क्या मालूम भाय कब किसका निशाना चूक जावे? ––---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- आज एक सज्जन से प्रेस कब के बाहर मुलाकात हुई जिन्होंने बताया कि उनका भतीजा सरवर शेख मेरे साथ स्टार न्यूज़ में बतौर कैमरामैन काम कर चुका है। सरवर शेख इस नाम ने मुझे करीब 25 साल के एक ऐसे युवक की याद दिला दी जो था तो लंबा चौड़ा और हट्टा कट्टा लेकिन काफी दब्बू किस्म का। उसने थोड़े दिन ही बतौर कैमरामैन काम किया लेकिन उसके साथ के अनुभव यादगार रहे। मुझे याद है वो 2004 में स्टार न्यूज़ में बतौर कैमरामैन लगा था। न्यूज़ चैनल में लगने से पहले वो एंटरटेनमेंट चैनल्स के लिए फ्रीलांस कैमरामैन का काम करता था। उसके साथ की गई पहली स्टोरी मैं कभी नही भूल सकता। जब हम गाड़ी में महालक्ष्मी के दफ्तर से निकले तो सरवर काफी खुशमिजाज मूड में था। सरवर को इस बात की खुशी थी कि उसे मेरे साथ स्टोरी पर जाने का मौका मिल रहा है। तब तक मेरे साथ सिर्फ चैनल के वरिष्ठ कैमरामैन ही भेजे जाते थे। रास्ते भर वो हंसते हंसाते, जोक सुनाते आया...लेकिन जब हमार...
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J.Dey Murder Verdict: Testimonies of this blogger & other journos..
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Here are excerpts from the order of Special MCOCA Court judge S.Adkar dated 02/05/2018 wherin the testimonies of Jitendra Dixit & other journalists have been considered for convicting underworld don Chota Rajan. _______________________________________________________________ 485. The analysis of the evidence of PW.76 Jitendra Dixit shows that at the relevant time, he was holding a senior position in the 'Star News' channel. This fact was not disputed by the defence in crossexamination. It has come in his evidence that wherever possible the information received by him from the Police used to be verified before it was aired. This shows that he was a responsib...
देवरानी-जेठानी की खटपट में लटक गया याकूब !
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किसी संयुक्त परिवार में अगर देवरानी जेठानी एक साथ रह रहीं हैं तो उनके बीच झगडा और मनमुटाव होना आम बात है। वे अक्सर अपने अपने पतियों से एक दूसरे की शिकायत करतीं हैं और कान भरतीं हैं...लेकिन देवरानी-जेठानी के बीच घर में अक्सर होने वाली ये छोटी मोटी खटपट किसी को फांसीं के फंदे तक भी पहुंचा सकती है, ये कहानी आपने आज तक नहीं सुनी होगी। 12 मार्च 1993 को हुए मुंबई बम धमाकों से पहले मुंबई के माहिम इलाके की अल हुसैनी इमारत में टाईगर मेमन अपने याकूब समेत अपने बाकी छोटे भाईयों और माता पिता के साथ एक ही घर में रहता था। जानकारी के मुताबिक टाईगर मेमन की पत्नी शबाना और याकूब मेमन की पत्नी राहीन में नहीं जमती थी और अक्सर उनमें खटपट होती रहती थी। मुंबई बमकांड की साजिश के तहत टाईगर मेमन ने याकूब मेमन समेत परिवार के सारे सदस्यों को भारत से भगा दिया।सभी लोग पहले दुबई गये, फिर सऊदी और उसके बाद पाकिस्तान। बताते हैं कि इस दौरान भी देवरानी-जेठानी के बीच कलह होती रहती थी। याकूब की पत्नी आये दिन टाईगर और उसकी पत्नी के बारे में याकूब से शिकायत करती रहती – “ तुम्हारे भाई के चक्कर में हमें ये दिन देखना ...
न्यूज चैनलों की बदलती भाषा और विषय चयन !
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(हाल ही में मुंबई के मशहूर के.सी.कॉलेज की ओर से आयोजित किये गये एक परिसंवाद में मीडिया के बदलते स्वरूप पर बोलने का मौका मिला। पेश है परिसंवाद में व्यक्त किये गये विचार- मीडिया की भाषा और विषय चयन पर बोलने से पहले मैं एक मूलभूत बात स्पष्ट करना चाहूंगा कि भारत में जब दूरदर्शन और आकाशवाणी का एकाधिकार था तब देश के नागरिकों को संबोधित किया जाता था , उनके मद्देनजर सामग्री तय की जाती थी। नागरिक इस शब्द पर गौर कीजिये। नागरिक की जगह आज उपभोक्ता ने ले ली है। निजी न्यूज चैनलों की सामग्री बाजार के नियमों पर आधारित होती है। क्या दिखाना है , कितना दिखाना है , कैसे दिखाना है ये सबकुछ एक बाजार को ध्यान में रखकर तय किया जाता है। पत्रकारिता को बाजारीय समीकरणों से प्रभावित होना चाहिये या नही , ये बहस का अलग विषय है...लेकिन वस्तुस्थिति यही है कि चाहे समाचार चैनल हों , खेल के चैनल हों या मनोरंजन चैनल हों सभी पर बाजार का प्रभाव है। अब पहले बात करते हैं चैनलों के विषय चयन की। जैसा कि मैने अभी कहा कि कौनसे विषय़ पर सामग्री दिखानी है ये बाजार तय करता है तो आप पूछेंगे कि टेलिविजन चैनलों का बाजार क्या...
एक महीने बाद : नोटबंदी, नरेंद्र मोदी और नजरिया।
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बात 2007 की है। गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजे आ गये थे। बीजेपी फिर एक बार भारी बहुमत से जीती थी। नरेंद्र मोदी नतीजे वाली शाम जीत के बाद चुनाव क्षेत्र मणिनगर में अपनी पहली जनसभा संबोधित करने जा रहे थे। मंच के ठीक सामने की ओर अपना कैमरा लगाकर मैं कवरेज कर रहा था। स्थानीय नेताओं के भाषणों के बाद मोदी जैसे ही माईक के सामने बोलने के लिये खडे हुए वहां मौजूद भीड बडी देर तक तालियां बजाती रही और मोदी की वाहवाही के नारे लगाती रही। चंद मिनटों बाद ये शोर थम गया। सभा में मौजूद लोग शांत हो गये कि अब मोदी को सुनते हैं...लेकिन मोदी कुछ नहीं बोले...करीब 30-40 सेकंड तक मौन रहे और अपने सामने मौजूद भीड को निहारते रहे।...फिर उन्होने पहली लाईन कही – “ ये मेरे मौन की विजय है ” । सभास्थल फिर एक बार तालियों की गडगडाहट और नारों से गूंज उठा। मोदी की इस अदा ने उस वक्त मुझे भी उनका प्रशंसक बना दिया। उस चुनाव के दौरान जो कुछ भी हुआ था उसे जानकर मोदी का ये कहना कि “ ये मेरे मौन की विजय है ” के मायने मैं समझ रहा था। ये वाकई में मोदी के मौन की विजय ही थी। मोदी उस वक्त कईयों के निशाने पर थे। कांग्रेस अध...
हमारा सिर बचाने के लिये अपना सिर गंवाती पुलिस !
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पुलिस क्या है ? समाज के बीच से समाज की सुरक्षा के लिये चुने गये चंद लोगों की एक संस्था। किसी पुलिसकर्मी की हत्या, समाज की आत्मा पर आघात है। आज पुलिसकर्मी हमारे कश्मीर को भारत से जोडे रखने के संघर्ष में भी मारा जा रहा है और मुंबई में ट्राफिक नियमों पर अमल करवाने के लिये भी। दोनो मामलों में मैं समानताएं देखता हूं। भारत माता की तस्वीर में जहां माता का सिर दिखता है नक्शे में उस जगह पृष्ठभूमि में कश्मीर होता है। मुंबई में जिन पुलिसकर्मी विलास शिंदे की हत्या हुई वो हेलमेट पहनने वाले नियम पर अमल करवा रहे थे। हेलमेट पहनने का वो नियम जो वाहन चालक की सिर की सलामती के लिये बनाया गया था। लोग हेलमेट पहनकर दुपहिया चलायें तो उनका सिर सलामत रहे। दोनो मामलों की तुलना का उद्देश्य इतना ही है कि आज पुलिस कहीं देश के शरीर का सिर बचाने के लिये जान दे रही है तो कहीं नागरिकों का सिर बचाने के लिये अपना सिर फोडवा रही है। दुखद है कि हम मौजूदा हो हल्ले के चंद दिनों बाद विलास शिंदे जैसे शहीदों को भूल जायेंगे और उनका नाम भी सिर्फ ड्यूटी पर मारे गये पुलिसकर्मियों के आंकडे में सिमट कर रह जायेगा, जैसा कि कश्मीर म...
मुंबई पुलिस के इतिहास का वो काला अगस्त !
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बबन जाधव के साथ स्वतंत्र भारत की मुंबई पुलिस के इतिहास में 2 काले अगस्त आये हैं। 11 अगस्त 2012 को मुंबई के आजाद मैदान के बाहर जो कुछ भी हुआ उसकी यादें अभी भी ताजा हैं। उस दोपहर पुलिसकर्मियों पर हमला किया गया, कईयों को दंगाईयों ने पीटपीट कर अधमरा कर दिया, पुलिस के वाहन जलाये गये और महिला पुलिसकर्मियों की इज्जत पर हाथ डालने की कोशिश हुई...वाकई पुलिस के लिये बेहद शर्मिंदगी का दिन था ! ....लेकिन अबसे 34 साल पहले भी 1982 में अगस्त के महीने में ही एक ऐसा वक्त आया था जब मुंबई पुलिस बहुत बुरे दौर से गुजरी। उस दौरान मुंबई पुलिस के कर्मचारियों के एक वर्ग ने बगावत का ऐलान कर दिया था। 11 अगस्त 2012 को आजाद मैदान के बाहर जो कुछ हुआ उसे तो मैने खुद देखा, लेकिन 19 अगस्त 1982 को जो कुछ हुआ उसकी कहानी सुनाई मुझे बबन जाधव ने। बबन जाधव अब उन गिनेचुने जिंदा बचे पुलिसकर्मियों में रह गये हैं जो उस पुलिस बगावत में शामिल हुए थे। बबन जाधव से मेरी दोस्ती साल 2003 में हुई थी जब बैन लगने के बाद पकडे गये सिमी के सदस्यों को कुर्ला कोर्ट में पेश किया जा रहा था और तब जाधव कोर्ट की सुरक्षा के प्रभारी थे। ...