Monday, 22 February 2016

संजय तू बातों से मानेगा या…? मुन्नाभाई की कहानी, जेलर की जुबानी।


अंग्रेजी हूकूमत के दौर में बनाई गई मुंबई की आर्थर रोड जेल अपनी चारदीवारी के बीच एक इतिहास समेटे है। अगर बीते डेढ दो दशक की ही बात करें तो आर्थर रोड जेल में ऐसी शख्ससियतें कैदी बनकर आ चुकीं हैं जो कि मुंबई में खूनखराबे, आतंक और खौफ के लिये जिम्मेदार रहीं। ऐसे लोगों से जेल में सामना होता था महाराष्ट्र जेल की डीआईजी स्वाती साठे का जो कि 2 बार इस कुख्यात आर्थर रोड जेल की सुपिरिंटेंडेंट रह चुकीं हैं। स्वाती साठे के कार्यकाल में अरूण गवली, अबू सलेम, मुस्तफा दोसा, याकूब मेमन, अजमल कसाब, अश्विन नाईक जैसे खतरनाक नाम तो उनके कैदी बने ही साथ ही गैरकानूनी हथियार रखने के गुनहगार फिल्मस्टार संजय दत्त को भी सबसे लंबे वक्त तक उन्होने ही जेल में देखा।

Swati Sathe, DIG (Prisons), Maharashtra.

एक फिल्मी हस्ती जो ऐशोआराम की जिंदगी जी रहा हो, जो महंगी विदेशी शराब पीता हो, जिसका खाना सात सितारा रेसतरां में होता हो, जो चलते वक्त लाखों के कपडे, घडी और चैन से लदा हुआ होता हो, उसे अगर अचानक जेल की कांटोभरी जिंदगी जीने के लिये कह दिया जाये तो इस बदलाव से वो कैसे संघर्ष करता है, ये स्वाती साठे ने करीब से देखा है संजय दत्त में।

जेल ऐसी जगह है जहां भ्रष्टाचार के लिये खूब जगह है।कैदी जेल में सुख सुविधाएं पाने के लिये जेल अधिकारियों को मोटी कीमत देने को तैयार रहते हैं। संगठित अपराध के गिरोह का तो एक पूरा सिस्टम काम करता है जेल के स्टाफ को “खुश” करने में ताकि गिरोह के सदस्यों को जेल “जेल” न लगे, उन्हें मनपसंद खाना मिले, शराब मिले, ड्रग्स मिले, मोबाइल फोन मिले। जेल में होने वाले भ्रष्टाचार के कई मामलों का आये दिन मीडिया के मार्फत खुलासा होते रहता है। कई बार कोई सख्त अफसर आया जो रिश्वत नहीं लेता तो उसके खिलाफ डर का इस्तेमाल किया जाता है। उसे जान से मारने से लेकर तबादला करवा देने तक का डर दिखाया जाता है। जो डर जाता है वो चुप बैठता है। स्वाती साठे की इमेज चुप बैठने वाले अफसरों में नहीं थी। उनके कार्यकाल के दौरान आर्थर रोड जेल में किसी गैंगस्टर के बजाय उनका खौफ होता था। अपनी सख्त और ईमानदार छवि की वजह से साठे ने जेल महकमें में अपनी अलग पहचान बनाई थी। इन्हीं नो नॉनसेंस स्वाती साठे से सामना हुआ था संजय दत्त का।


बात तब की है जब टाडा अदालत में संजय दत्त को 6 साल जेल की सजा सुनाये जाने के बाद उन्हें आर्थर रोड जेल में लाया गया। संजय दत्त 1993 में पहले भी इस जेल के कैदी रह चुके थे।चूंकि आर्थर रोड जेल ऐसे कैदियों की जेल है जिनके खिलाफ मुकदमा चल रहा हो इसलिये सजायाफ्ता होने के कारण संजय दत्त को इस जेल से दूसरी जगह भेजा जाना था...लेकिन जब तक संजय दत्त के लिये दूसरी जेल मुकर्रर हो तब तक उन्हें कुछ वक्त के लिये यहीं रखने का फैसला किया गया। संजय दत्त को जेल में लाये जाने के बाद नियम के मुताबिक जेल का वो यूनिफॉर्म पहनने को कहा गया जो कि हर कैदी पहनता है। ये यूनिफॉर्म सफेद रंग की थी जिसकी कीमत बाजार में लगभग 100 रूपये की होगी। खुद को 6 साल जेल की सजा सुनाये जाने के बाद संजय दत्त सदमें में थे।आंखें डबडबा रहीं थीं, ऐसे में जब उन्हें ये यूनिफॉर्म पहनने को कहा गया तो वो अपना आपा खो बैठे। दत्त ने चिल्लाकर कहा कि वो यूनिफॉर्म नहीं पहनेंगे। जेल के कर्मचारी उन्हें विनम्रता से समझाने लगे कि नियमों के मुताबिक ये जरूरी है...लेकिन दत्त जिद पर अड गये...नहीं पहनूंगा...नहीं पहनूंगा...नहीं पहनूंगा। निचले दर्जे के जेल अधिकारी हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे कि वो इतने बडे फिल्मस्टार के साथ सख्ती से पेश आयें जिसकी बहन प्रिया दत्त केंद्र और राज्य की सत्तासीन कांग्रेस पार्टी की सांसद भी थी।


जेल अधिकारी स्वाती साठे के केबिन में पहुंचे और बताया कि संजय दत्त यूनिफॉर्म नहीं पहन रहा है।कोई बात सुनने के लिये तैयार नहीं है।स्वाती साठे ने तय किया कि इस मामले को अब वे अपने हाथ में लेंगीं। वे तुरंत संजय दत्त के बैरक में पहुंचीं। साठे का चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ था। संजय दत्त भी स्वाती साठे के मिजाज से परिचित थे। स्वाती साठे को अपने बैरक में देख उनके भी हाव भाव बदल गये। स्वाती साठे ने दत्त की आंख में आंख डालकर उनकी ओर अपनी छडी दिखाते हुए कहा – संजय तू बातों से मानेगा या लातों से ? इस सवाल के साथ वो कुछ पलों तक दत्त का चेहरा देखतीं रहीं। दत्त ने अपनी नजरें झुका लीं। उन्हें उम्मीद नहीं की थी कि उनके साथ जेल में ऐसा भी हो सकता है। स्वाती साठे ने आगे कुछ नहीं कहा और बैरक से बाहर चलीं गईं। संजय दत्त ने खामोश रहते हुए यूनिफॉर्म पहन ली।

Wednesday, 30 December 2015

If you cherished Salman verdict, you must also know Ajay Chaurasia!


Do you know Ajay Chaurasia?
Most likely you have no idea who he is.
…but you certainly know who is Salman Khan.
You also know that recently Salman was acquitted from Bombay High Court.
Last May Sessions Court sentenced him for 5 years imprisonment and within 7 months his appeal was heard and he walked free.
Now you may ask, how is Ajay Chaurasia related to Salman’s case?
The only thing common between Salman Khan’s case and Ajay Chaurasia’s story is that both had appealed in Bombay High Court against their convictions by the lower courts.
However, Salman Khan got justice in just 7 months. Guess since how long Ajay Chaurasia’s appeal is pending with Bombay High Court?
Since 7 YEARS! Yes the same figure 7 ! Salman is fortunate that his case was disposed off in 7 MONTHS  & Ajay is making rounds of court since last 7 YEARS.

This Ajay Chaurasia doesn’t earn in millions like Salman Khan. He works as a decorator for wedding parties and hardly manages to earn around 10 to 12 thousands rupees per month.
He doesn’t stay in plush Galaxy Apartment at the sea face of Bandra. Ajay resides in a small room of a chawl at Kalyan, 60 kilometres away from Mumbai.
What crime Ajay has committed?
He is not charged with drunken driving causing death of somebody sleeping on footpath.
His story begins in 2006 when he fell in love with a girl from neighbourhood.
As the girl’s family was against the marriage, both ran away and got married.
The girl was few days short to attain marriageable age.
Girl’s family registered a complaint with cops & Ajay’s brother was picked up.
When Ajay got the news of torture to his brother by cops, he decided to surrender.
After returning, the girl decided to leave him & toed the line of her parents.
Police charged Ajay with kidnapping and rape.
Next year in 2007, he was sentenced to jail for 7 years.
In 2008 while Ajay was in Nasik Jail, he filed an appeal against his conviction in Bombay High Court and this appeal is yet to be disposed even after 7 years.
Out of 7 years which Ajay has been sentenced, he has already spent 5 years in jail as he was able to get bail only in 2011 after a social organisation took over his case.
Remember, when Salman was sentenced for 5 years jail, he didn’t go behind the bars even for a moment. Moreover, that day the clerk’s office closed 3 hours later than the regular time.

Like Salman Khan, Ajay is also still unmarried. (His earlier marriage was declared illegal)
The only difference is that Salman is not marrying willingly whereas nobody wants to get their daughter wed to Ajay who has been stamped as a criminal and who doesn’t know what’s in store for his future. He still makes rounds of court date after date in hope of justice. Sometimes he makes over 20 rounds a year.
There are many like Ajay who are hoping for justice in our heavily burdened judicial system. There are over 40 lakhs cases in various High Courts across the country. Around 10 % of these cases are pending over 10 years.  Just in Bombay High Court there are over 3,75,000 pending cases. In lower courts of Maharashtra there are around 30 lakhs pending cases. But, fortunately for Salman, the speed of justice was different! Fast!

When you compare Salman’s case with Ajay’s, certain questions arise in your mind. However, I have full faith on our judiciary. Everybody is equal in the eyes of law. Everybody is equal as per our constitution. Ajay Chaurasia should also understand this. 

Thursday, 17 December 2015

सलमान खान: इंसाफ की रफ्तार!

सलमान खान को हिट एंड रन केस में बॉम्बे हाई कोर्ट से बरी हुए आज हफ्ताभर हो गया है। इस दौरान मेरी कई वकीलों से बातचीत हुई जो कि इस केस से जुडे हुए नहीं थे, लेकिन न्यायिक प्रकिया पर नजर रखे हुए थे। ऐसे तमाम वकील मुझे हतप्रभ और गुस्से से भरे हुए नजर आये।...नहीं..नहीं..ये गुस्सा सलमान खान को इस तरह से छोड दिये जाने को लेकर नहीं था, न ही सलमान को बरी करने जाने वाले जज के खिलाफ था। ये गुस्सा था न्यायिक प्रक्रिया की उस तेज रफ्तार को लेकर जो सिर्फ सलमान के मामले में ही नजर आई।

अगर किसी आरोपी को निचली अदालत दोषी करार देकर सजा सुनाती है और 6 महीने में ऊपरी अदालत यानी कि हाई कोर्ट उसकी अपील पर फैसला सुना देती है तो ये अभियुक्त के नजरिये से एक अच्छी बात है। अभियुक्त अपने भविष्य को लेकर सस्पेंस में नहीं रहता। उसे ज्यादा कोर्ट के चक्कर नहीं लगाने पडते, तारीख दर तारीख इंतजार नहीं करना होता, वकीलों को ज्यादा फीस नहीं देनी होती। सलमान हिट एंड रन केस में बरी हो गये ये तो उनके लिये एक अच्छी खबर थी ही, लेकिन उससे ज्यादा अहम बात ये थी कि वो उस तकलीफदेह न्यायिक प्रकिया से भी बच गये जो कि आम लोगों को अदालत में झेलनी पडती है। मई 2015 में सेशंस कोर्ट सलमान को शराब पीकर गाडी चलाने और एक शख्स की मौत का जिम्मेदार होने के आरोप में 5 साल की जेल के सजा सुनाता है और करीब 7 महीने बाद ही दिसंबर में उसकी अपील पर फैसला भी आ जाता है। सेशंस कोर्ट की ओर से दोषी ठहराये जाने के बाद सलमान ने एक रात भी सलाखों के पीछे नहीं गुजारी। सलमान ने जब हाई कोर्ट में अपील दायर की तो उन्हें जमानत देते वक्त जज अभय ठिपसे ने आदेश दिया था कि उनकी अपील पर जल्द सुनवाई हो। इसके पीछे मकसद ये था कि ये न समझा जाये कि सलमान खान जमानत लेकर लंबे वक्त तक आजाद रह सकेंगे और कोर्ट में मामला चलता रहेगा।

सलमान खुशनसीब थे कि उनके मामले का निपटारा 7 महीनें में ही हो गया...लेकिन बाकी लोगों के साथ क्या होता है ?
एक वकील दोस्त के मुताबिक सलमान जैसे या सलमान से कम गंभीर मामलों में भी अगर कोई आरोपी दोषी ठहराया जाता है तो उसकी अपील पर फैसला आते आते कम से कम 4-5 साल लग ही जाते हैं और कई मामलों में तो 7 से 8 साल तक। सोचिये...कहां 7 महीने और कहां 7 से 8 साल !!! अदालत में तारीख पर तारीख पडतीं जातीं हैं। जो बडे वकील होते हैं वे तो तारीखों पर अपने जूनियर को खडा कर देते हैं, लेकिन आम वकीलों को तारीख के वक्त अदालत में खुद मौजूद रहना होता है और अपने मामले का नंबर आने का इंतजार करना पडता है और फिर मिल जाती है एक और तारीख! वकीलों को फीस तो देनी ही है। हर तारीख पर मुवक्कील का पैसा भी खर्च होता जाता है। कई मामलों में तो ऐसा भी हुआ है कि किसी आरोप में निचली अदालत ने आरोपी को दोषी करार देकर सजा सुना दी, उसे जेल भेज दिया। सालों बाद बॉम्बे हाई कोर्ट ने उसकी अपील पर फैसला सुनाते हुए उसे बरी कर दिया, लेकिन निचली अदालत के फैसले और हाई कोर्ट के फैसले के बीच का वक्त इतना लंबा था कि आरोपी ने जेल में उस सजा की अवधि पूरी कर ली जिसके लिये बाद उसे हाई कोर्ट ने बरी कर दिया। ऐसे मामले अंग्रेजी की उस कहावत का सटीक उदाहरण हैं- Justice delayed is justice denied. कई ऐसे भी मामले हैं जिनमें निचली अदालत की ओर से दोषी ठहराये जाने के बाद हाईकोर्ट ने आरोपी को जमानत दे दी हो, लेकिन इस जमानत को हासिल करने तक उसे काफी वक्त जेल में गुजारना पडा, जबकि सलमान के मामले में जमानत पर सुनवाई तुरंत हो गई थी और आपको याद होगा कि उस दिन अदालती लिपिक का दफ्तर भी नियत वक्त से काफी देर से बंद हुआ था।


ये बात सच है कि मुंबई समेत देशभर की अदालतें अपनी क्षमता से ज्यादा मामलों से दबीं हुईं हैं। अकेले बॉम्बे हाईकोर्ट में इस वक्त पौने 4 लाख मामले लंबित हैं। महाराष्ट्र की निचली अदालतों में 30 लाख के करीब मामले लंबित हैं। लॉ कमीशन ने सिफारिश की थी हर 10 लाख की आबादी पर 200 जज होने चाहिये, लेकिन हकीकत में सिर्फ 17 ही हैं। हमारी न्यायिक व्यवस्था ऑवरलॉडेड है और उससे नागरिक त्रस्त हैं, लेकिन ऐसे हालात में भी सलमाऩ जैसे लोग इस व्यवस्था से प्रभावित नहीं होते। बॉम्बे हाईकोर्ट में वकालत कर रहे जिन वकीलों से मेरी बात हुई उनका मानना है कि जो मापदंड सलमाऩ खान के मामले के निपटारे के लिये अपनाया गया वही मापदंड सभी मामलों में अपनाया जाना चाहिये। फिलहाल सभी यही चर्चा कर रहे हैं कि सलमाऩ के मामले में इंसाफ ने जो रफ्तार दिखाई उसने देश को क्या संदेश दिया ?

Monday, 7 December 2015

चेन्नै: त्रासदी दर त्रासदी...वही सवाल, वही ख्याल।


कहते हैं कि एक ही चीज बार बार देखने-सुनने से उसके प्रति संवेदना खत्म हो जाती है। 17 साल की उम्र में पत्रकारिता शुरू की थी और 37 साल की उम्र तक पहुंचते पहुंचते न जानें कितनी और किस किस तरह की मौतें देखीं। कुदरती और मनुष्यजनित हादसों में होने वाली मौतें, पुलिस और गैंगस्टरों की गोलियों से होने वाली मौतें, दहशतगर्दों की ओर से किये गये बम धमाकों में इंसानी शरीर के चिथडे उडा देने वाली मौतें...मुझे कभी कभी डर लगता है कि मेरी हालत सरकारी अस्ताल में पोस्टमार्टम के लिये रोजाना लाशों की चीरफाड करने वाले संवदेनहीन डॉक्टर की जैसी न हो जाये...लेकिन शायद अभी वो नौबत नहीं आई है। संवेदना बची हुई है...मन सोचता है...दुखी होता है...और लिखने को मजबूर करता है।

ये ब्लॉग मैं चेन्नै से बाढ की त्रासदी कवर करके वापस लौटते वक्त लिख रहा हूं। इस बार भी वही सवाल और वही ख्याल मेरे जेहन में हलचल मचा रहे हैं जो बीते डेढ दशक में दुनिया की अनेक बडी कुदरती आपदाओं के कवरेज के दौरान मुझे घेरे हुए थे। 2004 में हिंद महासागर में सुनामी लहरों की हैवानियत, 2005 में मुंबई को डुबा देने वाली बारिश, 2011 में जापान को हिला देनेवाली सुनामी लहरों का कहर, 2013 उत्तराखंड के केदारनाथ में हुई जलप्रलय। भले ही ये तमाम त्रासदियां दुनिया के अलग अलग हिस्सों में कवर की हों, लेकिन इन सबके कवरेज के दौरान मैने कई समानताएं पाईं। कुदरत के कहर की ऊपरी तस्वीरें हर जगह एक जैसी ही नजर आतीं थीं। बर्बाद हो चुकीं बस्तियां, अपनों को खो चुके रोते-बिलखते लोग, लापता लोगों को ढूंढते बदहवास रिश्तेदार, राहत सामग्री के लिये तरसते लोग...इन तस्वीरों के अलावा एक और बात भी सभी त्रासदियों में समान है। वो है इन त्रासदियों के लिये खुद इंसान का जिम्मेदार होना। इस बात को समझने के लिये ज्यादा गहरे शोध की जरूरत नहीं है। आपदाओं के ठिकानों पर पहुंचकर पहली नजर में ही बात समझ में आ जाती है। उत्तराखंड में मंदाकिनी नदी को पाटा गया और उसकी चौडाई कम की गई, मुंबई में मीठी नदीं की भी गहराई और चौडाई अतिक्रमण की वजह से कम हुई, चैन्नै में हुई तबाही के लिये अध्यार नदीं को जिम्मेदार माना जा रहा है जिसे इंसानी लालच ने 50 फीसदी से भी ज्यादा समेट दिया और जहां से किसी वक्त नदीं की धारा बहती थी वहां अब रईसों की बस्तियां बना दी गईं। जापान में भी समुद्र को पाटा गया और मुंबई में भी। प्रकृति के हमले का शिकार बने इन ठिकानों पर की गईं ये बडी भूलें थीं और जब इनका मेल अन्य कारणों के साथ हुआ तो विस्फोट तो होना ही था।

इन त्रादियों को कवर करते वक्त मैने जो कुछ भी देखा और इनसे जुडी हुई जो भी सामग्री मैने पढी है उससे मैं चिंतित हूं। ये भयानक सच स्वीकार करने के लिये तैयार हो जाईये कि आने वाले वक्त में हमें मुंबई, चैन्नै, उत्तराखंड, जापान जैसी या इनसे भी कई गुना ज्यादा भयंकर तबाहियां देखनीं होंगीं और ये “आने वाला वक्त” ज्यादा दूर नहीं है। अगले 10-15 सालो के भीतर ही देखिये कि क्या क्या होता है। “ग्लोबल वार्मिंग” इन दो शब्दों को हरगिज हल्के में नहीं लिया जा सकता। हमने बीती सदी में ही अपनी पृथ्वी को इस हद तक नुकसान पहुंचाया है कि अब कुदरत के पलटवार को रोकना नामुमकिन हो गया है...सिर्फ उससे बचने के तरीके सोच सकते हैं और ज्यादा नुकसान न होने देने के प्रयास कर सकते हैं। हाल ही में पेरिस में जो सम्मेलन हुआ उसमें दुनियाभर के देशों ने इस बात को समझा जरूर, लेकिन सभी देशों को अपने स्वार्थ के साथ समझौता करके जो गंभीर कदम उठाये जाने चाहिये थे, वो नहीं हुआ।


चलते चलते चेन्नै में इंडियन एयरफोर्स के एक पायलट के वो शब्द यहां मैं काबिल ए जिक्र समझता हूं जो आसमान से शहर की तबाही देखकर हतप्रभ था और जिसे मैने खुद को कहते सुना – “If you screw up the nature..the nature knows how to screw you up back…”

Tuesday, 24 November 2015

दाऊद की प्रोपर्टी नीलामी के पीछे की असली कहानी !!!


खबर आई है कि एक बार फिर अंडरवर्लड डॉन दाऊद इब्राहिम की संपत्ति की नीलामी होने जा रही है। बीते 16 सालों में दाऊद की संपत्ति की ये चौथी बार नीलामी हो रही है। मैं इससे पहले दाऊद की संपत्तियों की 3 नीलामियां कवर कर चुका हूं और मेरा मानना है कि ऐसी नीलामी एक ड्रामे से ज्यादा कुछ नहीं होती। साल 2000 में सबसे पहली बार नीलामी कोलाबा इलाके के इस होटल डिप्लोमैट में हुई थी...लेकिन तब किसी की हिम्मत नहीं हुई कि वो डॉन की संपत्ति पर बोली लगाये। उसके अगले साल 28 मार्च 2001 को दूसरी बार फिरसे नीलामी की गई जिसमें दिल्ली के शिवसैनिक अजय श्रीवास्तव ने नागपाडा इलाके की जयराजभाई लेन में 2 दुकाने खरीदीं। उसी साल 20 सितंबर को फिरसे तीसरी नीलामी हुई। उस नीलामी में दिल्ली के ही एक व्यापारी पीयूष जैन ने दाऊद की ताडदेव इलाके की एक संपत्ति खरीदी। इन दोनो ही लोगों ने संपत्ति के पैसे तो चुका दिये लेकिन आज तक संपत्ति का कब्जा हासिल नहीं कर सके हैं।

दिल्ली के शिवसैनिक अजय श्रीवास्तव पेशे से वकील हैं।1999 में श्रीवास्तव पहली बार तब चर्चा में आये थे जब उन्होने पाकिस्तान के साथ क्रिकेट मैच खेले जाने के विरोध में फिरोजशाह कोटला मैदान की पिच खोद डाली थी। अजय श्रीवास्तव ने संपत्ति तो खरीद ली, लेकिन उसके बाद उनका सामना हुआ दाऊद इब्राहिम की बहन हसीना पारकर से। हसीना पारकर ने संपत्ति का कब्जा देने से इंकार कर दिया। अजय श्रीवास्तव ने कब्जा हासिल करने के लिये मुंबई के स्मॉल कॉसेस कोर्ट में अर्जी दायर की। 10 साल तक चले मुकदमें के बाद साल 2010 में फैसला उनके पक्ष में ही आया लेकिन इसके बावजूद हसीना कब्जा छोडने को तैयार नहीं हुई।
भले ही कोर्ट की चारदीवारी में अजय श्रीवास्तव दाऊद के खिलाफ मुकदमा जीत गये हों, लेकिन दाऊद गिरोह के लिये ये उसकी नाक का सवाल था।हसीना पारकर ने स्मॉल कॉसेस कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील कर दी। हसीना पारकर की पिछले साल हार्ट अटैक से मौत हो गई, लेकिन अब उसके बच्चे मुकदमा आगे चला रहे हैं। कुल मिलाकर बीते 15 सालों से अजय श्रीवास्तव कब्जा हासिल करने के लिये दिल्ली से मुंबई का चक्कर काट रहे हैं। इस बीच उत्तर प्रदेश से पुलिस ने छोटा शकील गिरोह के कुछ शूटरों को गिरफ्तार किया जिनसे पूछताछ में पता चला कि उन्हें अजय श्रीवास्तव को अपना निशाना बनाना था। अजय श्रीवास्तव का कसूर था कि उसने दाऊद की संपत्ति पर बोली लगाने की हिम्मत की। इसके बाद दिल्ली पुलिस ने अजय श्रीवास्तव को सुरक्षा मुहैया करा दी। श्रीवास्तव का कहना है कि उन्होने अंडरवर्लड के खौफ के खिलाफ संदेश देने के लिये दाऊद की संपत्ति खरीदी थी। उन्होने मुंबई पुलिस को भी पेशकश की वे उनकी खरीदी हुई संपत्तियों का कब्जा ले ले और उस जगह अपनी चौकी बना दें, लेकिन मुंबई पुलिस ने दिलचस्पी नहीं दिखाई।

वैसे श्रीवास्तव के कुछ पुराने साथी जो अब उनसे अलग हो चुके हैं दबी जुबान से ये भी आरोप लगाते हैं कि उन्होने दाऊद की संपत्ति सिर्फ पब्लिसिटी की खातिर खरीदी थी। श्रीवास्तव की असली मंशा थी कि ऐसा करके वे शिवसेना में अपना कद बढा पायेंगे, लेकिन संपत्ति खरीदने के बाद जब वे मातोश्री बंगले पर बाल ठाकरे से मिलने पहुंचे तो ठाकरे ने उनसे मिलने से इंकार कर दिया।

दाऊद की संपत्ति को नीलामी में खरीदने वाले शख्स पीयूष जैन भी आज तक उसका कब्जा हासिल नहीं कर सकें हैं। जोश में आकर पीयूष जैन ने संपत्ति खरीद तो ली लेकिन उसके बाद डर के मारे उनकी हालत खराब हो गई। संपत्ति खरीदने के बाद पीयूष जैन ने दिल्ली में रहना छोड दिया और अब एक दूसरे शहर में रहने के लिये चले गये हैं। संपत्ति पर कब्जा हासिल करने किलेय पीयूष जैन ने कोई कोर्ट केस भी नहीं किया लेकिन जब उनसे मैने पूछा किया संपत्ति हासिल करने के लिये आपने क्या किया तो उनका जवाब था कि जब अटलबिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे तो मैने उनको खत लिखकर गुहार लगाई थी कि वे संपत्ति पर कब्जा हासिल करने में उनकी मदद करें।

अलग अलग केंद्रीय जांच एजेंसियों ने दाऊद इब्राहिम की करीब 12 संपत्तियों को जब्त कर रखा है और आज की तारीख में बाजार में उनकी कीमत 100 करोड के करीब आंकी जा रही है। सूत्रों के मुताबिक दाऊद के पास कई बेनामी संपत्तियां भी हैं जिनकी कोई आधिकारिक जानकारी इन जांच एजंसियों के पास नहीं है। ऐसी संपत्तियों की देखभाल का काम पहले दाऊद की बहन हसीना पारकर करती थी और अब उसका छोटा भाई इकबाल कासकर करता है।

14 साल बाद फिर एक बार दाऊद की संपत्ति की नीलामी तो हो रही है। हो सकता है कि फिर एक बार कोई न कोई हौसला जुटाकर बोली लगाने के लिये नीलामी में पहुंच जाये...लेकिन उसके आगे उस संपत्ति पर कब्जा हासिल करने के लिये उसे खुद ही दाऊद के रिश्तेदारों से कानूनी लडाई लडनी होगी। बीते हए मामले यही बताते हैं कि पुलिस और सरकार इसमें कोई मदद नहीं करेगी।


(इस विषय का वीडियो यहां देखें- https://www.youtube.com/watch?v=pwGiMOTAKWs )

Saturday, 14 November 2015

7 समानताएं पेरिस और मुंबई हमलों के बीच !


मुंबई में हुआ आतंकी हमला भी नवंबर में हुआ था और पेरिस  में हुआ हमला भी नवंबर में हुआ है लेकिन महीने की समानता के अलावा अगर हम बारीकी से गौर करें तो पाएंगे कि पेरिस और मुंबई के हमलो के बीच करीब 7 समानताएं है।

१)  Crowded Locations.
पहली समानता यह है कि दोनों शहरों में आतंकियों ने भीड़ भाड़ वाले इलाको  को चुना था अपने टारगेट के तौर पैर।   मुंबई में हुए हमले का सबसे बड़ा टारगेट था CST  रेलवे स्टेशन जहां पर अजमल कसाब और उसके साथी इस्माइल  ने  ट्रेन पकड़ने के लिए आए मुसाफिरों  पर अंधाधुंध गोलियां बरसाई।   अकेले CST रेलवे स्टेशन पर ही 56 लोगों की मौत हो गई जिसमें रेलवे मुसाफिर भी थे और पुलिस कर्मचारी भी।

२) Eating Places
पेरिस  और मुंबई के हमलो के बीच दूसरी समानता ये है कि दोनों ही  हमलो में  खाने पीने के  रेस्टोरेंट्स को आतंकियों ने अपना निशाना बनाया जैसे कि मुंबई में उतरे आतंकियों के पहले गुट ने सबसे पहले कोलाबा इलाके के इस मशहूर लियोपोल्ड  कैफ़े में अंधाधुंध फायरिंग की जिस में की 11 लोग मारे गए।

३) Multiple Targets
तीसरी समानता यह है कि आतंकियों ने एक ही शहर मे हमला करने के लिए एक से ज्यादा ठिकाने चुने।फ्रांस में आतंकियों ने 6 अलग-अलग ठिकानों पर हमला किया जबकि मुंबई में  भी आतंकियों ने ७ ठिकानो पर हमला किया था।

४) Fidayeens
चौथी समानता यह है कि पेरिस और मुंबई दोनों ही शहर के हमलो में शामिल आतंकवादी फिदाइन थे यानी कि वो मरने के लिए तैयार होकर ही आए थे। अजमल कसाब ने जो अपना बयान दिया था उसमे उसने बताया था कि उन्हें उनके  handler ने निर्देश दिए थे कि जब तक मारे ना जाओ तब तक मारते रहो, लड़ते रहो।

५) Hostages
पांचवी  समानता।दोनों ही हमलो में आतंकियों ने कई लोगों को बंधक बना लिया था और उन्हें चुन-चुन कर मारा गया जैसे कि Trident होटल में घुसे दो आतंकियों ने तमाम लोगों को बंधक बनाया था।   उन्हें एक कतार में खड़ा किया गया और फिर चुन-चुन कर उन्हें गोली मार दी गई।

६) Sophisticated Weapons
मुंबई और पैरिस के हमलो के बीच छठवीं समानता यह है कि दोनों हमलो में एक ही जैसे हथियारों का इस्तेमाल हुआ।मुंबई में भी आतंकी अपने साथ AK-47 जैसे हथियार लेकर आए थे और पेरिस में भी  AK 47  का इस्तेमाल हुआ जिससे की मिनटों में तमाम लोगों को ढेर किया जा सकता है।

७) Number of attackers
दोनों शहर में हुए हमलो के बीच सातवीं समानता यह है कि दोनों ही हमलो में आतंकियों की संख्या लगभग बराबर ही रही। जब मुंबई में हमला हुआ था तो पाकिस्तान से 10 आतंकी यहां पर आए थे और पेरिस के हमले में भी आठ आतंकी शामिल हुए।

कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि पेरिस में हुआ आतंकी हमला उतना ही बड़ा था जितना कि 26 नवंबर 2008 को मुंबई में हुआ हमला। दोनों ही हमने अपने अपने देशों के सबसे बड़े आतंकी हमले थे पर इतिहास में काली स्याही से दर्ज किए जाएंगे।

Saturday, 7 November 2015

सफरनामा: बाली, इंडोनेशिया (Travelogue-Bali, Indonesia)


बीते हफ्ते इंडोनेशिया के बाली में हुई माफिया छोटा राजन की गिरफ्तारी के सिलसिले में बाली जाना हुआ। एक क्राईम रिपोर्टर की नजर से बाली में छोटा राजन से जुडा एक ब्लॉग मैं पहले ही लिख चुका हूं। छोटा राजन के पकडे जाने के बाद कुछ दिनों तक बाली का जिक्र भारतीय मीडिया में होता रहा, लेकिन इंडोनेशिया का ये प्रांत एक बेहद खूबसूरत पर्यटन स्थल भी है जो दुनियाभर से पर्यटकों को अपनी ओर खींचता है। मेरा ये ब्लॉग एक घुम्मकड की नजर से है और उन लोगों के लिये है जो भविष्य में बाली घूमने की हसरत रखते हैं।

बाली में दाखिल होते वक्त...
अगर बाली में लैंड करते वक्त आप विमान की खिडकी वाली सीट पर बैठे हैं तो समझिये कि आप खुशनसीब हैं। बाली के नुआरा राय एयरपोर्ट का रनवे बिलकुल समुद्र से सटा हुआ है और जैसे जैसे विमान नीचे उतरता है आप को लगेगा कि विमान पानी पर लैंड करने जा रहा है। मुझे और बाकी के सहयात्रियों को ये बेहद रोमांचक अनुभव लगा। हवाई अड्डा ज्यादा बडा नहीं हैं। विमान से उतरने के चंद पलों बाद ही आप इमीग्रेशन की कतार में खडे हो जाते हैं। भारतियों के लिये बाली में आना उतना ही आसान है जितना भारत के किसी एक शहर से दूसरे शहर में पहुंचना। बाली में भारतियों के लिये पहले से वीजा लेने की जरूरत नहीं है और न ही वीजा के लिये एक पैसा देना पडता है। इमीग्रेशन पर 30 दिनों का टूरिस्ट वीजा का ठप्पा लगवाइये और बेधडक आगे बढ जाईये। यहां एक तख्ती जरूर आपको दिखाई देगी कि गलत वीजा पर बाली में दाखिल होने वालों को 5 साल तक की कैद होगी।

शहर के भीतर...
जब आप कार में बैठकर एयरपोर्ट से शहर में दाखिल होते हैं तो आपको पहली नजर में शायद ये लगेगा ही नहीं कि आप किसी दूसरे देश में आये हैं। कभी आप महसूस करेंगे कि आप दक्षिण भारत के किसी शहर में हैं तो कहीं आपको बाली गोवा के जैसा लगेगा...लेकिन थोडा गौर से देखने पर फर्क मालूम पडने लग जाता है। सडक पर वाहनों की आवाजाही बेहद अनुशासित है। यहां भी भारत की तरह सडक की बायीं ओर से वाहन चलते हैं। सडकें भीडभरी न होने पर भी शहर के भीतर कोई भी वाहन 30 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से ज्यादा नहीं चलाता। ।भारत की तरह यहां भी कई दुपहिया वाहन चालक आपको ट्रैफिक नियम तोडते दिख जायेंगे। यहां भी दुपहिये पर सवार दोनों लोगों को हेलमेट पहनना जरूरी है और इस नियम पर सख्ती से अमल होता है। सिटी बसें सडक पर बिलकुल नजर नहीं आयेंगी और न ही यहां लोकल ट्रेनें और मेट्रो रेल चलतीं हैं। हर किसी के पास खुद की गाडी है। बुझी हुई सिगरेट के टुकडों के अलावा यहां सडकों पर और किसी तरह की गंदगी नहीं दिखाई देगी। हमारे देश के चौक चौबारों पर नेताओं और राजनेताओं की प्रतिमाएं लगीं दिखतीं हैं लेकिन बाली के चौराहों पर आपको रामायाण, महाभारत और पौराणिक पात्रों जैसे कृष्ण, अर्जुन, गरूड की प्रतिमाएं जगह जगह दिखाई देंगीं। कई इमारतों के दरवाजे भी आपको भारतीय शैली में बनाए दिखाई देंगे।

नकद नारायण।
अगर मैं ये कहूं कि मैने बाली में पानी की एक बोतल 5 हजार रूपये में खरीदी तो शायद आपको लगेगा कि मुझे ठग लिया गया। दरअसल इंडोनिेशिया की करंसी का नाम भी भारत की तरह ही “रूपया” है लेकिन इस रूपये का मूल्य भारतीय रूपये की तुलना में काफी कम है। एक अमेरीकी डॉलर में आपको 13100 इंडोनिशियाई रूपये से लेकर 13600 इंडोनेशियाई रूपये तक मिल सकते हैं। मेरी सलाह है कि बाली में उतरने पर एयरपोर्ट पर करंसी एक्सचेंज कराने के बजाय शहर के भीतर करंसी एक्सचेंज कराएं जहां आपको डॉलर का ज्यादा मूल्य मिलेगा। इंडोनेशियाई करंसी की इस हालत के मद्देनजर आपको हर चीज यहां हजार या लाख में खरीदनी पडेगी। मसलन अगर आपने इंडोनेशियाई करंसी में अगर 1 लाख रूपये का खाना खाया है तो इसका मतलब आपने 7 या 8 अमेरीकी डॉलर खर्च किये हैं। वैसे एक पर्यटन के ठिकाने के तौर पर बाली तुलनात्मक रूप से काफी सस्ता है बस खर्च करते वक्त “हजार” और “लाख” जैसे शब्दों को ज्यादा गंभीरता से मत लीजिये।

जुबान और शाहरूख खान।
“तुम पास आये...यूं मुसकुराए...तुम ने न जाने क्या सपने दिखाये...”- फिल्म “कुछ कुछ होता है” का ये गीत बाली में बेहद लोकप्रिय है। ये बात हमें तब पता चली जब कार में सफर करते वक्त मेरे सहकर्मी गणेश ठाकुर ने अपने मोबाईल पर ये गाना लगाया तो हमारा स्थानीय ड्राईवर गदेय भी साथ गुनगुनाने लगा। हमें ये देखकर बडा ताज्जुब हुआ। उसने हमें बताया कि शाहरूख का ये गाना बाली में बेहद लोकप्रिय है और लोग मतलब न जानते हुए भी इसकी प्यारी धुन की वजह से इसको गुनगुनाते हैं। उसकी इस बात की पृष्टि कई और बालीवासियों ने भी की। बाली के लोग शाहरूख खान को काफी पसंद करते हैं। वैसे बाली में भाषा एक छोटी सी समस्या है। ज्यादातर लोगों को अंग्रेजी समझ नहीं आती और जिनको आती है उनको टूटीफूटी ही आती है। बेहतर होगा कि बाली पहुंचने से पहले थोडे-बहुत बाली के शब्द सीखकर जायें। वैसे ज्यादा घबराने की बात नहीं है कामचलाऊ अंग्रेजी हर कोई समझ ही लेता है।

धरम-करम।
इंडोनेशिया एक मुसलिम देश है, लेकिन बाली उसका एक हिंदू बहुल प्रांत है। यहां 83 फीसदी हिंदू हैं और बाकी लोगों में मुसलिम, इसाई और बौद्ध धर्म को मानने वाले लोग हैं। इनके बीच किसी भी तरह की सांप्रदायिक कटुता बाली में नजर नहीं आती है। जगह जगह पर हिंदू मंदिर और धर्म के प्रतीक दिखाई देंगे। बाली के हिंदू बडे धार्मिक हैं और आमतौर पर दिन में तीन बार पूजा करते हैं। सुबह सुबह घरों-दुकानों के बाहर फूलों से सजी थाली लेकर लोग पूजा करते नजर आयेंगे। अक्सर कार ड्राईवर छोटी सी एक पूजा की थाली अपने कार के डैश बोर्ड पर भी रख लेते हैं, जहां हम भगवान की मूर्ति लगाते हैं। उस थाली से चावल की एक अलग तरह की महक पूरी कार में फैल जाती है। आपको ये महक पसंद भी आ सकती है और कई लोग इससे परेशान भी हो सकते हैं। आमतौर पर लोगों को देवी देवताओं से जुडे संस्कृत के मंत्र कंठस्थ हैं। हमारे ड्राईवर ने हमें गायत्री मंत्र से लेकर शिव स्तोत्र तक पढकर सुनाया। शुक्रवार के दिन यहां भी नमाज के लिये कई सडकें बंद कर दी जातीं हैं।

गुनाह और पुलिस।
बाली एक शांतिपूर्ण जगह है और यहां अपराध लगभग न के बराबर हैं। ज्यादातर अपराधी जो पकडे जाते हैं वो ड्रग्स के गुनाहों से जुडे होते हैं। पर्यटकों के साथ लूटपाट, ठगी वगैरह जैसी वारदातें यहां नहीं होतीं। एक वक्त था जब बाली पुरूष वेश्यावृत्ति यानी जिगैलो के लिये जाना जाता था, जिनकी ज्यादातर ग्राहक ऑस्ट्रेलिया और यूरोप से अकेले आने वाली महिलाएं होतीं थीं। मसाज की आड में वेश्यावृत्ति यहां भी होती है। होटल से शाम को बाहर निकलते वक्त हल्की आवाज में “गुड मसाज?” “गुड गर्ल?” बुदबुदाते हुए दल्ले आपके पीछे लग जायेंगे...लेकिन एक बार आपने आवाज कडक करके मना कर दिया तो आपको तंग नहीं करेंगे।
बाली में जगह जगह पर पुलिस की मौजूदगी है। ज्यादातर पुलिसकर्मी मिलनसार हैं। आम पुलिसकर्मी को आप हथियारों या फिर लाठी के साथ भी नहीं देखेंगे।
भले ही वैसे अपराध के मामले में बाली सुरक्षित हो, लेकिन आतंकवाद यहां भी अपना रंग दिखा चुका है। साल 2002 में यहां के 2 नाईट क्लबों में इमाम समुद्र नाम के आतंकी ने बम धमाके किये थे, जिनमें पश्चिमी देशों से आये 100 से ज्यादा पर्यटक मारे गये। साल 2005 में भी जिंबारन और कुटा बीच पर बम धमाके हुए थे जिनमें कई लोगों की मौत हो गई। आतंकवाद का शिकार होने के बावजूद आज भी बाली में सुरक्षा व्यवस्था भारत जैसी नजर नहीं आती और ये एक चिंता की बात है।(कहने का मतलब ये भी नहीं कि भारत में आतंकवाद से निपटने के संतोषजनक इंतजाम हैं)

खानपान।
बाली की सबसे लोकप्रिय डिश है नासी गोरेंग (Nasi Goreng) । ये डिश हलके फ्राई किये हुए चावल के साथ तैयार की जाती है और इसे चिकन, अंडा, मछली, केकडा, गोश्त या सब्जी के साथ पेश किया जाता है। नासी गोरेंग को इंडोनेशिया की राष्ट्रीय डिश माना जाता है। जिस तरह से भारत में शाम के वक्त जगह जगह चाट वगैरह के ठेले खुल जाते हैं उसी तरह से यहां शाम को सी फूड से बनाई गई चाट बेची जाती है। वैसे बाली के लोग तले हुए खाने के बजाय उबाला गया खाना ज्यादा पसंद करते हैं और यहां की कई स्थानीय डिश भारतियों को स्वादहीन या खराब लगें।
यहां पर कई भारतीय रेस्तरां भी हैं जैसे गणेश, सितारा, क्वींस ऑफ इंडिया वगैरह जहां भारतीय शैफ खाना तैयार करते हैं। ये रेस्तरां भारतियों के अलावा यूरोपियन पर्यटकों में भी खासे लोकप्रिय हैं।
 
नासी गोरेंग- इंडोनेशिया की राष्ट्रीय डिश।
बिंतांग और बाली हाई यहां की सबसे लोकप्रिय बियर हैं और इनकी यहां वही हैसीयत है जो भारत में किंगफिशर की। यहां की एक विशेष प्रकार की कॉफी भी दुनियाभर में मशहूर है और जो काफी महंगी आती है। उसे लुवाक कॉफी कहते हैं और ये बिल्ली जैसे एक जानवर के मल से बनाई जाती है। (हमने नहीं पी)

सैर सपाटा
बाली की सबसे बडी खासीयत यहां के खूबसूरत और साफसुथरे बीच हैं। लगभग सभी बीचों पर वॉटर स्पोरट्स का इंतजाम है जैसे स्कूबा डाईविंग, अंडर सी वॉक, पैराग्लाईडिंग, जेट स्की वगैरह। दक्षिण बाली का नूसा दुआ बीच खास इसी के लिये जाना जाता है। कुटा बीच पर शाम के वक्त सैकडों लोग सूर्यास्त देखने के लिये जुटते हैं। जिंबारन बीच नाईट लाईफ के लिये जाना जाता है। सानूर बीच शहर से सटा हुआ है जहां स्थानीय पर्यटक ज्यादा दिखाई देते हैं।

अक्टूबर में यहां का अधिकतम तापमान 30-35 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है। नवंबर के आखिर तक बारिश का मौसम शुरू होता है, लेकिन वैसी बारिश नहीं होती जैसी कि हम मुंबई में देखते हैं।
बाली के देनपसार से करीब घंटेभर की दूरी पर उबुद नाम की जगह है। यहां का वानर वन (मंकी फोरेस्ट) काफी मशहूर है जिसमें कई प्रजातियों के बंदर देखने मिलते हैं। ऊबुद थोडा ऊंचाई पर है और यहां मौसम ठंडा रहता है। खरीददारी, अध्यात्म, योगा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिये भी उबुद जाना जाता है।
हवाई अड्डे के करीब कृष्णा नाम का एक मार्केट है जहां बाली के कपडे, खिलौने और स्म़ृति चिन्ह पर्यटकों को ठीकठाक दामों पर मिल जाते हैं। लोग बाली से वापस लौटते वक्त अक्सर यहां खरीददारी करने के लिये कुछ देर रूकते हैं।

आम लोग।
बाली के ज्यादातर लोग शांतिप्रिय और भोले भाले हैं, पर्यटकों का सम्मान करते हैं और किसी तरह के विवाद से बचते हैं। ये भारतियों को काफी पसंद करते हैं और उन्हें अपने से ऊंचा समझते हैं क्योंकि इन्हें लगता है कि भारतीय उनके आराध्य भगवानों के देश से आये हैं।

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