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Wednesday, 17 June 2015

छगन भुजबल : राजनेता से अभिनेता तक


मुंबई में मानसून आ गया है, लेकिन लगता है कि जितना पानी बरसा है उससे ज्यादा एनसीपी के वरिष्ठ नेता छगन भुजबल पर आरोपों की बारिश हुई है। महाराष्ट्र सदन घोटाला, आय से ज्यादा संपत्ति, फर्जी डिग्री, पद का दुरूपयोग कर बिल्डर को सरकारी जगह देने, निवेशकों से ठगी करने जैसे आरोप भुजबल पर हाल के दिनों में लगे हैं। ऐसे आरोपों को लेकर जांच एजेंसियां भी हरकत में आईं हुई दिख रहीं हैं। महाराष्ट्र की सियासत में जो सबसे दिलचस्प चेहरें हैं, उनमें से एक छगन भुजबल मुझे नजर आते हैं। बतौर पत्रकार कई मौकों पर भुजबल से मुलाकात हुई और इन मुलाकातों ने मेरी नजर में उनकी जो इमेज बनाई है वो बहुरंगी है।

प्रतिशोधी छगन भुजबल (Avenger Bhujbal)
छगन भुजबल में बदला लेने की जबरदस्त भावना है। अगर किसी ने भुजबल को हानि पहुंचाई है तो भुजबल मौका पडने पर उसे नहीं छोडते। भुजबल ने खुद को राजनीति में लाने वाले शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे को भी नहीं छोडा। 1991 में शिवसेना से बगावत करने के बाद से ही भुजबल बाल ठाकरे के निशाने पर थे। भुजबल को सबक सिखाने का मौका ठाकरे को तब मिला जब 1995 में बीजेपी-शिवसेना की गठबंधन सरकार महाराष्ट्र की सत्ता में आई।1996 में भुजबल महाराष्ट्र में विपक्ष के नेता थे और उन्हें मंत्रालय के सामने A-10 बंगला बतौर निवास मिला था। एक दिन शिवसैनिकों की भीड ने उनके बंगले पर हमला कर दिया और जमकर तोडफोड की। भुजबल का कहना था कि ये उनकी हत्या की साजिश थी और उन्होने जैसे तैसे बंगले से निकल भागकर अपनी जान बचाई। भुजबल इस घटना को भूले नहीं और बदला लेने की ताक में रहे। उन्हें मौका मिला साल 2000 में जब फिर एक बार कांग्रेस-एनसीपी सरकार महाराष्ट्र की सत्ता में आई और भुजबल राज्य के गृहमंत्री बनाये गये।

गृहमंत्री बनने के बाद भुजबल ने भडकाऊ लेख लिखने के 6 साल पुराने आरोप के तहत शिवसेना प्रमुख ठाकरे को गिरफ्तार करवा दिया। ये भुजबल का बदला था। भले ही ठाकरे की गिरफ्तारी तकनीकी तौर पर घंटेभर की ही रही हो, लेकिन उन्हें गिरफ्तार करवाना भुजबल के लिये एक बडी जीत थी। जिन बाल ठाकरे की आवाज पर मुंबई हिल जाती थी, जिनके शिवसैनिक एक आदेश पर हिंसा और तोडफोड के लिये तैयार रहते थे, उन नेता को गिरफ्तार करना कोई आसान काम नहीं था। राज्य के गृहमंत्री होने के नाते मुंबई में कानून-व्यवस्था बनी रहे इसकी जिम्मेदारी भी भुजबल पर थी, लेकिन भुजबल ने ये जोखिम उठाया और इसके लिये पूरी तैयारी भी की। राज्यभर की पुलिस को मुंबई में लगा दिया गया और आपराधिक मामलों वाले शिवसैनिकों को पहले ही पकड लिया गया। जुलाई 2000 में ठाकरे की गिरफ्तारी से 10 दिनों पहले ही शहर में माहौल गर्म हो गया था, लेकिन गिरफ्तारी वाले दिन भुजबल ने इतने कडे इंतजाम कर रखे थे कि मुंबई में शिवसेना की ओर से कोई बडा उत्पात नहीं मचाया जा सका।

अंडरवर्लड से रिश्तों के आरोपों के तहत हीरा कारोबारी और फिल्म प्रोड्यूसर भरत शाह की मकोका कानून के गिरफ्तारी भी सियासी हलकों में भुजबल की प्रतिशोधी भावना की एक मिसाल मानी जाती है, लेकिन इस मामले में पुख्ता तौर पर ज्यादा लिखने के लिये कुछ नहीं है।

कलाकार भुजबल (Actor Bhujbal)
जो पत्रकार राजनीति कवर करते हैं उन्हें पता है कि भुजबल एक अच्छे कलाकार भी हैं। बाल ठाकरे और राज ठाकरे की तरह ही भुजबल को भी दूसरों की मिमिक्री करना आता है। वे अभिनय भी कर लेते हैं, ये तब पता चलता था जब मैं बाल ठाकरे की ओर से लगाये गये किसी आरोप पर उनकी प्रतिक्रिया लेने जाता था। वे आंखें लाल करके, भौंहें टेढी करके, कैमरे की तरफ उंगली दिखाते हुए ऐसे बोलते जैसे ठाकरे उनके सामने ही खडे हों। चेहरे पर ऐसे नाटकीय भाव लाने के बाद वे बोलना शुरू करते सुन लो बाल ठाकरे...बाद में पता चला कि भुजबल एक मराठी फिल्म और पारंपरिक नाटकों में भी काम कर चुके हैं और अपनी इस कला का इस्तेमाल वे राजनीति में भी करते थे।
भुजबल को गीत गाने का भी शौक है ये तब पता चला जब एक बार उन्होने क्राईम रिपोर्टरों को रामटेक बंगले पर एक कार्यक्रम में आमंत्रित किया। उस मौके पर टाईम्स औफ इंडिया के वरिष्ठ पत्रकार एस.बालाकृष्णन और भुजबल के बीच अच्छी जुगलबंदी हुई। भुजबल ने उस मौके पर कई पुराने हिंदी फिल्मों के गाने गाये।
भुजबल को टोपियां इकट्ठा करने का भी शौक है। उनके पास दुनियाभर की तरह तरह की बनावट वाली टोपियों का कलैक्शन हैं। भुजबल की कलाप्रियता और उनके शौकों पर अलग से पूरा ब्लॉग लिखा जा सकता है।

उत्तरजीवी भुजबल (Survivor Bhujbal)
बडी से बडी मुसीबत आने पर भी भुजबल को खुशमिजाज रहते देखा गया है और ये भी दिलचस्प बात है कि गंभीर मामलों में भी फंसने के बावजूद भुजबल बिना किसी बडी हानि के बाहर निकाल आते हैं जो उनकी जिजीविषा दर्शाती है। साल 2003 में भुजबल पर उस वक्त बन आई थी जब वे करोडों के फर्जी स्टांप पेपर घोटाले जो कि तेलगी घोटाले के नाम से चर्चित हुआ था में फंस गये थे। एक के बाद एक तमाम छोटे बडे पुलिस अफसरों की गिरफ्तारी के बाद नंबर छगन भुजबल और उनके भतीजे समीर का लगने वाला था, लेकिन भुजबल ने हिम्मत नहीं हारी। घोटाले के पर्दाफाश होने के बाद से ही लगातार उनका नाम चर्चा में रहा लेकिन भुजबल ने खुदको बेकसूर बताया। सिर्फ एक बार जी न्यूज के मौजूदा रेसीडेंट एडिटर संजय सिंह के एक सवाल पर वे आपा खो बैठे थे और भरी प्रेस कांफ्रेंस में उन्होने सिंह को चप्पल निकालने की धमकी दे दी थी। साल 2004 में एक वक्त ऐसा आया जब बॉम्बे हाई कोर्ट की ओर से गठित विशेष जांच टीम की ओर से भुजबल की गिरफ्तारी तय मानी गई, लेकिन ऐन वक्त पर केंद्र में सत्ता परिवर्तन हो गया। केंद्र में एनडीए की जगह यूपीए आ गई। शरद पवार सरकार में शामिल होकर कृषि मंत्री बन गये और तेलगी घोटाले की जांच एसआईटी से छीनकर सीबीआई को सौंप दी गई। भुजबल गिरफ्तारी से बच गये।

करीब 11 साल बाद भुजबल फिर एक बार कानून के भंवर में फंसे हैं। क्या वे इस बार डूबेंगे या हमेशा की तरह फिर बच निकलेंगे ?

Tuesday, 9 June 2015

यादों की विक्टोरिया...


घोडे मुंबई की पहचान से दो तरह से जुडे थे। एक महालक्ष्मी रेसकोर्स में होने वाली घोडों की दौड की वजह से जिनमें करोडों का सट्टा लगता है और दूसरा मुंबई में चलनेवाली विक्टोरिया की वजह से। महालक्ष्मी रेसकोर्स में घोडे अब भी दौडते हैं, लेकिन विक्टोरिया का दौर खत्म हो चुका है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने पशू क्रूरता विरोधी आंदोलकों की दलीलों के आधार पर विक्टोरिया को बैन कर दिया है और सालभर के भीतर मुंबई शहर से विक्टोरिया पूरी तरह से गायब हो जायेंगीं। वैसे मुंबई में विक्टोरिया का अंत इस अदालती आदेश के काफी पहले हो चुका था। जो विक्टोरिया शहर की नब्ज का हिस्सा थीं, वो अबसे 2 दशक पहले ही सडकों पर से गायब हो चुकीं थीं। इन दिनों आप नरीमन पॉइंट और गेटवे औफ इंडिया पर जो चमकती दमकती घोडागाडियां देखते हैं, वे सिर्फ मनोरंजन के लिये हैं, पर्यटकों को लुभाने के लिये हैं।

असली विक्टोरिया मुंबई में यातायात का एक अहम माध्यम थी, खासकर पुरानी मुंबई के इलाकों में ठीक उसी तरह जैसे टैक्सी, ऑटो, बस वगैरह हैं। जैसे आज ऑटोरिक्शा सिर्फ मुंबई के उपनगरों में ही नजर आते हैं, माहिम और सायन से दक्षिण मुंबई की तरफ उनका आना मना है, उसी तरह से विक्टोरिया भी ज्यादातर सिर्फ दक्षिण मुंबई में ही नजर आतीं थीं, उपनगरों में नहीं। 1880 के आसपास विक्टोरिया को मुंबई में अंग्रेजों ने शुरू किया था और जल्द ही ये शहर की पहचान में शामिल हो गईं। मुझे बचपन की याद है कि 90 के दशक की शुरूवात तक दक्षिण मुंबई के कालबादेवी रोड से सटे तांबा-कांटा नाम के इलाके में एक विक्टोरिया स्टैंड हुआ करता था। शाम को यहां विक्टोरिया की कतारें लगतीं थीं। इनके ज्यादातर मुसाफिर गुजराती और मारवाडी होते थे जो अपना कारोबार खत्म करने के बाद विक्टोरिया के जरिये मरीन लाईन या सीएसटी स्टेशन जाते। रोजाना आने-जाने वाले मुसाफिरों के ग्रुप होते थे और किराया सभी मुसाफिर मिलकर चुकाते थे।कालबादेवी रोड पर टाक...टिक...टाक..टिक...की आवाज करती हुई विक्टोरिया और उसपर ताश के पत्ते खेलते बैठे लोग शाम के वक्त आम नजारा था। तांबा-कांटा का विक्टोरिया स्टैंड शाम को गुलजार हो जाता था। कारोबारियों के अलावा मुंबादेवी मंदिर में दर्शन के लिये आने वाले श्रद्धालुओं के लिये भी विक्टोरिया एक सुविधाजनक विकल्प थी। घोडों की लीद और हरी घास की गंध/दुर्गंध पूरे इलाके में फैली रहती। जिन जिन इलाकों में विक्टोरिया का ज्यादा आना जाना होता, वहां भी सडक पर लीद से अक्सर गंदगी हो जाती थी। यही वजह थी कि उन दिनों में मुंबई महानगरपालिका हर सुबह टैंकर से पानी मंगवा कर सडकों को धुलवाती थी। शुरूवात में ट्रामें भी घोडे ही खींचते थे और उनसे भी गंदगी होती थी, इसलिये सडकों को धुलवाने का इंतजाम किया गया था। करीब 20 साल पहले तांबा-कांटा का विक्टोरिया स्टैंड धीरे धीरे खत्म हो गया। विक्टोरिया की सवारी करने वाले घटते गये और उनके साथ ही विक्टोरिया भी। इसके पीछे एक कारण 1992-93 के दंगों को भी माना जा रहा है। जैसे कि पहले मैने बताया कि विक्टोरिया के ज्यादातर मुसाफिर दक्षिण मुंबई के गुजराती और मारवाडी समुदाय के लोग होते थे, लेकिन दंगों के बाद इन समुदाय के ज्यादातर लोग मुंबई छोड कर मीरा रोड, भायंदर, वसई, विरार जैसे ठिकानों पर जा बसे। इसके अलावा वाहनों की तादाद सडकों पर इतनी बढ गई कि विक्टोरिया जैसे धीमे रफ्तार वाले वाहन का इस्तेमाल व्यावहारिक नहीं रहा खासकर दक्षिण मुंबई की पतली, संकरी सडकों पर इनका चलना मुश्किल हो गया। अपने आखिरी दिनों में मुंबई में बमुश्किल 100 विक्टोरिया ही बचीं थीं। (इनमें वे शामिल नहीं है जिनका मनोरंजन के लिये इस्तेमाल होता है)


आपने पुरानी हिंदी फिल्मों में विक्टोरिया को देखा होगा। घोडागाडी को देश के दूसरे हिस्सों में तांगा, इक्का वगैरह कहा जाता है, मुंबई में इन्हें विक्टोरिया कहते हैं। मुंबई की विक्टोरिया देश के दूसरे शहरों में चलने वाली घोडागाडियों से बिलकुल अलग दिखती थी। विक्टोरिया में कुल 4 पहिये होते थे, जिनमें आगे के दो पहिये छोटे रहते और पीछे के 2 बडे। कोचवान समेत कुल 4 लोग विक्टोरिया पर बैठ सकते थे। कोचवान की सीट आगे की तरफ अलग रहती थी और थोडी उंची उठी रहती थी। बगल में लंबा सा चाबुक स्टैंड पर लगा रहता था। कोचवान को गजकरण कहा जाता था। उन्हें गजकरण क्यों कहा जाता था, ये पता नहीं क्योंकि गज का अर्थ हाथी होता है जबकि इन लोगों का काम घोडे से पडता था। गजकरण की पोशाक खाकी रंग की शर्ट और पैंट होती थी। रोशनी के लिये विक्टोरिया के दोनो ओर लैंप लगे रहते, जिनमें तेल के दिये से रोशनी की जाती। विक्टोरिया के पीछे एक मोटी रॉड लगी रहती, जिसपर अक्सर बच्चे लटक कर झूलते थे। विक्टोरिया में अरबी नस्ल के लाल, सफेद और काले घोडे लगाये जाते जो कि काफी लंबे और तगडे होते थे।

विक्टोरिया में लगने वाले घोडों के तबेले मुंबई के बॉम्बे सेंट्रल, ग्रांट रोड और कर्नाक बंदर जैसे इलाकों में होते थे। इनके तबेले मुंबई देह व्यापार के लिये बदनाम इलाके प्ले हाऊस और फाकलैंड रोड के बीचोंबीच भी थे। मुंबई में विक्टोरिया खत्म होने के पीछे एक बडी वजह इन तबेलों का खत्म होना भी है। रियल इस्टेट बाजार में तेजी आने के साथ ही मुंबई में जमीन की कीमतें भी आसमान छूने लगीं। ऐसे में तबेलों की जगह ऊंची उंची इमारतों ने ले ली। इमारतों के लिये जगह हासिल करने की खातिर क्या क्रूर तरीके अपनाये गये इसका एक किस्सा मेरे दिवंगत नाना ने एक बार मुझे सुनाया था। बॉम्बे सेंट्रल के बेलासिस रोड पर घोडों का सबसे बडा तबेला था जो कि कई एकड में फैला था। तबेले की इस जमीन पर उस जमाने के स्मगलर युसुफ पटेल की नजर थी जो कि वहां इमारत बनवाना चाहता था। तबेला खाली करवाने के लिये उसने कई पैंतरे आजमाये, लेकिन जब वो तबेला हासिल नहीं कर सका तो दिसंबर 1979 की एक रात उसने तबेले में चारों तरफ से आग लगा दी। तबेला पूरी तरह से जल गया और उसी के साथ तबेले में मौजूद सैकडों बेजुबान घोडे भी जिंदा जला दिये गये। वो दिन मुंबई के इतिहास के काले दिनों में से एक था। युसुफ पटेल को तबेले की जमीन तो मिल गई, लेकिन उस घटना के कई महीनों बाद तक मुंबई की सडकों पर विक्टोरिया नजर नहीं आई।

 मुंबई में चलने वाली असली विक्टोरिया तो हालातों के चलते खुद ब खुद ही खत्म हो गईं, लेकिन विक्टोरिया के नाम पर जो घोडागाडियां मुंबई में चल रहीं हैं, उनपर पाबंदी को मैं जायज ही मानता हूं। मनोरंजन के नाम पर इनके साथ जो सलूक किया जा रहा था वो क्रूर था और उनपर लगाम लगनी ही चाहिये थी।

Saturday, 6 June 2015

ब्लॉग की ताकत से किसकी नींद हराम?


(मई 2015 में कोलंबो, श्रीलंका में आयोजित अंतरराष्ट्रीय ब्लॉगर्स सम्मलेन में मेरे संबोधन के अंश।)
सम्मानीय दोस्तों,
इस अंतरराष्ट्रीय ब्लॉगर्स सम्मेलन में शिरकत करते हुए मुझे काफी खुशी हो रही है। अलग अलग राष्ट्रों में बसे ब्लॉगर्स बिरादरी के सदस्यों से परिचय का ये एक बेहतरीन मौका है। इस मौके पर मुझे कमी खल रही है बांग्लादेश के हमारे दिवंगत साथी अविजित रॉय और वशीकुर रहमान बाबू की, जिनकी कट्टरपंथियों ने इसी साल हत्या कर दी। अविजित और वशीकुर ने खुदको अभिव्यक्त करने के लिये ब्लॉगिंग को अपना माध्यम बनाया था। वे खुली सोच के लोग थे, नई सोच के लोग थे, रूढीवादियों का विरोध करते थे और इसी की कीमत उन्होने अपनी जान देकर अदा की। बांग्लादेश में ब्लॉगरों की हत्याएं दुखद हैं और चिंता का विषय भी हैं, लेकिन इसने एक बात को रेखांकित किया है कि उस देश में ब्लॉग अभिव्यकित का एक ताकतवर माध्यम बनकर उभरा है। इतना ताकतवर कि कट्टरपंथियों और चरमपंथियों को उसके प्रभाव से खतरा महसूस होने लगा है और यही वजह है कि ब्लॉग पर उठने वाली आवाजों को दबाने के लिये वे ब्लॉगर्स की हत्या कर रहे हैं। साल 2013 से अब तक बांग्लादेश में 3 प्रमुख ब्लॉगरों की हत्या हो चुकी है। सार्क के दूसरे सदस्य राष्ट्रों में भी सरकारी और गैर सरकारी संगठनों ने ब्लॉगर्स को दबाने की कोशिशें की हैं, उनका जीना मुहाल किया है, उन्हें डराया धमकाया गया है। ऐसे में अविजित रॉय की हत्या के बाद और खुद अपनी हत्या से पहले वशीकुर रहमान के लिखे शब्द याद आते हैं। वशीकुर रहमान ने अपने ब्लॉग में लिखा था- शब्दों की हत्या नहीं हो सकती। एक अविजित रॉय की हत्या लाखों अविजित रॉय को जन्म देगी। हम तब तक लिखना बंद नहीं करेंगे जब तक कि तुम्हारी धर्मांधता नहीं मरती।


इस मौके पर मैं अपने इन शहीद हुए साथियों को श्रधदांजलि अर्पण करता हूं और उनकी आत्मा को यकीन दिलाना चाहता हूं कि ब्लॉगर्स की आवाज मरेगी नहीं। मैं अविजित रॉय, वशीकुर रहमान और अहमद राजिब हैदर जैसे उन तमाम ब्लॉगर्स के साथ हूं जो दमनकारी सियासत, धर्मांधता और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ अपने ब्लॉग के जरिये लडाई लड रहे हैं। मेरी आप सभी से भी गुजारिश है कि इस मंच के माध्यम से हम ऐसे तमाम ब्लॉगरों की आवाज को बुलंद करें और ब्लॉगरों को दबाने वाली शकितयों के खिलाफ संघर्ष करें।