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गोविंदा गेला रे गेला...

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बीते 12 साल से मैं जन्माष्मी के मौके पर ठाणे के पांच पखाडी इलाके से अपने चैनल पर लाईव देते वक्त देशवासियों का इस त्यौहार से परिचय कुछ इस तरह से कराता था – “ मुंबई का गोविंदा साहस और संस्कृति का प्रतीक है। ये त्यौहार कई तरह के संदेश देता है। ये टीम वर्क सिखाता है। ये सिखाता है कि ऊंचे लक्ष्य तक पहुचने के लिये जोखिम भी उठाना पडता है। ये सिखाता है कि कई बार मंजिल तक पहुंचने के लिये गिरने-पडने के बाद भी कोशिश करनी पडती है। त्यौहार से ये भी संदेश मिलता है कि आधार अगर मजबूत है तो मिनार देर तक टिकती है, नहीं तो लडखडा जाती है। ” । इस साल भी शायद यही लाईनें कैमरे पर दोहराता, लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब गोविंदा का त्यौहार वैसा नहीं रहने वाला जैसा सालों से मनाया जाता रहा है। बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश से मैं आंशिक रूप से खुश भी हूं और दुखी भी। खुश इसलिये कि हाईकोर्ट ने नाबालिग बच्चों के इस त्यौहार में शिरकत करने पर रोक लगा दी है। मैं खुद भी यही चाहता था। दुखी इस बात से हूं कि अब इस त्यौहार की जान ही निकल गई है। अदालत का आदेश है कि मटकी लटकाने की ऊंचाई 20 फुट से ज्यादा न हो। इ...

बचपन चाचा चौधरी के साथ।

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मैने कॉमिक्सें पढनी अबसे करीब 20 साल पहले छोड दी थीं लेकिन बचपन के उन 7-8 साल की यादें जब मैं कॉमिक्सें पढता था आज भी ताजा हैं। वो दौर नब्बे के दशक का था जब मैं कॉमिक्सों और बाल पत्रिकाओं का आदी हो गया था। चंपक, टिंकल, लोटपोट, पराग और बालहंस मेरी पसंदीदा बाल पत्रिकाएं थीं। इनके अलावा चाचा चौधरी, महाबलि शाका, नागराज, राजन-इकबाल और मोटी-पतलू के कॉमिक्सों को पढने में काफी दिलचस्पी थी। दिलचस्पी इतनी ज्यादा कि अक्सर घर पर बडों से डांट खानी पडती थी कि लडके का पढाई-लिखाई में मन नहीं लग रहा है, स्कूली किताबों के बजाय कॉमिक्सों में ही घुसा रहता है। कॉमिक्सों की ऐसी लत लग गई थी कि मां को एक बार स्कूल में मेरी क्लास टीचर से शिकायत करनी पडी कि इसकी कॉमिक्सों की आदत छूट नहीं रही है, आप ही कुछ कीजिये। सच भी था। स्कूल से लौटने के बाद मेरा ज्यादातर वक्त कॉमिक्सों की कल्पनाभरी दुनिया में ही गुजरता था। घर से स्कूल में खाने पीने के लिये जो भी रूपये-दो रूपये मिलते थे उन्हें बचाकर मैं कॉमिक्सों खरीद लेता था। मेरे पास कॉमिक्सों का भंडार हो गया था। एक वक्त तो ऐसा आया कि मेरे पास 200 से ज्यादा कॉमिक्स इ...

कोई हिंदी सिखा दो भाई...प्रेमचंद वाली !

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हिंदी दिवस में अभी करीब डेढ महीने का वक्त है...आमतौर पर हिंदी को लेकर चिंता जताना और उसके लिये शाब्दिक रोना धोना तब भी होता है...लेकिन इन दिनों केंदीय लोक सेवा आयोग (UPSC) की परीक्षा देने वालों का हिंदी को लेकर आंदोलन चल रहा है। ऐसे में हिंदी पर ये मेरा ब्लॉग शायद पूरी तरह से अप्रासंगिक नहीं हो। मैं भाषाई कट्टरवाद में यकीन नहीं रखता। मेरा मानना है कि भाषा लोगों को जोडने का माध्यम है, न कि उन्हें बांटने का, लेकिन जब मैं उस अखबार में हिंदी (या हिंदुस्तानी ) की दुर्दशा होते हुए देखता हूं जिसने मुझे हिंदी पढना-लिखना सिखाया, हिंदी पत्रकारिता और लेखन में मेरी रूचि जगाई तो दुख होता है। ये अखबार है नवभारत टाईम्स। खुद एक समाचार संस्थान से जुडा होकर किसी दूसरे समाचार संस्थान के कामकाज पर टिप्पणी करना शायद कुछ लोगों को गलत लगे, लेकिन मैं कम से कम इस बहाने ये छूट ले सकता हूं कि नवभारत टाईम्स प्रिंट का अखबार है और मैं टीवी के माध्यम से जुडा हूं। ये ब्लॉग भी नवभारत टाईम्स के एक पाठक के नजरिये से ही लिख रहा हूं न कि एक टीवी पत्रकार की हैसीयत से। मैं अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में पढा और...

विश्वास, अंधविश्वास और पुलिस।

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इस खबर को देखकर हंसी भी आई और दुख भी हुआ कि महाराष्ट्र पुलिस के एक आला अधिकारी ने नरेंद्र दाभोलकर की हत्या की गुत्थी सुलझाने के लिये तंत्र, मंत्र का सहारा लिया, एक तांत्रिक पर भरोसा किया। जो आदमी जिंदगीभर अंधविश्वास के खिलाफ लडा और शायद इसी वजह से मारा गया, उसकी हत्या की जांच ही अंधविश्वास के हवाले हो इससे ज्यादा अपमान और उसका क्या हो सकता है। सुनने में तो ये किसी भद्दे मजाक की तरह ही लगता है। बहरहाल, इस खबर ने मुझे प्रेरित किया लिखने के लिये पुलिस के विश्वास और अंधविश्वास पर। बीते 15 सालों की क्राईम रिपोर्टिंग के दौरान इस बारे में जो कुछ भी देखा...सुना...पेश है... बीजेपी के मौजूदा सांसद और मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर डॉ.सत्यपाल सिंह के मोबाइल फोन पर अगर आप कॉ़ल करेंगे तो कॉलर ट्यून में आपको गायत्री मंत्र सुनाई देगा। पुलिसिया नौकरी के दौरान धर्म के प्रति उनका झुकाव छुपा नहीं था। जिस दौरान वे पुलिस कमिश्नर थे तब एक परिचित महिला पत्रकार ने ट्वीट किया – “ एक पुलिस कमिश्नर का अपनी कॉलर ट्यून के रूप में गायत्री मंत्र रखना शोभा नहीं देता। ये गलत है ” । ट्वीटर पर ही मेरी उनसे छोटी...

चाईनीज फूड और मुंबई

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अबसे 2 दशक पहले तक आम भारतीयों के लिये नूडल्स का मतलब था-मैगी नूडल्स। वो मैगी नूडल्स जिसके विज्ञापन दूरदर्शन पर आते थे और जिसमें दावा किया जाता था कि वो 2 मिनट में तैयार हो जाते हैं। अब दौर है हक्का नूडल्स का, सिजवान नूडल्स का, सिंगापुर नूडल्स का वगैरह वगैरह..। 2 दशक पहले तक चाईनीज फूड (चीनी खाना) मुंबई के सिर्फ धनाढ्य या ऊपरी मध्यम वर्ग के लोगों की पसंद हुआ करता था या ये कहें कि सिर्फ उनकी जेबें ही चाईनीज खाने की इजाजत देतीं थीं। शहर में चाईना गार्डन या फ्लौरा जैसे गिने चुने ही रेस्तरां थे जहां इन वर्गों के लोग चाईनीज फूड का लुत्फ उठाने के लिये जाते थे। 90 के दशक के मध्य में चाईनीज फूड मुंबई के स्टालों पर मिलना शुरू हुआ और धीरे धीरे शहर के खानपान का हिस्सा बन गया। मुंबई में अब शायद ही कोई दक्षिण भारतीय व्यंजन पेश करने वाले उडीपी रेस्तरां हो जिसके मेन्यू में चाईनीज फूड का अलग पन्ना न हो। मंचाऊ सूप, चाऊमीन, ट्रिपल सिजवान, मशरूम मंचूरियन अब घर घर का नाम बन चुके हैं। घर में चाईनीज फूड बनाने के लिये अब शॉपिंग मॉल्स में भी चाईनीज मसालों के अलग सैक्शन खुलने लगे हैं। मुंबई में चाईनी...

केदारनाथ : डर के आगे आस्था है !

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बीते हफ्ते केदारनाथ से लौटा। साढे 11 हजार की ऊंचाई पर इस बात की रिपोर्टिंग करने गया था कि बीते एक साल में वहां क्या क्या बदला है ? क्या मंदिर में फिर से शिवभक्तों का तांता लगने लगा है ? सरकारी इंतजाम क्या हैं ? पुनर्निमाण का काम कितना हुआ है और क्या केदारनाथ में फिर पहले जैसी रौनक लौट सकेगी ? गुप्तकाशी के पास फाटा नामक के कस्बे से मैं सिर्फ 8 मिनट में ही हेलिकॉप्टर के जरिये पहुंच गया। वहां एक रात गुजारने के बाद मैने पैदल ही वापस उतरना तय किया। उतरते वक्त कई तरह के भाव मन में थे- आश्चर्य के, दुख के, गुस्से के, प्रशंसा के और उम्मीद के। डर के आग आस्था है। बीते साल केदारनाथ में जो तबाही मची उसकी दिल दहला देने वाली तस्वीरें पूरी दुनिया ने टेलिविजन के जरिये देखीं। उन तस्वीरों को देखकर ऐसा लगा कि प्रकृति की ओर से किये गये इतने बडे नरसंहार के बाद शायद अब लोग केदारनाथ नहीं आयेंगे। जान सबसे बडी चीज है...लेकिन ऐसा हुआ नहीं। केदारनाथ में इन दिनों रोजाना 1 हजार के करीब लोग दर्शन करने आ रहे हैं। 700 लोग पैदल 21 किलोमीटर की चढाई करके और 300 के करीब लोग हेलिकॉप्टर से। ज्यादातर लोग भकि...

स्मृति ईरानी, विपक्ष और मीडिया...

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इससे पहले कि ये मामला और ज्यादा तूल पकडे और अदालती चक्कर में फंसे मेरा मानना है कि स्मृति ईरानी को तुरंत मंत्रीपद से इस्तीफा दे देना चाहिये। इस्तीफा इसलिये नहीं देना चाहिये कि वो मानव संसाधन विकास मंत्री होने के काबिल नहीं हैं या ज्यादा पढी लिखी नहीं हैं, बल्कि उनका इस्तीफा नैतिकता की मांग है। जिस कांग्रेस की वो घोटालों और गडबडियों को लेकर अपनी सभाओं में आक्रमक तरीके से खिंचाई करतीं आईं है, वैसे ही मामले में अब वो खुद फंसती दिख रहीं हैं। ये मामला सियासी आरोप-प्रत्यारोप से उठकर है। इसने न केवल ईरानी के आचरण पर सवाल खडा किया है, बल्कि विपक्ष और मीडिया पर भी। स्मृति ईरानी ने बतौर सांसद चुने जाते वक्त अपनी शिक्षा के बारे में गलत जानकारी दी, ये विवाद तब उठा जब मानव संसाधन विकास मंत्री के तौर पर उनके नाम का ऐलान हुआ। 2004 में उन्होने अपने हलफनामें में बताया कि वे बी.ए.पास है। इसके बाद के एफीडेविट में उन्होने बताया कि वे सिर्फ बी.कॉम प्रथम वर्ष तक पढी हैं। ये स्पष्ट नहीं है कि इसमें कौनसी जानकारी सही है, लेकिन इतना साफ है कि दोनो में से एक जानकारी गलत है। एक सांसद पद के लिये बतौर उ...