Search This Blog

Saturday, 28 September 2013

अंदर की बात: कैसे संजय दत्त को मिलते मिलते रह गई 2 महीने की सजा माफी।

बीते गुरूवार को यरवदा जेल के कैदी संजय दत्त का पुणे के बाल गंधर्व नाट्यगृह में एक खास शो आयोजित होने वाला था। सामाजिक कामों के लिये फंड जुटाने की खातिर संजय दत्त ने बाकी कैदियों के साथ मिलकर कुछ छोटे छोटे नाटक तैयार किये थे जिनमें दत्त के मुन्नाभाई अवतार की झलक देखने मिलती। दत्त कई डांस नंबरों पर भी नाचने वाले थे। कई दिनों पहले से इस शो की तैयारी शुरू हो गई थी और टिकट भी बेच दिये गये थे। शो में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण और गृहमंत्री आर.आर.पाटिल भी शिरकत करने वाले थे। अखबारों में भी शो को लेकर पहले से खबरें छपवा दी गईं थीं और दूरदर्शन को शो के अधिकार बेच दिये गये थे, लेकिन गुरूवार दोपहर अचानक शो को रद्द कर दिया गया। शो रद्द करने के पीछे सुरक्षा कारणों का हवाला दिया गया। कहा गया कि ऐसी जानकारी मिली है कि शो के दौरान कोई गडबडी हो सकती है, लेकिन क्या हकीकत में बात यही थी ?

अब पढिये शो के रद्द किये जाने के पीछे की असली कहानी जो महाराष्ट्र जेल प्रशासन के एक आला सूत्र से पता चली।

सबसे पहले इस सवाल पर गौर करते हैं कि इस तरह के शो को आयोजित करने का आईडिया किसका था और इसे आयोजित किये जाने के पीछे असली मकसद क्या था?
सूत्रों के मुताबिक संजय दत्त से इस तरह का शो करवाने का ख्याल डीआईजी रैंक के एक जेल अधिकारी को आया। ये वही अधिकारी हैं जो पहले भी अपनी जेल के कुछ खास कैदियों के साथ विशेष बर्ताव करने के मामले में चर्चित रहे हैं। अगर कोई फिल्मस्टार बतौर कैदी इनकी जेल में आ जाता तो ये उसकी मेहमान नवाजी में कोई कसर नहीं छोडते। संजय दत्त जब पिछली बार यरवदा जेल गये थे तब इन्ही के कार्यकाल में जेल से निकलते वक्त वर्दीधारी जेलकर्मियों की दत्त से गले मिलने और हाथ मिलाने की तस्वीरें स्टार न्यूज (अब एबीपी न्यूज) ने दिखाईं थीं। 2002 में हिट एंड रन मामले में ठाणे जेल से न्यायिक हिरासत से रिहा होते वक्त यही जनाब ठाणे जेल के प्रभारी थे। सलमान की गुजारिश पर उन्हें मीडिया के कैमरों से बचाने के लिये इन्होने हर मुमकिन कोशिश की।  इस मामले में भी डीआईजी के बर्ताव पर गौर करना इसलिये जरूरी है क्योंकि डीआईजी रैंक के अफसर को जेल नियमों के मुताबिक ये अधिकार होता है कि वो उस कैदी की सजा 60 दिनों तक (2 महीने) तक माफ कर दे जिसने किसी सामाजि, सांस्कृतिक कार्यक्रम में हिस्सा लिया हो या जेल में होने वाले किसी गलत काम को रोकने के लिये जेल प्रशासन की मदद की हो। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या संजय दत्त को इस शो में लेकर क्या उन्हें विशेष सजा माफी की खातिर भूमिका बनाई जा रही थी। ( जेल सुपिरिंटेंडेंट 30 दिन और आई.जी रैंक का अधिकारी 90 दिनों की सजा माफी दे सकता है।) जेल सूत्रों को कहना है कि मौजूदा आई.जी. (पुलिस में एडीजी रैंक) मीरा बोरवणकर 90 दिनों की अपनी विशेष माफी देने से रहीं क्योंकि उनका नाम मुंबई पुलिस कमिश्नर की रेस में चल रहा है और ऐसे में वे किसी विवाद में पडना नहीं चाहेंगीं, लेकिन सुपिरिंटेंडेंट और डीआईजी अपने अधिकार के इस्तेमाल के लिये स्वतंत्र हैं।

अब जानते हैं कि आखिर शो रद्द क्यों हुआ।
सूत्र के मुताबिक आर.आर.पाटिल और पृथ्वीराज चव्हाण को उनके कुछ करीबी पत्रकारों ने चेताया कि इस शो में शामिल होकर आप नय विवाद नये खडा कर देंगे। जिस पुणे शहर में महीनेभर पहले ही अंधश्रद्धा के विरोध में काम करने वाले समाजसेवी नरेंद्र दाभोलकर की हत्या हुई है, जिनके हत्यारों का अब तक कोई सुराग नहीं मिला, जिस पुणे शहर की जर्मन बेकरी में बम धमाके का आरोपी अफजल उस्मानी पुलिस की हिरासत से फरार हो गया, उसी शहर में जाकर आप अपराधियों के शो में शरीक होंगे, उनके काम पर तालियां बजायेंगे इससे लोगों के बीच अच्छा संदेश नहीं जायेगा। मीडिया में आपकी काफी छीछालेदर होगी। कानून और व्यवस्था के मोर्चे पर सरकार पहले ही कमजोर नजर आ रही है। पत्रकारों की इसी सलाह पर पुणे जेल प्रशासन के पास मंत्रालय से एक फोन गया, जिसके बाद आनन फानन में शो रद्द कर दिया गया। अब इज्जत बचाने के लिये कुछ बहाना तो बनाना ही था, इसलिये मीडिया में प्रचारित किया गया कि सुरक्षा कारणों से शो रद्द किया जा रहा है।


संजय दत्त को आर्मस् एक्ट के तहत 5 साल जेल की सजा मिली है जिसमें से उन्होने 2 साल तो गुजार लिये। अब बाकी के 3 साल उन्हें सलाखों के पीछे गुजारने हैं। अगर गुरूवार का शो हो जाता तो डीआईजी की कृपा से कम से कम 2 महीने की उनकी सजा कम हो जाती। खैर, ऐसे मौके अभी संजय दत्त को और मिलेंगे और दत्त 3 साल पूरे होने से काफी पहले जेल से बाहर आ जायेंगे।

Monday, 23 September 2013

नैरॉबी ने 26/11 से कुछ नहीं सीखा, क्या हमने सीखा?

26 नवंबर 2008 के मुंबई में हुए आतंकी हमलों को पूरी दुनिया ने देखा। आतंकवाद से पीडित तमाम राष्ट्रों ने उन हमलों से सीख ली और भविष्य में ऐसे हमले अपनी जमीन पर टालने के लिये रणनीतियां भी बनाईं। केन्या भी भारत की तरह ही आतंकवाद से प्रभावित एक देश है। मुंबई के हमलों के बाद बाकी देशों की तरह केन्या के पास भी मौका था अपनी सुरक्षा का जायजा लेने का और खामियों को दुरूस्त करने का जो उसने नहीं किया। भारत में भी उन हमलों के बाद बहुत कुछ हुआ...लेकिन जो नहीं हुआ, ये आलेख उसपर है। खासकर 26-11 की तर्ज पर नैरोबी में हुए आतंकी हमले के बाद इसका विश्लेषण प्रासंगिक है।

मुंबई के किसी शॉपिंग मॉल में दाखिल होने से पहले आपको गेट पर गणवेश पहने निजी सुरक्षाकर्मियों से दो चार होना पडेगा। पहले वो आपको  DFMD (Door Frame Metal Detector) से गुजरने के लिये कहेंगे, फिर एक सुरक्षा गार्ड अपने हाथ में लिये दूसरे मेटल डिटेक्टर को सिर से पैर तक घुमायेगा। एक सुरक्षा गार्ड आपके बैग को खोल कर उसपर एक नजर डालेगा और इस प्रक्रिया से गुजरने के बाद आप उस शॉपिंग मॉल में प्रवेश कर पायेंगे। जब भी मैं मुंबई के किसी मॉल या फिर मशहूर मंदिर में जाता हूं तो गेट पर इस सुरक्षा जांच को देखकर मिलेजुले भाव आते हैं। इस प्रक्रिया को देखकर गुस्सा भी आता है, हंसी भी आती है और निराशा भी होती है। दो टूक शब्दों में कहें तो इस तरह की सुरक्षा जांच किसी काम की नहीं है। इस काम के लिये तैनात किये जाने वाले सुरक्षाकर्मियों की शक्लों पर कभी गौर कीजिये। इनकी शक्ल पर आपको सिर्फ बोरियत और अपने काम के प्रति अरूचि ही दिखाई देगी। इंसान की शक्ल में ये रोबोट होते हैं। मेटल डिटेक्टर छुआकर आपके शरीर की जांच या फिर आपके बैग को देखना सिर्फ एक रस्म नजर आती है। इन्हें देखकर आपको नहीं लगेगा कि वाकई में इनकी दिलचस्पी कडी सुरक्षा जांच करके किसी संदिग्ध को आपत्तिजनक सामग्री के साथ पकडना है। कई बार मैं सोचता हूं कि अगर इन्होने कभी किसी अपराधी या आतंकी को हथियार के साथ पकड भी लिया तो क्यो करेगे? शॉपिंग मॉल्स में लगाया गये ज्यादातर निजी सुरक्षागार्ड हथियारों से लैस नहीं हैं। जब तक ये कुछ कर पायेंगे तब तक तो वो शख्स अपना काम करना शुरू कर चुका होगा। मुंबई के तमाम सार्वजनिक ठिकानों पर सुरक्षा इंतजामों को देखने के बाद मुझे ये विश्वास हो गया है कि ऐसे इंतजाम सुरक्षा के नाम पर सिर्फ आंखों में धूल झोंकने का काम कर रहे हैं। साल 2010 में मैने मुंबादेवी मंदिर में एक स्टिंग ऑपरेशन किया था। उस ऑपरेशन में ये दिखाया गया था कि किस तरह से मैं मंदिर की सुरक्षा जांच से गुजरने के बावजूद लोहे के फर्जी रिवॉल्वर के साथ मंदिर में दाखिल हो गया। मैने मंदिर परिसर में बडी देर तक एक काले रंग का बैग भी रख छोडा, लेकिन उस पर न तो मंदिर के निजी सुरक्षा गार्ड्स की नजर पडी और न ही ड्यूटी पर तैनात पुलिसवालों की। मंदिर परिसर में सीसीटीवी भी लगे हुए थे।

मैं तमाम सार्वजनिक ठिकानों पर लगाये गये निजी सुरक्षा गार्ड्स को प्रभावी नहीं मानता हूं। मुझे उनकी ट्रेनिंग और किसी हथियारबंद से निपटने में उनकी काबिलियत पर भी शक है। शॉपिंग मॉल के कार पार्क भी सुरक्षित नहीं नजर आते। हालांकि मॉल में घुसते वक्त आईने के जरिये आपकी कार का निचला हिस्सा देखा जाता है और आपको कार की डिग्गी खोलने के लिये कहा जाता है, लेकिन मुंबई के किसी भी मॉल के पास ऐसी व्यवस्था नहीं है जिससे इस बात का पता लगाया जा सके कि कार में कहीं विस्फोटक तो नहीं? पूरी प्रक्रिया मुझे बेकार नजर आती है और लोगों को सुरक्षित होने का झूठा अहसास दिलाती है। हवाई अड्डा एकमात्र ऐसी जगह है जहां नजर आता है कि सुरक्षा गंभीरता से ली जाती रही है (हालांकि, कई लोगों के अनुभव इससे अलग हो सकते है) अगर आप अपने हैंडबैग में शेविंग रेजर या सिग्रेट लाईटर ले जा रहे हैं तो 99.9 फीसदी आप पकडे जा सकते हैं। मुझे याद है साल 2010 में जब मैं मलेशिया की राजधानी क्वालालुमपुर से लौट रहा था तब मेरा कैमरामैन अनजाने में वहां की सुस्त सुरक्षा जांच को पार करते हुए सिग्रेट लाईटर हवाई जहाज के भीतर तक ले आया। याद की कीजिये 1999 में जिस IC-814 विमान को हाईजैक किया गया था उसमें हथियारबंद आतंकी काठमांडू से सवार हुए थे, भारत के किसी हवाई अड्डे से नहीं।

अमेरिका दौरे के वक्त मैने वहां की कई सरकारी इमारतों, हवाई अड्डों, बडे होटलों, शॉपिंग मॉल्स, एफबीआई मुख्यालय और संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्यालय की सुरक्षा व्यवस्था देखी। कहीं पर सुरक्षा को लेकर ढीला रवैया नजर नहीं आया। सुरक्षा के लिये तैनात गार्ड सिर्फ वहां अपनी मौजूदगी दर्शाने के लिये नहीं खडे दिखे, बल्कि उनसे व्यावासायिकता झलक रही थी। उन्हें इस बात का अति आत्मविश्वास भी नहीं था कि सिर्फ उनकी मौजूदगी देखकर बदमाश भाग खडे होंगे। कई लोगों की नजर में अमेरिकियों की ओर से अपनाई जाने वाली सुरक्षा प्रक्रिया अपमानजनक और गलत हैं, लेकिन मेरा मानना है कि 9-11 के बाद अमेरिका ने कई सही पाठ पढे हैं।

इंसान अपनी गलतियों से सीखता है। मुंबई शहर जिसने बीते 10 सालों में 12 आतंकी हमले देखे हैं जिनमें कुल 500 के करीब लोग मारे गये और 1000 से ज्यादा घायल हुए को अब तक काफी कुछ सीख लेना चाहिये था। कम से कम 26-11 के हमलों के बाद जो कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे बडा आतंकी हमला था हमें हमारी सुरक्षा जरूरतों के प्रति और ज्यादा संवेदनशील होने की जरूरत है। हमें से मेरा तात्पर्य महज सरकारी एजेंसियों से ही नहीं बल्कि निजी संस्थानों और आम नागरिकों से भी है। ये अफसोसजनक भी है और चिंताजनक भी कि हमने अब तक सबक नहीं लिया है। 26-11 जैसे हमलों का खतरा हम पर अब भी वैसा ही है जैसा पहले था।


ऐसा नहीं है कि हमारी सुरक्षा एजेंसियां हाथ पर हाथ धरे बैठीं हैं। आये दिन मंदिरों, होटलों, स्कूलों वगैरह के बाहर होने वाले मॉक ड्रिल्स से पता चलता है कि सुरक्षा एजेंसियां खराब से खराब हालात से निपटने के लिये तैयारियां कर रहीं है। आप गणोशोत्सव, स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस वगैरह के पहले सडक पर भारी नाकेबंदी भी पायेंगे। यहां मेरा सवाल है कि क्या हम अपनी हिफाजत को सिर्फ इन सुरक्षा संगठनों के हाथ ही छोड दें? हमें इनकी सीमांए पता हैं और साथ ही इनके राजनीतिक आकाओं का चरित्र भी...ऐसे में इनपर निर्भर रहना कितनी समझदारी होगी? यही नहीं किसी भी आतंकी हमले के वक्त ये सुरक्षाकर्मी ही हालात से निपटने वाले First Responders  होंगे ऐसा नहीं है। इनकी जगह पर आम नागरिक या निजी सुरक्षा गार्ड भी हो सकते हैं। बदलती दुनिया में सुरक्षा की परिकल्पना बहुआयामी होनी चाहिये जो कि समाज की सभी इकाईयों को शामिल करे। हर किसी को सुरक्षित रहने की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेनी होगी। 

Nairobi didnt learn from 26/11, have we?

While entering a shopping mall you are greeted by safari wearing men, they ask you to pass through a DFMD (Door Frame Metal Detector) they touch your various body parts with hand held metal detectors, another guy asks you to open your bag and just peeps into it and then you gain access to the mall. Every time I visit a mall or a famous temple in Mumbai, I experience a mixed feeling of anger, amusement & disappointment for this so called “Security Check” procedure. To be blunt, they are good for nothing. Just look at the faces and body language of the guys who have been assigned this job. They look bored, uninterested and act like robots. Touching the hand held metal detector to your body or having a look at your bag just seems to be a ritual. They don’t seem to be genuinely interested in scrutinizing your belongings and finding something suspicious or objectionable from you. Often, I wonder, if some criminal or terrorist is really caught with arms then what will they do? Most of the private guards employed by shopping malls in Mumbai are unarmed. By the time they respond to the situation or call the police, the ill intentioned guy would begin doing what he intended to do. My observations of security arrangements at public places in Mumbai have made me believe that they are a sham. Once, I did a sting operation in 2010 to check security arrangements at Mumbadevi Temple and easily managed to gain entry with a metal toy gun. I also kept a black coloured bag in the temple complex which neither caught attention of the private security guards, nor the local cops posted at the temple. The premises was cctv monitored.

At most of the public places where private security guards are deployed, I don’t see that they are effective. I also have doubts on their training and ability to deal with situations when somebody with arms confronts them. Neither the car parks of shopping malls etc seem to be safe, although, there might be guards at the entrance who will check the bottom of your car with a mirror and ask you to open the dickey of your car. This car check just seems to be an eyewash. I don’t think they have any means to determine whether the vehicle is carrying explosives. The whole procedure seems to be pointless & gives you a false sense of security. Airport is the only place in Mumbai where I see that the security is taken seriously (some may have doubts on that also). Even if you are carrying a shaving razor or a cigarette lighter there is a 99% chance that it will get detected by CRPF guys. I remember returning from Kualalumpur in 2010 when my cameraman cleared the much casually implemented security check procedure and boarded the aircraft with a lighter unintentionally. Remember, in the case of IC-814 hijacking in 1999, the hijackers had boarded the flight from Kathmandu & not from any of the Indian airports.

I have undergone security procedures at the US airports & numerous federal buildings at Washington DC and New York City including the UN headquarters. Everywhere, I have found that there is no nonsense approach towards security & men deployed for the job display thorough professionalism. They aren’t posted there just to make their presence felt & aren’t overconfident that the evil doer will deter from carrying out his mission just by looking at them. Many people criticise the security checks in the US as disrespectful, impolite and absurd, but I think whatever the accusations may be, US has learnt right lessons post 9/11.

Humans learn from their mistakes. Mumbai city which has seen 12 terrorist attacks since last 10 years which killed around 500 people & injured more than 1000 should have learnt its lessons by now. At least post 26/11 attacks which were the worst in the history of free India should have made us more sensitive towards the security requirements of Mumbai. By “us” I mean not just the governmental agencies, but also private bodies & individuals. Being safe is everybody’s concern. However, it is sad & worrisome that we haven’t learnt our lessons yet. Still we are very much vulnerable to terrorist attacks.

It is not that our security agencies are not doing anything. Frequent mock drills by our commando forces at temples, schools, hotels etc show that they are always in preparation for the worst. You will also see frequent nakabandis on streets when some national celebration like Independence Day or Republic Day is approaching. Here, my question is that shall we just rely on the security forces to protect us? We know their limitations & also the characters of the politicians who command them, and then, how far will it be prudent to just be dependent on them? Moreover, they may not be the first responders all the time in an adverse situation. The first responders might be anybody from general public to private security guards. The idea of security has to be multifaceted involving every section of our social structure. The collective consciousness of becoming safe & taking onus on oneself is required. So next time when you are frisked at the entrance of a shopping mall, don’t believe that this is going to take care of our security inside.

Monday, 16 September 2013

मुंबई को क्यों चाहिये सांप्रदायिक सौहार्द की घुट्टी?



मुज्जफरनगर में भडकी सांप्रदायिक हिंसा ने साल 1992-93 में मुंबई में हुए दंगों की यादें फिर ताजा कर दीं। उस दौरान मैं एक स्कूली छात्र था और उस उम्र में मैने जो देखा वो तस्वीरें आज भी जेहन में साफ हैं। मेरी पैदाईश शहर के कुख्यात बंबई नंबर 3 में हुई थी। यहां हिंदू और मुसलमानों की मिलीजुली आबादी है और मेरा घर उस जगह था जहां सडक के एक ओर हिंदुओं के घर हैं और दूसरी ओर मुसलिमों के। वो सडक हिंदू और मुसलिमों दंगाई गुटों के लिये कुरूक्षेत्र बन गई थी। वे खौफनाक पल आज भी रोंगटे खडे कर देते हैं - किस तरह से किसी के पेट में तलवार घुसेड कर अंतडियां बाहर निकाली गईं, कैसे किसी को पेट्रोल से नहलाकर माचिस सुलगा दी गई, कैसे किसी को पकड कर उसके सिर में गोली दागी गई। दिसंबर 1992 और जनवरी 1993 के दूसरे हफ्ते के अखबारों में छपने वाली लगभग हर खबर इंसानियत को शर्मसार कर देने वाली थी। वे रातें भी किसी कयामत से कम नहीं थीं। कब किसी इमारत को आग लगा दी जायेगी, कब पेट्रोल बम से दंगाई हमला कर देंगे जैसे सवालों ने नींद उडा रखी थी। जिस इंसान ने कभी जिंदगी में मक्खी भी न मारी हो, वो दंगाईयों से बचने के लिये घर में पेट्रोल बम बना रहा था, साईकिल की चैन, हॉकी स्टिक, चॉपर और बडे बडे पत्थरों का ढेर घर पर इक्टठा कर रहा था। कई दिनों तक चलने वाले कर्फयू ने उन लोगों की जिंदगी भी नर्क बना दी थी जो कि दंगे से सीधे तौर पर प्रभावित नहीं हुए थे। जो लोग कुछ दिन पहले ही मां-बाप बनने की खुशी मना रहे थे, उनके पास अब अपने नवजात बच्चे की खातिर दूध नहीं था, कुछ के घर पर राशन खत्म हो गया था और जिनके यहां राशन था उनके पास खाना पकाने के लिये रसोई गैस खत्म हो गई थी। घर पर बीमारी से तडपते बुजुर्ग को अस्पताल न ले जा पाने की मजबूरी थी। कुछ लोग सोच सकते हैं कि इस लेख के जरिये गडे मुर्दे उखाडने का क्या फायदा। किसी भी सांप्रदायिक दंगे में इस तरह की त्रासदी होती ही है...लेकिन मेरा मानना है कि उन दंगों की यादें ताजा रखना जरूरी है। उन दंगों के दौरान जो कुछ भी हुआ उसे मिटाना खतरनाक हो सकता है...खासकर उस पीढी के लिये जिसने उन दंगों को नहीं देखा है, उसका दर्द महसूस नहीं किया है।

जो लोग आज 15 से 25 साल के बीच हैं वे या तो मुंबई दंगों के वक्त बहुत ही छोटे थे या फिर पैदा ही नहीं हुए थे। इन्हें इस बात का अंदाजा नहीं है कि सांप्रदायिक हिंसा की आग क्या क्या लील सकती है, उससे कैसी तबाही मच सकती है। ये उस उम्र के लोग हैं जिन्हें नफरत का जहर फैलाने वाले बडी ही आसानी से अपने झांसे में ले लेते हैं, उनके अपरिपक्व दिमाग और गर्म खून को गलत दिशा की ओर मोडते हैं। याद कीजिये 11 अगस्त 2012 को मुंबई के आजाद मैदान के बाहर हुए दंगे को जिसमें खासकर पुलिस और मीडिया को निशाना बनाया गया था। पकडे गये लगभग सभी दंगाई इसी उम्र के थे। उस तारीख को हुई हिंसा पर तो उसी दिन काबू पा लिया गया लेकिन उस घटना ने मुंबई के लिये खतरे की घंटी जरूर बजा दी है। उसने ये सवाल भी पूछने को मजबूर किया है कि मुंबई में सांप्रादायिक सौहार्द पैदा करने के लिये जो कुछ भी किया जा रहा है क्या वो पर्याप्त है और वाकई में इस दिशा में कुछ किया जा भी रहा है क्या ?

सांप्रादायिक एकता के इरादे से मुंबई में मोहल्ला एकता कमिटी शुरू की गई थी। मोहल्ला कमिटी का ये फार्मूला सुरेश खोपडे नाम के एक पुलिस अधिकारी ने 1993 के मुंबई दंगों के दौरान पास के कस्बे भिवंडी में अपनाया था। भिवंडी का सांप्रादायिक दंगों का काला इतिहास रहा है, लेकिन खोपडे के मुताबिक बाबरी कांड के बाद वहां दंगे इसलिये नहीं भडके क्योंकि मोहल्ला एकता कमिटी सिस्टम को वहां लागू किया गया था। इस सिस्टम के तहत हर ऐसे इलाके में जो सांप्रादियक तौर पर संवेदनशील है, वहां एक कमिटी बनाई जाती है, जिसमें हिंदू और मुसलिम समाज के स्थानीय नेताओं को सदस्य बनाया जाता है और कमिटी का कामकाज स्थानीय पुलिस की देखरेख में होता है। शिवसेना, बीजेपी, मुसलिम लीग, समाजवादी पार्टी जैसी सियासी पार्टी के नेताओं को भी इनका सदस्य बनाया जाता था। कमिटी की जिम्मेदारी होती थी कि ऐसी गतिविधियां आयोजित की जायें जिससे दोनो कौमों के लोगों के बीच आपसी विश्वास बढे और नफरत कम हो। 1992-93 के बाद मुंबई में भी ऐसी तमाम कमिटियां बनाई गईं। दंगों के कई साल बाद तक इनकी मौजूदगी भी नजर आई। गणपति विसर्जन का जुलुस अगर किसी मसजिद के सामने से नमाज के वक्त गुजरता तो कमिटी के लोग गणपति मंडल के सदस्यों का फूल देकर स्वागत करते और उनसे शालीन शब्दों में बैंड बाजा बंद करने की गुजारिश की जाती। कमिटी की ओर से दोनो संप्रदायों और पुलिस के बीच दोस्ताना किक्रेट मैच वगैरह भी आयोजित किये जाते। खैर, ये सब अबसे चंद साल पहले तक की बात थी। अब मोहल्ला कमिटियां सिर्फ नाम की रह गईं हैं। सिर्फ गणपति विसर्जन के वक्त ही उनका अस्तित्व नजर आता है। कई कमिटियों में आपराधिक पृष्ठभूमि के लोग घुस गये हैं जिनका मकसद कमिटी के जरिये पुलिस अधिकारियों के साथ करीबी हासिल करना होता है।


1992-93 में जब मुंबई में दंगे हुए थे तब पूरे देश का माहौल खराब था। बाबरी मसले ने दोनों समुदायों के बीच की खाई को और गहरा कर दिया था। इस वक्त वैसा कुछ नहीं है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि हम ये मानकर बैठ जायें कि मुंबई में फिरसे दंगे नहीं होंगे। 11 अगस्त 2012 को आजाद मैदान के बाहर जो कुछ भी हुआ वो एक मिसाल है कि नफरत की चिंगारी कभी भी शोले की शक्ल ले सकती है। सांप्रदायिक हिंसा के बम को चिंगारी लगाने के लिये बहानों की कमी नहीं है। चुनाव नजदीक हैं और चंद राजनेता अपनी कामियाबी सुनिश्चित करने की खातिर किसी भी हद तक जा सकते हैं। आये दिन आतंकियों की ओर से बम धमाके होते रहते हैं। इनके पीछे भी छुपा हुआ मकसद सांप्रदायिक हिंसा पैदा करना ही होता है। 1993 बमकांड के आरोपियों के इकबालनामों को पढेंगे तो पता चलेगा कि धमाके के बाद दाऊद गिरोह ने फिरसे मुंबई में एक सांप्रदायिक दंगे की उम्मीद की थी। वैसे भी खुफिया एजेंसियों की ओर से तो ये अलर्ट आ ही रखा है कि देश के दुश्मन फिरसे सांप्रदायिक दंगे करवाने की फिराक में हैं।


सांप्रदियक दंगों पर किये गये तमाम अध्ययनों से पता चलता है कि कोई भी दंगा किसी एक वारदात से नहीं भडकता बल्कि उसके पीछे एक के बाद एक कई घटनाओं का सिलसिला होता है, आर्थिक कारण होते हैं, सामाजिक कारण होते हैं जिनसे दोनो संप्रदायों के बीच कटुता बढती जाती है। अपने गुस्से का इजहार करने के लिये दोनो संप्रदाय के लोग बस मौका ढूंढ रहे होते हैं और ऐसे में कोई छोटी सी वारदात भी बडे नरसंहार का सिलसिला शुरू कर देती है। मेरी नजर में आज जरूरत है कि मौजूदा पीढी को सांप्रादियक हिंसा के खौफ से वाकिब कराया जाये, उन्हें 1992-93 के बारे में बताया जाये, जिन कारणों से दंगों होते हैं उन्हें रोकने के लिये कोई तकनीक बनाई जाये, फिर चाहे वो मोहल्ला कमिटी सिस्टम को फिरसे दुरूस्त किया जाना हो या फिर उससे बेहतर किसी तरीके का अपनाया जाना। मुंबई के दंगों ने हमारे कई विश्वासों को झूठा साबित किया था जैसे कि मुंबई एक आधुनिक सोच वाला शहर है, मुंबई में हर कोई अपनी रोटी-रोजगार के बारे में ही सोचता है, मुंबई में किसी को किसी से लडने की फुर्सत नहीं वगैरह। हमें वैसा झटका फिरसे न लगे इसकी खातिर मुंबई को फिरसे सांप्रादियक सौहार्द की घुट्टी पिलाने की जरूरत है।

Why Mumbai Needs A Dose of Communal Harmony Urgently?




The communal clashes of Muzzafarnagar have refreshed my memories of Mumbai riots of 1992-93. I was a school going kid that time & whatever I witnessed at that age is still clear in my consciousness. I was born & brought up in city’s infamous locality of “Bombay Number 3”. The locality is having a mixed population of Hindus & Muslims & my house was located beside a road whose one side was occupied by Hindus & another by Muslim residents. The road became a battleground of the two warring communities during those riots. I still remember those pictures where somebody’s intestines were ripped apart by a sword, where somebody was bathed with petrol & then a burning match stick was thrown at him & how a rioter shot somebody in his head. Daily newspapers published during the second week of December 1992 & January 1993 were full of stories which ashamed humanity. Nights were no less than hell. Nobody was able to sleep fearing attacks from rioters. Even a person who had never killed a fly made petrol bombs at his home & collected cycle chains, hockey sticks, choppers & stones to defend himself & family from the rioters. Curfew imposed by the authorities made survival difficult for people who were not directly affected by the riots. A couple who was celebrating parenthood till few days back was left with no milk to feed their infant. Some families ran out of eatables, while many had no cooking gas to cook. Some families were not able to take their ailing elders to hospital. You may ask, what is the point in digging out such past? Such misery is caused in any communal riots…but I believe it is necessary to keep those memories alive. It will be disastrous to erase what happened during in 1992-93, especially for that generation which has not witnessed those riots & have not felt that pain.

Those people who are amongst the age group of 15-25 years today were either not born during Mumbai riots or were too young at that time. They don’t have much idea of what havoc communal riots can play & what could be their long & short term effects. They belong to an age group which could be easily brain washed by hate mongers. Their immature minds & boiling blood could be easily used for evil agendas. Remember 11 August 2012 riots of Azad Maidan where media personnel & cops were targeted. Most of the rioters arrested by cops belonged to this particular age group. The violence happened that day was controlled in few hours, but that incident has set an alarm for future. It has also raised a question whether we are doing enough in Mumbai to strengthen communal harmony & whether we are doing anything at all in this direction?

Mohalla Ekta Committee System was initiated in Mumbai with an idea of generating communal harmony. This formula was adopted by a police officer named Suresh Khopade in Bhiwandi which is a town near Mumbai. Bhiwandi has a black history of communal riots but Khopade believes that communal riots didn’t happen there post Babri incident due to Mohalla Ekta Committes. According to this system Mohalla Committees are formed in those areas which are communally sensitive. Local leaders of Hindu & Muslim communities are made members of such committees and their functioning is supervised by local cops. Local leaders of parties like Shiv Sena, BJP, Muslim League & Samajwadi Party were also made members of Mohalla Committees. The committees were entrusted with responsibility of organizing activities which attempt to boost mutual trust between the communities & reduce hostilities. Many such committees were set up in Mumbai post 1992-93 riots. Their presence was felt till many years after the riots. If a procession for Ganpati immersion passed in front of a mosque at the time of prayers, members of committee greeted the revellers with flowers & politely requested them to shut down the band. The committees also organized friendly cricket matches between the communities & with the cops. Anyways, such committees have now become defunct. They now exist just for the namesake & their existence is seen just during Ganpati immersions or Iftaar parties. People with shady backgrounds have become members of many such committees with the agenda of gaining proximity with cops.

1992-93 riots of Mumbai happened when the general environment of the nation was awful. Babri issue had deepened the gorge between the two communities. Things are different now, but that doesn’t mean that we should sit idle assuming that communal riots will never happen again in Mumbai. Whatever happened on August 11, 2012 at Azad Maidan is an example that communal clashes can flare up again anytime. Elections are around the corner & few politicians may go to any extent to ensure their success. Frequent bomb blasts across the country also intend to ignite communal violence. Confessional statements of 1993 blasts accused indicate that Dawood Ibrahim’s gang anticipated another communal riot in Mumbai post serial bombings. Moreover, Indian intelligence agencies have also warned that anti national elements are waiting for a chance to cause communal riots.


Various studies & researches conducted on communal riots suggest that any big communal riot is not caused by just a standalone incident. A series of incidents one after the other, economic factors & social factors lead to bitterness between the communities. Any minor provocation provides the warring communities an opportunity to ventilate their hostilities & leads to a carnage. In my view, the present generation must be informed about the consequences of communal clashes & should be told what this city witnessed during 1992-93. A system must be evolved to deal with the causes of communal riots which could include reviving Mohalla Ekta Committees or introducing something better. Mumbai riots also shattered our many beliefs like Mumbai is a city of progressive thinking, everybody is just concerned about his bread & butter in Mumbai & nobody has time to fight in this city. If we don’t want to get shocked like that again then a dose of communal harmony for the city is a must.

Tuesday, 3 September 2013

गद्दार हाथ आ भी गया तो...



हाल ही में केंद्रीय गृहमंत्री सुशीलकुमार शिंदे ने फरमाया कि जल्द ही दाऊद इब्राहिम को भी पकड कर भारत लाया जायेगा. यूपीए सरकार के बाकी मंत्रियों की ओर से देश की अर्थव्यवस्था, विकास और भ्रष्टाचार के खिलाफ दिये गये तमाम बयानों के बीच कम से कम शिंदे के इस बयान में थोडा दम नजर आता है. जिस तरह से हाल में अब्दुल करीम टुंडा और यासीन भटकल जैसी बडी मछलियां पकडीं गईं, अमेरिका की ओर से जो दबाव पाकिस्तान पर बनाया जा रहा है और पाकिस्तान के भीतर जो घटनाक्रम हो रहे हैं, उनको देखते हुए दाऊद की गिरफ्तारी अब सिर्फ सपना ही नजर नहीं आती. सूत्र भी बताते हैं कि डी कंपनी में इन दिनों सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है.

मान लें कि अगर दाऊद जिंदा हमारे हाथ आ भी जाता है तो सवाल उठता है कि हम उसके साथ क्या कर पायेंगे? क्या दाऊद को उसके सारे गुनाहों और आतंकी वारदातों के लिये सजा मिल पायेगी? क्या उसका दुनियाभर में फैला संगठित अपराध का गिरोह खत्म हो जायेगा. इन सवालों के जवाब उन हालातों में छुपे होगें जिनमें वो हमारी एजेंसियों के हाथ लगेगा। पाकिस्तान फिलहाल आधिकारिक तौर पर तो दाऊद को हमें सुपुर्द करने से रहा क्योंकि उसका पक्ष रहा है कि दाऊद हमारी जमीन पर है ही नहीं (हालांकि उनके एक राजनयिक की जुबान से हाल ही में सच्चाई फिसल गई थी, जिसका बाद में उन्होने खंडन किया)। अगर दाऊद खुद को जानबूझकर यूरोपीय संघ के किसी देश में गिरफ्तार करवा लेता है, जैसा कि अबू सलेम के मामले में हुआ तो उसे भारत लाने के लिये हमारी सरकार को पहले वहां एक कानूनी लडाई लडनी होगी। उसका प्रत्यर्पण कई शर्तों के साथ होगा जैसे कि मौत की सजा नहीं दी जानी चाहिये, 25 साल से ज्यादा की सजा नहीं दी जानी चाहिये, सुरक्षा दी जानी चाहिये वगैरह। इस तरह से सशर्त दाऊद का भारत आना जाहिर तौर पर भारतवासियों की अपने सबसे बडे गुनहगार और गद्दार के पकडे जाने की खुशी को फीका करे देगा।

दूसरा, भारतीय कमांडो दस्तों की ओर से अबोटाबाद सरीखे ऑपरेशन का विकल्प सिर्फ काल्पनिक ही है। हालांकि, हमारी सरकार दाऊद के ठिकानों से वाकिफ है, उसके खिलाफ अमेरिकियों की तरह दुश्मन की जमीन पर ऑपरेशन करने का हमारे पास अनुभन नहीं है। ऐसी कोशिश भी करने से दोनो परमाणु हथियारों से लैस राष्ट्रों के बीच जंग छिड सकती है।

तीसरा विकल्प हो सकता है कि दाऊद को नेपाल सीमा से पकडा जाये या फिर किसी गैर यूरोपीय संघ राष्ट्र से उसे डीपोर्ट कराया जाये (ये तब ही मुमकिन है जब दाऊद अपनी जान बचाने के लिये खुद को सरेंडर करे)। इसी हालात में भारतीय एजेंसियां खुलकर दाऊद के खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर सकेंगीं और अपनी मर्जी के मुताबिक दाऊद के खिलाफ मुकदमा चला सकेंगी। हालांकि, दाऊद की गिरफ्तारी के बाद भी आगे का रास्ता आसान नहीं होगा।

ये सच है कि दाऊद मुंबई अंडरवर्लड का सबसे क्रूर, खतरनाक और शातिर चेहरा है। एक वक्त था जब दाऊद के नाम के जिक्र से ही बडी बडी फिल्मी हस्तियों, बिल्डरों, व्यापारियों और क्रिकेटरों के पसीने छूट जाते थे। दाऊद के नाम से जो खौफ पैदा होता था उससे उसके गिरोह ने खूब पैसे उगाहे। बहरहाल, दाऊद ने 90 के दशक के मध्य में खुद फोन करना बंद कर दिया। सिर्फ हाल ही में दिल्ली पुलिस ने एक मैच फिक्सिंग मामले की तहकीकात के दौरान दाऊद की उसके एक गुर्गे से बातचीत का रिकार्ड हासिल किया। दाऊद के ज्यादातर कॉल उसका दाहिना हाथ छोटा शकील (बाबू शकील अहमद मियांजान शेख) करता था। दाऊद पर पुलिस और मीडिया ने तमाम गुनाहों के आरोप लगा रखे हैं, लेकिन सवाल ये है कि क्या पुलिस के पास इतने सबूत हैं कि वो दाऊद का नाम उसके गिरोह की ओर से अंजाम दिये गये गुनाहों के साथ जोडकर अदालत में साबित कर सके। ये कोई भी अंदाजा लगा सकता है कि खुद की पैरवी के लिये दाऊद राम जेठमलानी सरीखे बडे से बडे वकीलों की फौज खडा कर देगा (दाऊद ने जेठमलानी को फोन करके एक बार सरेंडर करने की भी पेशकश की थी) जो सीबीआई की ओर से लगाये गये आरोपों को तार तार करने में कोई कसर नहीं छोडेंगे । इसके अलावा जहां तक 80 के दशक और 90 के दशक की शुरूवात में दाऊद के खिलाफ दर्ज मामलों का सवाल है तब के ज्यादातर जांच अधिकारी या तो रिटायर हो गये हैं, मर गये हैं या फिर मुंबई से बाहर रहने चले गये हैं। गवाहों का भी यही हाल है। अगर पुलिस कई गवाहों को खोज भी लाती है तो ये जानना दिलचस्प होगा कि कितने गवाह अदालत में दाऊद के खिलाफ गवाही दे पाते हैं।

जहां तक 12 मार्च 1993 के सिलसिलेवार बम धमाकों का ताल्लुक है, सीबीआई के लिये टाडा कोर्ट में अपने आरोप साबित कर पाना काफी चुनौतीपूर्ण होगा। हालांकि, इस मामले में दाऊद आरोपी नंबर 1 है लेकिन जो भारी भरकम चार्जशीट अदालत में दाखिल की गई उसमें दाऊद की भूमिका का जिक्र सिर्फ 3 जगह पर आता है। यहां भी दाऊद के खिलाफ सबूत सिर्फ 3 आरोपियों के इकबालिया बयान पर आधारित है (दाऊद फणसे, सलीम मिरां शेख और इजाज पठान)। दाऊद के खिलाफ भी अबू सलेम और मुस्तफा दौसा की तरह अलग मुकदमा चलेगा क्योंकि मुख्य मुकदमा साल 2007 में ही खत्म हो चुका है और टाडा अदालत आरोपियों के भविष्य का फैसला सुना चुकी है।

बहरहाल, हमें पूरी तरह से नाउम्मीद होने की भी जरूरत नहीं है। ये विश्लेषण सिर्फ सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध जानकारी के आधार पर किया गया है। फिलहाल ये मानना ही बेहतर होगा कि हमारी खुफिया और जांच एजेंसियों उपरोक्त चुनौतियों से वाकिफ होंगीं और उन चुनौतियों से निपटने के लिये उनके पास रणनीति भी तैयार होगी। देर सबेर हमें निम्न में से एक खबर मिलने ही वाली है- दाऊद इब्राहिम की बीमारी के कारण मौत, दाऊद इब्राहिम गिरफ्तार या दाऊद इब्राहिम की हत्या। आप कौनसी वाली सुनना चाहते हैं?

  

Even if we get the traitor...


Recently, Home Minister Sushilkumar Shinde stated that we will also get Dawood Ibrahim soon. Unlike, all other statements made by UPA ministers regarding country's economy, progress & measures against corruption, this one seem to have some substance. Considering the recent arrests of big fishes like Abdul Karim Tunda & Yaseen Bhatkal, the US pressure on Pakistan & internal circumstances within Pakistan, it is no longer just a patriot's fantasy to see Dawood behind Indian bars. Sources also point out that everything is not going all right within D –Company itself.

Assuming, we are able to get Dawood alive, the questions arises what will we be able to do with him? Will he be punished for all the crimes & terrorist activities attributed to him? Will his global organised crime syndicate cease to exist? Answers to these questions lie in the manner in which our agencies get him. Firstly, Pakistani govt will never officially hand him over to us as their stand has been "Dawood is not on our soil". (Although, recently one of its diplomat's tongue slipped the truth, but for obvious reasons he denied it shortly after.)If he deliberately gets arrested from some European Union country like Abu Salem did, then, India will have to first fight a legal battle for his extradition. The extradition may have preconditions like no death penalty, safety & no jail sentence of more than 25 years etc. Home coming of Dawood in such a manner will certainly steal away the happiness of people for getting India's biggest criminal & a traitor. 

Secondly, Abottabad type of operation by Indian commando forces is an unrealistic option. Although, our government might be aware of his hideouts, we don’t  have expertise to conduct such operations in a hostile territory like Americans. Even if we attempt one, then it might lead to a full fledged war between the two nuclear armed nations. 

Third option will be to get him from Nepal border or his deportation from a non-European country, (that is only if Dawood chooses to surrender himself after fearing for his life). Only in such a scenario Indian agencies will get a free hand to prosecute him in cases they want him to. However, even after arrest of Dawood, the road ahead will not be a cakewalk.

It is true that Dawood Ibrahim has been the most cruel, dangerous & cunning face of Mumbai underworld. There was a time when just a mention of his name caused film producers, builders, cricketers & businessman to sweat & earned his gang loads of money which was extorted from the fear his name generated. However, Dawood had quit making direct calls in mid 90s. Only recently a brief conversation of him with one of his cronies was intercepted by Delhi cops in a match fixing case. Other than this most of the calls on his behalf were made by his lieutenant Chota Shakeel (Babu Shakeel Ahmed Miyazaan Shaikh). He has been be attributed to so many crimes by media & police, but the question is whether cops have enough evidence to produce in a court of law to link him with all the crimes committed by his gang members. It is anybody's guess that he will hire top lawyers equivalent to the stature of Ram Jethamalani (whom once he offered to surrender) to tear apart the charges against him in the courts. Moreover, as far as cases against him during the decade of 80s & early 90s are concerned most of the investigating officers are either retired, dead or relocated out of Mumbai. Same is the case with witnesses also. It will also be interesting to observe that even those witnesses whom cops will be able trace, depose against Dawood in the court or not. 

As far as his role in serial blasts of 12 March 1993 is concerned, it will be very tough for CBI to prove its case in TADA court. Although, Dawood is accused number 1 in the case, his role is mentioned only thrice in the elephantine chargesheet filed by CBI. Here also the evidence against Dawood is solely based on the statements of co-accused persons (Dawood Phanse, Salim Miraan Shaikh & Ijaz Pathan). He will be tried separately like Abu Salem & Mustafa Dossa as the main trial has ended in 2007 & the fate of all other accused has been decided by the court.


However, there is still no reason to get disappointed as yet. The above analysis is purely based on the information available in public domain. For the time being it is better to assume that our intelligence & security agencies are aware of the above challenges & have a strategy to counter them, which we don’t know. Anyways, sooner or later we will be hearing any one of the following as breaking news- “Dawood Ibrahim dies due to illness”, “Dawood Ibrahim arrested” or “Dawood Ibrahim killed”. Which one you want to hear?