऊद के दाहिने हाथ छोटा शकील का फोनो (फोन पर लिया गया इंटरव्यू) चलने लगा। छोटा शकील ने उस फोनो में अपनी आक्रमकता और गुस्सा दिखाने की पूरी कोशिश की थी- “हम भी बदला लेंगे उनसे..”, “घर में घुसकर मारेंगे..” ,“क्या जरूरत थी ये करने की..”, “एक बेगुनाह को मारा है उन्होने...”, “फैमिली वालों को हाथ नहीं लगाने का रूल उन्होने तोडा है” वगैरह जैसे धमकी भर वाक्य बोल कर वो चैनल पर मिले एयरटाईम का पूरा इस्तेमाल कर रहा था। दुर्भाग्यवश इस चैनल ने NBA के उस नियम को नहीं माना कि किसी गैंगस्टर की आवाज चैनल पर नहीं सुनानी है, राष्ट्र के नाम संदेश देने के लिये उसे मंच नहीं देना है।

दोनो डॉन एक दूसरे को टीवी के जरिये धमका रहे थे। गैंगवार में पिस्तौल और रिवॉल्वर का इस्तेमाल करने वाले ये अपराधी अपनी लडाई टीवी चैनलों को फोन करके लड रहे थे। टीवी पर चल रहा था गैंगवार। एक पर राजन था तो दूसरे पर उसका दुश्मन शकील। मुझे ये सब देख कर हंसी भी आ रही थी और गुस्सा भी। दोनो डॉन के बोले वाक्य किसी फिल्मी डायलॉग से कम न थे। दुख की बात थी कि उनकी आपसी लडाई में न्यूज चैनल माध्यम बन गये थे...लेकिन दोनो डॉन क्या कह रहे हैं न्यूज चैनल इस बात को नजर अंदाज भी नहीं कर सकते क्योंकि सवाल भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई की कानून व्यवस्था का भी था और कई बार गिरोहों के बीच चलने वाले इस आपसी गैंगवार का शिकार मुंबई के आम बेगुनाह नागरिक भी हो चुके हैं।

मीडिया की इस बात पर भी नजर रहती है कि पुलिस इन आपराधिक गिरोहों को आपस में भिडने से रोकने के लिये क्या कर रही है। वैसे कुछ पुलिस अधिकारियों का मानना है डॉन के फोनो चैनल पर दिखाकर मीडिया ही उनका महिमामंडन करती है और उन्हें बडा बनाती है। ये एक कडवा सच है जिससे मैं सहमत हूं। बात साल 2005 की है। एक सुबह मुझे विदेशी नंबर से एक फोन आया। सामने वाले ने दावा कि वो रवि पुजारी बोल रहा है और उसने अभी अभी अपने शूटरों के जरिये मुंबई के मशहूर वकील मजीद मेमन पर फायरिंग करवाई है। मैने तुरंत तत्कालीन पुलिस कमिश्नर ए.एन.रॉय को फोन पर इसकी जानकारी दी। उन्होने इस बात की पृष्टि की कि एडवोकेट मेमन पर फायरिंग हुई है, लेकिन वो बाल बाल बच गये हैं। उस वक्त NBA नहीं बना था और न ही ऐसा कोई नियम टीवी चैनलों ने खुद अपनाया था कि गैंगस्टरों का फोनो नहीं दिखाएंगे। हमारे चैनल ने तय किया कि मजीद मेमन पर फायरिंग का दावा करते हुए रवि पुजारी का लाईव फोनो चैनल पर दिखाया जायेगा। जब एंकर ने पुजारी से लाईव सवाल जवाब शुरू किये तो पुजारी ने इस मौके का पूरा गलत फायदा उठाने की कोशिश की। उसने न केवल मेमन पर फिरसे हमाला करने की धमकी दी बल्कि साथ साथ शहर के कई बिल्डरों और कारोबारियों को भी धमकाया। ये बात मुझे बिलकुल गलत लगी। रवि पुजारी उन दिनों छोटा राजन गिरोह से अलग होकर अपना अलग गिरोह खडा कर रहा था और इसके लिये वो हमारे चैनल का इस्तेमाल कर रहा था। जब लोग जानेंगे कि रवि पुजारी कौन है तो वे उससे डरेंगे और डरकर उस तक पैसे भी पहुंचाएंगे। मैने तय कर लिया कि अब चाहे जो भी रवि पुजारी को चैनल के इस्तेमाल का मौका नहीं देना है। उस घटना के बाद रवि पुजारी के गिरोह ने 2-3 बार और फायरिंग की वारदातों को अंजाम दिया। हर बार फायरिंग की जिम्मेदारी लेने के लिये मुझे फोन करता इस उम्मीद में कि मैं फिर से उसका चैनल पर लाईव इंटरव्यू करवाउंगा, लेकिन उसे मुझसे नाउम्मीद ही होना पडता। मैं हर बार उसके फोन की जानकारी क्राईम ब्रांच के अपने परिचित अधिकारियों को दे देता और साथ ही रवि पुजारी को भी ये बता देता कि मैं ऐसा कर रहा हूं। मेरे साथ अपनी दाल न गलती देख रवि पुजारी फिर दूसरे चैनलों को फोन करने लगा। पुजारी की तरह ही संतोष शेट्टी और बंटी पांडे जैसे छोटा राजन से अलग हुए दूसरे गैंगस्टरों ने भी अलग अलग चैनलों को फोन करके मुंबई अंडरवर्लड़ में अपनी “ब्रांडिंग” करने की कोशिश की।
फोन चाहे छोटा राजन की ओर से आया हो या फिर रवि पुजारी की ओर से, हर बार मैं बिना देर किये इसकी जानकारी मुंबई पुलिस को जरूर दे देता हूं। (वैसे इसकी जरूरत नहीं है क्योंकि मेरे सूत्रों के मुताबिक पुलिस और चंद एजेंसियां पहले से चुनिंदा क्राईम रिपोर्टरों का फोन सुनती रहतीं हैं।) मजीद मेमन पर हुई फायरिंग के मामले की जांच मेरे एक मित्र पुलिस अधिकारी के पास ही आई। उसने हिचकिचाते हुए मुझसे पूछा कि क्या मैं उस मामले में गवाह बन पाऊंगा। मैने तुरंत अपनी सहमति दे दी। बतौर पत्रकार हमारा काम सच को खोजना और उसे लोगों तक पहुंचाना है, ऐसे में कठघरे में खडे रहकर अदालत के सामने सच बोलने से क्या परहेज। अदालत में मैने अपनी गवाही दी। पहले सरकारी वकील ने मुझसे सवाल पूछे और फिर बचाव पक्ष के 4 वकीलों ने।
आक्रमक तेवर, भौंहे टेढी कर, कडे शब्दों के साथ सवाल पूछकर बचाव पक्ष का हर वकील अदालत के सामने यही साबित करना चाहता था कि मैं पुलिस का आदमी हूं और पुलिस के कहने पर ही मैं ये बयान दे रहा हूं कि मजीद मेमन पर फायरिंग रवि पुजारी ने करवाई। मैने सभी की आंखों में आंख डालकर उनके जवाब दिये और अपने शरारती स्वभाव के चलते कुछेक को चिढाने के लिये उलटा उनपर सवाल दाग दिये और गर्मागर्म बहस भी की। कई बार जज को हमें शांत कराना पडा। मेरी गवाही के दौरान वो शूटर भी बतौर आरोपी अदालत में मौजूद था जिस पर रवि पुजारी के आदेश से मेमन पर फायरिंग करने का आरोप था।  

अंडरवर्लड की खबरों में ड्रामा भी होता है, एक्शन भी और रोमांच भी। बिजनी, पानी, मकान, महंगाई जैसी नियमित खबरों और बयानबाजी पर आधारित ज्यादातर राजनीतिक खबरों से हटकर जो लोग न्यूज चैनलों पर कुछ देखना चाहते हैं उन्हें अंडरवर्लड की खबरें दिलचस्प लगतीं हैं। चैनल भी दर्शकों की इस पसंद से वाकिफ हैं ही और इसलिये इस तरह की खबरों को न्यूज चैनलों पर तरजीह मिलती है। सवाल बस इतना है कि अंडरवर्लड का हथियार बने बिना अंडरवर्लड की रिपोर्टिंग कैसे हो?

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