Thursday, 29 May 2014

स्मृति ईरानी, विपक्ष और मीडिया...



इससे पहले कि ये मामला और ज्यादा तूल पकडे और अदालती चक्कर में फंसे मेरा मानना है कि स्मृति ईरानी को तुरंत मंत्रीपद से इस्तीफा दे देना चाहिये। इस्तीफा इसलिये नहीं देना चाहिये कि वो मानव संसाधन विकास मंत्री होने के काबिल नहीं हैं या ज्यादा पढी लिखी नहीं हैं, बल्कि उनका इस्तीफा नैतिकता की मांग है। जिस कांग्रेस की वो घोटालों और गडबडियों को लेकर अपनी सभाओं में आक्रमक तरीके से खिंचाई करतीं आईं है, वैसे ही मामले में अब वो खुद फंसती दिख रहीं हैं। ये मामला सियासी आरोप-प्रत्यारोप से उठकर है। इसने न केवल ईरानी के आचरण पर सवाल खडा किया है, बल्कि विपक्ष और मीडिया पर भी।

स्मृति ईरानी ने बतौर सांसद चुने जाते वक्त अपनी शिक्षा के बारे में गलत जानकारी दी, ये विवाद तब उठा जब मानव संसाधन विकास मंत्री के तौर पर उनके नाम का ऐलान हुआ। 2004 में उन्होने अपने हलफनामें में बताया कि वे बी.ए.पास है। इसके बाद के एफीडेविट में उन्होने बताया कि वे सिर्फ बी.कॉम प्रथम वर्ष तक पढी हैं। ये स्पष्ट नहीं है कि इसमें कौनसी जानकारी सही है, लेकिन इतना साफ है कि दोनो में से एक जानकारी गलत है। एक सांसद पद के लिये बतौर उम्मीदवार खडे शख्स से इस तरह की जानकारी हलफनामें में देना बिलकुल अस्वीकार्य है। न केवल ये अनौतिक है, दुराचार है बल्कि गैरकानूनी भी है। यहां मीडिया और विपक्ष के लिये सवाल ये है कि स्मृति ईरानी की ओर से दी गई अपनी शिक्षा संबंधी जानकारी में गडबडी पर उनकी पहले नजर क्यों नहीं पडी ? ईरानी एक हाई प्रोफाईल संसदीय सीट अमेठी से एक हाई प्रोफाइल नेता राहुल गांधी के खिलाफ उम्मीदवार थीं।चुनाव के दौरान दोनो उम्मीदवारों की छोटी सी छोटी हरकत पर भी बारीकी से नजर थी, फिर इतनी बडी बात छूट कैसे गई? बतौर एक पत्रकार मुझे ये मानने में गुरेज नहीं है कि मीडिया से चूक हुई है। वैसे इस जानकारी का खुलासा 2011 में ही हो जाना चाहिये था जब ईरानी ने राज्यसभा चुनाव के लिये पर्चा भरा था। उस वक्त ईरानी से सवाल होना चाहिये था- मैडम 2004 में आप खुद को बी.ए.पास बता रहीं थीं अब सिर्फ बारहवीं पास कैसे हो गईं ? ये सवाल ईरानी से न तब पूछा गया और न 2014 का लोकसभा चुनाव लडते वक्त।

वैसे अब विपक्ष और खासकर कांग्रेस को इस मुद्दे पर ईरानी को घेरने का नैतिक अधिकार नहीं है। महाराष्ट्र में 2 ऐसे मामले हैं जहां खुद कांग्रेस के 2 नेताओं ने अपनी पढाई-लिखाई से जुडी गलत जानकारी दर्ज करवाई थी, जिनका खुलासा खुद मैने अपनी रिपोर्टस में किया था। एक हैं महाराष्ट्र के पूर्व गृहराज्यमंत्री कृपाशंकर सिंह और दूसरे अल्पसंख्यक विकास मंत्रालय के कैबिनेट मंत्री आरिफ नसीम खान। कांग्रेस पार्टी ने इनकी गडबडी का खुलासा होने पर भी इनके खिलाफ कुछ नहीं किया। ऐसे में स्मृति ईरानी के मामले में विपक्ष से ज्यादा की उम्मीद नहीं का जा सकती।


संसद में विपक्ष अब सिर्फ नाम भर के लिये रह गया है। ऐसे में मीडिया की जिम्मेदारी और बढ जाती है इस बात पर नजर रखने के लिये कि सरकार मनमानी न करे और लोगों के अधिकारों पर अतिक्रमण न करे। प्रधानमंत्री मोदी अगर अपनी नवनर्मित सरकार की छवि को साफ रखना चाहते हैं तो उन्हें खुद ही ईरानी को सलाह देनी चाहिये कि वे पद से हट जायें। वैसे मेरा मानना है कि बीजेपी के पास कई और काबिल लोग हैं जो इस पद को संभाल सकते हैं। स्मृति ईरानी के मंत्री बनने से वे हैरान भी हैं और शायद ठगे हुए भी महसूस कर रहे हैं।

3 comments:

Anil Galgali said...

जितेंद्र जी काफी सटीक और बेहतरीन लेख है। अब सत्वपरीक्षा है इनामदार और न्यायप्रिय नरेंद्र मोदी की। क्या वे इस मंत्री को अपनी स्मृतिओ से निकाल देते है या उसी सामंतवादी परंपरा के तहत बरकरार रखते है।

Suyash said...

I don't read Hindi much but love to read your columns specifically. And I must say that this one is a perfect column on the topic!

Anonymous said...

अगर मोदी सच में दिशा और दशा बदलना चाहते है तो स्मृति से इस्तीफा मांग लेना चाहिए नेतिकता के आधार पर वरना तो राजनीती में यह पहली बार नहीं हुआ है । और रही मीडिया की बात तो अब भी देर नहीं हुई है।

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