Saturday, 4 June 2011

मुंबई के रिपोर्टर का मानसून (कविता)

आई आई आई जमकर बरसात,
छाता, रेनकोट अब ले लो साथ,
बूम माईक को टोपी पहनाओ
पाकिट, मोबाइल पर प्लास्टिक चढवाओ
पानी भरने कि खबर जो आये,
ट्रेन, सडक जब बंद हो जाये
निकल कर औफिस से सरपट भागो
हिंदमाता, परेल पर ओबी मांगो
कुर्ला, सायन भी छूट न जाये
मिलन सबवे को भी दिखलायें
भीग भीग कर करो रिपोर्टिंग
काले बादलों से हो गई है सेटिंग
स्टोरी आईडिया देने का टेंशन नहीं आये
जब बादल रिमझिम कृपा बरसाये
खाओ गर्मागरम वडापाव, भजिया प्लेट
संभल कर रहना गडबड न हो पेट
भीगने में आता है खूब मजा
तबियत को मिल जाती है खराब होने की वजह
जब सर्दी, खांसी, सिरदर्द सताये
विक्स, बाम और ब्रांडी काम आये
यहां गिरी बिजली, वहां उखडा पेड
लगातार चेक करते रहो फायर ब्रिगेड
अगर बडी कोई बिल्डिंग गिर जाये
दिन और रात एक हो जाये
मीठी नदी बडी है कडवी
नजर रहे उसकी सरहद भी
लाईव चैट और वाक थ्रू गिरवाओ
वक्त मिले तो पैकेज कटवाओ
बीएमसी, सरकार को बचने न देना
2005 की 26 जुलाई याद कर लेना
वीकेंड पर पिकनिक को जाना
झरनो में फिर खूब नहाना
भीगा भागा सा है न्यूज रूम
सभी रिपोर्टरों को हैप्पी मानसून
-महाकवि जीतेंद्र दीक्षित J

8 comments:

shrikishore said...

wah jeetu bahut khub. rasrkavi ramdharisingh dinkar ke jaane ke baad rastrkavi ki jagah khaaali thi,tumhari pratibha dekhne ke baad lagta hai wo khali jagah bhar gai hai.....

RITESH KUMAR SRIVASTAVA said...
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RITESH KUMAR SRIVASTAVA said...
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RITESH KUMAR SRIVASTAVA said...
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RITESH KUMAR SRIVASTAVA said...
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RITESH KUMAR SRIVASTAVA said...

इलेक्ट्रानिक मीडिया के महाकवि और मानसूनवादी नई कविता के जनक मान्वयर जितेन्द्र दीक्षित जी को मानसून आगमन पर ढेरो शुभकामनाएं... आप की खिदमत में पेश है मुंबईया मानसून पर एक और मानसूनवादी कविता...

महालक्ष्मी में हुई महाबारिश
परेल में मच गई रेल्लम पेल
दादर में देखो दरिया का खेल
माहिम में रुक गई लोकल रेल
बांद्रा में बदरा के अजब ही रंग
अंधेरी की मौज-मस्ती में भंग
बोरिवली में काले बादल बरसें
मायानगरी में मदिरा छलके
देखो! मानसून में मुंबई के रंग
सीधे सेटेलाइट से D-गैंग के संग

--मासूनवादी कवि 'रितेश श्रीवास्तव'

Sandeep Singh said...

वड़ा-पाव और भजिया की याद ताजा कर दी आपने...झमाझम बारिश में इन सबका मजा बयां नहीं किया जा सकता...इसे तो सिर्फ खाने वाला ही समझ सकता है। मुंबई छोड़ने का अफसोस हमेशा रहता है जब भी वड़ा पाव की याद आती है औऱ दूसरे आपसे मुंबई ऑफिस के बाहर...main entrance में की हुई कुछ बातें...
prerna

Sandeep Singh said...

वीकेंड पर पिकनिक को जाना
झरनो में फिर खूब नहाना
भीगा भागा सा है न्यूज रूम
सभी रिपोर्टरों को हैप्पी मानसून
..................

सर जी ये वो बंद जो जीतेंद्र दीक्षित को 'जीतू सर' बनाता है। काम से समझौता किए बिना आप जैसे लोग ही इस विधा से जुड़े लोगों के होठों पर स्मित ला सकते हैं।

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