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Sunday, 27 June 2010

The No Nonsense Blog: मुंबई में हर हफ्ते होता है "भूतों" का जमावडा।

The No Nonsense Blog: मुंबई में हर हफ्ते होता है "भूतों" का जमावडा।: "मुंबई में हर गुरूवार एक जगह होता है ऐसे लोगों का जमावडा जिनके बारे में नाते रिश्तेदार मानते हैं कि उन्हें भूत-प्रेत ने जकड रखा है। ये लोग वह..."

मुंबई में हर हफ्ते होता है "भूतों" का जमावडा।

मुंबई में हर गुरूवार एक जगह होता है ऐसे लोगों का जमावडा जिनके बारे में नाते रिश्तेदार मानते हैं कि उन्हें भूत-प्रेत ने जकड रखा है। ये लोग वहां नाचते हैं गाते हैं, ऊट पटांग हरकतें करते हैं और अपने आप से बातें करते हैं।मैने खुफिया कैमरे से जब इसकी पडताल की तो पाया कि मुंबई जैसे शहर में भी कई पढे लिखे लोग अंधविश्वास में यकीन करते हैं और अपने बीमार नाते रिश्तेदारों का इलाज कराने तंत्र-मंत्र का सहारा लेते हैं। डेढ करोड की आबादी वाला महानगर मुंबई देश के सबसे आधुनिक शहरों में से एक गिना जाता है...लेकिन अपनी इस पडताल में मैने जो तस्वीर देखी वो मुंबई की इस इमेज से मेल नहीं खाती और आपको सोचने पर मजबूर कर देती है कि क्या वाकई में हम 21 वीं सदी में रहते हैं।


ये जगह है मुंबई के हार्बर लाईन रेल स्टेशन रे रोड के करीब दातार दरगाह।यहां हर गुरूवार की शाम सैकडों लोग जमा होते हैं। दरगाह के बाहर का माहौल बडा ही अजीब और डरावना होता है। कोई औरत लगातार 2 घंटे से झूम रही होती है। उसे लग रहा होता है कि उसके शरीर में किसी खतरनाक चुडैल की आत्मा घुस गई है। खुद को राक्षस समझ रहा एक आदमी बडी देर से इसी तरह अपना सिर हिला रहा होता है।कई महिलाएं चिल्ला चिल्लाकर अपने बाल घुमा रही होतीं है। उन्हें भी लग रहा होता है कि इनमें किसी शैतान की आत्मा समा गई है। दरगाह के बाहर मौजूद कई शख्स इसी तरह की ऊट पटांग हरकतें करते नजर आते हैं। उन्हें उनके रिश्तेदार यहां लेकर आते हैं। तांत्रिकों की जुबान में जब कोई शख्स ऐसी हरकत करे तो इसका मतलब है कि उसे हाजिरी आई है। हाजिरी आने का मतलब है कि उस शख्स के जिस्म में कोई सैतानी रूह हाजिर हुई है।इस जगह के बारे में ये प्रचारित हुआ है कि जो भी 5 या 7 गुरूवार इस दरगाह पर चक्कर लगा ले तो भूत, प्रेत वगैरह उसे तंग करना बंद कर देते हैं। यहां मुंबई के अलग अलग इलाकों से तो लोग आते ही हैं आसपास के शहरों से भी लोग यहां पहुंचते हैं। शाम को दरगाह पर सलामी के वक्त तो यहां पैर रखने की जगह भी मुश्किल से मिल पाती है और जब नगाडे की आवाज के साथ सलामी दी जाती है तो उस वक्त ऐसा लगता है मानो सारे भूत प्रेत एक साथ नाच उठे हों। इस तरह के अड्डे भारत के कई गाम्रीण इलाकों में भी हैं लेकिन मुंबई जैसे शहर में इसका होना मुझे अजीब लगा।

मुसीबत का मारा इंसान अपनी समस्या का हल पाने के लिये हर तरीका अपनाता है। जब दवा से काम नहीं चलता तो दुआ का सहारा लेता है..लेकिन कई ऐसे भी होते हैं जो इलाज के लिये दवा के बजाय सीधे तंत्र-मंत्र का सहारा लेते हैं।यहां आने वाले ज्यादातर मरीजों के रिश्तेदार ये मानते ही नहीं कि मरीज को कोई मानसिक बीमारी है। उनकी नजर में ये रूहानी ताकतों की चपेट में हैं और इनसे निपटने का तरीका तंत्र-मंत्र ही है न कि मेडिकल साईंस। यहां कई लोग ऐसे हैं जिनका दावा है कि बिना कोई बाहरी इलाज किये सिर्फ यहां आने से ही उनकी हालत में सुधार हुआ है। हमने वहां बात की एक शख्स से जिसका नाम है दशरथ गौतम। दशरथ ने बारहवीं तक पढाई की है और एक चश्मे के स्टोर में काम करता है। दिखने में वो एक आम सेहतमंद नौजवान जैसा ही है...लेकिन कई बार दशरथ अपना होश-ओ हवास खो देता है और उट पटांग हरकतें करने लगता है। तेजी से अपना सिर हिलाने लगता है..जोर जोर से चिल्लाने लगता है...बेहोश हो जाता है। दशरथ के घरवालों का मानना था कि उसे कोई रूहानी ताकत तंग कर रही है। उसके शिक्षक फूफा किसी की सलाह पर उसे दातार दरगाह ले आये। यहां 4 हफ्ते आने के बाद दशरथ का कहना है कि वहां जाने के बाद उसकी तबियत में सुधार हुआ है।

अपने मोबाईल कैमरे में दरगाह के बाहर की तस्वीरों को शूट करके मैं मनोचिकित्सक डॉ. यूसुफ माचिसवाला के पास पहुंचा। उन्हें तस्वीरें दिखाकर मैने पूछा कि लोग ऐसी हरकतें क्यों कर रहे हैं और मनोविज्ञान की नजर में ये सब क्या है। उनका कहना था कि मनोवैज्ञालिक जुबान में इस बीमारी को पजेशन सिंड्रम (POSSESSION SYNDROME) कहते हैं।कई बार लोग बचपन से ही भूत प्रेत वगैरह की कहानियां सुनते हैं और जब किन्ही कारणों से दिमागी सिस्टम अस्त व्यस्त हो जाता है तो लोगों को ये लगता है कि वे किसी आत्मा की गिरफ्त में हैं। ऐसे में कई लोग लोग मनोचिकित्सक के पास जाते हैं तो कई दरगाहों पर मत्था टेकने। डॉ माचिसवाला के मुताबिक अगर दरगाह पर जाने के बाद किसी की तबियत ठीक हो रही है तो इसके पीछे भी मनोवैज्ञानिक कारण है। वे इसे वैकल्पिक इलाज (ALTERNATE THERAPY) मानते हैं। लोगों से सुन सुन कर पीडित व्यकित के दिमाग में ऐसी आस्था जगह बना लेती है कि दरगाह पर जाने से वो ठीक हो जायेगा। उसका यही विश्वास धीरे धीरे उसे बीमारी से पीछा छुडाती है। ऐसी बीमारी का जन्म भी दिमाग में गहरे बैठे खयालों से होता है और उनका निदान भी दिमाग में खयालों से ही हो जाता है।

खैर मनोविज्ञान चाहे जो भी कहता है लेकिन इस रिपोर्ट पर काम करने के बाद मैं इसी निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि भले ही हम 21 वीं सदी में पहुंच गये हों लेकिन आज भी आस्था और अंधविश्वास के बीच की लकीर बहुत धुंधली है।

Friday, 25 June 2010

"दाऊदभाई न होते तो मुसलमानों का क्या होता.."

गुरूवार की सुबह मुझे हल्का बुखार लग रहा था और शरीर में कमजोरी भी महसूस हो रही थी। कार चलाकर दफ्तर जाने का मूड नहीं था इसलिये मैं टैक्सी से महालक्ष्मी में अपने दफ्तर पहुंचा। शाम को मुझे नानी से मिलने दक्षिण मुंबई के बॉम्बे अस्पताल जाना था, जहां वे मोतीबिंदू के ऑपरेशन के लिये भर्ती हुईं थीं। मैने महालक्ष्मी से बॉम्बे अस्पताल जाने के लिये टैक्सी पकडी। टैक्सी वाला एक बुजुर्ग शख्श था।चेहरे पर हल्की सफेद दाढी उग आई थी। तेज बारिश के कारण टैक्सी काफी धीमी रफ्तार से आगे बढ रही थी। उस टैक्सी वाले ने मुझसे पूछा- साब 2 दिन टैक्सी हडताल पर थी तो पब्लिक को बहुत तकलीफ हुई होगी न?


टैक्सीवाले का सवाल एक दिन पहले हुई टैक्सी की हडताल से था। टैक्सी वाले सीएनजी की कीमत बढने की वजह से टैक्सी का किराया बढाने की मांग को लेकर हडताल पर उतरे थे। बाद में जब सरकार ने किराया बढाने का ऐलान किया तो उन्होने अपनी हडताल वापस ली।

टैक्सी वाले के सवाल पर मैने उससे उलटा सवाल पूछा- तकलीफ तो हुई थी। तुम किस यूनियन के हो...क्वाड्रोस के? शिवसेना के या किसी दूसरी यूनियन के?

टैक्सी ड्राईवर-हम तो सबके हैं और किसी के भी नहीं..सब यूनियन वाले चोर हैं..सब को अपनी फिक्र पडी है..हम लोग तो रोज कमाने खाने वाले आदमी हैं भाई। वो क्या हैं न कि वो एक मंत्री के बेटे (महाराष्ट्र के मंत्री नारायण राणे के बेटे नितेश राणे के संगठन स्वाभिमान) के आदमी लोग ने गाडियों की तोडमताडी शुरू कर दी थी न.. इसके लिये घबराकर बाकी सब टैक्सी वालों ने भी अपनी गाडी खडी कर दी। मैं तो भाडे की(किराये पर) गाडी चलाता हूं। दूसरे की गाडी का नुकसान होता तो अपने को ही जेब से भरना पडता न...उसलिये मैने गाडी खडी कर दी और मालिक को फोन करके बता दिया। एक-दो दिन नही कमाना गाडी तुडवाने से बेहतर है।

मैं-हां ये बात तो सही है। आप लोगों के साथ तो जबरदस्ती हो रही थी।

टैक्सी ड्राईवर-टैक्सी वालों पर तो हर कोई जुल्म करता है भाई। यूनियन वाले से लेकर सिग्नल पर खडे पुलिस वाले तक...सरकार भी तो जुल्म कर रही है। अभी नया रूल बना दिया कि 25 साल पुरानी गाडी निकाल कर नई गाडी खरीदों...क्या जरूरत है इसकी..अभी हमको हमारी पुरानी फिएट बेचकर नई सेंट्रो-वैंट्रो या फिर मारूति की गाडियां खरीदनी पड रहीं हैं..ये भी कोई बात है...आजकल की ये गाडियां मजबूत नहीं हैं...गाडियां तो फिएट और एंबेसेडर जैसी ही होनी चाहिये...एकदम मजबूत...पुराने जमाने में अंडरवर्लड के बडे बडे भाई लोग भी इन्ही गाडियों में फिरते थे।

मैं - आपकी बात सही है। आपको मालूम है कि दाऊद ने अपने गुनाहों के करियर का पहला गुनाह भी काले रंग की एक एंबैसेडर कार से किया  था। मसजिद बंदर इलाके में एक ज्वेलर को लूटा था उसने। वो भी जब मुंबई में था तो फिएट और एंबैसेडर में ही घूमा करता था।

अंडरवर्लड के बारे में मुझसे ये जानकारी सुनकर वो चौंका, लेकिन अपने हाव भाव के छुपाने की कोशिश करते हुए उसने कहा- हां मालूम है न भाई। इन सब भाई लोगों को मैने काफी करीब से देखा है। मैं उनके इलाके में ही पला बढा हूं।


मैं-कौन से इलाके में रहते हैं आप?

टैक्सी ड्राईवर- अभी तो मैं कुर्ला में रहता हूं लेकिन मेरा बचपन कमाठीपुरा में बीता (कमाठीपुरा मुंबई का रेड लाईट इलाका है और दाऊद और पठान गिरोहों के अड्डों के काफी करीब है।) हमारे अब्बा का तंबाकू कि डिबिया बनाने का काम था। हम घर में ही वो काम करते थे।

मैं-फिर तो आपने दाऊद को भी बचपन में देखा होगा?

टैक्सी ड्राईवर- मैने सबको देखा है। दाऊद भाई को, अमीरभाई को (पठान गैंग का अमीरजादा), आलमभाई को (पठान गैंग का आलमजेब) और समदभाई को (पठान गैंग का समद खान) मैं तो नागपाडा के उसी अहमद सैलर स्कूल में पढा हूं जिसमें दाऊदभाई ने पढाई की है। दाऊद भाई ने दसवीं तक पढाई की थी और मैने सातवीं तक..वो मेरे से उम्र में थोडा बडे थे...अभी मैं 53 साल का हूं और उनकी उम्र् 57-58 होगी।

मुझे इस टैक्सीवाले की बातें काफी दिलचस्प लगीं..लेकिन वो सच बोल रहा है क्या ये परखने के लिये मैने अपने मोबाईल में स्टोर की हुई एक पुरानी ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर उसे दिखाई। इस तस्वीर में युवा दाऊद अपने पठान गिरोह के दुश्मनों अमीरजादा, आलमजेब और समद खान के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खडा दिख रहा है। चंद सालों बाद दाऊद ने इन तीनों की हत्या करवा दी।

टैक्सीवाले ने टैक्सी एक सडक किनारे रोकी और एक एक कर तस्वीर में मौजूद हर इंसान का नाम बताने लगा...य़े आलमभाई हैं..ये अमीरभाई हैं..ये समदभाई हैं..मुझे आश्चर्य हुआ कि उसने सभी के नाम बिलकुल सही बताये थे।

टैक्सी ड्राईवर- साब ये फोटो आलमभाई की बहन की शादी की है। नूरबाग में रिशेप्शन हुआ था। मैं भी मौजूद था जब ये फोटो खींची जा रही थी। आलम भाई बडे डॉन थे लेकिन उनके बात करने की अदा क्या प्यारी थी..किसी से पानी भी मांगते थे तो बडे अदब से। क्या वक्त था वो भी...ये सभी दोस्त थे..लेकिन पैसों को लेकर आपस में ही खून खराबा कर डाला...इनकी वजह से ही आज हिसाब किताब काफिरों के हाथ में जा रहा है....अभी तो सब भाई लोग खत्म हो गये। उस वक्त क्या वट था उनका...

अब तक की बातचीत से उस टैक्सी वाले को भ्रम हो गया था कि मैं अंडरवर्लड का आदमी हूं और मुसलिम भी हूं फिर भी उसने जब मेरा नाम पूछा तो मैने उसे बताया कि मेरा नाम उमर है। मुझे लगा कि शायद अगर मैने अपना असली नाम बता दिया तो वो खुलकर मुझसे बात नहीं कर पायेगा। मेरा नाम बताने पर उसे पक्का यकीन हो गया कि मैं मुसलिम ही हूं तो वो और बेफिक्र होकर मुझसे बात करने लगा।

टैक्सी ड्राईवर-भाईजान मैं तो दाऊदभाई को मानता हूं। आज दाऊदभाई की वजह से ही हिंदुस्तान में मुसलमान शान से जी पा रहा है। अगर दाऊद भाई ने 1993 में बम नहीं फोडे होते तो अपने लोगों का जीना मुश्किल हो जाता। मुसलमानों का रास्ते पर निकलना भारी हो जाता भाई।

मैने उसके हां में हां मिलाई लेकिन कहा – दाऊदभाई भी आज कहां सुकून से जी रहे हैं। उनके गैंग के कितने लोग तो पुलिस की गोलियों से मारे गये।

टैक्सी ड्राईवर-आप सही फरमा रहे हैं भाई। अभी वो जमाना गया...अब तो पुलिस किसी के नाम पर 2 N.C.( अदखलपात्र गुनाह) होने के बाद तीसरी बार में सीधा ठोंक डालती है। अभी अंडरवर्लड में कोई दम नहीं है। एक जमाने में जिगर वाले भाईलोग हुआ करते थे। वो पुलिस से कुत्ते जैसा सलूक करते थे। पुलिस भी उनसे डरती थी।आज तो पुलिस ही भाई है।

मैं-चचा आप इतने सारे भाई लोगों के बीच पले बढे हो...कभी इन लोग के लिये काम नहीं किया?

टैक्सी ड्राईवर-भाई इसके लिये मैं अपने वालिद का शुक्रगुजार हूं। उन्होने मेरे को कभी इन लोग के बीच घुसने नहीं दिये। मुझपर बचपन में उनकी कडी नजर रही। आज मैं टैक्सी चला के खुश हूं। अपने बीवी बच्चों के साथ हूं। मैंने दाऊद के पिता इब्राहिम चचा का जनाजा उठते हुए देखा है। मुझे बडा बुरा लगा।हर बाप चाहता है कि उसके जनाजे को बेटे का कंधा नसीब हो...दाऊदभाई आज करोडों में खेल रहे हैं लेकिन क्या वो अपने बाप को ये खुशी दे पाये? खैर जो हो गया सो हो गया...खुदा उनके गुनाहों को माफ करे और उनको बरकत दे हम तो यही दुआ करेंगे।

इस बीच मेरी मंजिल आ गई थी और मैं किराया चुका कर अस्पताल की सीढियां चढने लगा..लेकिन मेरे दिमाग में अभी भी टैक्सी वाला का वो वाक्य गूंज रहा था-दाऊदभाई की वजह से हिंदुस्तान में मुसलमान शान से जी पा रहा है। मेरे मन में ये सवाल आया कि क्या मुंबई के सभी निचले वर्ग के कम पढे लिखे मुसलिम दाऊद के प्रति ऐसा ही भाव रखते हैं?

Thursday, 10 June 2010

स्वार्थी डॉन दाऊद इब्राहिम

अंडरवर्लड डॉन दाऊद इब्राहिम खुदगर्ज है। वो अपने साथियों का इस्तेमाल करके उन्हें उनके हाल पर छोड देता है। ये कहना है मंगलवार को अबू धावी से गिरफ्तार किये गये मुंबई बमकांड के आरोपी ताहिर मर्चंट उर्फ टकल्या का। पहले भी दाऊद के कुछ साथी उसपर यूज एंड थ्रो की नीति अपनाने का आरोप लगा चुके हैं।


ताहिर टकल्या को अपनी गिरफ्तारी से ज्यादा मलाल अपने आका दाऊद इब्राहिम की अनदेखी का है। ताहिर टकल्या पर दाऊद की ओर से रची गई मुंबई बमकांड की साजिश में हिस्सा लेने का आरोप है। पिछले सत्रह सालों से सीबीआई उसे तलाश रही थी। मंगलवार को उसे अबू धाबी से प्रत्यर्पित करके भारत लाया गया। सीबीआई सूत्रों के मुताबिक हवालात में टकल्या दाऊद इब्राहिम को कोस रहा है। टकल्या के मुताबिक 12 मार्च 1993 के मुंबई बमकांड के बाद कुछ दिनों तक तो दाऊद और उसके साथी टाईगर मेमन ने साजिश में शामिल लोगों की देखभाल की..लेकिन जैसे जैसे वक्त आग बढा दाऊद ने उनकी अनदेखी करनी शुरू कर दी। दाऊद इब्राहिम से रू बरू मिल पाना भी मुश्किल हो गया। एक तो कभी भी पकडे जाने की तलवार सिर पर लटक रही थी उसपर दाऊद ने दाना पानी भी देना बंद कर दिया। ऐसे में टकल्या खुद ही खाडी देशों में यहां वहां भटक कर अपना पेट पाल रहा था।ताहिर का कहना है कि दाऊद बमकांड में साथ देने वाले साथियों की न तो आर्थिक मदद करता था और न ही आपराधिक मामलों में पकडे जाने पर उन्हें छुडाता था। वहीं दूसरी ओर दाऊद के भाई, रिश्तेदार या गैंग के कोई खास सदस्य अगर खाडी देशों में पकडे जाते तो दाऊद अमीर शेखों के नेटवर्क का इस्तेमाल करके उन्हें छुडा लेता था।

ताहिर टकल्या जैसे ही आरोप पिछले साल गिरफ्तार किये गये बमकांड के एक और आरोपी करीमुल्ला खान ने लगाये थे। करीमुल्ला ने बताया था कि दाऊद उन्हें बमकांड के बाद हर महीने 10 हजार रूपये खर्चे के लिये देता था। उसके परिवार को भी पैसे पहुंचाये जाते थे लेकिन कुछ सालों बाद दाऊद ने पैसे देने बंद कर दिये। जब भी वो पैसे मांगता उससे गाली गलौच की जाती और धमकियां दी जातीं। बमकांड की साजिश में साथ देने वाले बाकी लोगों के साथ भी यही सलूक किया गया।

सूत्र बताते हैं कि दाऊद अपने लोगों पर इस वक्त इसलिये ध्यान नहीं दे पा रहा क्योंकि दुनियाभर की एजेंसियों ने पाकिस्तान पर उसकी गिरफ्तारी के लिये दबाव बना रखा है। ऐसे में दाऊद की प्राथमिकता पहले खुद को महफूज रखने की है।

Wednesday, 9 June 2010

अंडरवर्लड डॉन छोटा राजन का इंटरव्यू

( हाल ही में मुंबई के चेंबूर इलाके में छोटा राजन के खास गुर्गे फरीद तनाशा की हत्या कर दी गई। इस हत्या के पीछे एक शक खुद छोटा राजन पर भी जताया जा रहा है। राजन ने 07-06-2010 को मुझे फोन किया और फरीद तनाशा समेत मुंबई अंडरवर्लड के नये समीकरणों और दाऊद के मौजूदा ठिकाने पर कई बातें बताईं। उस इंटरव्यू के कुछ खास अंश यहां पेश हैं)
जीतेंद्र-आपकी जानकारी के मुताबिक फरीद तनाशा की हत्या किसने करवाई?छोटा राजन- ये भरत नेपाली का काम है। नेपाली पहले मेरे साथ काम करता था। पैसा की खातिर और अपना नंबर बढाने का वास्ते उसने ये काम किया..लेकिन उसके पास इतने छोकरे लोग नहीं है कि वो मेरे एरिया में आकर इतना बडा काम करे। यूपी-वीपी से छोकरे लाकर ही उसने तनाशा का काम किया..पर ये बरोबर नहीं है। चेंबूर, सहकार नगर कॉलोनी पीसफुल एरिया है। उधर ऐसा किया ये मेरे को बराबर नहीं लगा। लोगों को कन्फ्यूजन है कि ये मैने किया है..लेकिन ये भरत नेपाली का काम है।

जीतेंद्र- क्या फरीद तनाशा ने आपके दुश्मन छोटा शकील से हाथ मिला लिया है? तनाशा और छोटा शकील के बीच करीबी कैसे आई ?
छोटा राजन- तनाशा जब जेल में था तो बमकांड के आरोपियों के साथ रहता था। उनके साथ चाय वगैरह पीता था। वही टाईम से उन लोगों ने धरम के नाम का वास्ता देकर उसको अपने साथ में करने के लिये ब्रेन वॉश करना शुरू किया। शकील ने भी बात किया कि तू अपने धरम का है अपने साथ आजा। इसलिये वो फूट गया।

जीतेंद्र-क्या छोटा शकील के लोगों से दूर रहने की चेतावनी आपने कभी तनाशा को दी थी?
छोटा राजन – जब मेरे को ये मालूम पडा तो 2 बार मैने तनाशा को वार्निंग दिया। मैं उसको बोला क्या रे मा@#$%द वो लोग के साथ काय को घूमता है तो मेरे को जवाब दिया कि क्या भाई वो लोग अगर अपुन को सलाम करेंगा तो क्या अपुन जवाब भी नहीं देंगा। मैने उसको समझाया कि वो लोग दुश्मन हैं, ब्लास्ट वाले हैं उनसे सलाम काहे को लेने का। इसके अलावा कुछ और भी बातें मुझे पता चली।वो नहीं माना। अगर भरत नेपाली ने उसका मर्डर नहीं करवाया होता तो शायद मेरे को ही अपना हाथ खराब करना पडता। मेरे लिये इस तरह किसी का छोड कर जाना कोई नई बात नहीं है।

जीतेंद्र -भरत नेपाली आपसे क्यों अलग हुआ?
छोटा राजन- साल 2000 में किसी ने मुझे भरत नेपाली के नाम की सिफारिश की थी कि ये अपनी कॉलनी का लडका है। अपने एक दोस्त के यहां ड्राईवर का काम करता था। अच्छा लडका है, वफादार रहेगा ये बताया गया था इसलिये मैने उसको काम पर रखा। ये सब लोग पैसा के लिये काम करने वाला आदमी निकला। भरत नेपाली बाद में संतोष शेट्टी के चक्कर में आ गया। शरद शेट्टी ने नेपाली को दुबई में शकील से मिलवाया था। दोनो ने मलेशिया में मेरे आदमी बालू डोकरे का मर्डर कर दिया। बालू डोकरे को संतोष शेट्टी इंडोनेशिया में बोला था कि वो भी शकील गैंग ज्वाइन कर ले..लेकिन डोकरे ने उसके साथ गाली गलौच किया था।जब से मैं दाऊद से अलग हुआ हूं ये सब मेरे से फूटने लगे। सुनील सावत्या, रवि पुजारी, हेमंत पुजारी, गुरू साटम, अनिल परब सब अलग हो गये। भरत नेपाली और संतोष शेट्टी, दाऊद से मिलकर मेरी हत्या करना चाहते हैं। ये फरीद तनाशा भी छोटा शकील को बोल रहा था कि नेपाली और संतोष तो छोटा राजन का कुछ नहीं कर सकते। मैं तुम्हारा काम करके बता सकता हूं।

जीतेंद्र-हाल ही में दाऊद इब्राहिम की बहन हसीना पारकर से भी आपकी एक बार बात हुई है। ये किस सिलसिलें में हुई थी?
छोटा राजन- 2-3 महीने पहले दाऊद की बहन हसीना पारकर ने मेरे को मैसेज भिजवाया था कि उसको मेरे से बात करने का है। मैने फोन किया तो उसने मेरे को बताया कि कोई उसे मेरे नाम से धमकी दे रहा है, गाली गलौच कर रहा है, पैसे मांग रहा है। मैने उसको पूछा कि क्या आपको लगता है कि मैं इस तरह का काम करुंगा? मैने क्लियर किया कि देखो आपके साथ मेरे को कोई प्रॉब्लम नहीं है। काहे को मैं आपको तकलीफ देंगा। मैं ऐसा कभी करता नहीं। आपको दाऊद भाई से भी आप ये बात पूछ सकती हो। वो भी बताएंगा। मेरे को आपके भाई को ठीक करने का है।आपसे मेरे को कोई प्रोब्लम नहीं। मैं जब दाऊद के साथ तो आपको बहन जैसा मानता था। अभी भी वैसा ही है।

जीतेंद्र- आपकी सेहत कैसी है? खबरें आ रही थीं कि आपकी तबियत बेहद खराब चल रही है? आपकी किडनी खराब हो गई है?
छोटा राजन- (हा हा हा।) ये सब दाऊद के लोगों ने गलत फैलाया है मेरे बारे में। वो क्या हुआ था कि बैंकॉक के फायरिंग में मेरे को एक गोली पेट में लगी और एक थाई (जांघ) में। पेट में जो गोली लगी थी तो उससे इंटेस्टाईन फट गया था (अंतडियों को नुकसान पहुंचा था) उसमें इंफैक्शन फैल गया। डॉक्टरो ने ऑपरेशन करके उसके ठीक कर दिया। अभी मैं एकदम फिट हूं। भागता दौडता हूं।

जीतेंद्र-हर इंसान अपने दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रख रखता है। आपका दुश्मन दाऊद इन दिनों कहां है और वो क्या कर रहा है?

छोटा राजन- दाऊद ठीक इस वक्त किधर है ये मैं आपको नहीं बताउंगा..लेकिन मैं आपको ये बता सकता हूं कि वो गये 3 साल से कराची में नहीं है। वो मिडिल इस्ट में एक जगह है। वो आईएसआई की गोद में बैठा हुआ है। मशीनगनों का पहरा है। मैं 16 साल से उससे लड रहा हूं और मेरी उसपर नजर है।मेरे को दाऊद को खत्म करने का है। मेरे को मेरा देश से प्यार है। मैं इंडियन है। बैंकॉक में मेरे साथ जो कुछ हुआ उसके बाद से ये सब लोग पैसा के चक्कर में पड गया और अपना अलग काम करने लगा। मैंने कभी किसी बेगुनाह आदमी को तकलीफ दिया नहीं। आप चेक करो। मैने गये 10 सालों में किसी बेगुनाह को एक्सटोर्शन के लिये मारा नहीं। किसी बिल्डर का मर्डर किया नहीं। हां मैने दाऊद के लोगों को मारा है। मैं दाऊद के खिलाफ हूं, रहूंगा और मरते दम तक रहूंगा।

जीतेंद्र-क्या ये बात सच है कि 15 सितंबर 2000 को जब बैंकॉक में आप पर हमला हुआ तो उसके बाद से आपका गिरोह कमजोर पडने लगा?
छोटा राजन- अगर ऐसा है तो फिर सावत्या का मर्डर मैने कैसे करवाया, शरद शेट्टी को मैने कैसे मरवाया, नागपाडा में घर में घुसकर छोटे मियां और आशिफ दाढी पर फायरिंग कैसे करवाई? खबरी अमजद पटेल और हिमांशु को कालाघोडा में कैसे मारा। ओ.पी.सिंह को कैसे मारा? अभी गये साल नेपाल में कमल नेपाली का गेम कैसे बजाया? मैं कैसे कमजोर हो गया? ये सारी गलत बातें मेरे दुश्मन मेरे बारे में फैला रहे हैं। उन्होने तो ये तक अफवाह फैला दी कि मेरी किडनी खराब हो गई है। नेपाली मुझे छोड कर चला गया...ये चला गया...वो चला गया...मेरे को कई फर्क नहीं पडता है। जो मुझे करना है वो मैं करूंगा। उसके लिये मुझे मरना भी पडे तो कोई गम नहीं है। अपने ऊपर गोली चलने के बाद भी मैने दाऊद के कई लोगों को मारा..लेकिन वो एक बालू डोकरे को छोडकर कुछ नहीं कर पाया।

जीतेंद्र- डीके राव और विकी मल्होत्रा जैसे आपके गैंग मेंबर भी फरीद तनाशा के साथी थे। क्यो दोनो अब भी आपके प्रति वफादार हैं या उन्होने भी आपसे गद्दारी कर दी है?
छोटा राजन- डी.के.राव भी मेरे साथ है और विकी मल्होत्रा भी मेरे साथ है। इन लोगों की भावनाएं अभी मरीं नहीं हैं। ये लोग प्रिंसिपल से चलते हैं।

जीतेंद्र- आप विदेश में छुपकर अपना गैंग चला रहे हैं। क्या आपका भारत वापस लौटने का कोई इरादा है?
छोटा राजन- नहीं। भारत की मुझे बहुत जरूरत है लेकिन देखिये जैसे रॉ की गुप्ता जैसी औफिसर वहां पाकिस्तान में बैठ कर देशभक्तों को मरवाती थी तो हम किस पर भरोसा करें? वहां कई बडे पोस्ट पर दाऊद के लोग बैठे हैं। ऐसा नहीं है कि सभी औफिसर्स की भावनाएं मर गईं हैं। कई औफिसर जाने अनजाने में मेरी मदद करते हैं। आई अप्रीशिएट दैट.

जीतेंद्र-पिछली बार जब विधान सभा चुनाव में आपके भाई दीपक निकालजे खडे हुए तो ये खबर आई कि उनका राजनीति में जाना आपको पसंद नहीं है। क्या ये सच है?
छोटा राजन- नादान है वो। उसकी बुद्धि राजनीति के लायक नहीं है। राजनीति में आकर वो लोगों का क्या भला करेगा। उसपर खुदका अपना नाम बनाने की सनक सवार है।

Thursday, 3 June 2010

क्या छोटा राजन गिरोह खात्में के कगार पर है ?

गैंगस्टर फरीद तनाशा की हत्या के बाद अब अंडरवर्लड में ये सवाल उठ रहे हैं कि क्या छोटा राजन का गिरोह खत्म हो गया है। बीते 10 सालों में राजन के कई खास साथियों ने उससे गद्दारी करके अलग गिरोह बनाया, कुछ दुश्मनों या पुलिस के हाथों मारे गये और कुछ गिरफ्तार हुए। इससे अंडरवर्लड में छोटा राजन की पकड लगातार ढीली पडती गई।
फरीद तनाशा उन चंद बचे खुचे गैंगस्टरों में से था जो अब तक छोटा राजन के साथ थे। तनाशा ही इन दिनों मुंबई में राजन गिरोह का काला कारोबार संभाल रहा था। तनाशा की हत्या ने राजन गिरोह के ताबूत में एक और कील ठोंक दी है। अंडरवर्लड में सवाल उठ रहा है कि अब क्या छोटा राजन का खौफ बरकरार रह पायेगा? क्या उसके धमकी भरे फोन कॉल्स से डरकर फिल्मी हस्तियां, बिल्डर और बडे कारोबारी उस तक मोटी रकम पहुंचायेंगे? क्या राजन के कट्टर दुश्मन दाऊद इब्राहिम के लोगों को उससे छुपने की जरूरत पडेगी ? हाल के सालों में राजन गिरोह की जो दुर्दशा हुई है उस पर गौर करें तो जवाब मिलता है नहीं।
15 सितंबर 2000 को राजन पर बैंकॉक में हमला हुआ और तबसे राजन गिरोह ने बिखरना शुरू कर दिया। ये हमला अंडरवर्लड डॉन दाऊद इब्राहिम के निशानदेही पर हुआ था। हमले में राजन तो बच गया लेकिन उसका दाहिना हाथ रोहित वर्मा मारा गया। इसके चंद दिनों बाद ही साल 2002 में उसके खास साथी ओ.पी.सिंह की नासिक जेल में मौत हो गई। शक जताया जा रहा है कि राजन ने ओपी सिंह की हत्या करवा दी थी क्योंकि वो एक पुलिस अधिकारी के साथ मिलकर अलग गिरोह बनाने जा रहा था। चार साल बाद राजन ने अपने एक और बडे साथी बालू ढोकरे को खो दिया। मलेशिया की राजधानी क्वालालुमपुर में उसकी हत्या हो गई।
राजन के कई पुराने साथी भी इस बीच उससे अलग होकर अपना अलग गिरोह चलाने लगे। रवि पुजारी, हेमंत पुजारी, बंटी पांडे, इजाज लाकडावाला और भरत नेपाली उससे अलग होकर खुद ही अपना अपना अलग गिरोह चलाने लग गये हैं। इस बीच पुलिस ने राजन गिरोह पर काफी दबाव बनाया। बीते 15 सालों में पुलिस ने छोटा राजन से जुडे करीब 100 गैंगस्टरों को एनकाउंटर्स में मार दिया। राजन की पत्नी सुजाता निकालजे और भाई दीपक निकाजले को भी आपराधिक मामलों में गिरफ्तार किया गया। राजन के फिलहाल 2 बडे साथी ही बाहर है डी.के.राव और विकी मल्होत्रा। दोनो इसी साल लंबा वक्त जेल में गुजार कर बाहर निकले हैं और इनकी हर हरकत पर पुलिस की नजर रहती है।
छोटा राजन का गिरोह कमजोर तो हुआ है लेकिन वो अब भी अपने दुश्मन दाऊद इब्राहिम की हिटलिस्ट पर है। यही वजह है कि उसे लगातार अपना ठिकाना बदलते रहना पडता है।