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Thursday, 24 March 2011

जापान का जज्बा: भाग-3

बडे ही कम समय की पूर्व सूचना पर मुझे मुंबई से जापान के लिये निकलना पडा। सोमवार की रात डेढ बजे की फ्लाइट थी और दिन का वक्त वीसा वगैरह हासिल करने में, जापान का विशेष फोन लेने में और विदेशी करंसी का हिसाब किताब करने में निकल गया। जापान के फुकूशिमा डाईची परमाणु संयंत्र से रेडिएशन होने की खबर लगातार आ रही थी। मुझे दफ्तर के लोगों ने और शुभचिंतकों ने सलाह दी कि मैं जापान निकलने से पहले एंटी रेडीएशन कपडे खरीद लूं। मुझे भी ये जरूरी लगा लेकिन मैं उन कपडों को खरीद नहीं सका। पहली बात तो ये कि एंटी न्युक्लयर रेडीएशन कपडे इतनी आसानी से मुंबई के खुले बाजार में, मेडीकल स्टोर्स में या फिर अस्पतालों में उपलब्ध नहीं हैं। दूसरा उस जगह को खोजने का इतना वक्त मेरे पास नहीं था जहां ये कपडे मिल पाते। लिहाजा मैने फैसला किया कि बिना एंटी रेडीएशन कपडों के ही मैं जापान जाऊंगा और मुमकिन हुआ तो टोकियो में ही ये कपडे खरीद लूंगा। वहां उनके उपलब्ध होने की ज्यादा गुंजाइश है।

टोकियो में स्थानीय समय के मुताबिक रात के करीब 9 बजे हम पहुंचे। जापान की धरती पर कदम रखने के कुछ ही मिनटों बाद हिंदी और मराठी चैनलों के लिये लाईव और वाक थ्रू का सिलसिला शुरू हो गया। होटल में चैक इन कर सोते सोते रात के 1 बज गये। अगले दिन सुबह वहां के अंग्रेजी अखबार The Japan Times  के पहले पन्ने पर छपी खबर ने होश उडा दिये। अखबार में Tokyo Metropolitan Government  के गवर्नर शिंतारो इशीहारा का बयान छपा कि बीते दिन की सुबह यानी कि जिस शाम हम टोकियो पहुंचे वहां सामान्य से 20 गुना ज्यादा रेडीएशन पाया गया था...लेकिन राहत की बात ये थी कि ये रेडिएशन कुछ देर में ही कम भी हो गया और इस रेडीएशन से इंसान की सेहत को तुरंत किसी तरह का खतरा नहीं था। हम समझ गये कि यहां रेडिएशन का जोखिम उठाना ही होगा। खैर रेडिएशन के बारे में चिंता करने के लिये मेरे पास ज्यादा वक्त नहीं था। मेरा दिमाग पर फिक्र हावी थी ज्यादा से ज्यादा खबरों को भेजने की, जापान में बसे भारतियों तक पहुंचकर उनसे बात करने की और उत्तर-पूर्वी जापान के उस सेंदई शहर की ओर जाने की तैयारी करने की जहां सुनामी ने सबसे ज्यादा विध्वंश किया था।

टोकियो में एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिये हमने लोकल ट्रेनों का सहारा लिया। पहली रात एयरपोर्ट से होटल पहुंचते वक्त हमें ये पता चल गया था कि टैक्सियां टोकियो में बेहद महंगी हैं और अगर 5 दिनों के टोकियो सफर के दौरान अगर हम टैक्सियों का इस्तेमाल करते तो भारत से लाए सारे डॉलर 3 दिनों में ही टैक्सी का किराया चुकाते चुकाते खत्म हो जाते, हमारी जेब खाली हो जाती और हमें अपने दफ्तर से और डॉलर आपात हालत में मंगाने पडते। लोकल ट्रेनें टैक्सियों के मुकाबले बेहद सस्ती और जल्द से जल्द एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने वाला माध्यम थीं। कुछ स्टेशनों पर सिर्फ जापानी में ही ट्रेन रूट और किराये के बारे में जानकारी दी गई थी और कुछ पर अंग्रेजी, चीनी और कोरियाई भाषा में भी जानकारी उपलब्ध थी। जहां पर अंग्रेजी में जानकारी नहीं दी गई थी वहां हमें थोडी दिक्कत आई लेकिन जैसा कि पहले मैं बता चुका हूं कि जापानी बेहद मददगार थे हमें कोई न कोई मिल जाता था जो हमें मंजिल तक आसानी से पहुंचने का रास्ता बता देता। ज्यादातर जापानी अच्छी अंग्रेजी नहीं जानते लेकिन हमने जिनसे भी बात की उन्होने टूटी फूटी अंग्रेजी में मदद करने की हमारी पूरी कोशिश की।

मैं सुनामी और भूकंप के बाद टोकियो के जनजीवन पर असर से जुडी खबरें फाईल कर रहा था लेकिन मुझे सेंदई इलाके में जाने की तैयारी भी करनी थी जहां सबसे ज्यादा तबाही मची थी। सवाल था कि सेंदई पहुंचे कैसे?  रेल पटरियां पूरी तरह से उखड चुकीं थीं, सडकें टूट चुकीं थीं और सेंदई उस फुकूशिमा डाईची परमाणु संयंत्र से होकर पहुंचना था जहां भूकंप के बाद फैल रहे रेडीएशन से निपटने की जद्दोजहद जारी थी। जापान सरकार ने फुकूशिमा से 30 किलोमीटर के दायरे में किसी के भी प्रवेश पर पाबंदी लगा दी थी। मैने बस सेवा के बारे में पता किया। बसें लंबा चक्कर घूमकर सेंदई से कई किलोमीटर दूर एक जगह तो जा रहीं थीं लेकिन वहां के लिये अगले हफ्तेभर तक आरक्षण उपलब्ध नहीं था। अगर कार लेकर जाते तब भी लाखों येन का खर्च आता और दूसरी दिक्कत ये थी कि वहां से वापस लौटने में दिक्कत होती क्योंकि सेंदई और आसपास के इलाकों में पेट्रोल की आपूर्ति पूरी तरह से ठप थी। कई पेट्रोल पंप सुनामी की लहरें बहा ले गईं थीं। वहां से फोन या इंटरनैट के माध्यम से भारत संपर्क करना भी मुश्किल था क्योंकि सभी मोबाइल टावर नष्ट हो चुके थे और हमारे पास सैटेलाइट फोन नहीं था। ज्यादातर जापानी टीवी चैनलों के स्थानीय पत्रकार ही सेंदई तक पहुंचकर वहां से रिपोर्टिंग कर रहे थे। कुछेक विदेशी चैनलों के पत्रकार सेना के हेलिकॉप्टरों के जरिये वहां पहुंचे थे।

सेंदई कैसे पहुंचा जाये मैं इस उधेडबुन में था कि दफ्तर से फोन पर निर्देश आया कि वहां नहीं जाना है। फुकूशिमा डाईची परमाणु संयंत्र में फिरसे आग लगने और रेडीएशन बढने की खबर आने लगी थी और हमारे चैनल ने तय किया कि मैं सेंदई जाने के चक्कर में रेडिएशन का शिकार होने की रिस्क न लूं। सेंदई में पहले से मौजूद पत्रकार भी इस खबर के आने पर वहां से निकल गये।

फुकूशिमा प्लांट में लगी आग से जापान पर फिर एक बार न्यूकिलयर से तबाही का खतरा मंडरा रहा था...वैसी तबाही का खतरा जैसी 1945 में हिरोशिमा और नागासाकी शहरों में मची थी। मैने भारत वापस लौटने से पहले हिरोशिमा जाकर एक रिपोर्ट फाईल करने की सोची। जिस शहर के बारे में बचपन से इतिहास की किताबों में पढता आया था उसे सामने से देखने की लालसा थी। वो शहर देखना था जहां विश्व का पहला एटम बम गिराया गया। मैं बुलैट ट्रेन जिन्हे की जापान में शिंकाइजेन नाम से जाना जाता है के जरिये करीब टोकियो से 600 किलोमीटर का सफर तय करते हुए 4 घंटे में हिरोशिमा पहुंच गया। हिरोशिमा स्टेशन से पकडी गई ट्राम ने सीधा उस स्मारक के सामने उतारा जिसे वहां Atom Bomb Dome कहा जाता है। ये एक गुंबद वाली बडी इमारत थी जो कि एटम बम गिराये जाने से पहले हिरोशिमा के सासंकृतिक और वाणिज्यिक केंद्र के तौर पर जानी जाती थी। अमेरिकी लडाकू विमान की ओर से गिराया गया एटम बम इसी इमारत के पास आकर गिरा था। इमारत में मौजूद सारे लोग तुरंत ही पिघल कर मारे गये। यही हश्र इस इमारत से 2 किलोमीटर के दायरे में आनेवाले तमाम लोगों का हुआ। हिरोशिमा शहर नष्ट हो गया। बाद में जब हिरोशिमा शहर का पुनर्निमाण होने लगा तो इस इमारत को भी गिराकर यहां नई इमारत खडी करने का प्रस्ताव रखा गया लेकिन कई लोगों ने इसका विरोध किया। उनका मानना था कि हिरोशिमा में एटम बम से बर्बाद हुईं तमाम इमारतों को फिरसे बना लिया गया है लेकिन इस एक इमारत को जस का तस रखा जाये ताकि आनेवाली पीढियों को परमाणु हथियारों से लडी जानेवाली जंग के खौफनाक और अमानवीय चेहरे का अंदाजा हो सके। आज ये जगह दुनियाभर के परमाणु विरोधियों का तीर्थ बन चुकी है और हर वक्त यहां पर्यटकों का तांता लगा रहता है।

हिरोशिमा पर एटम बम से हमले के चंद सालों बाद ही ये शहर फिर एक बार उठ खडा हुआ और जापान के सबसे बडे औद्योगिक शहरों में एक बनकर उभरा। आज देखकर नहीं लगता कि ये वही हिरोशिमा है जो एटम बम से हुई तबाही के कारण विश्व के इतिहास के काले पन्नो में नजर आता है। हिरोशिमा एक मिसाल है जापानियों के जज्बे की, उनकी सकारात्मक सोच की और तकनीक का इस्तेमाल कर नई ऊचाईयों को छूने की जिद की। इसी वजह से मैं ये मानता हूं कि सुनामी से तबाह हुए जापान को फिर एक बार शान से उठ खडा होने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। जापान से वापस लौटते वक्त मैं सोच रहा था कि जापानियो जैसा अनुशासन, मिलनसार और मददगार स्वभाव और सकारात्मक सोच अगर सभी भारतवासी भी रखने लगें तो हमारे देश की सूरत कुछ अलग ही होगी।

जापान का जज्बा: भाग-2

जापान के लोग इस कडवी सच्चाई को स्वीकार कर चुके हैं कि भौगौलिक स्थिति की वजह से जापान में छोटे बडे भूकंप आते रहेंगे, लेकिन जापानियों ने कुदरत की इस साजिश के खिलाफ घुटने नहीं टेके हैं। भूकंप से कैसे निपटाना है इसके लिये जापान ने हर तरह की तैयारी कर ली है। टोकियो के निशीकसाई इलाके में अपने परिवार के साथ रहने वाले एक भारतीय शख्स गौतम बिलिमोरिया से मैं मिला। टोकियो के इस इलाके में भारतीय बहुतायत में रहते हैं इसलिये इस इलाके को वहां मिनी इंडिया भी कहा जाता है। गौतम के मुताबिक बच्चों को स्कूली स्तर से ही भूकंप के बारे में पढाया जाने लगता है। भूकंप क्यों आते हैं, उनसे क्या नुकसान होता है, उनसे कैसे बचा जाये इन सबकी जानकारी बचपन से ही जापानी अपने बच्चों को देते हैं। जापान की सरकार भी अपने नागरिकों को भूकंप के प्रति जागरूक करने के लिये तमाम इलाकों में Earthquake Simulator  नाम का यंत्र घुमाती है। इस यंत्र में नागरिकों को खडा करके महसूस कराया जाता है कि रिक्टर स्केल पर अलग अलग तीव्रता के भूकंप आने पर जमीन कितना हिलती है और फलां तीव्रता का भूकंप आने पर क्या करना चाहिये। यही वजह है कि छोटे छोटे जापानी बच्चे भी भूकंप के हलके झटके आने पर बिना घबराये अंदाजे से ही बता देते हैं कि इस भूकंप की रिक्टर स्केल पर तीव्रता कितनी होगी। उनका अंदाजा ज्यादातर मामलों में सही होता है। रिक्टर स्केल पर 6 की तीव्रता तक भूकंप आने पर जापानी विचलित नहीं होते, लेकिन 6 से आगे बढने पर वे सावधान हो जाते हैं।

एक चीज जो मुझे बडी दिलचस्प लगी वो थी  Emergency Kit. जापान में रहनेवाला हर शख्स अपने साथ एक इमरजेंसी किट रखता है। इस किट में उनका ओरिजनिल पासपोर्ट होता है, स्कूल कॉलेज से जुडे जरूरी दस्तावेज होते हैं, अहम सरकारी कागजात होते हैं  और साथ ही चंद दिनों तक गुजारने के लिये सूखा खाना और फलों का रस होता है। जापान के दैनिक जीवन में इस इमरजेंसी किट की बडी अहमियत रहती है। बच्चों को इस किट के बिना स्कूल में नहीं लिया जाता। इस किट के पीछे मकसद ये है कि अगर भूकंप या दूसरे कुदरती कहर की वजह से अगर लोगों के घर ढह जायें तो कम से कम वो कुछ दिनों तक बिना बाहरी मदद के जिंदा रह सकें और कागजातों के सहारे राहत और पुनर्वास के लिये जरूरी मदद पा सकें।

भूकंप आने पर अमूमन लोगों की स्वाभाविक प्रतिक्रिया रहती है इमारत या घर से तुरंत निकल भागने की..लेकिन जापान में इसके बिलकुल उलट होता है। भूकंप की वजह से जब इमारत हिलने लग जातीं हैं तो लोग इमारत से बाहर नहीं भागते बल्कि अपने घरों में ही पलंग या टेबल के नीचे बैठ जाते हैं। इमारतों की नींव इतनी मजबूत बनाई जाती है और उनमें इस तरह का Spring mechanism लगा होता है कि वो गिरती या ढहती नहीं हैं सिर्फ हिलतीं हैं। जापानियों का यही मानना है कि भूकंप आने पर आप सडक से ज्यादा इमारत के भीतर सुरक्षित हो। बाहर निकलने पर कोई बिजली का खंभा या दूसरी चीज आप पर गिर सकती है या आप जमीन में आई दरार में गिर सकते हो जिससे कि जान भी जा सकती है।
एक और चीज मैने टोकियों में देखी। जो लोग हाल के चंद सालों में यहां रहने आये हैं और जो आये दिन आने वाले भूकंप के झटकों से पूरी तरह वाकिब नहीं हुए हैं उन्हें एक तरह का भ्रम अक्सर सताता है यानी भूकंप के झटके न आने पर भी उन्हें लगता है कि इमारतें हिलडुल रहीं हैं, जमीन खिसक रही है वगैरह जबकि हकीकत में वैसा कुछ नहीं हुआ होता। मनोवैज्ञानिक शायद इसे Earthquake Phobia कहते होंगे।

जापान है मददगारों का देश-
मैं अब तक जितने भी देशों में गया हूं उन सबमें मुझे जापान के लोग सबसे ज्यादा शालीन, उदार और मददगार लगे। ज्यादातर आम जापानियों को ठीकठाक अंग्रेजी नहीं आती, लेकिन अगर आप उनसे मदद मांग रहे हैं तो अपनी समझ के मुताबिक वे आपकी मदद करने में कोई कसर नहीं छोडेंगे। मेरे साथ 2 से 3 ऐसे वाकये हुए जिनसे मेंरे मन में जापानियों के प्रति काफी सम्मान पैदा हुआ है। 17 मार्च को मैं टोकियो के सेनागावा स्टेशन उतरा जहां से मुझे रीजनल इमीग्रेशन ब्यूरो जाना था। स्टेशन से बाहर निकलते ही नीचे सडक पर जाने के लिये सीढियां हैं। मै सीढियां उतरने लगा। सामने से एक जापानी सूटबूट पहनकर ट्रेन पकडने के लिये स्टेशन की ओर सरपट जा रहा था। मैने उसे रोककर पूछा- Excuse Me..where is the bus stop for Emigration bureau. मेरा सवाल सुनकर वो कुछ पल के लिये सोच में पड गया और फिर कहा..I don’t know. हमें जवाब देकर जापानी जल्दबाजी में स्टेशन की ओर आगे बढ गया। हम सीढियों से नीचे उतर आये और वहां लगे नक्शे के जरिये बस स्टाप खोजने लगे। नक्शे में जानकारी जापानी भाषा में दी गई थी और हमें समझने में दिक्कत हो रही थी। आगे क्या करें हम ये सोच ही रहे थे कि तभी पीछे से किसी ने हमें आवाज दी- Excuse Me. I have found out where the bus stop is. Please come along with me. ये वही जापानी था जो हमें सीढियां उतरते वक्त मिला था। हांफते हुए हमें ढूंढने के लिये ये सीढियां उतरकर वापस हमारे पास आया था हमारी मदद करने। बस स्टाप वहां से थोडे फासले पर था। हमें मदद करने के लिये इस जापानी नागरिक ने अपनी ट्रेन छोड दी और इमीग्रेशन ब्यूरो के लिये जाने वाली बस में बिठाकर ये वापस स्टेशन की ओर लौटा। किसी दूसरे देश के नागरिक की मदद के लिये हर कोई इतनी जहमत नहीं उठाता। जापानी कितने मददगार हैं ये इस बात की सिर्फ एक ही मिसाल थी। 5 दिनों के जापान के सफर में हमें इस जैसी कई और भी मिसालें मिलीं लेकिन उन सबका यहां जिक्र यहां मुश्किल है। एक और वाकये मुझे जिक्र करना जरूरी लगता है..एयरपोर्ट पर मैने अमेरिकी डॉलर देकर जितने भी येन(जापानी मुद्रा) खरीदे थे वे खत्म हो चुके थे। मुझे कुछ और येन की जरूरत थी। मैं टोकियो के शिंजुकू इलाके में सिटीबैंक की शाखा में गया। यहां का सारा स्टाफ जापानी था। मैने करंसी एक्सचेंज काउंटर पर मौजूद महिला के पास जाकर कहा कि मुझे 1200 डॉलर के येन चाहिये। उसने कहा कि येन तो मुझे मिल जायेंगे लेकिन अगर आप इस बैंक से कुछ कदमों के फासले पर जायेंगे तो आपको एक जापानी बैंक मिलेगा वहां आप को कम डॉलर में ज्यादा येन मिल जायेंगे। यहां करंसी एक्सचेंज रेट ज्यादा है और इस बैंक का कमीशन भी ज्यादा है।मुझे ये बात काबिल ए तारीफ लगी। एक विदेशी नागरिक की सहूलियत के लिये इस महिला ने अपने बैंका का ग्राहक छोड दिया। मैं महिला के बताये हुए नजदीकी जापानी बैंक में गया और वहां वाकई में सौदा फायदेमंद रहा।

रेल्वे स्टेशन हो या हवाई अड्डा या फिर पुलिस थाना...हर जगह पर जापानी एक सरीखे मददगार नजर आये।

(भाग-3 में पढिये जापान में रिपोर्टिंग के दौरान आईं चुनौतियां, भूकंप का अनुभव और बिजली कटौती की मुहीम।)

Tuesday, 22 March 2011

जापान का जज्बा: भाग-1

26 नवंबर 2008 के मुंबई पर हुए आतंकी हमले के बाद अब ये दूसरा ऐसा मौका था जब हम उस दिशा की ओर निकले थे जहां से लोग अपनी जान बचाकर भाग रहे थे। शुक्रवार 12 मार्च 2011 को जापान में भूकंप और सुनामी ने कहर बरपाया और उसके बाद जब हालात और भी बिगडते गये तो रविवार को हमारे चैनल ने भी वहां एक टीम भेजने का फैसला किया। सोमवार के दिन मैने जापानी कंसुलेट में वीजा के लिये अर्जी दे दी। वीजा चंद घंटों में ही बिना किसी परेशानी के और ज्यादा कागजात पेश किये बिना ही हमें मिल गया। दरअसल जापान सरकार ने विदेश में मौजूद अपने तमाम अधिकारियों को निर्देश दे रखा था कि अगर कोई पत्रकार जापान आना चाहता है तो उसे जल्द से जल्द वीजा दिया जाये ताकि जापान के हालातों के बारे में दुनिया को ज्यादा से ज्यादा जानकारी मिल सके। मैं 16 मार्च को जापान की राजधानी टोकियो पहुंचा और अगले 5 दिनों तक जापान में ही रहा। इन 5 दिनों में मैने जो देखा, जो महसूस किया, जिन लोगों से बातचीत की उसने मेरे मन में जापान के प्रति जागी स्वाभाविक सहानुभूति से ज्यादा इस देश के लिये आदर पैदा किया। चाहे संकट के वक्त में हिम्मत दिखाते हुए आशावादी रहने की बात हो, चाहे हादसों से निपटने की तकनीक की बात हो या फिर किसी की मदद करने का जज्बा हो, जापान ने दिल जीत लिया।

हादसे में भी हिम्मत और अनुशासन का प्रदर्शन-
वैसे तो जापान में भूकंप आना कोई असामान्य बात नहीं है लेकिन 12 मार्च 2011 को जापान में आया भूंकप जापान के ताजा इतिहास में आया सबसे बडा भूकंप था। रिक्टर पैमाने पर 9 की तीव्रता से आये इस भूकंप से उपजी सुनामी ने सेंदई और मियागी जैसे जापान के उत्तर पूर्वी इलाके को तो नर्क में तब्दील कर ही दिया लेकिन साथ साथ टोकियो को भी हिलाकर रख दिया। सभी फोन लाईनें बंद हो गईं।मुंबई की तरह ही टोकियो में भी लोकल ट्रेने वहां की लाईफ लाईन मानी जातीं हैं। करीब 80 लाख लोग टोकियो में घर से दफ्तर के बीच का सफर लोकल ट्रेनो से तय करते हैं। जब भूकंप आया तो शहर की सभी लोकल ट्रेने भी बंद हो गईं। कहीं बिजली के खंभे उखड गये तो कहीं पटरी जगह से खिसक गई। शहर थम गया...लेकिन ऐसी हालत में भी टोकियो निवासियों ने अनुशासनहीनता नहीं दिखाई, कोई अफरा तफरी नहीं मचाई और न ही किसी तरह का हंगामा किया। लोकल ट्रेन से सफर करने वाले तमाम मुसाफिर अब सडक पर आ गये...लेकिन बसों और टैक्सियों के लिये सभी ने कतार लगाई..कोई धक्का मुक्की नहीं..गाली गलौच नहीं। हर कोई एक दूसरे की सुविधा का ध्यान रख रहा था।पूरा शहर एक परिवार की तरह पेश आ रहा था जहां हर किसी को हर किसी की फिक्र थी।

इतने बडे पैमाने पर भूकंप आने के बावजूद टोकियो शहर में एक भी इमारत जमींदोस्त नहीं हुई। सभी इमारतो को इस तकनीक से बनाया गया था कि रिक्टर स्केल पर 9 की तीव्रता के भूकप आने पर भी वे बुरी तरह से हिल तो रहीं थीं लेकिन गिरीं नहीं। लोगों के हताहत होने की कोई बडी खबर नहीं आई। भूकंप से नुकसान सिर्फ इतना हुआ कि पानी सप्लाई करनेवाली पाईप लाईने कई इलाकों में टूट गईं। ऐसे जिन इलाकों में पानी की पाईप लाईनों को नुकसान पहुंचा वहां सरकार ने तुरंत पानी के टैकर और कपडा धुलाई की मशीनें भिजवा दीं और लोगों को जरा भी असुविधा नहीं होने दी। यहां भी लोगों ने अनुशासन दिखाते हुए कतार में खडे रहकर पानी लिया और अपने कपडे धोये बिना कोई हो हल्ला मचाये।

भूकंप के अगले ही दिन पूरा शहर बिलकुल सामान्य दिखा। लोग सुबह 5 बजे से ही अपने दफ्तर जाने के लिये निकलने लगे थे।कई लाईनों पर लोकल ट्रेने फिरसे शुरू हो गईं थीं। सडक पर ट्राफिक भी सामान्य नजर आ रहा था और बाजार भी खुल गये थे। लोगों के चेहरे पर अपनी देश में आई त्रासदी का गम साफ झलक रहा था लेकिन वे डरे हुए बिलकुल नहीं लगे।

विदेशियों में निकल भागने के लिये हडकंप-
जापान दूसरे विश्व युद्ध के बाद अब तक का अपना सबसे बुरा वक्त झेल रहा था लेकिन जापानी नागरिक इससे जरा भी विचलित नहीं दिखे। विचलित दिखे जापान में बसे तमाम विदेशी जिनके देशों ने जापान के लिये एडवाईसरी जारी कर रखीं थीं। किसी देश ने अपने नागरिकों को तुरंत जापान छोडने के लिये कहा तो किसी ने कहा कि रेडीएशन के खतरे के मद्देनजर नागरिक अपने होटलों से बाहर न निकलें तो किसी की सलाह थी कि बेहद जरूरी हो तब ही जापान जायें। इस तरह की एडवाईसरीज ने खौफ का माहौल पैदा कर दिया था। मैं सेनागावा इलाके के रिजनल इमीग्रेशन ब्यूरो में गया तो पाया कि वहां दुनिया के तमाम देशों के 5 हजार से ज्यादा नागरिक रिएंट्री वीजा हासिल करने के लिये 3 किलोमीटर से ज्यादा लंबी कतार लगा कर 10 घंटे से ज्यादा तक खडे थे। मैने कुछ भारतीय, नेपाली और बांगलादेशी नागरिकों से बात की। कुछ का कहना था कि वे फुकूशिमा प्लांट से लीक हो रहे रेडिएशन से डरकर लौट रहे हैं तो कुछ का कहना था कि भारत में उनके घरवालों का काफी दबाव हैं कि वे वापस लौट जायें। सभी ने यही सोच रखा था कि हालात ठीक हो जाने पर वे वापस जापान लौट आयेंगे।
जब मैं जापान से वापस लौट रहा था तो टोकियो हवाई अड्डे पर इससे भी बडा मंजर देखने मिला। हवाई अड्डे पर जन सैलाब उमडा हुआ था। 10 हजार से ज्यादा विदेशी नागरिक अपने अपने देश लौटने के लिये एयरपोर्ट पर मौजूद थे। मुझे भी अपनी फ्लाईट पर चैक इन की प्रक्रिया निपटाने के लिये 3 घंटे लग गये। एक भारतीय महिला से मेरी वहां बात हुई। उसका कहना था- मैं डरकर वापस भारत नहीं लौट रही हूं। उलटा ऐसे वक्त में मुझे जापान छोडते वक्त अपराध बोध हो रहा है। इस देश ने मुझे सबकुछ दिया है। मुसीबत के वक्त मैं इसे छोड कर जा रहीं हूं..लेकिन सिर्फ इसलिये क्योंकि भारत से हर दिन हमारे करीबी रिश्तेदार फोन करके रोना धोना करते हैं। न्यूज चैनलों पर रेडिएशन से जुडी खबरें देखकर वे डरें हुए हैं। मेरे मां और पिताजी की चिंता के मारे तबियत बिगड गई है। उसकी बात मुझे सच लगी। एयरपोर्ट पर कई जापान में बसे ऐसे भारतीय दिखे जो सिर्फ अपने रिश्तेदारों के दबाव में आकर लौट रहे थे। उनमे से कुछ की मीडिया से भी शिकायत थी। एक बडी सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करने वाले जयंत नाम के शख्स ने कहा- यार भारत में हमारे घरवाले क्यों नहीं डरेंगे? न्यूज चैनल वाले हेडलाईन दिखाते हैं- मिट जायेगा टोकियो...खत्म हो जायेगा जापान...2012 के विनाश की शुरूवात...प्रलय की उलटी गिनती शुरू..


चूंकि मैं ज्यादातर वक्त कवरेज के लिये बाहर ही था और जापान पहुंच कर मैने कोई भी भारतीय चैनल नहीं देखा था इसलिये मुझे नहीं मालूम था कि चंद भारतीय चैनल जापान की त्रासदी को किसतरह से परोस रहे हैं..लेकिन जिस तरह की हेडलाईंस की का जिक्र जयंत ने किया उससे मैं समझ गया कि कुछ चैनलों ने इसी अंदाज में जापान की खबरें पेश की होंगीं और वे चैनल कौनसे होंगे।

(भाग-2 में पढिये कि कैसे जापान में लोग दूसरों की मदद के लिये किसी भी हद तक जा सकते हैं और कुदरती हादसों से निपटने के लिये क्या हैं जापान के अनोखे तरीके।)

Wednesday, 9 March 2011

दाऊद इब्राहिम की शिक्स्त

अंडरवर्लड डॉन दाऊद इब्राहिम को मुंबई की एक अदालत में करारी शिकस्त झेलनी पडी है। नीलामी में बेची गईं दाऊद की संपत्ति पर अब दिल्ली के एक वकील का कब्जा होगा। अजय श्रीवास्तव नाम के इस वकील ने साल 2001 में इनकम टैक्स विभाग की नीलामी में दाऊद के गढ नागपाडा इलाके में 2 संपत्तियों की बोली लगाई थी लेकिन दाऊद की बहन हसीना पारकर उन्हें संपत्ति का कब्जा नहीं लेने दे रही थी। 10 साल की कानूनी जंग के बाद अब अदालत ने वकील श्रीवास्तव के पक्ष में फैसला सुनाया है।
मार्च 2001 में इनकम टैक्स ने जब दाऊद इब्राहिम की 11 बेनामी संपत्तियों की नीलामी की थी तब अजय श्रीवास्तव ने नागपाडा की जयराजभाई लेन के इंडस्ट्रीयल गाले की बोली लगाकर उन्हें ढाई लाख रूपये में खरीदा था। कागज पर तो दोनो संपत्तियां अजय श्रीवास्तव की हो गईं, लेकिन दाऊद की बहन हसीना पारकर ने इनपर श्रीवास्तव को कब्जा नहीं हासिल करने दिया। अजय श्रीवास्तव ने कब्जा हासिल करने के लिये अदालत का दरवाजा खटखटाया और करीब 10 साल बाद उन्हें कामियाबी मिली है। अदालत ने न केवल हसीना पारकर को संपत्तियों का कब्जा छोडने को कहा है बल्कि ये आदेश भी दिया है कि अजय श्रीवास्तव ने मुकदमा लडने के लिये जो खर्च किया है उसकी भी भरपाई करे।
इनकम टैक्स विभाग ने सालभर के भीतर 2 बार दाऊद की संपत्तियों की नीलामी की थी, लेकिन उस दौरान दाऊद के खौफ का आलम ये था कि पहली नीलामी में कोई बोली लगाने की हिम्मत नहीं कर सका। दूसरी नीलामी में अजय श्रीवास्तव ने बोली लगाकर सबको चौंका दिया।

नागपाडा के जिस इलाके में संपत्ति हैं दाऊद ने अपना आपराधिक करियर वहीं से शुरू किया था। उसके तमाम गुर्गे भी वहीं रहते हैं और कई काले कारोबारों का अड्डा भी यही रहा है। इसलिये इस संपत्ती का छिनना दाऊद गिरोह के लिये नाक का सवाल बन गया था। इसके अलावा जिस तरह से नागपाडा इलाके में बडे बडे टावर बन रहे हैं उसे देखते हुए इस जगह की कीमत अब 5 करोड रूपये से ज्यादा की हो गई है।श्रीवास्तव का कहना है कि दाऊद की संपत्ति खरीद कर वो दुनिया को संदेश देना चाहते थे कि गुनहगारों से डरने की जरूरत नहीं है। इस तरह से उन्हें नीचा दिखाने का मौका नहीं छोडना चाहिये।

अजय श्रीवास्तव केस वापस लें लें इसकी खातिर दाऊद गिरोह की ओर से कई पैंतरें आजमाए गये। श्रीवास्तव के वकील वीरल शुक्ला को धमकाया गया और एक बार तो दाऊद के गुंडों ने उनकी कार तोड डाली। जज पर दबाव डालने की कोशिश की गई। मामले की सुनवाई कर रहे एक जज ने तो अपना तबादला ही करवा लिया।(हालांकि इस बात की पृष्टि नहीं हो सकी है कि इसी वजह से जज ने अपना तबादला करवाया।)
अजय श्रीवास्तव दाऊद की संपत्ति पर बोली लगाने से पहले भी खबरों में रह चुके हैं। दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान की पिच खोदने के आरोप में उनकी गिरफ्तारी हुई थी। श्रीवास्तव शिवसेना से भी जुडे हुए हैं, लेकिन शिवसेना ने कभी दाऊद की संपत्ति पर बोली लगाने के लिये श्रीवास्तव का कभी आधिकारिक समर्थन नहीं किया। श्रीवास्तव को दाऊद गिरोह की ओर से धमकियां भी आईं और एक बार उनकी हत्या की भी कोशिश की गई। श्रीवास्तव की जान के खतरे को देखते हुए कुछ दिनों तक दिल्ली पुलिस ने उन्हे सुरक्षा भी मुहैया करवाई। श्रीवास्तव ने अबसे चंद साल पहले मुंबई पुलिस से पेशकश की थी कि चूंकि दोनो संपत्तियां ठीक दाऊद के इलाके में हैं इसलिये वो इन्हें मुंबई पुलिस को दान कर देंगे ताकि पुलिस वहां पर अपनी चौकी बनाकर दाऊद गिरोह की गतिविधियों पर नजर रख सके..पर पुलिस ने श्रीवास्तव की पेशकश में दिलचस्पी नहीं दिखाई।

दाऊद की संपत्ति पर बोली लगाने के पीछे अजय श्रीवास्तव की मंशा पर भी कई सवाल उठे। किसी ने कहा कि श्रीवास्तव ये सब पब्लिसिटी के लिये कर रहे हैं तो किसी का कहना था कि उनकी मानसिक हालत खराब है और इसीलिये कह रहे हैं आ बैल मुझे मार। उनके सियासी दुश्मनों ने तो ये तक अफवाह उडा दी कि श्रीवास्तव खुद ही दाऊद के आदमी हैं और ये सारा कुछ दाऊद की चाल है।

अदालत की चारदीवारी के भीतर भले ही अजय श्रीवास्तव ने कानूनी जंग जीत ली हो लेकिन उनके लिये अदालती आदेश की तामील करवा पाना आसान न होगा। दाऊद गिरोह के लिये अपनी संपत्ति पर से कब्जा गंवाना कानूनी मसला नहीं बल्कि नाक का मसला है।

Tuesday, 1 March 2011

डी.शिवानंदन के साथ पहला एनकाउंटर...

"सर अगर आप नाजिम रिजवी से डरते हैं तो बिना उसका नाम लिये मुझे कैमरे पर बाईट दे दीजिये।"
मेरे मुंह से ये शब्द निकले ही थे कि जैसे मुंबई पुलिस के क्राईम ब्रांच के दफ्तर में ज्वालामुखी फट पडा। क्राईम ब्रांच के मुखिया डी.शिवानंदन मुझपर बरस पडे।" Do you know to whom are you talking. You are in front of D.Sivanandhan, Joint Commissioner of Mumbai Crime Branch...अगर मैं नाजिम रिजवी जैसे मादर#$ ..से डरता होता तो क्या ये कुर्सी पर बैठता। शिवानंदन किसी से भी नहीं डरता। चलो अपना कैमरा ऑन करो... जो पूछने का है पूछो..मैं साले का नाम लेकर बोलेगा."
शिवानंदन के गुस्से को देखकर तो एक पल मुझे लगा कि कहीं वो मेरा ही एनकाउंटर न करवा दें। बात साल 1999 की है जब शिवानंदन मुंबई के तमाम एनकाउंटर स्पेशलिस्ट प्रदीप शर्मा, दया नायक, विजय सालस्कर, प्रफुल्ल भोसले जैसे एनकाउंटर स्पेलिस्ट अफसरों के बॉस हुआ करते थे। डी.शिवानंदन से ये मेरी पहली मुलाकात थी। मेरे तत्कालीन बॉस(और मौजूदा भी) मिलिदं खांडेकर ने मुझे अंडरवर्लड और बॉलीवुड के रिश्तों पर शिवानंदन का इंटरव्यू करने के लिये कहा था। उन दिनों ये खबर आई थी कि फिल्म चोरी चोरी चुपके चुपके में डॉन छोटा शकील का पैसा लगा है और पुलिस इस फिल्म के निर्माता नाजिम रिजवी को मोका कानून के तहत गिरफ्तार कर सकती है। मैं दूरदर्शन पर दिखाये जाने वाले शो "आज तक" में बतौर क्राईम रिपोर्टर हाल ही में नौकरी पर लगा था और डी.शिवानंदन से ये मेरी पहली मुलाकात थी रात के करीब 9 बजे क्राफर्ड मार्केट के सामने उनके दफ्तर में। शिवानंदन काफी गुस्सैल स्वभाव के माने जाते थे और उस वक्त मीडिया से भी उनकी अच्छी नहीं बनती थी। मुझे उनकी बाईट लेने का काफी दबाव था...नई नई नौकरी थी और मैं खाली हाथ लौटकर नहीं जाना चाहता था। मैं बडी देर तक शिवानंदन को बाईट देने के लिये मनाता रहा लेकिन वे ये कहकर बाईट देने से इंकार कर रहे थे कि मामले की तहकीकात अभी चल रही है ऐसे में अनायास ही मेरे मुंह से निकल गया- "सर अगर आप नाजिम रिजवी से डरते हैं तो बिना उसका नाम लिये मुझे कैमरे पर बाईट दे दीजिये।" मेरे शब्द सुनकर शिवानंदन भडक तो काफी उठे लेकिन इससे मेरा काम भी हो गया। मुझे जैसी बाईट चाहिये थी, वैसे बाईट उन्होने दे दी...मैं क्राईम ब्रांच के दफ्तर से सुरक्षित वापस लौटने में भी कामियाब रहा।
उस एक मुलाकात के बाद शिवानंदन से बतौर क्राईम रिपोर्टर सैकडों बार हमारी मुलाकातें होतीं रहीं और बहुत जल्द ही हम अच्छे दोस्त बन गये।

28 फरवरी 2011 को डी.शिवानंदन की पुलिस महकमें से विदाई भले ही किसी भी आम आईपीएस अफसर की तरह रही हो, लेकिन शिवानंदन का 35 साल का पुलिसिया करियर खास रहा है..एक्शन और चुनौतियों से भरा रहा है...उनकी इसी इमेज ने बॉलीवुड को भी अपनी ओर खींचा और कंपनी और अब तक 56 जैसी फिल्मों में शिवानंदन जैसे किरदार दिखाये गये। जब 90 के दशक में गैंगवार की वजह से मुंबई की सडकें खून से लाल हो रहीं थीं और हर दिन एक से दो लोग अंडरवर्लड की गोलियां का शिकार हो रहे थे तब डी. शिवानंदन को मुंबई क्राईम ब्रांच का मुखिया बनाया गया था। शिवानंदन ने महकमें से कुछ खास अफसरों को चुना और एनकाउंटर्स की रणनीति अपनाई। 238 गैंगस्टर पुलिस की गोलियों से मारे गये और साढे तीन हजार आरोपी मोका जैसे सख्त कानून के तहत सलाखों के पीछे भेजे गये। क्राईम ब्रांच प्रमुख के पद से तबादला होने के बाद शिवानंदन कुछ महीनों के लिये सीबीआई में रहे। नागपुर पुलिस कमिश्नर, ठाणे पुलिस कमिश्नर और राज्य खुफिया विभाग के प्रमुख का पदभार संभालने के बाद साल 2009 में उन्हें मुंबई का पुलिस प्रमुख बनाया गया।शिवानंदन की आखिरी पोस्टिंग महाराष्ट्र के डीजीपी के तौर पर हुई।

बतौर एक क्राईम रिपोर्टर शिवानंदन ने मेरी बडी मदद की। मेरे क्राईम शो रेड अलर्ट और शूट आउट के में दिखाई जाने वाली स्टोरीज के लिये न केवल उन्होने रिसर्च में साथ दिया बल्कि  शो का स्तर और प्रमाणिकता बनाये रखने के लिये अपनी टिप्पणियां भी देते थे। मुंबई के ज्यादातर हाई प्रोफाइल शूटआउट्स उन्ही के कार्यकाल में हुए और उन शूटआउट्स को अंजाम देनेवाले भी उन्ही के कार्यकाल में पकडे या मारे गये। शिवानंदन ने जिसे एक बार दोस्त बना लिया फिर वो उसके लिये किसी भी हद तक जा सकते हैं ये बात मैने 19 नवंबर 2009 को देखी। विल्सन कॉलेज में उन्हें 26-11-2008 के आतंकी हमले पर लिखी गई मेरी किताब वे 59 घंटे के लोकार्पण के लिये आना था..लेकिन तारीख से ठीक एक दिन पहले उन्हें तेज बुखार आ गया। मैने 19 तारीख की सुबह उन्हें फोन किया। फोन उठाते ही उन्होने कहा- Jitendra.dont worry..i will keep my words..I will come for you whatever it may be.I am taking medicines & will try to get well for the evening function. फोन पर उनकी आवाज सुनकर ही पता चल रहा था कि वे काफी बीमार हैं और उन्हे बोलने में भी तकलीफ हो रही थी। मैने टेक केयर बोल कर फोन रख दिया। किस मुंह से मैं उन्हें शाम के कार्यक्रम में आने को कहता...मैने आस छोड दी थी कि शिवानंदन किताब के लोकार्पण के लिये आयेंगे..लेकिन मुझे उस वक्त सुखद आश्चर्य हुआ जब ठीक वक्त पर शिवानंदन विल्सन कॉलेज में कार्यक्रम में शरीक होने के लिये पहुंचे। मंच पर वे मेरे बगल में ही बैठे थे। मैने महसूस किया कि उस वक्त भी उन्हें तेज बुखार था जिसकी वजह से उन्हें हलकती कंपकंपी हो रही थी। इस हालत में भी शिवानंदन ने न केवल पूरे कार्यक्रम में आखिर तक मौजूद रहे बल्कि पूरे जोश के साथ भाषण भी दिया और 26-11 की पहली बरषी के बारे में पुलिसिया कार्यक्रमों की जानकारी भी दी। शिवानंदन बीमारी की वजह से पिछले 2 दिनों से दफ्तर नहीं गये थे और सारे कार्यक्रम उन्होने रद्द कर दिये थे। मैने अब तक की अपनी उम्र में दोस्ती निभाने की ऐसी मिसाल नहीं देखी।