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Thursday, 3 May 2018

क्या मालूम भाय कब किसका निशाना चूक जावे?

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आज एक सज्जन से प्रेस कब के बाहर मुलाकात हुई जिन्होंने बताया कि उनका भतीजा सरवर शेख मेरे साथ स्टार न्यूज़ में बतौर कैमरामैन काम कर चुका है।
सरवर शेख इस नाम ने मुझे करीब 25 साल के एक ऐसे युवक की याद दिला दी जो था तो लंबा चौड़ा और हट्टा कट्टा लेकिन काफी दब्बू किस्म का। उसने थोड़े दिन ही बतौर कैमरामैन काम किया लेकिन उसके साथ के अनुभव यादगार रहे।
मुझे याद है वो 2004 में स्टार न्यूज़ में बतौर कैमरामैन लगा था। न्यूज़ चैनल में लगने से पहले वो एंटरटेनमेंट चैनल्स के लिए फ्रीलांस कैमरामैन का काम करता था। उसके साथ की गई पहली स्टोरी मैं कभी नही भूल सकता। जब हम गाड़ी में महालक्ष्मी के दफ्तर से निकले तो सरवर काफी खुशमिजाज मूड में था। सरवर को इस बात की खुशी थी कि उसे मेरे साथ स्टोरी पर जाने का मौका मिल रहा है। तब तक मेरे साथ सिर्फ चैनल के वरिष्ठ कैमरामैन ही भेजे जाते थे। रास्ते भर वो हंसते हंसाते, जोक सुनाते आया...लेकिन जब हमारी मंज़िल आयी तो उसके चेहरे से सारी हंसी गायब हो गयी।
हमारी मंजिल थी दक्षिण मुम्बई की पाकमोडिया स्ट्रीट और रिपोर्ट थी महजबीन नामक उस इमारत पर जो अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद ने अपनी पत्नी के नाम पर बनवाई थी। ये इमारत पाकमोडिया स्ट्रीट में ठीक दाऊद के पुराने घर के सामने थी जिसे बीएमसी के तत्कालीन अधिकारी खैरनार ने 90 के दशक में ढहा दिया था। अपनी रिपोर्ट के लिए मुझे उस इमारत के मलबे के बैकड्रॉप में कैमरे के सामने खड़े होकर पीटीसी करना था।
फ्रेम बनाकर मैने पीटीसी करना शुरू किया। पीटीसी में मैंने दाऊद के लिए "देशद्रोही", "गद्दार", "बेगुनाहों का हत्यारा", "भगोड़ा" जैसे शब्दों इस्तेमाल किया था। ये सब सुनकर सरवर विचलित हो गया। दाऊद के बारे में इस तरह के शब्द सरेआम इस्तेमाल करते हुए उसने पहली बार किसी को देखा था। वो तुरंत ही वहां से निकल जाना चाहता था। जैसे ही पीटीसी खत्म हुआ वो घबराकर गाड़ी की और दौड़ा।
लौटते वक्त गाड़ी में वो बड़ी देर तक खामोश रहा। मैंने पूछा-क्या हुआ सरवर इतने चुप क्यों हो? कोई टेंशन है क्या?
लड़खड़ाई आवाज में उसने जवाब दिया - "सोच रहा हूँ अब आपका क्या होगा?"
"मेरा क्या होगा? क्या मतलब?"
"भाय आपने दाऊदभाय को इतना उल्टा सुल्टा बोले वो भी उनके घर के बाहर इच खड़े रे के। दाऊदभाय सुनेंगे तो भड़क जाएंगे। आपको छोड़ेंगे क्या? भोत डेंजर आदमी है भाय।"
मुझे हंसी आ गई
मैन कहा -"सरवर तुम मेरी चिंता मत करो। अभी एंटरटेनमेंट से नए नए न्यूज़ में आये हो न। धीरे धीरे इसकी आदत हो जाएगी।"
मेरे जवाब से वो संतुष्ट नही लगा।उसे पसीना आ रहा था।
उसके बाद मैंने देखा कि सरवर मेरे साथ शूट पर आने में कतराने लगा। जब भी ऑपरेशन्स मैनेजर उसे मेरे साथ शूट पर जाने को कहता तो वो कोई न कोई बहाना बनाकर टालने की कोशिश करता। कभी तबियत खराब होने का तो कभी किसी नाते रिश्तेदार के अचानक एक्सीडेंट में घायल हो जाने का वगैरह।
महालक्ष्मी की जिस गली में स्टार न्यूज़ का दफ्तर था उसी के मुहाने पर चाय की स्टाल लगती थी। स्टार न्यूज़ के कर्मचारी वहीं चाय के लिए आते थे। मेरे भी ब्यूरो के बाकी रिपोर्टर्स के साथ वहां दिन में तीन चार चक्कर लगते।
मैंने दो तीन बार गौर किया कि जब भी मैं चाय के स्टाल पर पहुंचता और वहां अगर सरवर पहले से मौजूद है तो मुझे देख कर वो दूर खड़ा जो जाता। मुझे समझ नही आता कि वो ऐसा क्यों कर रहा था।
एक दिन इसी तरह मैं अपने साथी रिपोर्टर्स के साथ वहां चाय पीने के लिए पहुंचा। सरवर वहां पहले से चाय का कप लेकर खड़ा था। मुझे देखते ही वो फिर करीब 10 मीटर दूर जाकर खड़ा हो गया। मैंने चाय का कप लिया और उसके पास पहुंचा। सरवर के कंधे पर हाथ रखकर पूछा- क्या हुआ सरवर? मुझे देखकर भाग क्यों जाते हो?
सरवर के शरीर मे हल्की से कंपकपी होने लगी और पसीना छूटने लगा। इस हालत में उसने जो जवाब दिया वो याद करके आज भी मैं अपनी हंसी नही रोक पाता।
सरवर ने हिचकिचाते हुए कहा- "आपसे तो दूर रहना ही ठीक है भाय। क्या मालूम कब किसका निशाना चूक जावे..."
माजरा समझ मे आ चुका था। सरवर को डर था कि डी कंपनी का कोई शूटर मुझे गोली मार सकता है और अगर वो मेरे नजदीक रहा तो गलती से गोली उसे भी लग सकती है।
खैर सरवर की मौत चूकी हुई गोली से नही हुई। स्टार न्यूज़ छोड़ने के बाद उसने कलर्स चैनल के रियलिटी शो "बिग बॉस" में बतौर कैमरामैन काम करना शुरू किया था और लोनावाला में शूट के लिए यूनिट के बाकी सदस्यों के साथ रहता था। एक रात खाना खाकर जब वो वापस होटल लौट रहा था तो उसकी कार खंडाला की खाई में जा गिरी जिसमे उसकी मौत हो गयी।
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J.Dey Murder Verdict: Testimonies of this blogger & other journos..





Here are excerpts from the order of Special MCOCA Court judge S.Adkar dated 02/05/2018 wherin the testimonies of Jitendra Dixit & other journalists have been considered for convicting underworld don Chota Rajan.
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485. The analysis of the evidence of PW.76 ­Jitendra Dixit shows that at
the relevant time, he was holding a senior position in the 'Star News'
channel. This fact was not disputed by the defence in cross­examination. It
has come in his evidence that wherever possible the information received
by him from the Police used to be verified before it was aired. This shows
that   he   was   a   responsible   correspondent.   His   evidence   that   on
16/11/2011   he   had   received   a   phone   call   on   his   mobile   number
9820703347   from   the   accused   no.12­Chhota   Rajan   from   the   number
+3444   and   that   the   accused   no.12­Chhota   Rajan   claimed   the
responsibility for the murder of J.Dey was not dented in any manner
during the cross­examination. Further, on being asked by the defence, he
has also stated that when he received the call from the number +3444 the
digits in front of it or after it were not reflected on the screen of his mobile
phone. These facts further confirm that PW.76­Jitendra Dixit had indeed
received a phone call from the number +3444. He received the said phone
call sometime in the afternoon and in the evening he wrote and posted the
contents of his conversation on his blog “Address to the Universe” on his
website   “www.jitendradiary.blogspot.com”.   When   the   Police   came   to
know about his conversation with the accused no.12­Chhota Rajan, he was
immediately summoned on the next day i.e. on 17/11/2011 for enquiry
and after his enquiry, his statement was recorded. At that time, he gave
the printout of the blog (Exh.788) to PW.143­ACP Duraphe. This fact is
confirmed   by   PW.143­ACP   Duraphe   in   his   evidence.   The   evidence   of
PW.76­Jitendra Dixit also shows that he used to regularly write blogs on
his website. In fact, he was writing blogs since the year 2007. Therefore, it
cannot be said that he created his website and the blog only for the
purposes of the present case to oblige the Police. On the contrary, in the
cross­examination, it has been brought on the record that it was his hobby
to write blog. Not only this, the defence has relied upon his other blogs
Exh.1369 colly) in support of their stand. 
486. The evidence of PW.76 ­Jitendra Dixit was sought to be doubted onthe ground that he was very close to the Police and in collusion with the
Police he has falsely implicated the accused no.12­Chhota Rajan. The said
submission is required to be rejected. It was not unusual for him to be in
touch with the Police considering the fact that he was a crime Reporter
and they need to be in touch with the Police to get the information which
they want. But that does not mean that PW.76­Jitendra Dixit was under
the   control   of   the   Police.   There   is   nothing   to   suggest   that   he   was
compelled to write the blog (Exh.788) on 16/11/2011 at the instance of
the Police. In fact, during his cross­examination, a suggestion was given to
him that he was deposing falsely at the instance of the Police. But the
same was emphatically dismissed by him. The fact that he was called by
the Police after he had written the blog (Exh.788) is the testimony of the
fact that prior to 17/11/2011 he had no contact whatsoever with the
Police with respect to this case. So also, there is nothing to suggest that
just   prior   to   writing   the   blog   (Exh.788)   he   was   in   touch   with   the
Investigating Officer of this case. As stated earlier, when an accused claims
to be falsely implicated he has to lay down a factual foundation for the
same and prove it by leading impeccable evidence. But, no evidence was
led in that regard. 
487. During the cross­examination of PW.76 ­Jitendra Dixit he has stated
that he did not undergo any course in recognition of voice samples. A
similar   question   was   put   to   PW.100­Aariz   Chandra   in   his   cross-
examination. While analyzing the evidence of PW.100­Aariz Chandra this
Court has already considered and rejected the submission.
488. As stated earlier, after the receipt of the phone call from the accused
no.12­Chhota   Rajan   claiming   responsibility   of   the   murder   of   J.Dey,
PW.76 ­Jitendra Dixit had posted the contents of his conversation in his
blog   “address   to   the   Universe”   on   his   website
www.jitendradiary.blogspot.com”.   This   immediate   conduct   of   PW.76­
Jitendra Dixit in posting the contents of the conversation on his blog is
relevant. The contents of the blog (Exh.788) corroborate the oral evidence
of PW.76­Jitendra Dixit. It has come in his evidence that before taking the
printout of the blog (Exh.788) he did not edit the contents of the blog.
This shows that the contents of the blog were not tampered with. 
489. It may be noted that the blog (Exh.788) does not bear the date on
which it was written. But there is a reason for it. The blog was written on
the same day on which the phone call was received. The starting two lines
of the blog (Exh.788) itself shows that it was written on 16/11/2011. The
contents of the blog were written in present tense. Further, it has come in
his evidence that he had taken the printout of the blog (Exh.788) on the
next day of the receipt of the phone call which also means that he had
written the blog (Exh.788) on the same day on which he had received the
phone call from the accused nos.12­Chhota Rajan. In any case, there is
nothing suspicious in his evidence. Further, it is not the stand of the
defence that the contents of the blog were imaginary and false. There is no
evidence to even  prima facie  suggest that PW.76­Jitendra Dixit had any
motive to create a false blog. He had no axe to grind against the accused
no.12­Chhota Rajan. In fact, by posting such news he risked his career and
possibly his life as had the contents of the blog (Exh.788) were false, the
accused no.12­Chhota Rajan would not have spared him.
490. It may be noted that it has come in the evidence of PW.76­Jitendra
Dixit that when the accused no.12­ Chhota Rajan was arrested at Bali,
Indonesia  many  Reporters including  him  had  gone  there. It  has  been
brought out in his cross­examination that though at that time, he did not
have any one to one interview with the accused no.12­Chhota Rajan many
Reporters   had   put   questions   to   the   accused   no.12­Chhota   Rajan.
Obviously, at that time, he must have heard the voice of the accused
no.12­Chhota Rajan when he gave the answers to the questions which
were put to him. Thus, he had another occasion to hear the voice of the
accused no.12­Chhota Rajan as he was in front of him. It is not the stand
of the case of the defence that the voice of the accused no.12­Chhota
Rajan which was heard by PW.76­Jitendra Dixit at Bali, Indonesia was not
the same voice which was heard by him when the phone call was made to
him.
491. It may be noted that when the extra­judicial confessions were made
admittedly, the accused no.12­Chhota Rajan was not in India. He was not
under the control of any investigating/vigilance authority of India. He was
a   free   man.   His   movements   were   not   controlled   by   the   Indian   law
enforcement agencies. As he was located hundreds of miles away from
India and Mumbai he had no fear of the Indian law enforcement agencies.
He was not in a position of weakness. As he did not feel threatened in any
manner by the Indian law enforcement agencies or any other agency, he
called PW.78­Sunilkumar Singh and other witnesses and told them the
truth. In this background, if the news regarding the phone call made to
these witnesses was really a fake news then nothing prevented him from
immediately   picking   up   his   phone   and   calling   the   media   denying   his
involvement in the murder of J.Dey. But he did not do so.
512. From the above, it is clear that the evidence of PW.76­Jitendra Dixit,
PW.78­Sunilkumar Singh, PW.87­Nikhil Dixit and PW.100­Aariz Chandra
regarding the phone calls made to them by the accused no.12­Chhota
Rajan confessing his guilt is  cogent, trustworthy and reliable. There is
nothing suspicious about their evidence. These witnesses were senior and
experienced Journalists. They were independent witnesses. There was no
reason for them to depose falsely. There is no evidence to show that there
was any previous concert between these witnesses to falsely implicate the
accused no.12­Chhota Rajan in this case. The extra­judicial confessions
made by the accused no.12­Chhota Rajan to them do not suffer from any
inherent   improbabilities.  The   words   spoken   to   by   these   witnesses   are
clear,   unambiguous   and  unmistakably   convey   that   the   accused   no.12­
Chhota Rajan is responsible for the murder of J.Dey. The extra­judicial
confessions have passed the test of credibility and can be accepted and can
be the basis of a conviction.

Tuesday, 21 March 2017

देवरानी-जेठानी की खटपट में लटक गया याकूब !


किसी संयुक्त परिवार में अगर देवरानी जेठानी एक साथ रह रहीं हैं तो उनके बीच झगडा और मनमुटाव होना आम बात है। वे अक्सर अपने अपने पतियों से एक दूसरे की शिकायत करतीं हैं और कान भरतीं हैं...लेकिन देवरानी-जेठानी के बीच घर में अक्सर होने वाली ये छोटी मोटी खटपट किसी को फांसीं के फंदे तक भी पहुंचा सकती है, ये कहानी आपने आज तक नहीं सुनी होगी।

12 मार्च 1993 को हुए मुंबई बम धमाकों से पहले मुंबई के माहिम इलाके की अल हुसैनी इमारत में टाईगर मेमन अपने याकूब समेत अपने बाकी छोटे भाईयों और माता पिता के साथ एक ही घर में रहता था। जानकारी के मुताबिक टाईगर मेमन की पत्नी शबाना और याकूब मेमन की पत्नी राहीन में नहीं जमती थी और अक्सर उनमें खटपट होती रहती थी। मुंबई बमकांड की साजिश के तहत टाईगर मेमन ने याकूब मेमन समेत परिवार के सारे सदस्यों को भारत से भगा दिया।सभी लोग पहले दुबई गये, फिर सऊदी और उसके बाद पाकिस्तान। बताते हैं कि इस दौरान भी देवरानी-जेठानी के बीच कलह होती रहती थी। याकूब की पत्नी आये दिन टाईगर और उसकी पत्नी के बारे में याकूब से शिकायत करती रहती – तुम्हारे भाई के चक्कर में हमें ये दिन देखना पड रहा है। हम अपने नाते रिश्तेदारों से दूर हो गये हैं। न किसी की शादी-ब्याह में जा सकते हैं, न मैयत में। ये भी कोई जिंदगी है। तुम्हारे भाई के टुकडों पर अब पलना पडेगा। अपनी पत्नी के मुंह से रोज निकलने वाले ये शब्द याकूब को खूब चुभते थे। देवरानी-जेठानी के बीच रोज होने वाली खटपट से वो तंग आ चुका था। याकूब ने भारत वापस लौटने का जो फैसला किया उसमें इस कलह ने एक बडी भूमिका निभाई। वो इससे छुटकारा चाहता था और उसने टाईगर मेमन से  बगावत करके वापस भारत लौटने का फैसला किया।

याकूब मेंमन, भाई टाईगर और अयूब मेमन को कराची में छोड कर नेपाल के रास्ते अपनी पत्नी राहीन, बाकी भाईयों, उनकी पत्नियों और माता-पिता के साथ भारत वापस लौट आया। नई दिल्ली रेल स्टेशन पर उसकी गिरफ्तारी दिखाई गई। याकूब को उम्मीद थी कि चूंकि बमकांड की साजिश में उसकी ज्यादा भूमिका थी नहीं इसलिये कुछ साल बाद वो जेल से छूट जायेगा। दिल्ली में गिरफ्तारी के बाद उसके, उसकी पत्नी राहीन, बाकी भाईयों और परिजनों के  खिलाफ टाडा के तहत मुकदमा चलाया गया। पत्नी राहीन को तो अदालत ने छोड दिया लेकिन टाडा अदालत ने याकूब को बमकांड की साजिश का दोषी मानते हुए उसे फांसीं की सजा सुना दी। 30 जुलाई 2015 को  सुबह 7 बजे के करीब नागपुर जेल में उसे फांसीं पर लटका दिया गया। 30 जुलाई याकूब के जन्मदिन की भी तारीख थी।


मेमन परिवार के एक करीबी सदस्य का कहना है कि अगर देवरानी-जेठानी में रोज की खटपट न होती तो शायद याकूब भारत आने का मन नहीं बनाता। न वो अपने भाई टाईगर की तरह पकडा जाता और न फांसीं पर लटकाया जाता। 

Monday, 6 March 2017

न्यूज चैनलों की बदलती भाषा और विषय चयन !


(हाल ही में मुंबई के मशहूर के.सी.कॉलेज की ओर से आयोजित किये गये एक परिसंवाद में मीडिया के बदलते स्वरूप पर बोलने का मौका मिला। पेश है परिसंवाद में व्यक्त किये गये विचार-

मीडिया की भाषा और विषय चयन पर बोलने से पहले मैं एक मूलभूत बात स्पष्ट करना चाहूंगा कि भारत में जब दूरदर्शन और आकाशवाणी का एकाधिकार था तब देश के नागरिकों को संबोधित किया जाता था, उनके मद्देनजर सामग्री तय की जाती थी। नागरिक इस शब्द पर गौर कीजिये। नागरिक की जगह आज उपभोक्ता ने ले ली है। निजी न्यूज चैनलों की सामग्री बाजार के नियमों पर आधारित होती है। क्या दिखाना है, कितना दिखाना है, कैसे दिखाना है ये सबकुछ एक बाजार को ध्यान में रखकर तय किया जाता है। पत्रकारिता को बाजारीय समीकरणों से प्रभावित होना चाहिये या नही, ये बहस का अलग विषय है...लेकिन वस्तुस्थिति यही है कि चाहे समाचार चैनल हों, खेल के चैनल हों या मनोरंजन चैनल हों सभी पर बाजार का प्रभाव है।

अब पहले बात करते हैं चैनलों के विषय चयन की। जैसा कि मैने अभी कहा कि कौनसे विषय़ पर सामग्री दिखानी है ये बाजार तय करता है तो आप पूछेंगे कि टेलिविजन चैनलों का बाजार क्या है। 1990 के दशक के मध्य में जब निजी चैनलों का दौर शुरू हुआ तब केबल टीवी की पहुंच सिर्फ शहरी इलाकों तक थी। इसलिये तमाम न्यूज चैनलों का बाजार था शहरी इलाकों के , मध्यम वर्गीच परिवारों के युवा दर्शक जिनकी उम्र 18 साल से लेकर 35-40 साल के बीच हो। जो लोग इस बाजार का हिस्सा थे वे क्या देखना पसंद करते हैं, उनकी क्या सोच है, उनके क्या सपने हैं, उनका रहनसहन कैसा है, उनकी क्या चिंताएं हैं इसपर न्यूज चैनल अपनी सामग्री तय करते थे। बीते 2 सालों में हिंदी समाचार चैनलों के बाजार में विस्तार हुआ है। केबल टीवी और डीटीएच की पहुंच अब भारत के गांव गांव तक हो गई है। इस वजह से अब ग्रामीण इलाकों को भी समाचार चैनलों के बाजार में शामिल कर लिया गया है। आपने देखा होगा कि हिदी न्यूज चैनल आज तक ने एक कार्यक्रम शुरू किया गांव आज तक। ये इसी बदले हुए बाजार का असर है। ग्रामीण इलाके को बाजार में शामिल किये जाने से पहले समाचार चैनलों पर किसानों की चर्चा अक्सर तब ही होती थी, जब किसानों की आत्महत्या पर राजनेता बयानबाजी करते थे या फिर जब सब्जी और अनाज के दाम बढ जाते थे...लेकिन अब ग्रामीण इलाके का कवरेज धीरे धीरे व्यापक हो रहा है, बढ रहा है।

90 के दशक के मध्य से लेकर अब तक न्यूज चैनलों का विषय चयन भी बडा दिलचस्प रहा है। 90 के दशक में जब निजी न्यूज चैनलों का दौर शुरू हुआ तब देश में काफी राजनीतिक उठापटक चल रही थी। खूब नाटकीयता थी, खूब कहानियां निकलतीं थीं। 13 दिन और तेरह महीने में सरकारें गिरतीं थीं। चंद्रास्वामी, टीएन सेशन, अटलबिहारीवाजपेयी, एल.के अडवानी, प्रमोद महाजन जैसे नाम टीवी पर छाये रहते थे। केंद्र और कई राज्यों में बार बार मध्यावधि चुनाव होते थे। इस वजह से समाचार चैनलों का पूरा फोकस राजनीतिक खबरों पर रहता था। ये दौर इस दशक की शुरूवात तक चला...लेकिन इन 6-7 सालों में इतनी राजनीतिक कवरेज हो गई कि लोग उनसे ऊबने लगे। राजनीति से अलग अब कुछ और दिखाने की जरूरत होने लगी।

साल 2001 से राजनीति की जगह अपराध लेने लग गया...हालांकि आम धारणा ये बन गई कि दोनो के बीच अब ज्यादा फर्क नहीं रह गया। समाचार चैनलों पर अपराध से जुडी खबरों के हावी होने के पीछे 2 कारण थे। पहला कि संगठित अपराध उस वक्त अपने चरम पर थे। मुंबई में गैंगवार हो रहा था। दाऊद इब्राहिम, छोटा राजन, अरूण गवली, अश्विन नाईक, अबू सलेम के गिरोह न केवल एक दूसरे के शूटरों को मार रहे थे, बल्कि मुंबई के बडे फिल्मकारों और कारोबारियों भी अपना निशाना बना रहे थे। छोटा राजन के लोग मुंबई बमकांड के आरोपियों की हत्या कर रहे थे, तो वहीं छोटा शकील के लोग मुंबई दंगों के आरोपी शिवसैनिकों पर गोलियां बरसा रहे थे। शायद ही कोई ऐसा दिन होता था जब मुंबई में गोली नहीं चलती थी। उसी दौरान छोटा शकील की फिल्म फाईनेंस करने के आरोप में भारत के सबसे बडे हीरा कारोबारी भरत शाह की गिरफ्तारी हुई, जिसने बॉलीवुड और अंडरवर्लड के रिश्तों पर सामग्री तैयार करने के लिये न्यूज चैनलों को खूब मौका दिया। उसी दौरान महाराष्ट्र का बहुचर्चित तेलगी घोटाला भी सामने आया जिसमें कई बडे पुलिस अधिकारी जेल गये। हालांकि, ये आपराधिक गतिविधियां मुंबई से जुडी थीं लेकिन इन्हे राष्ट्रीय समाचार चैनलों में खूब जगह मिलती थी।

गिरोहों की ओर से किये जा रहे संगठित अपराध के अलावा आतंकी हमलों का सिलसिला भी शुरू हो गया। संसद पर हमला, अक्षरधाम पर हमला, कोलकाता के अमेरिकन सेंटर पर हमला, मुंबई के घाटकोपर इलाके में एक बस में बम विस्फोट, गेटवे औफ इंडिया और मुंबादेवी मंदिर के बाहर हुए बम धमाके उस दौरान राष्ट्रीय न्यूज चैनलों में छाये रहे।

आतंकवाद और अंडरवर्लड की खबरों में ड्रामा था, बदला था, साजिश थी, सस्पेंस था, एक्शन था। उनमें हीरो भी थे और विलेन भी जिनकी समाचार चैनलों को हमेशा कहानियां सुनाने के लिये तलाश रहती है। यही वजह थी कि समाचार चैनलों ने उन्हें खूब जगह दी और ये खबरें देखीं भी भरपूर गईं। कई समाचार चैनलों ने अपराध के लिये विशेष शो शुरू किये जैसे स्टार न्यूज ने रेड अलर्ट, सनसनी और शूटआउट जैसे कार्यक्रम शुरू किये तो वहीं आज तक ने जुर्म और वारदात जैसे कार्यक्रम शुरू किये। इंडिया टीवी ने एसीपी अर्जुन नाम का क्राईम शो शुरू किया।

करीब 5-6 साल तक हिंदी समाचार चैनलों पर अपराध की खबरों का दौर चला। आज भी हिंदी चैनलों पर क्राईम शो चलते हैं और अपराध की खबरों को प्रमुखता मिलती है, लेकिन वैसी नहीं जैसी उस दौर में मिलती थी। उसके बाद आया वो दौर जिसे मैं हिंदी न्यूज चैनलों का सबसे घृणित दौर मानता हूं। ये वो दौर था जब हिंदी न्यूज चैनलों की विश्वसनीयता, उनकी परिपक्वता और यहां तक कि उनकी आवश्यकता पर भी सवाल उठने लगे।

साल 2005-06 के आसपास गंभीर खबरें हिंदी न्यूज चैनलों से गायब होने लगीं। उनकी जगह ले ली अग्रेजी की टैबलॉयड स्टाईल की पत्रकारिता ने। अंधविश्वास, भूत-प्रेत, नाग-नागिन, उडनतश्तरी, सैक्स रैकेट, फैशन शो, फिल्मी गपशप जैसी खबरें पूरी तरह से हिंदी चैनलों पर हावी हो गईं। आपको याद होगा कि एक दिन किसी गांव के एक आदमी ने खुद के बारे में भविष्यवाणी कर दी थी कि आज शाम को मैं मरने वाला हूं और उसके बाद तमाम समाचार चैनलों ने उस गांव में सुबह से ही डेरा जमा लिया। चैनल पर सिर्फ उसी व्यकित से जुडी खबरें चल रहीं थीं और उसके भजन-कीर्तन करते हुए तस्वीरें बार बार दिखाई जा रहीं थीं। मुझे याद है उस दिन चैनल पर दूसरी कोई खबर नहीं चली। शाम को जब खुद के बताये वक्त पर वो आदमी नहीं मरा तो चैनलों ने बताना शुरू किया ढोंगी की पोल खुली। समाचार चैनलों पर इस तरह की सामग्री का विरोध भी शुरू हो गया। कहा जाना लगा कि टीवी पत्रकारिता के नाम पर ये पत्रकारिता के साथ मजाक है। कईयों ने कहा कि समाचार चैनलों को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से दिये जाने वाले लाईसेंस रद्द करके उन्हें मनोरंजन की श्रेणी वाले लाईसेंस दिये जाने चाहिये। मुझे याद है कि जेवियर्स कॉलेज में राजनीतिशास्त्र पढाने वाली प्रतिभा नेथानी एक समाचार चैनल के दफ्तर उसकी ओर से दिखाई जाने वाली सामग्री का विरोध करने के लिये मोर्चा लेकर पहुंच गईं और अदालत में जनहित याचिका दायर करने की भी तैयारी कर रहीं थीं।

खैर इससे पहले कि हिंदी समाचार चैनलों के खिलाफ कोई जनांदोलन शुरू हो पाता, न्यूज चैनलों ने अपना फोकस बदलना शुरू कर दिया। टैबलाईड स्टाईल पत्रकारिता से फिर एक बार उनका रूख गंभीर खबरों की तरफ हुआ। इस बार विषय थे भ्रष्टाचार और सिस्टम की खामियां। मुंबई में 26 नवंबर 2008 का आतंकी हमला, दिल्ली में लोकपाल के लिये अन्ना हजारे का अनशन, निर्भयाकांड, टूजी घोटाला, कोयला घोटाला इत्यादि ने समाचार चैनलों का कवरेज भ्रष्टाचार और प्रशासनिक व्यवस्था से जुडी खबरों की तरफ मोडा। मीडिया के इस बदले हुए रूख का तत्कालीन विपक्षी पार्टियों ने केंद्र और दिल्ली की राजनीति में भरपूर फायदा उठाया।

अब बात करते हैं कि इस वक्त समाचार चैनल किस तरह के विषयों पर फोकस करते हैं। ये सोशल मीडिया का दौर है। सोशल मीडिया एक तरह से समाचार चैनलों के लिये चुनौती बनकर उभरा है। 24 घंटे के न्यूज चैनलों की एक उपयोगिता ये भी मानी जाती है कि कोई भी बडी खबर वो हमें तुरंत बता देते हैं, जिसे चैनल ब्रेकिंग न्यूज के तौर पर पेश करते हैं...पर अब ये काम सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर होने लगा है। कई बडी खबरें ट्वीटर और फेसबुक के मार्फत ब्रेक हुईं हैं। इसके अलावा चैनल पर कौनसी सामग्री दिखाई जानी है इसका एक पैमाना अब ये भी हो गया है कि ट्वीटर पर कौनसा विषय ट्रेंड कर रहा है। एक बात ये भी गौर करने वाली है कि टीवी स्क्रीन और मोबाइल स्क्रीन एक दूसरे के पूरक की भी भूमिका निभा रहे हैं। दर्शक टीवी पर कोई खबर देखता है, फिर ट्वीटर या फेसबुक पर अपने विचार व्यक्त करता है। उसी तरह न्यूज चैनल ये देखते हैं कि ट्वीटर और फेसबुक पर लोग किस विषय में ज्यादा रूचि ले रहे हैं। इसी बात के मद्देनजर कई न्यूज चैनल अपनी खबरों का हैशटैग तैयार करके दर्शकों को उन्हें ट्वीट करने के लिये कहते हैं और फिर कई दर्शकों के विचार टीवी स्क्रीन पर भी दिखाये जाते हैं।

टीवी एक तस्वीरों और ध्वनि का यानी कि ऑडियो विजुअल माध्यम है। अगर कोई रोचक सीसीटीवी फुटेज आता है या मोबाईल कैमरे से शूट की हुई कोई तस्वीरें आतीं हैं तो उन्हें भी समाचार चैनलों पर जगह मिलती। जबसे मोबाईल फोन में कैमरे आने लगें हैं और सीसीटीवी कैमरों का इस्तेमाल बढा है तबसे इनके आधार पर खबरें भी चैनलों पर खूब दिखाईं जा रहीं हैं।

समाचार चैनल के विषय चयन पर और भी काफी कुछ कहा जा सकता है लेकिन हमारे पास समय सीमित है, इसलिये अब मैं समाचार चैनलों की भाषा पर बात करूंगा।

आज हिंदी समाचारों की भाषा कैसी है।
आज हिंदी समाचारों की भाषा सरल है, सनसनीखेज है, आक्रमक है, आम बोलचाल वाली है और संक्षिप्त है। बीते 2 दशकों में हिंदी न्यूज चैनलों की भाषा में भी काफी बदलाव हुआ है और ये पूरी मीडिया में हो रहे बदलावों का एक हिस्सा है।

साल 2000 में आज तक न्यूज चैनल शुरू करने के लिये दिल्ली में हमारी ट्रेनिंग हो रही थी। आज तक के तत्कालीन संपादक कमर वाहिद नकवी ने उस ट्रेनिंग के दौरान हमें बताया कि आज तक चैनल में उस भाषा उसका इस्तेमाल होना चाहिये जो हिंदी फिल्मों में इस्तेमाल होती है। दिलचस्प बात ये है कि उस वक्त और बडी हद तक आज भी हिंदी फिल्मों में जिस भाषा का इस्तेमाल होता है वो पूरी तरह से हिंदी नहीं होती। उसमें उर्दू या फिर कहें हिंदुस्तानी का बडा प्रभाव रहता है। तो कैसी है ये भाषा। मिसाल के तौर पर अदालत से जुडे शब्दों को लीजिये

इस भाषा में-
न्यायलय को अदालत
सश्रम कारावास को कैदे बामशक्कत
अपराध को गुनाह
आदेश को हुक्म
शपथपत्र को हलफनामा
भारतीय दंड संहिता को ताजीराते हिंद
धारा को दफा
अभियुक्त को मुलजिम
उत्तर को जवाब
और
हत्या को खून    कहते हैं

अगर आम बोलचाल के शब्दों की बात करें तो
राजनीति को सियासत
विशेषज्ञ को जानकार
राज्य को सूबा
यात्रा को सफर
सेना को फौज
दुर्घटना को हादसा
उदाहरण को मिसाल
मार्ग को राह या रास्ता कहते हैं।

ये वो भाषा थी जिसका आज तक ने कई सालों तक इस्तेमाल किया और आज भी एक हद तक कर रही है। समाचार चैनलों में भाषा की शुद्धता से ज्यादा जोर इस बात पर दिया जाता है कि क्या दर्शक खबर को आसानी से समझ पा रहा है।

एक मिसाल- अगर मैं ये कहूं कि ऊपरी उपस्कर भंग हो जाने के कारण लोकल ट्रेनें देरी से चल रहीं
हैं तो कितने लोग समझ पायेंगे  लेकिन अगर मैं कहूं कि ओवरहेड वायर टूट जाने की वजह से लोकल ट्रेने देरी से चल रहीं हैं तो सभी समझ लेंगे।
अखबार तो सिर्फ शिक्षित लोग ही पढ सकते हैं, लेकिन टीवी अनपढ आदमी भी देख सकता है। इसलिये चैनलों की भाषा वो होती है जो अनपढ या कम पढा लिखा व्यकित भी समझ जाये। भाषा की शुद्धता को यहां ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता।
मैंने अंग्रेजी माध्यम से पढाई की है और जब मैं तीसरी कक्षा में था तबसे हिंदी सिखाई जाने लगी। शिक्षिका ने सुझाव दिया कि हिंदी अच्छी करने के लिये हिंदी अखबार पढो। घर में नवभारत टाईम्स आता था और मैं उसे रोज पढने लगा। आज कोई माता-पिता या शिक्षक बच्चे को ये नहीं कह सकता कि हिंदी सीखने के लिये न्यूज चैनल देखो। वैसे अब तो नवभारत टाईम्स से भी हिंदी गायब हो गई है। हिंदी समाचार चैनलों में हिंदी शुद्ध नहीं है या तो उनमें अग्रेजी हावी हो गई है या फिर क्षेत्रीय भाषाओं के शब्द। इसके पीछे एक कारण ये है कि कई समाचार संमूह अपने अलग अलग भाषाई चैनलों के लिये एक ही बहुभाषी रिपोर्टरों की टीम रख रहे हैं। उदाहरण के तौर पर किसी एक समाचार संस्थान के हिंदी और मराठी चैनल दोनो हैं तो वो वैसे रिपोर्टर की नियुकित करेगा जो कि दोनो ही भाषाएं बोल ले...लेकिन कैमरे पर भले ही ये रिपोर्टर अपनी मातृभाषा ठीक बोल लें, लेकिन दूसरी भाषा में बोलते वक्त वैसा नहीं होता। मसलन अगर किसी मराठी भाषी रिपोर्टर को अगर हिंदी में खबर देनी है तो वो कह देता है महानगरपालिका के बाहर जीजामाता नगर के रहिवासियों ने गोंध़ड किया। रहिवासी और गोंध़ड- मराठी के शब्द हैं। यहां रहिवासी की जगह निवासी होना चाहिये था और गोंध़ड की जगह हंगामा होना चाहिये था। इसी तरह से कोई समाचार समूह अपने अंग्रेजी और हिंदी चैनलों के लिये एक ही रिपोर्टिंग टीम रखते हैं, जिनके कुछ सदस्य कैमरे पर अच्छी अंग्रजी बोलते हैं, लेकिन टूटी फूटी हिंदी।
वैसे समाचार चैनलों पर हिंदी और अंग्रेजी का अच्छा मेल हो गया है। ब्रेकिंग न्यूज अंग्रेजी के इन दो शब्दों का जितना इस्तेमाल अंग्रेजी चैनलों ने किया है, उतना ही हिंदी चैनलों ने भी। जब कोई बडी खबर आती है तो लाल पट्टी पर खबर भले ही देवनागरी में लिखी जाये, लेकिन ऊपर रोमन में लिखा देंखेंगे ब्रेकिंग न्यूज। बडी दुर्घटना के वक्त आप चैनल पर सुनेंगे भीषण एक्सीडैंट।

भाषा की शुद्धता को अहमियत देने वाले लोग हिंदी चैनलों की भाषा को खिचडी भाषा भी बोल सकते हैं तो वहीं उदारवादी लोग इसे हिंदी की प्रगतिशीलता भी मान सकते हैं।

एक और बदलाव बीते एक डेढ दशक में देखने मिला है। पहले समाचार चैनलों की भाषा मुहावरेदार होती थी, काव्यात्मक होती थी जो अब नहीं है। फटाफट खबरों या 5 मिनट में पचास खबरों के इस जमाने में भाषा की सुंदरता पेश करने के अवसर ओझल हो गये हैं।

तो ये थे समाचार चैनलों के विषय चयन और भाषा पर मेरे विचार। वक्त के साथ साथ हिंदी चैनल की सामग्री और उनकी भाषा दोनो लगातार बदल रहे हैं। खुशी की बात ये है कि चाहे जिस भी रूप में हो, लेकिन हिंदी ने अपनी पहचान कायम रखी है।

Thursday, 8 December 2016

एक महीने बाद : नोटबंदी, नरेंद्र मोदी और नजरिया।

बात 2007 की है। गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजे आ गये थे। बीजेपी फिर एक बार भारी बहुमत से जीती थी। नरेंद्र मोदी नतीजे वाली शाम जीत के बाद चुनाव क्षेत्र मणिनगर में अपनी पहली जनसभा संबोधित करने जा रहे थे। मंच के ठीक सामने की ओर अपना कैमरा लगाकर मैं कवरेज कर रहा था। स्थानीय नेताओं के भाषणों के बाद मोदी जैसे ही माईक के सामने बोलने के लिये खडे हुए वहां मौजूद भीड बडी देर तक तालियां बजाती रही और मोदी की वाहवाही के नारे लगाती रही। चंद मिनटों बाद ये शोर थम गया। सभा में मौजूद लोग शांत हो गये कि अब मोदी को सुनते हैं...लेकिन मोदी कुछ नहीं बोले...करीब 30-40 सेकंड तक मौन रहे और अपने सामने  मौजूद भीड को निहारते रहे।...फिर उन्होने पहली लाईन कही ये मेरे मौन की विजय है। सभास्थल फिर एक बार तालियों की गडगडाहट और नारों से गूंज उठा। मोदी की इस अदा ने उस वक्त मुझे भी उनका प्रशंसक बना दिया। उस चुनाव के दौरान जो कुछ भी हुआ था उसे जानकर मोदी का ये कहना कि ये मेरे मौन की विजय है के मायने मैं समझ रहा था।

ये वाकई में मोदी के मौन की विजय ही थी। मोदी उस वक्त कईयों के निशाने पर थे। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी अपनी सभा में मोदी को मौत का सौदागर बोलकर उनपर सीधा हमला कर रहीं थीं। खुद बीजेपी के केंद्रीय और राज्य के आला नेता उनके खिलाफ अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे थे। बीजेपी में मोदी से नीचे के कद के लोगों का एक वर्ग भी उनका विरोध कर रहा था। 2002 के दंगों की कहानियां उछाल कर मीडिया भी उन्हें आडे हाथों ले रही थी...लेकिन मोदी मौन रहे। उन्होने न तो सोनिया पर पलटवार किया, न तो अपनी पार्टी के नेताओं से बहस की और न मीडिया में अपने खिलाफ हो रहे कवरेज पर प्रतिक्रिया दी। मोदी सभाओं में सिर्फ अपने कामों को गिनाते गये और भविष्य की योजनाओं का बताते गये। बाकी सभी नकारात्मक बातों पर मौन रहे और इसी मौन को अपनी जीत का आधार बताकर मोदी ने अपनी विजय सभा में कहा ये मेरे मौन की विजय है

मोदी की उस सभा के बाद मैं उनसे बडा प्रभावित हुआ (भक्त नहीं बना) मैंने सोचा कि मोदी की इस सियासी रणनीति को हम अपने निजी जीवन में भी अपना सकते हैं। नकारात्मक बातों को नजरअंदाज करके अपना काम करते जाओ। 7 साल बाद 2014 में जब मोदी प्रधानमंत्री बने तब भी मैंने उनके सियासी सफर को प्रेरणादायक पाया। अपने शुरूवाती मन की बात कार्यक्रम में मोदी ने एक बात कही जो मुझे अच्छी लगी जीवन में कुछ बनने की नहीं बल्कि कुछ करने की इच्छा होनी चाहिये। प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी के कई कार्यक्रम मुझे अच्छे लगे और सोशल नेटवर्किंग साईट्स के जरिये मैने उनकी प्रशंसा भी की जैसे जनधन खाते, बेटी बचाओ, स्वचछ भारत अभियान, योगा डे इत्यादि। 2005 में मैने श्रीश्री रविशंकर का आर्ट औफ लिविंग का कोर्स किया था लेकिन बाद में ज्यादा दिनों तक प्रैक्टिस नहीं कर सका। योग के प्रति फिर एक बार रूचि जगी जब मोदी ने पहली बार योगा डे मनाने का ऐलान किया। इस बात ने भी प्रभावित किया कि मोदी खुद सुबह 4 बजे उठकर योग करते हैं। उस दौरान मै योग के बारे में और ज्यादा जानकारी जुटाने लगा और खुद भी रोजाना योग करना शुरू कर दिया। ये आदत आज भी कायम है।

मोदी में इतनी सारी सकारात्मक बातें देखकर और उनकी कुछ नीतियां खुद अपनाकर भी अपनेआप को मैं खुशनसीब मानता हूं कि मैं उनका भक्त नहीं बना। एक चीज जो मेरी समझ में आई है कि दुनिया में ज्यादातर लोगों का दूसरे व्यकित या वस्तु को देखने का नजरिया This OR That का होता है। लोग यो तो किसी व्यकित या वस्तु को पूरी तरह से अच्छा या फिर पूरी तरह से बुरा समझ लेते हैं। मुझे लगता है कि किसी को आंकने का ये अन्यायपूर्ण नजरिया है। सही नजरिया  This AND That का है। कोई व्यकित या वस्तु में कुछ अच्छा भी हो सकता है और कुछ बुरा भी यानी good AND bad न कि सिर्फ good OR bad.

दिक्कत ये है कि आज मोदी को लेकर कई लोग this AND that का नजरिया अपनाने के बजाय this OR that का नजरिया अपना रहे हैं। यही वजह है कि देश में मोदी के अंधभक्त और अंधविरोधियों के 2 तबके उभर आये हैं। अंधभक्तों का तबका मोदी के व्यकितत्व और नीतियों में कोई बुराई नहीं देखता और अंधविरोधी लोग मोदी में कोई अच्छाई नहीं देखते। ये दोनो ही तबके मोदी के व्यकितत्व का गलत आंकलन कर रहे हैं।

मैं मोदी के व्यकित्तव को This AND That के नजरिये से देखता हूं। यही वजह है कि मोदी के शख्सियात और उनकी कई नीतियों का कायल होने के बावजूद जिस तरह से उन्होने देश में नोटबंदी लागू की है उसका मैं विरोध करता हूं। आज नोटबंदी को एक महीने पूरे हो रहे हैं और इस महीनेभर में मैने लोगों की तकलीफें देखीं हैं। खुद अपना पैसे हासिल करने के लिये लोगों को घंटों और दिनों तक अपना कामधंदा छोडकर कतार में खडे देखा है, बीमार पडकर गिरते देखा है, रोते देखा है, पुलिस की लाठियां खाते देखा है, शादी ब्याह टलते देखा है, बेमौत मरते देखा है, 2 हजार की नोट पाकर छुट्टे के लिये लोगों को झगडते देखा है। नोटबंदी को लेकर अब आर्थिक विश्लेषक जो राय दे रहे हैं उसका सार मुंबईया जुबान में यही है चार आने की मुर्गी बारह आने का मसाला। लोगों ने कालेधन को सफेद करने के नये तरीके ढूंढ लिये हैं। खुद मोदी की पार्टी बीजेपी के नेता लाखों-करोडों के कालेधन के साथ पकडे जा रहे हैं। आंतकवादी के कोई हौसले पस्त नहीं हुए। देश पर आर्थिक मंदी की तलवार लटक रही है।


ये बात सही है कि जिस तरह से मैं मोदी के व्यकितत्व को सिर्फ Good OR Bad के नजरिये से नहीं देखता, उसी तरह नोटबंदी के फैसले को भी नहीं देखता...लेकिन फिलहाल महीनेभर के अनुभव के बाद नोटबंदी में good कम और bad ज्यादा नजर आ रहा है।