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Thursday, 24 March 2011

जापान का जज्बा: भाग-2

जापान के लोग इस कडवी सच्चाई को स्वीकार कर चुके हैं कि भौगौलिक स्थिति की वजह से जापान में छोटे बडे भूकंप आते रहेंगे, लेकिन जापानियों ने कुदरत की इस साजिश के खिलाफ घुटने नहीं टेके हैं। भूकंप से कैसे निपटाना है इसके लिये जापान ने हर तरह की तैयारी कर ली है। टोकियो के निशीकसाई इलाके में अपने परिवार के साथ रहने वाले एक भारतीय शख्स गौतम बिलिमोरिया से मैं मिला। टोकियो के इस इलाके में भारतीय बहुतायत में रहते हैं इसलिये इस इलाके को वहां मिनी इंडिया भी कहा जाता है। गौतम के मुताबिक बच्चों को स्कूली स्तर से ही भूकंप के बारे में पढाया जाने लगता है। भूकंप क्यों आते हैं, उनसे क्या नुकसान होता है, उनसे कैसे बचा जाये इन सबकी जानकारी बचपन से ही जापानी अपने बच्चों को देते हैं। जापान की सरकार भी अपने नागरिकों को भूकंप के प्रति जागरूक करने के लिये तमाम इलाकों में Earthquake Simulator  नाम का यंत्र घुमाती है। इस यंत्र में नागरिकों को खडा करके महसूस कराया जाता है कि रिक्टर स्केल पर अलग अलग तीव्रता के भूकंप आने पर जमीन कितना हिलती है और फलां तीव्रता का भूकंप आने पर क्या करना चाहिये। यही वजह है कि छोटे छोटे जापानी बच्चे भी भूकंप के हलके झटके आने पर बिना घबराये अंदाजे से ही बता देते हैं कि इस भूकंप की रिक्टर स्केल पर तीव्रता कितनी होगी। उनका अंदाजा ज्यादातर मामलों में सही होता है। रिक्टर स्केल पर 6 की तीव्रता तक भूकंप आने पर जापानी विचलित नहीं होते, लेकिन 6 से आगे बढने पर वे सावधान हो जाते हैं।

एक चीज जो मुझे बडी दिलचस्प लगी वो थी  Emergency Kit. जापान में रहनेवाला हर शख्स अपने साथ एक इमरजेंसी किट रखता है। इस किट में उनका ओरिजनिल पासपोर्ट होता है, स्कूल कॉलेज से जुडे जरूरी दस्तावेज होते हैं, अहम सरकारी कागजात होते हैं  और साथ ही चंद दिनों तक गुजारने के लिये सूखा खाना और फलों का रस होता है। जापान के दैनिक जीवन में इस इमरजेंसी किट की बडी अहमियत रहती है। बच्चों को इस किट के बिना स्कूल में नहीं लिया जाता। इस किट के पीछे मकसद ये है कि अगर भूकंप या दूसरे कुदरती कहर की वजह से अगर लोगों के घर ढह जायें तो कम से कम वो कुछ दिनों तक बिना बाहरी मदद के जिंदा रह सकें और कागजातों के सहारे राहत और पुनर्वास के लिये जरूरी मदद पा सकें।

भूकंप आने पर अमूमन लोगों की स्वाभाविक प्रतिक्रिया रहती है इमारत या घर से तुरंत निकल भागने की..लेकिन जापान में इसके बिलकुल उलट होता है। भूकंप की वजह से जब इमारत हिलने लग जातीं हैं तो लोग इमारत से बाहर नहीं भागते बल्कि अपने घरों में ही पलंग या टेबल के नीचे बैठ जाते हैं। इमारतों की नींव इतनी मजबूत बनाई जाती है और उनमें इस तरह का Spring mechanism लगा होता है कि वो गिरती या ढहती नहीं हैं सिर्फ हिलतीं हैं। जापानियों का यही मानना है कि भूकंप आने पर आप सडक से ज्यादा इमारत के भीतर सुरक्षित हो। बाहर निकलने पर कोई बिजली का खंभा या दूसरी चीज आप पर गिर सकती है या आप जमीन में आई दरार में गिर सकते हो जिससे कि जान भी जा सकती है।
एक और चीज मैने टोकियों में देखी। जो लोग हाल के चंद सालों में यहां रहने आये हैं और जो आये दिन आने वाले भूकंप के झटकों से पूरी तरह वाकिब नहीं हुए हैं उन्हें एक तरह का भ्रम अक्सर सताता है यानी भूकंप के झटके न आने पर भी उन्हें लगता है कि इमारतें हिलडुल रहीं हैं, जमीन खिसक रही है वगैरह जबकि हकीकत में वैसा कुछ नहीं हुआ होता। मनोवैज्ञानिक शायद इसे Earthquake Phobia कहते होंगे।

जापान है मददगारों का देश-
मैं अब तक जितने भी देशों में गया हूं उन सबमें मुझे जापान के लोग सबसे ज्यादा शालीन, उदार और मददगार लगे। ज्यादातर आम जापानियों को ठीकठाक अंग्रेजी नहीं आती, लेकिन अगर आप उनसे मदद मांग रहे हैं तो अपनी समझ के मुताबिक वे आपकी मदद करने में कोई कसर नहीं छोडेंगे। मेरे साथ 2 से 3 ऐसे वाकये हुए जिनसे मेंरे मन में जापानियों के प्रति काफी सम्मान पैदा हुआ है। 17 मार्च को मैं टोकियो के सेनागावा स्टेशन उतरा जहां से मुझे रीजनल इमीग्रेशन ब्यूरो जाना था। स्टेशन से बाहर निकलते ही नीचे सडक पर जाने के लिये सीढियां हैं। मै सीढियां उतरने लगा। सामने से एक जापानी सूटबूट पहनकर ट्रेन पकडने के लिये स्टेशन की ओर सरपट जा रहा था। मैने उसे रोककर पूछा- Excuse Me..where is the bus stop for Emigration bureau. मेरा सवाल सुनकर वो कुछ पल के लिये सोच में पड गया और फिर कहा..I don’t know. हमें जवाब देकर जापानी जल्दबाजी में स्टेशन की ओर आगे बढ गया। हम सीढियों से नीचे उतर आये और वहां लगे नक्शे के जरिये बस स्टाप खोजने लगे। नक्शे में जानकारी जापानी भाषा में दी गई थी और हमें समझने में दिक्कत हो रही थी। आगे क्या करें हम ये सोच ही रहे थे कि तभी पीछे से किसी ने हमें आवाज दी- Excuse Me. I have found out where the bus stop is. Please come along with me. ये वही जापानी था जो हमें सीढियां उतरते वक्त मिला था। हांफते हुए हमें ढूंढने के लिये ये सीढियां उतरकर वापस हमारे पास आया था हमारी मदद करने। बस स्टाप वहां से थोडे फासले पर था। हमें मदद करने के लिये इस जापानी नागरिक ने अपनी ट्रेन छोड दी और इमीग्रेशन ब्यूरो के लिये जाने वाली बस में बिठाकर ये वापस स्टेशन की ओर लौटा। किसी दूसरे देश के नागरिक की मदद के लिये हर कोई इतनी जहमत नहीं उठाता। जापानी कितने मददगार हैं ये इस बात की सिर्फ एक ही मिसाल थी। 5 दिनों के जापान के सफर में हमें इस जैसी कई और भी मिसालें मिलीं लेकिन उन सबका यहां जिक्र यहां मुश्किल है। एक और वाकये मुझे जिक्र करना जरूरी लगता है..एयरपोर्ट पर मैने अमेरिकी डॉलर देकर जितने भी येन(जापानी मुद्रा) खरीदे थे वे खत्म हो चुके थे। मुझे कुछ और येन की जरूरत थी। मैं टोकियो के शिंजुकू इलाके में सिटीबैंक की शाखा में गया। यहां का सारा स्टाफ जापानी था। मैने करंसी एक्सचेंज काउंटर पर मौजूद महिला के पास जाकर कहा कि मुझे 1200 डॉलर के येन चाहिये। उसने कहा कि येन तो मुझे मिल जायेंगे लेकिन अगर आप इस बैंक से कुछ कदमों के फासले पर जायेंगे तो आपको एक जापानी बैंक मिलेगा वहां आप को कम डॉलर में ज्यादा येन मिल जायेंगे। यहां करंसी एक्सचेंज रेट ज्यादा है और इस बैंक का कमीशन भी ज्यादा है।मुझे ये बात काबिल ए तारीफ लगी। एक विदेशी नागरिक की सहूलियत के लिये इस महिला ने अपने बैंका का ग्राहक छोड दिया। मैं महिला के बताये हुए नजदीकी जापानी बैंक में गया और वहां वाकई में सौदा फायदेमंद रहा।

रेल्वे स्टेशन हो या हवाई अड्डा या फिर पुलिस थाना...हर जगह पर जापानी एक सरीखे मददगार नजर आये।

(भाग-3 में पढिये जापान में रिपोर्टिंग के दौरान आईं चुनौतियां, भूकंप का अनुभव और बिजली कटौती की मुहीम।)

1 comment:

shri8131 said...

प्रत्यक्ष काळ जरी आला तरी त्याला थोपवण्याची तयारी म्हणजे काय! हेच आपण शिकावे.
जपान व जपानी ग्रेटच.