Monday, 22 September 2014

5 Things If BJP-Shiv Sena Alliance Breaks In Maharashtra.



In case BJP-Shiv Sena alliance dissolves in Maharashtra, you may expect the following:

1) Shiv Sena will revert to its linguistic/regionalist politics.
Shiv Sena & BJP joined hands on the grounds of Hindutwa. Although, Shiv Sena was born out of regional politics, it went soft on Marathi issue after allying with a national party BJP. However, after breaking the alliance Shiv Sena will no longer be under obligation to continue with this soft stand against “Outsider”. It may revert aggressively to its old Marathi issue which has been snatched away by Raj Thackeray’s party MNS lately.

2) BJP will push for separate Vidaharbha.
BJP supports smaller states and has supported the demand for separate Vidarbha state whereas its alliance partner Shiv Sena is fiercely against any division of Maharashtra. However, once the alliance breaks away, BJP will be free to push & support the demand of separate Vidarbha state which was never been included in the common minimum programme of the alliance due to opposition from Shiv Sena.

3) Advantage Raj Thackeray.
Although, Raj Thackeray will not be the kingmaker, but considering the poor state of his party, he might gain a good weightage in Maharashtra politics. BJP may approach MNS for a postpoll alliance with MNS & may not even field candidates at some of the seats where MNS is strong. Proximity of MNS has been indicated number of times in the past when Raj Thackeray visited Gujarat during Narendra Modi’s tenure as CM, when BJP & MNS shared power in Nasik Municipal Corporation & when Raj Thackeray supported Modi by not fielding MNS candidates against BJP contestants in Maharashtra during last Loksabha polls. Nitin Gadkari & Raj Thackeary are also very close friends which will help in cementing the alliance.

4) NCP will be in demand.
NCP is not in good terms with its alliance partner Congress & leaders of both the parties have spoken against each other during the tenure of their government. If BJP is not able to meet the required number of 144 for the majority by itself or with the support of MNS, then it may approach Sharad Pawar’s party NCP for a post poll alliance. In the past also in 1985 BJP ditched Shiv Sena & allied with Sharad Pawar, when Pawar broke away with Congress & formed Congress-S.

5) Effect on Centre & Civic Bodies.
Shiv Sena has been alliance partner of BJP at centre & at various civic corporations including Mumbai Municipal Corporation. Shiv Sena may announce to withdraw from alliance at these levels too.

Tuesday, 12 August 2014

गोविंदा गेला रे गेला...


बीते 12 साल से मैं जन्माष्मी के मौके पर ठाणे के पांच पखाडी इलाके से अपने चैनल पर लाईव देते वक्त देशवासियों का इस त्यौहार से परिचय कुछ इस तरह से कराता था – “मुंबई का गोविंदा साहस और संस्कृति का प्रतीक है। ये त्यौहार कई तरह के संदेश देता है। ये टीम वर्क सिखाता है। ये सिखाता है कि ऊंचे लक्ष्य तक पहुचने के लिये जोखिम भी उठाना पडता है। ये सिखाता है कि कई बार मंजिल तक पहुंचने के लिये गिरने-पडने के बाद भी कोशिश करनी पडती है। त्यौहार से ये भी संदेश मिलता है कि आधार अगर मजबूत है तो मिनार देर तक टिकती है, नहीं तो लडखडा जाती है।”।

इस साल भी शायद यही लाईनें कैमरे पर दोहराता, लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब गोविंदा का त्यौहार वैसा नहीं रहने वाला जैसा सालों से मनाया जाता रहा है। बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश से मैं आंशिक रूप से खुश भी हूं और दुखी भी। खुश इसलिये कि हाईकोर्ट ने नाबालिग बच्चों के इस त्यौहार में शिरकत करने पर रोक लगा दी है। मैं खुद भी यही चाहता था। दुखी इस बात से हूं कि अब इस त्यौहार की जान ही निकल गई है। अदालत का आदेश है कि मटकी लटकाने की ऊंचाई 20 फुट से ज्यादा न हो। इसका मतलब ये कि 5 फुट के 4 आदमी भी अगर एक के ऊपर एक खडे होते हैं तो वे मटकी को लपक लेंगें। अब तक त्यौहार में 9 मंजिलों वाली 40 फुट से ऊंची इंसानी मीनारें बनाई जा चुकीं हैं।  इस तरह अगर ये त्यौहार मनाया जाता है तो मेरी नजर में वो सिर्फ एक औपचारिकता भर होगी। इसमें संसकृति तो मिल जायेगी, लेकिन साहस नहीं रहेगा।

गोविंदा का त्यौहार गोकुल में भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं की नकल कर उन्हें याद करने का एक माध्यम भर नहीं है। ये उससे कहीं ज्यादा है। मेरी नजर में ये मुंबईवालों का एडवेंचर स्पोर्ट्स है। मुंबई के निचले और मध्यम वर्गीय युवा जो स्काई डाईविंग, बंगी जंपिंग, पैरा ग्लाईडिंग, स्कूबा डाईविंग, राफ्टिंग वगैरह जैसे महंगे एडवेंचर स्पोर्ट्स का खर्च वहन नहीं कर सकते, उनके लिये तो सालाना त्यौहार गोविंदा ही अपने जोश को अभिव्यक्त करने का मौका देता है। झुग्गियों और छोटी छोटी चालों में रहने वाले युवा महीने भर पहले से इंसानी मीनारें बनाने की प्रैक्टिस शुरू कर देते हैं। जाहिर है चोट लगने की, घायल होने की या बदनीसीबी से मृत्यू की गुंजाईश तो हर एडवेंचर स्पोर्ट्स में रहती है। एडवेंचर स्पोर्ट्स में जोखिम का होना तो स्वाभाविक है। दुनिया भर में एडवेंचर स्पोर्टस के दौरान हादसे होते है रहते हैं, लेकिन क्या उन खेलों को सरकार बंद कर देती है, या फिर उसमें एडवेंचर की खूबी निकाल लेती है। जोखिम है, खतरा है तभी तो उसमें रोमांच है, दिलचस्पी है। गोविंदा की मनोहरता को नष्ट करने के बजाय जरूरत थी कि गोविंदा पथकों की सुरक्षा पर जोर दिया जाता।

गोविंदा के मौजूदा स्वरूप के विरोधी कहते हैं कि इस त्यौहार ने व्यावसायिक रूप ले लिया था, ये राजनेताओं के प्रचार का एक माध्यम बन गया था वगरैह वगैरह। इस पर मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि कोई त्यौहार अगर वक्त के साथ खुद को बदलता चल रहा है तो क्या बुराई है। राजनेता तो हर उस चीज में अपना हित साधते हैं जिनमें जनता की दिलचस्पी हो। राजनेताओं के पैसों ने त्यौहारों को भव्य बनाया। इसमें डीजे जोडा गया, बडी ईनामी रकमें जोडी गईं, स्पेन के मानव पिरामिड बनाने वाली टीमों को मुकाबले के लिये बुलाया गया, मैनेजमेंट के छात्रों को भी यहां प्रबंधन के गुण सीखने के लिये बुलाया जाने लगा। गोविंदा को बडे पैमाने पर आयोजित करने वाले कुछ राजनेता मेरे दोस्त हैं और ये सभी अलग अलग पार्टी के हैं। मैने एक ओर इन्हें जितना त्यौहार की चमक-दमक पर करते देखा तो दूसरी ओर गोविंदा में शामिल होने वालों की सुरक्षा और उनके बीमा का भी इंतजाम करते देखा। मैं 5 ऐसे राजनेताओं को जानता हूं जो कि गोविंदा बडे पैमाने पर मनाने के लिये मशहूर हैं, उनकी मटकी कम से कम 50 फुट की ऊंचाई पर लटकती है, गोविंदा टीमें वहां 9 मंजिलों का मानव पिरामिड बनाने की कोशिश करतीं हैं और वे लाखों रूपये का ईनाम बांटते हैं। इनमें से 3 राजनेता ऐसे हैं जो कि हिंदुत्ववादी पार्टियों से जुडे हुए हैं। अचरज की बात है कि अदालती आदेश के बाद ये तीनों नेता चुपचाप बैठ गये, वहीं हिंदुओं के त्यौहार को प्रभावित करने वाले इस आदेश को वो राजनेता सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की बात कर रहा है, जिसकी पार्टी खुदको सेकुलर मानती है। वैसे गोविंदा को आधुनिक चकाचौंध वाली शक्ल ठाणे के इसी राजनेता ने ही सबसे पहले दी थी। जब उसके गोविंदा की चर्चा होने लगी और तमाम राष्ट्रीय न्यूज चैनल उसके यहां अपनी ओबी वैन लगाकर लाईव दिखाने लगे तो बाकी राजनेताओं को भी ये आईडिया मिल गया। मुंबई में एक विधायक ऐसा है जो गोविंदा के माध्यम से ही राजनीति में दाखिल हुआ। 2009 के पहले इसे मुंबई में कोई नहीं जानता था...लेकिन उसी साल जन्माष्टमी पर इसने बडी ईनामी रकम वाली मटकी लटकाई और अपनी तस्वीरों के साथ मुंबई भर में उसका जोर शोर से प्रचार किया। फार्मूला काम कर गया। राज ठाकरे की पार्टी एमएनएस ने उसे चुनाव का टिकट दे दिया।


बचपन से ही गोविंदा मेरा पसंदीदा त्यौहार रहा है। अभिनेता शम्मी कपूर पर फिलमाये गये “गोविंदा आला रे आला…“ गाते हुए गली के बच्चों के साथ मैं भी छोटे-मोटे मानव पिरामिड बना लेता था। कुछेक बार चोट भी लगी, लेकिन फिर भी सालभऱ इस त्यौहार का इंतजार रहता। अब बतौर टीवी पत्रकार इसका इंतजार रहता था। टीवी तस्वीरों का माध्यम है। इस त्यौहार के रंगों को कवर करने की बात ही अलग थी। बनते-गिरते मानव पिरामिड और पानी की बौछार पर नाचते हुए गोविंदाओं की जोशभरी तस्वीरें शायद अब कभी कवर न मिलें...गोविंदा गेला रे गेला...

Wednesday, 6 August 2014

बचपन चाचा चौधरी के साथ।


मैने कॉमिक्सें पढनी अबसे करीब 20 साल पहले छोड दी थीं लेकिन बचपन के उन 7-8 साल की यादें जब मैं कॉमिक्सें पढता था आज भी ताजा हैं। वो दौर नब्बे के दशक का था जब मैं कॉमिक्सों और बाल पत्रिकाओं का आदी हो गया था। चंपक, टिंकल, लोटपोट, पराग और बालहंस मेरी पसंदीदा बाल पत्रिकाएं थीं। इनके अलावा चाचा चौधरी, महाबलि शाका, नागराज, राजन-इकबाल और मोटी-पतलू के कॉमिक्सों को पढने में काफी दिलचस्पी थी। दिलचस्पी इतनी ज्यादा कि अक्सर घर पर बडों से डांट खानी पडती थी कि लडके का पढाई-लिखाई में मन नहीं लग रहा है, स्कूली किताबों के बजाय कॉमिक्सों में ही घुसा रहता है। कॉमिक्सों की ऐसी लत लग गई थी कि मां को एक बार स्कूल में मेरी क्लास टीचर से शिकायत करनी पडी कि इसकी कॉमिक्सों की आदत छूट नहीं रही है, आप ही कुछ कीजिये। सच भी था। स्कूल से लौटने के बाद मेरा ज्यादातर वक्त कॉमिक्सों की कल्पनाभरी दुनिया में ही गुजरता था। घर से स्कूल में खाने पीने के लिये जो भी रूपये-दो रूपये मिलते थे उन्हें बचाकर मैं कॉमिक्सों खरीद लेता था। मेरे पास कॉमिक्सों का भंडार हो गया था। एक वक्त तो ऐसा आया कि मेरे पास 200 से ज्यादा कॉमिक्स इकट्टठा हो गये। पिताजी ने जब ये भंडार देखा तो पीटने दौडे – “कॉमिक्सों के चक्कर पडा रहेगा को आगे कुछ कर नहीं पायेगा”। बडी मुश्किल से मां ने पिटने से बचाया। उसके बाद मैने अपनी सारी कॉमिक्सें पडोस के एक दोस्त के यहां छुपा दीं और पिताजी से झूठ कह दिया कि कॉमिक्सों को अब रद्दी वाले को बेच दिया है। मेरी ही तरह मेरे कई हमउम्र दोस्त भी कॉमिक्स पढने के शौकीन थे। उन दिनों फेसबुक, यू ट्यूब और व्हाट्स अप कहां था भई। आज हम इन सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर तस्वीरें और वीडियो “शेयर” करते हैं। उन दिनों हम आपस में कॉमिक्सें “शेयर” करते थे।

इन कॉमिक्सों और बाल पत्रिकाओं में ऐसा क्या था जो ये बच्चों को इतना लुभातीं थीं?  कॉमिक्सों और बाल पत्रिकाओं को छापना इतना आसान काम नहीं है, ये बात थोडी उम्र होने पर ही समझ में आती है, एक बाल पाठक के रूप में नहीं। कॉमिक्सों की कहानी, उनके चित्र और शब्दों के चयन के लिये खुद बच्चा बनकर सोचना पडता है। दिवंगत कार्टूनिस्ट प्राण और अमर चित्र कथा के संस्थापक अनंत पई इसमें पारंगत थे और भारत के कॉमिक्स जगत पर उनका दबदबा था। भारत में कॉमिक्सें सिर्फ बच्चों के मनोरंजन का माध्यम नहीं रहीं। पई ने अमर चित्र कथा के माध्यम से बच्चों को भारतीय संस्कृति, धर्म और मान्यताओं से परिचय करवाने का भी मिशन चलाया। तमाम ऐसे कॉमिक्स बाजार में आये जिनका उद्देश्य शैक्षणिक था। कई बाल पत्रिकाओं ने बच्चों की लेखन प्रतिभा को प्रोत्साहित करने में भी अहम भूमिका निभाई। राजस्थान पत्रिका ग्रुप से एक बच्चों की हिंदी पत्रिका निकलती है जिसका नाम है “बालहंस”। 90 के दशक में इसमें व्यावसायिक बाल साहित्यकारों की रचनाओं के अलावा बच्चों की रचनाएं भी प्रकाशित की जातीं थीं (पता नहीं अब ऐसा होता है या नहीं)। उस वक्त बालहंस के संपादक अनंत कुशवहा हुए करते थे। मई 1992 के अंक में इस पत्रिका ने एक निबंध लेखन प्रतियोगिता आयोजित की। देशभर के बच्चों से हिंदी में “मेरी मां”  विषय पर निबंध मंगवाये गये। मैं तब आठवीं कक्षा में था। स्कूल में कुछेक कविताओं और निबंध की प्रतियोगिताएं जीत चुका था। सोचा बालहंस की इस प्रतियोगिता में भी हिस्सा लेकर देखा जाये। विजेता को 250 रूपये का ईनाम दिया जाने वाला था। मैने अपना निबंध भेज दिया। 2 महीने बाद के अंक में प्रतियोगिता के नतीजे घोषित हुए। देखकर यकीन नहीं हुआ कि ये प्रतियोगिता मैने जीत ली थी। चंद दिनों बाद ढाई सौ रूपये का चेक बतौर लेखक मेरी पहली कमाई के तौर पर डाकिया लाया। ढाई सौ रूपये उन दिनों मेरे लिये बडी रकम थी लेकिन ज्यादा खुशी पत्रिका में अपना छपा हुआ नाम देखकर हुई। मेरे निबंध को स्कूल के नोटिस बोर्ड पर प्रिंसिपल ने मेरी प्रशंसा करते हुए लगवाया। खुश होकर उन्होने मुझे फादर कामिल बुल्के का हिंदी-इंग्लिश शब्दकोष भी भेंट किया। उसके बाद लिखने का जो सिलसिला शुरू हुआ है वो आज तक थमा नहीं।


आज कॉमिक्सों का दौर खत्म हो चला है...लेकिन ये प्राकृतिक है। हम अपनी उम्र में जो करते थे, उस उम्र में आज के बच्चे वे सब नहीं करते। कॉमिक्सों की जगह इन दिनों कैंडी क्रश, नीड फॉर स्पीड, फील्ड रनर्स, स्ट्राईक ए कैन, रोड रश, बबल ब्रेकर, एंग्री बर्ड्स वगैरह जैसे ऑनलाईन गेम्स ने ले लिया है जिन्हें छोटे छोटे बच्चे भी टैब पर खेल रहे हैं। 80 और 90 के दशक के तमाम बच्चों को कॉमिक्सों और बाल पत्रिकाओं ने प्रभावित किया था, आज के बच्चों को ये कर रहे हैं। आज कार्टूनिस्ट प्राण के निधन पर चाचा चौधरी और साबू को याद किया जा रहा है। कल को ये भी इसी तरह यादों में समा जायेंगे क्योंकि बचपन पर तब कोई और हावी होगा। 

Tuesday, 29 July 2014

कोई हिंदी सिखा दो भाई...प्रेमचंद वाली !


हिंदी दिवस में अभी करीब डेढ महीने का वक्त है...आमतौर पर हिंदी को लेकर चिंता जताना और उसके लिये शाब्दिक रोना धोना तब भी होता है...लेकिन इन दिनों केंदीय लोक सेवा आयोग (UPSC) की परीक्षा देने वालों का हिंदी को लेकर आंदोलन चल रहा है। ऐसे में हिंदी पर ये मेरा ब्लॉग शायद पूरी तरह से अप्रासंगिक नहीं हो।

मैं भाषाई कट्टरवाद में यकीन नहीं रखता। मेरा मानना है कि भाषा लोगों को जोडने का माध्यम है, न कि उन्हें बांटने का, लेकिन जब मैं उस अखबार में हिंदी (या हिंदुस्तानी ) की दुर्दशा होते हुए देखता हूं जिसने मुझे हिंदी पढना-लिखना सिखाया, हिंदी पत्रकारिता और लेखन में मेरी रूचि जगाई तो दुख होता है। ये अखबार है नवभारत टाईम्स। खुद एक समाचार संस्थान से जुडा होकर किसी दूसरे समाचार संस्थान के कामकाज पर टिप्पणी करना शायद कुछ लोगों को गलत लगे, लेकिन मैं कम से कम इस बहाने ये छूट ले सकता हूं कि नवभारत टाईम्स प्रिंट का अखबार है और मैं टीवी के माध्यम से जुडा हूं। ये ब्लॉग भी नवभारत टाईम्स के एक पाठक के नजरिये से ही लिख रहा हूं न कि एक टीवी पत्रकार की हैसीयत से।

मैं अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में पढा और मैने हिंदी सीखी नवभारत टाईम्स और जनसत्ता जैसे अखबारों से। तीसरी कक्षा में पहुंचने पर हमें हिंदी दूसरी भाषा के तौर पर पढाई जाने लगी। घर पर हफ्ते के 6 दिन नवभारत टाईम्स आता था और रविवार को जनसत्ता और उसके साथ आने वाली साप्ताहिक पत्रिका सबरंग। इन्हें पढते हुए ही हिंदी में मेरी दिलचस्पी पैदा हुई और आगे जाकर हिंदी पत्रकारिता में मैने अपना करियर बनाने की सोची।

90 के दशक में कोई खबर अगर नभाटा में छपती थी तो उसकी भाषा कुछ ऐसी होती थी-
अमिताभ बच्चन ने मुंबई पुलिस के अतिरिक्त आयुक्त ब्रजेश सिंह की किताब का लोकार्पण किया। इस मौके पर मुख्य अतिथि के रूप में पुलिस आयुक्त राकेश मारिया भी मौजूद थे। किताब के लेखक ब्रजेश सिंह ने कहा कि पुलिस की नौकरी करते करते इस किताब को लिख पाना आसान नहीं था।

पिछले दशक में फिर भाषा ऐसी हो गई-
अमिताभ बच्चन ने मुंबई पुलिस के एडिश्नल सीपी ब्रजेश सिंह की बुक को लांच किया। इस फंक्शन में चीफ गेस्ट पुलिस कमिश्नर राकेश मारिया भी प्रेशेंट थे। बुक के राईटर ब्रजेश सिंह ने कहा कि पुलिस सर्विस करते हुए इस बुक को राइट कर पाना ईजी नहीं था।

शायद 15-20 सालों बाद ये भाषा कुछ ऐसी हो जाये तो मुझे अचरज नहीं होगा-
अमिताभ बच्चन रिलीजड ए बुक रिटन बाय एडिश्नल सीपी औफ मुंबई पोलीस ब्रजेश सिंह। औन थिस ओकेशन पुलिस कमिश्नर राकेश मारिया वाज प्रेशेंट एस दी चीफ गेस्ट। आथर औफ दी बुक ब्रजेश सिंह सैड इट वाज नॉट ईजी टू राईट द बुक व्हाईल सर्विंग इन पोलीस।

नवभारत टाईम्स में काम करने वाले कुछ दोस्तों ने मुझे बताया कि चंद साल पहले प्रबंधन की ओर से अखबार की नई भाषा को तय किया गया। अखबार को “यंग फिल” देने के लिये और युवा पाठकों के बीच जगह बनाने के लिये हिंदी के वाक्यों में अंग्रेजी के शब्द घुसेडे जाते हैं, जो कि बेवजह और जबरन घुसेडे गये लगते हैं।इस भाषा को हिंगलिश् भी नहीं कह सकते। इस भाषा पर अमल करते करते नवभारत टाईम्स में काम करने वाले अच्छे हिंदी पत्रकारों की हिंदी भी बिगड गई। ये बात फेसबुक पर उनके हिंदी में लिखे पोस्ट पढकर पता चलती है।

किसी भी भाषा के विकास के लिये या उसके लोकप्रिय होने के लिये उसका लचीला होना जरूरी है, नये शब्दों को आत्मसात करना जरूरी है, लेकिन ये लचीलापन इतना भी न हो कि वो भाषा की मूल पहचान ही खत्म कर दे।

नवभारत टाईम्स की भाषा को बिलकुल नापसंद करने के बावजूद ये अखबार आज भी मेरे घर आता है क्योंकि इस अखबार में शहर के कई बेहतरीन हिंदी पत्रकारों की जुटाई खबरें छपतीं हैं, लेकिन मैं ये उम्मीद बिलकुल नहीं कर सकता कि इस अखबार को पढकर मेरा बेटा हिंदी सीखेगा।

मेरे इस लेख से आहत होकर शायद कोई सज्जन पलटवार कर कहें – हुंह...न्यूज चैनलों में कौनसी सही हिंदी दिखाई जाती है।

उनसे मैं यही कहूंगा- जनाब मैं आपसे सहमत हूं। 

Wednesday, 23 July 2014

विश्वास, अंधविश्वास और पुलिस।


इस खबर को देखकर हंसी भी आई और दुख भी हुआ कि महाराष्ट्र पुलिस के एक आला अधिकारी ने नरेंद्र दाभोलकर की हत्या की गुत्थी सुलझाने के लिये तंत्र, मंत्र का सहारा लिया, एक तांत्रिक पर भरोसा किया। जो आदमी जिंदगीभर अंधविश्वास के खिलाफ लडा और शायद इसी वजह से मारा गया, उसकी हत्या की जांच ही अंधविश्वास के हवाले हो इससे ज्यादा अपमान और उसका क्या हो सकता है। सुनने में तो ये किसी भद्दे मजाक की तरह ही लगता है। बहरहाल, इस खबर ने मुझे प्रेरित किया लिखने के लिये पुलिस के विश्वास और अंधविश्वास पर। बीते 15 सालों की क्राईम रिपोर्टिंग के दौरान इस बारे में जो कुछ भी देखा...सुना...पेश है...

बीजेपी के मौजूदा सांसद और मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर डॉ.सत्यपाल सिंह के मोबाइल फोन पर अगर आप कॉ़ल करेंगे तो कॉलर ट्यून में आपको गायत्री मंत्र सुनाई देगा। पुलिसिया नौकरी के दौरान धर्म के प्रति उनका झुकाव छुपा नहीं था। जिस दौरान वे पुलिस कमिश्नर थे तब एक परिचित महिला पत्रकार ने ट्वीट किया – “एक पुलिस कमिश्नर का अपनी कॉलर ट्यून के रूप में गायत्री मंत्र रखना शोभा नहीं देता। ये गलत है”। ट्वीटर पर ही मेरी उनसे छोटी सी बहस हो गई। मैने कहा कि हर पुलिस अधिकारी को भारत के नागरिक के तौर पर अपना धर्म मानने की आजादी है। वो कौनसी कॉलर ट्यून रखे इस बारे में पुलिस मैन्युअल में कुछ नहीं कहा गया है। फोन का कॉलर ट्यून रखना निजी विषय है। आपत्ति तब हो सकती है जब सत्यपाल सिंह अपना काम छोड दफ्तर में बैठकर दिनरात गायत्री मंत्र का पाठ करते और कहते कि मंत्र के प्रभाव से मुंबई में सब ठीक रहेगा, कोई अपराध नहीं होगा। ऐतराज तब भी होता जब वे अपने मातहत कर्मचारियों को भी गायत्री मंत्र कॉलर ट्यून रखने के लिये दबाव डालते।

मुंबई के लगभग किसी भी पुलिस थाने में चले जाईये। सीनियर इंस्पेक्टर और दूसरे अफसरों के कमरे में आपको हिंदू देवी देवताओं की तस्वीर लटकी दिखेंगीं। तमाम तरह के दबावों के बीच काम करने वाले पुलिसवालों को अगर इन तस्वीरों को देखकर आत्मबल मिलता है, सुकून मिलता है तो मुझे उसमें कुछ गलत नजर नहीं आता। इन तस्वीरों से मुंबई पुलिस की सेकुलर छवि को नुकसान पहुंचता मुझे नहीं दिखता। साल 2013 में मुंबई पुलिस के एक रिटायर्ड एसीपी जो कि गैर हिंदू मजहब को मानने वाले हैं ने पुलिस थानों में इन तस्वीरों के लगाये जाने पर ऐतराज जताया और मुंबई पुलिस कमिश्नर को शिकायत करते हुए खत लिख दिया। एसीपी साहब ने कहा कि पुलिस थानों में हिंदू देवी देवताओं की तस्वीरें देखकर उनके समुदाय के लोग असहज महसूस करते हैं, असुरक्षित महसूस करते हैं। ऐसे में अप्रैल 2013 में इन्ही सत्यपाल सिंह को एक सर्कुलर निकाल कर सभी थानों को हिदायत देनी पडी कि पुलिस परिसर से सभी तरह के धार्मिक प्रतीक हटाये जायें। शिवसेना-बीजेपी ने कमिश्नर के इस फरमान का विरोध किया था और कहा कि अंग्रेजों के जमाने में भी पुलिसकर्मियों पर ऐसी बंदिश नहीं लगाई गई थी।

अगर 1992-93 के मुंबई दंगों के अपवाद को छोड दिया जाये तो अग्रेजों के जमाने से ही मुंबई पुलिस की छवि आमतौर पर सेकुलर ही रही है। अग्रेजों के वक्त से ही मुंबई में एक प्रथा भी चली आ रही है जिसे देखने पर मुंबई पुलिस की आस्था का भी पता चलता है और सांप्रदायिक सदभाव का भी। मुंबई के माहिम में मखदूम शाह बाबा की दरगाह है। हर साल शाह बाबा के उर्स पर सबसे पहली चादर मुंबई पुलिस की ओर से चढाई जाती है। उर्स का पहला जुलूस भी माहिम पुलिस थाने में तैनात पुलिसकर्मी ही निकालते हैं। बडे ही धूम धाम के साथ ये जुलूस निकाला जाता है। थाने के सभी कर्मचारी नाचते गाते दरगाह तक पहुंचते हैं। उनमें कुछ वर्दी में होते हैं, कुछ सादे कपडों में। जुलूस में शरीक ज्यादतर पुलिसकर्मी हिंदू होते हैं। ये जुलूस आला पुलिस अफसरों की सहमति से आयोजित किया जाता है और कई बार डीसीपी रैंक के अधिकारी खुद भी सिर पर संदल रखकर दरगाह का रूख करते दिखते हैं। बताया जाता है पुलिसकर्मियों के बीच सैकडों सालों से ये मान्यता स्थापित हो गई है कि अगर किसी केस की गुत्थी नहीं सुलझ रही तो मखदूम शाह बाबा से प्रार्थना करने पर सुलझ जाती है। पुलिसकर्मियों की इस श्रद्धा को देखते हुए माहिम के बाबा “पुलिस वालों के बाबा” के तौर पर भी जाने जाते हैं।

मैं 2 ऐसे पुलिस अधिकारियों को जानता हूं जो साईंबाबा की पालकी में शामिल होकर मुंबई से शिर्डी तक पैदल यात्रा करते हैं। 242 किलोमीटर का ये पैदल सफर वे 10 दिनों में पूरा करते हैं और इसके लिये उन्हें छुट्टी लेनी पडती है। एक तो पुलिसकर्मियों को आसानी से छुट्टी मिलती नहीं, मिलती है तो उसके कभी भी रद्द होने का खतरा बना रहता है। छुट्टी का वक्त ज्यादातर पुलिकर्मी पारिवारिक कामों को निपटाने के लिये निकालते हैं। ऐसे में 10 दिन की छुट्टी आस्था के लिये समर्पित कर देना पुलिसकर्मियों के नजरिये से कोई छोटी बात नहीं।

मुंबई में जब 10 दिनों का गणेशोत्सव खत्म हो जाता है तब ग्यारवें या बारहवें दिन गणपति की वे गणपति प्रतिमाएं सागर तटों पर विसर्जन के लिये निकलतीं हैं जिनकी प्रतिष्ठापना पुलिस कॉ़लनियों या पुलिसवालों के मोहल्लों में की गईं हों। कारण ये है कि बाकी 10 दिन पुलिसकर्मी उत्सव के बंदोबस्त में व्यस्त रहते हैं। दसवें दिन यानी कि अनंत चतुर्दशी को उनका काम सबसे ज्यादा होता है जब ज्यादातर बडी गणपति प्रतिमाओं के विसर्जन के साथ उत्सव खत्म होता है। ऐसे में ग्यारहवें या बारहवें दिन ही उन्हें छुट्टी मिलती है और फिर वे अपनी बस्ती के गणपति विसर्जित करने निकलते हैं।

न्यायिक प्रक्रिया के दौरान भी पुलिसकर्मियों की आस्था प्रदर्शित होती है। आम गवाहों की तरह ही कठघरे में खडे होने पर गवाही से पहले पुलिसकर्मियों को भी शपथ लेनी होती है – भगवान की कसम खाकर कहता हूं जो भी कहूंगा सच कहूंगा।
अब तक ऐसा कोई वाकया याद नहीं आ रहा जिसमें किसी पुलिसकर्मी ने कहा हो कि मैं नास्तिक हूं इसलिये शपथ नहीं लूंगा। किसी ने ये कहकर भी शपथ लेने से इंकार नहीं किया कि पुलिस की नौकरी ही मेरा धर्म है।

खैर ये तो थी आस्था की मिसालें। अंधविश्वास के भी कई किस्से सुनने मिलते हैं जैसे एक पुलिसकर्मी का बेटा जो कि मेरा मित्र है हाल ही में बता रहा था कि मुंबई में कुछेक ऐसे पुलिस थाने हैं जहां हत्या या हादसे में मौत जैसे मामले ज्यादा होते हैं वहां हर अमावस्या को गुपचुप बकरे की बलि दी जाती है ताकि थाने के कार्यक्षेत्र में इस तरह की घटनाएं कम हो सकें। ये बात कितनी सही है ये मैने पता नहीं किया...लेकिन एक बात जो मुझे कई पुलिसकर्मियों से पता चली वो ये कि हर साल श्रावण शुरू होने के पहले “गटारी” के मौके पर कई पुलिस थाने “बकरा पार्टी” जरूर मनाते हैं। इसके बाद श्रावण खत्म होने तक शराब और मांसाहार सब बंद।


धर्म मानव सभ्यता की सबसे बेहतरीन संकल्पना भी है और सबसे खतरनाक और दुरूपयोग की जाने वाली भी। आस्था और अंधविश्वास के बीच की लकीर बहुत ही बारीक है और कई बार पढे-लिखे और दिमागदार लोग भी इस बारीकी को परख नहीं पाते फिर चाहे ये लोग वर्दी में हो, कुर्ते-पायेजामें में या जींस-टी शर्ट में। 

Monday, 23 June 2014

चाईनीज फूड और मुंबई


अबसे 2 दशक पहले तक आम भारतीयों के लिये नूडल्स का मतलब था-मैगी नूडल्स। वो मैगी नूडल्स जिसके विज्ञापन दूरदर्शन पर आते थे और जिसमें दावा किया जाता था कि वो 2 मिनट में तैयार हो जाते हैं। अब दौर है हक्का नूडल्स का, सिजवान नूडल्स का, सिंगापुर नूडल्स का वगैरह वगैरह..। 2 दशक पहले तक चाईनीज फूड (चीनी खाना) मुंबई के सिर्फ धनाढ्य या ऊपरी मध्यम वर्ग के लोगों की पसंद हुआ करता था या ये कहें कि सिर्फ उनकी जेबें ही चाईनीज खाने की इजाजत देतीं थीं। शहर में चाईना गार्डन या फ्लौरा जैसे गिने चुने ही रेस्तरां थे जहां इन वर्गों के लोग चाईनीज फूड का लुत्फ उठाने के लिये जाते थे। 90 के दशक के मध्य में चाईनीज फूड मुंबई के स्टालों पर मिलना शुरू हुआ और धीरे धीरे शहर के खानपान का हिस्सा बन गया। मुंबई में अब शायद ही कोई दक्षिण भारतीय व्यंजन पेश करने वाले उडीपी रेस्तरां हो जिसके मेन्यू में चाईनीज फूड का अलग पन्ना न हो। मंचाऊ सूप, चाऊमीन, ट्रिपल सिजवान, मशरूम मंचूरियन अब घर घर का नाम बन चुके हैं। घर में चाईनीज फूड बनाने के लिये अब शॉपिंग मॉल्स में भी चाईनीज मसालों के अलग सैक्शन खुलने लगे हैं।

मुंबई में चाईनीज फूड को आम लोगों तक पहुंचाया गहनों के बंगाली कारीगरों ने। दक्षिण मुंबई के जवेरी बाजार, कालबादेवी और भुलेश्वर जैसे इलाकों में बडे पैमाने पर बंगाली कारीगर रहते हैं जो बडे ज्वेलरों के लिये गहनों की कारीगरी का काम करते हैं। नब्बे के दशक की शुरूवात में इनमें से ही कुछ ने सडक किनारे चाईनीज फूड के स्टॉल लगाने शुरू किये। ये लोग पूर्वी कोलकाता के चाईना टाऊन में चाईनीज फूड चख चुके थे और चीनी व्यंजन बनाना भी इन्होने सीख लिया। “हक्का नूडल्स” का शब्द “हक्का” उन चीनी मजदूरों के लिये था जो 19वीं सदी में चीन से आकर बंगाल में बसे थे। शुरूवात में इन चाईनीज स्टाल्स के ग्राहक ज्यादातर बंगाली मजदूर और कारीगर ही हुआ करते थे, लेकिन धीरे धीरे मुंबई के दूसरे बाशिंदों के बीच भी ये लोकप्रिय होने लगे। मराठियों, गुजरातियों और मारवाडियों को भी चाईनीज फूड पसंद आने लगा।1995-96 तक मुंबई भर में करीब सौ से ज्यादा सडक किनारे चाईनीज फूड के स्टाल खुल गये। ये स्टाल अमूमन शाम 7 बजे से शुरू होते थे और रात 2-3 बजे तक चलते थे। ज्यादातर स्टाल चलाने वाले किसी नेपाली या पूर्वोत्तर भारत के किसी शख्स को बतौर खानसामा रखते थे ताकि चाईनीज फूड का अहसास आ सके। भडकीले लाल रंग के इन छोटे छोटे स्टॉल्स पर खूब भीड लगती। कई लोग शराब की बोतलें लेकर भी साथ आते थे और एक तरह से ये स्टॉल्स सडक किनारे बियर बार के रूप में भी तब्दील हो गये थे, बस शराब ग्राहक को खुद लानी पडती थी। रात की गश्त पर लगे पुलिसकर्मियों के लिये भी ये स्टॉल्स देर रात मुफ्त खाने का एक जरिया बन गये।

अब मुंबई में हर जगह चाईनीज फूड उपल्बध है। किसी भी रेस्तरां में चले जाईये, शॉपिंग मॉल में चले जाईये या फिर मुंबई से बाहर हाईवे पर किसी ढाबे पर जाईये। चाईनीज फूड आपको मिलेगा। आज मुंबई में जिस तरह वडापाव के जगह जगह पर स्टॉल्स लगते हैं उसी तरह से बीते 4-5 सालों में चाईनीज भेल के स्टॉल लगने भी शुरू हो गये हैं। चाईनीज भेल यानी चीनी मसालों के रसे से तैयार किये गये घोल में तले हुए नूडल्स का मिश्रण। 7 से 10 रूपये प्रति प्लेट मिलने वाली चाईनीज भेल जल्द ही लोकप्रिय हो गई और लोग इसे शाम के वक्त हलके फुलके स्नैक्स के तौर पर खाते हैं। सर्दी, खांसी से राहत पाने के लिये लोग चीनी मंचाऊ सूप को दवाई की तरह भी पीते हैं जिनमें अदरक, लहसुन, प्याज और मिर्च के अलावा कई ऐसे मसाले पडे होते हैं जो शरीर में गर्मी पैदा करते हैं। इन दिनों एक और चीनी डिश मुंबई के सडकों पर आई है-मंचूरियन पाव। भजिये (पकौडे) की तरह दिखने वाले मंयूरियन को पाव में रख कर बेचा जाता है।

एक मुख्य कारण जो चाईनीज फूड को भारतीय व्यंजनों से अलग करता है वो है उनमें Monosodium Glutmate (MSD) नामक नमक का होना। तमाम जापानी और चीनी पकवानों में इसका इस्तेमाल होता है। अजीनोमोटो नाम की कंपनी दुनियाभर में इसका कारोबार करती है। भारत में चाईनीज फूड में MSD का इस्तेमाल विवादास्पद भी रहा है। कईयों का मानना है कि इसको लंबे वक्त तक खाने से कई तरह की बीमारियां हो सकतीं हैं और छोटे बच्चों को तो इसे बिलकुल नहीं खाना चाहिये। वहीं कुछ का मानना है कि ये एक आम नमक की तरह है और आम नमक ज्यादा खाने पर जिस तरह का नुकसान शरीर को पहुंचाता है MSD से भी वैसा ही नुकसान होता है। मेरा चीनी मूल का एक स्कूली दोस्त है हू शिह फॉंग जो भारत के अलग अलग शहरों में चीनी रेस्तरां शुरू करने के लिये बतौर कंसलटंट का काम कर चुका है। फॉंग के मुताबिक लोगों को ये बात पता नहीं होगी, लेकिन अब तो तमाम भारतीय रेस्तरां भी अपने व्यंजनों में स्वाद बढाने के लिये MSD का इस्तेमाल करते हैं मसलन अगर आप छोले या राजमा का आर्डर देते हैं तो उसमें भी आपको वही MSD मिलेगा जो चाईनीज फूड में इस्तेमाल होता है। वैसे फॉंग का कहना है कि मुंबई में चंद गिने चुने रेस्तरां को छोडकर कहीं भी असली चाईनीज फूड नहीं मिलता। सब जगह चीनी फूड का भारतीयकरण हो चुका है। फॉंग के मुताबिक ये अच्छा है क्योंकि असली चाईनीज फूड शायद ही भारतियों को पसंद आये। भारतियों के लिये चीनियों जैसा चाईनीज फूड पचा पाना मुश्किल होगा।  


चीन भले ही भारत की उत्तर-पूर्वी सीमा पर आये दिन घुस्पैठ कर फिर वापस हट जाता हो, लेकिन भारतीयों के एक बडे तबके के स्वाद में उसने अब स्थाई कब्जा जमा लिया है।

Thursday, 19 June 2014

केदारनाथ : डर के आगे आस्था है !


बीते हफ्ते केदारनाथ से लौटा। साढे 11 हजार की ऊंचाई पर इस बात की रिपोर्टिंग करने गया था कि बीते एक साल में वहां क्या क्या बदला है? क्या मंदिर में फिर से शिवभक्तों का तांता लगने लगा है? सरकारी इंतजाम क्या हैं? पुनर्निमाण का काम कितना हुआ है और क्या केदारनाथ में फिर पहले जैसी रौनक लौट सकेगी? गुप्तकाशी के पास फाटा नामक के कस्बे से मैं सिर्फ 8 मिनट में ही हेलिकॉप्टर के जरिये पहुंच गया। वहां एक रात गुजारने के बाद मैने पैदल ही वापस उतरना तय किया। उतरते वक्त कई तरह के भाव मन में थे- आश्चर्य के, दुख के, गुस्से के, प्रशंसा के और उम्मीद के।

डर के आग आस्था है।
बीते साल केदारनाथ में जो तबाही मची उसकी दिल दहला देने वाली तस्वीरें पूरी दुनिया ने टेलिविजन के जरिये देखीं। उन तस्वीरों को देखकर ऐसा लगा कि प्रकृति की ओर से किये गये इतने बडे नरसंहार के बाद शायद अब लोग केदारनाथ नहीं आयेंगे। जान सबसे बडी चीज है...लेकिन ऐसा हुआ नहीं। केदारनाथ में इन दिनों रोजाना 1 हजार के करीब लोग दर्शन करने आ रहे हैं। 700 लोग पैदल 21 किलोमीटर की चढाई करके और 300 के करीब लोग हेलिकॉप्टर से। ज्यादातर लोग भकितभाव से वहां आये थे, कुछ लोग जिज्ञासा के कारण वहां पहुंचे ये देखने के लिये कि किस तरह से तबाही हुई थी, कुछ लोग अपनी ज्योत्रिलिंगों की यात्रा पूरी करने के लिये आये थे, जैसे एक सज्जन ने 11 ज्योत्रिलिंगों के दर्शन करने लिये थे, सिर्फ यहीं के दर्शन बचे थे इसलिये वे डरावनी तस्वीरों को देखने के बावजूद और खतरों को नजरअंदाज करते हुए यहां पहुंचे।
सभी ज्योत्रिलिंगों में केदारनाथ ज्योत्रिलिंग की यात्रा सबस कठिन है। अगर हेलिकॉप्टर से सफर के पैसे नहीं हैं तो 21 किलोमीटर की पैदल चढाई करनी पडती है। चढाई का रास्ता भी सरल नहीं है। कहीं सीधी चढाई है, कहीं बर्फ पर चलना पडता है तो कहीं ऊबड-खाबड पथरीला रास्ता है। केदारनाथ की वादियों में मौसम अचानक ही बदल जाता है। देखते देखते धूप की जगह बारिश और ओले ले लेते हैं। मई-जून जैसे महीनों में भी रात के वक्त तापमान शून्य से नीचे चला जाता है। अक्सर ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। उत्तराखंड में एक कहावत है- मुंबई का फैशन और केदारनाथ का मौसम कभी भी बदल जाता है। इन तमाम दुष्वारियों के बावजूद मैने देखा कि 80 साल तक की बूढी महिलाएं भी पैदल केदारनाथ के दर्शन करने पहुंच रहीं थीं। वैसे अब चढाई से पहले सभी श्रद्धालुओं को सेहत की जांच करवाना जरूरी है। डॉक्टर की ओर से फिटनेस प्रमाणपत्र मिलने के बाद ही केदारनाथ तक जाने की इजाजत मिलती है।

केदारनाथ में कितने मरे ?
केदारनाथ में मरने वालों का आंकडा अब भी एक रहस्य है और सरकार जो आंकडा दे रही है उस पर विवाद है। सरकार के मुताबिक केदारनाथ त्रासदी में पौने 4 हजार लोग मारे गये।आप सोचेंगे कि सरकार इस आंकडे पर कैसे पहुंचीं। दरअसल उस तबाही में जो लोग लापता हुए ऐसे पौने 4 हजार लोगों के रिश्तेदारों को सरकार ने डेथ सर्टिफिकेट जारी किये। सरकारी आंकडे के साथ पेंच ये है कि उस हादसे में कई पूरे के पूरे परिवार बह गये, जिनका कोई नहीं बचा जो सरकार के पास डेथ सर्टिफिकेट के लिये आवेदन करता। कई मामलों में लापता लोगों के रिश्तेदारो ने डेथ सर्टिफिकेट लेने की जरूरत नहीं समझी। जिन लोगों ने हादसे को अपनी आंखों से देखा उनका भी मानना है कि मरने वालों की तादाद सरकारी अनुमान से कहीं ज्यादा हो सकती है।

केदारनाथ की तबाही में लापता लोगों को मृत माना जायेगा, उत्तराखंड सरकार की इस नीति का कई लोगों ने गलत फायदा उठाने की भी कोशिश की। मुआवजे के लालच में कई ऐसे लोगों के रिश्तेदार भी डेथ सर्टिफिकेट मांगने के लिये आये जो कि केदारनाथ की तबाही के महीनों पहले ही लापता हो गये थे।
बहरहाल अब तक उन सभी पौने 4 हजार लोगों के शव भी नहीं मिले हैं जिन्हें सरकार मृत मान रही है। चश्मदीदों के मुताबिक अब भी हजारों शव केदारनाथ से लेकर गौरीकुंड के बीच बडे बडे पत्थरों और मलबे के ढेरों में दबे पडे हैं।

एक साल बाद क्या है हाल ?
अगर ये कहें कि सालभर में उत्तराखंड सरकार ने कुछ नहीं किया तो नाइंसाफी होगी। पिछले साल की तबाही को देखकर लगा था कि फिरसे यहां यात्रा शुरू होने में कई साल लग जायेंगे, लेकिन यात्रा शुरू हो गई है और यहां आने वालों को कोई खास असुविधा भी नहीं हो रही है। नेहरू इंस्टीट्यूट और माउंटेरियंग की मदद से केदारनाथ धाम के पुननिर्माण का काम किया जा रहा है। मंदिर के पीछे से गुजरने वाली मंदाकिनी नदी की धारा को बदला जा रहा है ताकि उसमें फिरसे बाढ आने पर केदारनाथ कस्बे को कोई नुकसान न पहुंचे। एक बडा हेलिपैड बनाया जा रहा है जिसपर एक साथ कई बडे हेलिकॉप्टर उतर सकते हैं। पैदल यात्रा के मार्ग को दुरूस्त किया जा रहा है। सारा काम उत्तराखंड पुलिस के एक डीआईजी जी.एस.मर्तोलिया की देखरेख में हो रहा है।
जो यात्री केदारनाथ पहुंचे रहे हैं उनके तीनों वक्त के खाने और चायपान का मुफ्त इंतजाम गढवाल मंडल की ओर से किया जा रहा है। खाना सादा लेकिन स्वादिष्ट और शुद्ध होता है। खाने के बाद बर्तन आपको खुद साफ करके वापस लौटाने हैं। रात को सोने के लिये टेंट की व्यवस्था है। मुसाफिरों को स्लीपिंग बैग दिये जाते हैं। सुबह नहाने के लिये गर्म पानी भी उपलब्ध रहता है। गौरीकुंड से लेकर केदारनाथ तक करीब 5 कैंप बनाये गये हैं जहां यात्री रूककर आराम कर सकते हैं, खा, पी सकते हैं। रास्तेभर जगह जगह पर पुलिस की मौजूदगी रहती है। हर कैंप में डॉक्टरों की एक टीम भी तैनात रहती है जो बीमार मुसाफिरों की मुफ्त जांच करती है और उन्हें दवा देती है।
चाहे सरकारी कर्मचारी हो या गैर सरकारी स्वयंसेवक, जो भी यहां दिखा, दिल से काम करता दिखा। हर कोई यही कहता कि इस बहाने वो भोलेनाथ की सेवा कर रहा है। इन तमाम लोगों ने बीते सालभर में जो कुछ भी किया है या जो कुछ कर रहे हैं मुझे वो प्रशंसनीय लगा।

मंदिर के इर्द-गिर्द है एक बहुत बडा कब्रिस्तान।
पिछले साल जब सैलाब आया तो केदारनाथ मंदिर के इर्द-गिर्द बनीं तमाम इमारतें धाराशायी हो गईं। सैकडों लोग उनके मलबे में दब गये। सरकारी टीमों ने बाद में ऊपर ऊपर जो भी लाशें नजर आईं उनका तो अंतिम संस्कार कर दिया लेकिन मलबे के भीतर अब भी सैकडों शव दबे पडे हैं। वहां मौजूद पंडों ने मंदिर से महज 200 मीटर के दायरे में मुझे कई ऐसे ठिकाने दिखाये जहां से शवों के सडने की बदबू अब भी आ रही थी और जहां इंसानी हड्डियां पडीं थीं। मैं जिस दिन केदारनाथ से निकला उसी दिन गरूडचट्टी नाम की जगह से बडे पैमाने पर शव बरामद हुए, जिसके बाद सरकार ने फिरसे शवों को खोजने के लिये एक अभियान शुरू कर दिया।

मंदिर को बचाने वाला पत्थर
केदारनाथ में शिवमंदिर के बाद अब दूसरा सबसे बडा आकर्षण उस मंदिर को बचाने वाला एक बडा पत्थर बन गया है जो मंदाकिनी नदी में बाढ आने पर पहाडों से बहकर नीचे आया और ठीक शिवमंदिर के पीछे आकर रूक गया। इसी पत्थर की वजह से बाढ का पानी मंदिर की नींव को नुकसान नहीं पहुंचा सका। लोग इसे एक चमत्कारिक पत्थर मानते हैं और इसके भी दर्शन करते हैं।
मंदिर के इर्द गिर्द साधुओं की भीड लगी रहती है जिनमें से कई गांजे का कश लगा रहे होते हैं। शाम की आरती के वक्त माहौल देखते ही बनता है। मंदिर में घंटे बज रहे होते हैं और उसी वक्त बाहर मौजूद तमाम साधु एक साथ अपने अपने डमरू बजा रहे होते हैं।

सरकार और पंडों में विवाद
मैं जैसे ही केदारनाथ हेलिपैड पर उतरा तो ये जानकर कि मैं पत्रकार हूं तमाम पंडों ने मुझे घेर लिया और बताने लगे कि सरकार उनके साथ नाइंसाफी कर रही है। केदारनाथ के जिन मकानों को बाढ में नुकसान पहुंचा है, सरकार ने उनपर चिन्ह लगा दिये हैं। ज्यादा क्षतिग्रस्त भवन, कम क्षतिग्रस्त भवन और क्षतिग्रस्त भवन, इन 3 श्रेणियों में सभी इमारतों को बांटा गया है। सरकार चरणबद्ध तरीके से खतरनाक हो चुकी इन इमारतों को गिराना चाहती है, लेकिन स्थानीय पंडे इसका विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार के इस कदम से उनके सिर छुपाने का ठिकाना छिन जायेगा।

लुआनी गांव की कहानी
केदारनाथ से लौटते वक्त मैं लुआनी गांव गया। इस गांव मैं पिछले साल भी तबाही के बाद गया था। गांव के 16 मर्द जो कि केदारनाथ में पंडे का काम करते थे, तबाही में लापता हो गये। कई ऐसे परिवार थे जिनमें कोई भी मर्द न बचा। गांव में मैं 11 महीने के सौम्य नाम के एक बच्चे से मिला। हंसते और किलकारियां मारते सौम्य को ये नहीं पता कि उसके पिता दुनिया में उसके आने से पहले ही चल बसे। पिछले साल पिता संदीप बगवाडी के तबाही में मारे जाने के 7 दिनों बाद उसका जन्म हुआ था। संदीप और उनके बडे भाई बाढ में बह गये थे। परिवार में अब दोनो की विधवाएं उनकी बूढी मां, एक 5 साल की बच्ची और लडका सौम्य है। सरकार ने विधवाओं को सवा 5 लाख रूपये का मुआवजा तो दिया है, लेकिन बगवाडी परिवार इस आर्थिक मदद को नाकाफी पाता है। लुआनी गांव को किसी गैर सरकारी संगठन ने गोद भी नहीं लिया है।


बहरहाल, केदारनाथ में जो कुछ भी देखा और जो कुछ भी अनुभव किया उसके बाद यही पंकित बार बार दिमाग में घूम रही है- डर के आगे आस्था है। जर्मन अर्थशास्त्री कार्ल मार्कस की कही एक बात याद आ रही है- Religion is the opium of masses यानी धर्म लोगों का नशा है और नशे के प्रभाव में इंसान को जोखिम, खतरे और दुख की परवाह नहीं होती।

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