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Monday, 15 November 2010

जश्न की खातिर फिर साथ जुटे देश के गद्दार

कराची में बीते शनिवार हुई भारत के गद्दारों की दावत।देशद्रोही डॉन दाऊद इब्राहिम अभी भी पाकिस्तान में ही है इसका एक और सबूत शनिवार को मिला। कराची में शनिवार शाम दाऊद के छोटे भाई अनीस इब्राहिम की बेटी का निकाह हुआ। इस निकाह में खुद दाऊद समेत उसके परिवार के लोग और पाकिस्तान के कई आला अफ्सर शरीक हुए।
अनीस इब्राहिम ने बेटी सबीना की शादी अपने ही दाहिने हाथ माने जाने वाले सलीम दलवी उर्फ सलीम चिपलून के बेटे एस.एस.दलवी से करवाई। शादी में देश विदेश से चुनिंदा मेहमान शरीक हुए। सूत्र बताते हैं कि दाऊद के बुलावे प उसका दाहिना हाथ छोटा शकील भी शादी में आया जिसकी की अनीस से अनबन चल रही है।
इस शादी में पाकिस्तान की खुफिया एंजेसी से जुड़े कई अफ्सर , कई बड़े सरकारी अधिकारी , और पाकिस्तानी फौज के कई अफ्सर मौजूद थे । 12 मार्च 1993 के मुंबई बमकांड का प्रमुख आरोपी टाईगर मेमन भी शादी में शरीक हुआ।जानबूझ कर इस शादी को लो प्रोफाइल रखा गया ताकि पाकिस्तान के इस झूठे दावे की पोल न खुल सके कि दाऊद अभी पाकिस्तान में ही है ।
भारत लगातार पाकिस्तान से दाऊद को अपने हवाले करने की मांग करता रहा है, लेकिन पाकिस्तानी सरकार हरबार दुनिया को यही बताती रही है कि दाऊद उसकी जमीन पर है ही नही । पाकिस्तान के दावे हर बार दाऊद के घर में शादी ब्याह के कार्यक्रम होने पर झूठे शाबित हो जाते हैं । 23 जुलाई 2005 को दाऊद ने अपनी बेटी माहरूक शादी क्रिकेटर जावेद मिया दाद के बेटे जुनैद से करवाई थी । उस शादी का रिशेप्शन भी पाकिस्तान और दुबई में रखा गया था । उस वक्त भी दुनियाभर की जांच एंजेसियों को पता चला था कि दाऊद पाकिस्तान में ही है । दाऊद और अनीस पर 1993 के मुंबई बम कांड समेत कई संगीन आपराधिक मामले तो दर्ज हैं ही, जिस सलीम चिपलून के बेटे से अनीस की बेटी की शादी हुई है उसके खिलाफ भी कई गुनाहों का आरोप है । 

Sunday, 24 October 2010

Mumbai 26/11/2008: My Observations.

It has been around 2 years since multiple attacks on Mumbai on 26-11-2008 had taken place. Although, I have written a whole book on those attacks, I have few observations based on the developments, information & investigations post attacks. They are listed as below:

1)      The planners were successful in brainwashing the terrorists, training them effectively & supervising the attack in Mumbai. They may replicate this success formula.
2)      The conspirators of the attacks got more than what they estimated. They not only managed to slay large number of civilians but also senior police officers, military officer & commandos. They got unexpected media coverage & stretched the attack for a long time.
3)      The plan was hatched with lots of patience, secrecy, research, focus on details & optimum use of technology. The preparations began more than 2 years before the attacks.
4)      Planners had a large list of targets but only few were selected.
5)      The attack exposed the watchfulness of Mumbai Police to face such attack. Before these attacks terrorist activity for Mumbai police was just Bomb explosions. They never expected AK-47 carrying terrorist to attack Mumbai.
6)      There were advanced inputs by intelligence sources which indicated that terrorists could come by sea route.
7)      The attacks have also exposed the coastal security of Mumbai by police, coast guards & the Navy.
8)      The attacks were the first of its kind coverage for Mumbai news reporters also. Role of media was criticized by a section of print media & law enforcing agencies for showing the live coverage of commando operations as the handlers of the terrorist were getting info on the strategy of defense forces. However, I believe that an attack of such magnitude could not be planned by the masterminds relying just on the tv coverage.
9)      During the attacks there were several incidents of rumor mongering like shootout again at CST, G.T.Hospital & Parsi Dairy of Marine Lines & death of then DCP Viswas Nagre Patil.
10)  The attacks also led to infight, mudslinging & responsibility fixing, both among the government & the police force.
11)   Although, lots of money have been spent & so many things have been done taking lessons from 26-11 attacks, few things seem funny & ridiculous. There were many DFMDs (Door Frame Metal Detectors) installed at various railway stations before the attack, but they were no use of detecting armed terrorist. Still there are DFMDs allover & they appear to be of no use in case terrorist decide to storm the railway station in the same manner. The rear entrance of Police Club is locked after the sunset believing that (?) the terrorists will again come that way & the door will restrict them.
12)  We are still very much prone to attacks like Moscow theatre hostage crisis, recent hostage situation in a tourist bus of Philippines caused by an ex policeman &  Rahul Raj bus hostage case of Mumbai.
13)  Most of the politicians who were relieved of their responsibilities after the attack have been reinstated again at prestigious posts.
14)  Taxi drivers haven’t learnt their lessons. Most of them don’t check if passengers are taking along their luggage after getting off the cab.
15)  Friendship with terror agent Hedley has facilitated Mahesh Bhatt’s son Rahul to bag entry into reality show Big Boss.

Tuesday, 28 September 2010

सरकार का लाडला जेलर

मुंबई की आर्थर रोड जेल में हुए गैंगवार ने फिर एक बार जेल प्रशासन पर सवाल उठा दिये हैं। इन सवालों के घेरे में हैं जेल सुपिरिंटेंडेंट राजेंद्र धामणे। धामणे के कार्यकाल में गैंगवार की ये दूसरी घटना है, लेकिन अपने राजनैतिक रिश्तों के चलते वे हर बार कार्रवाई से बच जाते हैं। मुंबई आने से पहले धामणे का पुणे के यरवदा जेल और ठाणे में कार्यकाल विवादों से घिरा रहा है।
मुंबई के आर्थर रोड जेल में फिरसे हुआ गैंगवार और फिरसे बेपर्दा हो गया यहां का जेल प्रशासन। डॉन अबू सलेम के गुर्गे मेंहदी हसन पर जिस तरह से पांडव पुत्र गैंग के सदस्यों ने हमला किया उससे यही बात सामने आती है कि न तो कैदियों में जेल प्रशासन का कोई डर है और न ही कैदियों को आपस में भिडने से रोकने के लिये कोई पुख्ता इंतजाम। जेल में इस बदइंतजामी के लिये जो शख्स जिम्मेदार है वो है राजेंद्र धामणे, मुंबई की आर्थर रोड जेल का सुपिरिंटेंडेंट।
ये कोई पहली बार नहीं है कि सुपिरिंटेंडेंट राजेंद्र धामणे के कार्यकाल में इस तरह की कोई वारदात हुई हो। धामणे पहले भी कई बार विवादों में फंस चुके हैं...लेकिन बताया जाता है कि वे कुछ राजनेताओं के लाडले हैं और इसीलिये हर बार बच निकलते हैं।
जब फिल्मस्टार संजय दत्त आर्मस एक्ट में दोषी ठहराये जाने के बाद जमानत पर रिहा होकर पुणे की यरवदा जेल से बाहर निकल रहे थे उस वक्त जेल के सिपाहियों में एक फिल्मस्टार के साथ हाथ मिलाते और गले मिलते तस्वीरे खिंचवाने की होड लग गई। वे ये तक भूल गये कि संजय दत्त उन्ही की जेल के सजायाफ्ता मुजरिम हैं।ये सबकुछ हो रहा था राजेंद्र धामणे के कार्यकाल में जो कि उस वक्त यरवदा जेल के सुपिरिंटेंडेंट थे। जब मीडिया ने ये खबर दिखाई तो सरकार ने सिपाहियों को तो बर्खास्त कर दिया, लेकिन धामणे अपने सियासी रसूख के चलते कार्रवाई से बच गये।
इससे पहले साल 2002 में धामणे जब ठाणे जेल के सुपिरिटेंडेंट थे तब भी उनका स्टार प्रेम नौकरी को दरकिनार कर देखने मिला। धामणे ने कार एक्सीडैंट मामले में जेल से रिहा हो रहे सलमान खान को मीडिया के कैमरों से बचाने के लिये खुद सलमान के बॉडीगार्ड का काम किया और विशेष गेट से गुपचुप सलमान को बाहर निकाला। इसी साल जुलाई में भी आर्थर रोड जेल में गैंगवार हुआ था जिसमें अबू सलेम को अंडरवर्लड डॉन दाऊद इब्राहिम के गुर्गे मुस्ताफ दोसा ने घायल कर दिया। उस वक्त भी धामणे की लापरवाही सामने आई थी।
मुंबई की आर्थर रोड जेल देश की संवेदनशील जेलों में से एक है। यहां तमाम बडे गैंगस्टरों के साथ साथ मुंबई हमले का आरोपी अजमल आमिर कसाब भी कैद है। ऐसे में सवाल यही उठता है कि धामणे जैसे लापरवाह और विवादित अफसर को आर्थर रोड जेल की बागडोर दिया जाना कितना सुरक्षित है।

Friday, 24 September 2010

मुंबई में मंत्री का मुंडा, बनने चला गुंडा

न छोटा राजन, न दाऊद इब्राहिम..मुंबई शहर में इन दिनों गुंडागर्दी को लेकर जो नाम बार बार खबरों में आ रहा है वो है नितेश राणे का। महाराष्ट्र के राजस्व मंत्री नारायण राणे के साहबजादे नितेश की कारगुजारियां बढती ही जा रहीं हैं। खुद पुलिसिया पहरे में चलने वाले नितेश राणे जब चाहें, जहां चाहें किसी को भी पीट सकते हैं। नितेश राणे की हरकतों से उनका यही मुगालता झलकता है कि बाप मंत्री है कोई क्या बिगाड लेगा।
दर्जनभर पुलिसवालों के घेरे में तनकर चलने वाले नितेश राणे को कोई छू तक नहीं सकता, लेकिन नितेश मुंबई में कभी भी किसी की भी हड्डी पसली एक कर सकते हैं। महाराष्ट्र के राजस्व मंत्री नारायण राणे के इस लाडले की हरकतें देखकर यही लगता है कि जल्द ही मुंबई अंडरवर्लड में छोटा राजन और दाऊद इब्राहिम के बाद अब नया नाम उभरेगा-छोटा राणे। अपने ही कार्यकर्ता चिंटू शेख पर हमले का आरोप तो सबसे ताजा है लेकिन अगर पिछले साल डेढ साल के दौरान नितेश की ओर से अंजाम दी गई वारदातों पर गौर करें तो अंदाजा मिल जाता है कि किस कदर ये छोटा राणे अपने पिता के रसूख का बेजा इस्तेमाल कर रहा है।
पहली करतूत- हाल ही में दादर रेल्वे स्टेशन पर कोंकण के लिये नई ट्रेन शुरू होते वक्त प्रदर्शन के लिये आये शिवसैनिकों पर अपने कार्यकर्ताओं से हमला करवाया। इसके बाद दोनो ही पार्टियों के बीच दंगा शुरू हो गया।
दूसरी करतूत- नितेश के संगठन स्वाभिमान ने 2 महीने पहले मुंबई के अलग अलग इलाकों में टैक्सी चलाने वालों की पिटाई की जिसके बाद शहर के तमाम टैक्सी वाले हडताल पर उतर आये।

तीसरी करतूत- चंद दिनों पहले ही मुंबई के चेंबूर इलाके में एक बिल्डर को नितेश और उसके साथियों ने जमकर पीटा, लेकिन बिल्डर ने नितेश के खौफ के कारण पुलिस में शिकायत नहीं दर्ज करवाई।

चौथी करतूत- मुंबई के खार इलाके में नितेश ने अपनी गाडी से एक पुलिस वाले का पैर कुचल दिया। पुलिस थाने में शिकायत दर्ज हुई लेकिन मामला रफा दफा कर दिया गया।

 पांचवी करतूत-  इसी साल मई में नितेश के चालीस कार्यकर्ताओं के साथ मुंबई कांग्रेस के जनरल सेक्रटरी जयवंत परब के दफ्तर पर वर्सोवा में हमला कर दिया। लाठियों और लोहे की छोडों से राणे के कार्यकर्ताओ ने सडक से गुजर रहे वाहन चालकों को भी बेवजह पीटा।

छठीं करतूत- इसी साल मार्च में नितेश राणे के कार्यकर्ताओं ने एक महिला पर पानी चोरी का आरोप लगाते हुए उसके चेहरे पर कालिख पोत कर उसे माहिम इलाके में घुमाया।

पिता नारायण राणे की बदौलत नितेश राणे न केवल हर वारदात को अंजाम देने के बाद बच जाते हैं बल्कि और नई वारदातों को अंजाम देने से भी बाज नहीं आते। अपने पिता से नितेश सियासी दांव पेंच सीख रहे नितेश ने अपने काम करने का तरीका कुछ वैसा अपनाया है जैसा तरीका अंडरवर्लड अपनाता है।

नितेश राणे ने अपना एक संगठन बनाया है जिसका नाम दिया है स्वाभिमान। वैसे तो वे इसे एक गैर राजनीतिक संगठन बताते हैं लेकिन इनके संगठन के काम करने की शिवसेना और एमएनएस सरीखे स्टाईल राजनीतिक दलों जैसी ही है यानी कि गाली गलौच, धमकी, तोडफोड और मारपीट वाली स्टाईल। ज्यादातर मामलों में लोग नितेश के डर के मारे उसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराने ही नहीं जाते और जिन मामलों में पुलिस शिकायत दर्ज करती भी है तो वे मामले सिर्फ कागजों पर ही रह जाते हैं। पुलिस कोई कडी कार्रवाई नहीं करती।

नितेश राणे हर वारदात के बाद बच तो निकलते हैं, लेकिन बेटे की करतूत बाप के लिये मुसीबत भी बनती नजर रही है। नारायण राणे फिर एक बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनने का सपना देख रहे हैं, लेकिन जाहिर है नितेश की कारगुजारियों का फायदा कांग्रेस में ही उनके विरोधी उठाने की कोशिश कर सकते हैं।

Wednesday, 18 August 2010

पीपली लाईव: तुझको मिर्ची लगी तो मैं क्या करूं.....

अबसे 10 साल पहले यानी साल 2000 में शाहरूख खान अभिनित एक फिल्म आई थी फिर भी दिल है हिंदुस्तानी। उस वक्त मैं टीवी पत्रकारिता में नया नया था। फिल्म में टीवी पत्रकारों को जोकरों की तरह दिखाया गया था। ये दिखाया गया था कि कैसे एक कथित आतंकी की फांसी को लेकर न्यूज चैनलों में काम करने वाले पागल हो गये थे। हर कोई अपनी तरह से उस फांसी को भुनाना चाहता था। मुझे फिल्म देखकर बडा बुरा लगा। सब बकवास लग रहा था। मेरा मानना था कि इस फिल्म के जरिये टीवी पत्रकारों की गलत और खराब तस्वीर पेश करने की कोशिश की गई है...लेकिन अगस्त 2004 में मैं गलत साबित हुआ। कोलकाता में हत्या और बलात्कार के आरोपी धनंजय चटर्जी को दी जाने वाली फांसी भारत में प्राईवेट न्यूज चैनलों का दौर शुरू होने के बाद पहली फांसीं थी। टीवी चैनलों ने ठीक वैसा ही बर्ताव किया जैसा कि उस फिल्म में दिखाया गया था। फांसी से जुडी हर चीज को बुरी तरह से निचोडा गया। यहां तक कि ये भी दिखाया गया कि फांसी का फंदा कैसे बनता है और किसी को फांसी पर कैसे लटकाते हैं। इसका असर धनंजय के फांसी पर लटकाय़े जाने के कई दिनों बाद तक देखने मिला..कई बच्चे फांसीं फांसी खेलते खेलते मारे गये...हमेशा कि तरह प्रिंट मीडिया ने भी न्यूज चैनलों की जमकर धुनाई की। पीपली लाईव भी हमारी मीडिया की वही कडवी हकीकत पेश कर रही है।

मेरे कई टीवी पत्रकार दोस्तों के गले ये फिल्म नहीं उतर रही।मैने पिछले हफ्ते ही ये फिल्म देखी और एक टीवी पत्रकार के तौर पर मुझे ये फिल्म बिलकुल नहीं चुभी..ये चुभी उन लोगों को होगी जो इस फिल्म में दिखाये गये प्रसंगों को हकीकत में जीते हैं, वैसा व्यवहार करते हैं, वैसा सोचते हैं। मैं इस व्यवसाय में रहकर भी खुदको इनके बीच का नहीं मानता। सिस्टम में रहकर सिस्टम बदलने की कोशिश रही है मेरी। मुझे याद है साल 2001 में जब आज तक दूरदर्शन पर दिखाये जाने वाले आधे घंटे के प्रोग्राम से एक न्यूज चैनल में तब्दील हुआ था उस वक्त टीवी रिपोर्टरों की शान ही अलग थी। आम तौर पर लोग उन्हें सम्मान की नजर से देखते थे। खबरें भी वैसीं चलतीं थीं जो कि सिस्टम को हिला कर रख देतीं और आम आदमी को लगता कि टीवी पत्रकार ही उनके सबसे बडे शुभचिंतक हैं....अब वैसा नहीं है। ट्रेनों में, हवाई अड्डे पर, चौराहों पर अगर गलती से भी न्यूज चैनलो का विषय निकलता है तो लोग निंदा करने लगते है.. ये सब मीडिया वाले ड्रामा करते हैंसब टीआरपी का खेल है बाबू राजनेताओं के बाद देश की सबसे ज्यादा धिक्कारी जाने वाली जमात बनती जा रही है टीवी पत्रकारों की। लोग अब भी न्यूज चैनल देखते हैं लेकिन उन्हें गंभीरता से नहीं लेते। जनता जिन चैनलों को एक वक्त में भ्रष्ट सत्ता के खिलाफ एक मजबूत हथियार के तौर पर देखती थी, उन्हीं चैनलों ने अपनी औकात मनोरंजन के माध्यम के तौर पर समेट ली है। पीपली लाईव यही हकीकत दिखाती है।

कई सज्जन मेरा विरोध ये कहकर कर सकते हैं कि इस फिल्म ने मीडिया का सिर्फ नकारात्मक पक्ष दिखाया है। मीडिया ने कई अच्छे काम भी किये हैं जैसे कई नेताओं के भ्रष्टाचार की पोल खोली है, कई अपराधियों को पकडवाया है, कई जन आंदोलनों को जन्म दिया है और उन्हें मजबूत बनाया है, कई बडे बाप के मनचले बेटे सलाखों के पीछे इसी मीडिया की सक्रीयता की वजह से गये हैं, क्या ये सब मीडिया की उपलब्धियां नहीं? उपलब्धियां हैं, बिलकुल हैं। मीडिया के समाज में इसी रोल को देखते हुए इसे अलग अहमियत दी गई है, स्वतंत्रताएं दी गईं हैं जिसका कि मीडिया के लोग भरपूर इस्तेमाल करते हैं...लेकिन एक अच्छा काम करने की एवज में आपको 10 बुरे काम करने की छूट किसने दे दी?

दरअसल पीपली लाईव में मीडिया के जिस रूप को दिखाया गया है वो रूप मीडिया पर सबसे ज्यादा हावी 2-3 साल पहले था। राखी सावंत, बटुकनाथ, फिल्मस्टारों और क्रिकेटरों का रोमांस, भूत-प्रेत, मियां-बीवी के झगडे, देह व्यापार के अलग अलग पहलुओं और मनोरंजक सामग्री को खबर की तरह पेश किया जाता था। इस तरह की खबरें ही प्रमुख होतीं थीं और उन्हीं को चैनलों पर सबसे ज्यादा जगह मिलती थी। नौबत तो ये आ गई थी कि कई बेचारे पत्रकार जो बडे जोश और समाज में सकारात्मक बदलाव का जज्बा लिये इस पेशे से जुडे थे वे खुद को ठगे हुए और फंसे हुए पा रहे थे। कुछ न्यूज चैनलों के अहम पदों पर आसीन लोगों को इस जज्बे और सोच से मतलब नहीं था। उन्हें तो बस टीआरपी की पापडी चाट चाहिये थी। अब धीरे धीरे ये दौर गुजर रहा है...लेकिन जो नुकसान मीडिया को पिछले चंद सालों में पहुंचा है उसकी क्षतिपूर्ति में वक्त लगेगा। अगर मीडिया ने अपनी ये छवि नहीं बदली तो कोई शंका नहीं कि आनेवाले वक्त में न्यूज चैनलों के खिलाफ जनआंदोलन शुरू हो जायेगा और कोई टीवी पत्रकारों से सीधे मुंह बात नहीं करेगा।

मैं चाहता हूं कि पीपली लाईव जैसी फिल्में मीडियावालों को आईना दिखाने के लिये हर 2-4 साल में आनी चाहिये। मीडिया के लोग सबकी पोल खोलने का दावा करते हैं अगर कोई ये काम मीडिया के साथ कर रहा है तो क्या गलत है। हम अब भी सुधर जायें तो अच्छा है। वैसे मेरे एक टीवी पत्रकार दोस्त ने कहा कि इस तरह की फिल्मों से तो हम टीवी पत्रकारों की इमेज खराब हो रही है। मैने कहा- छोडिये जनाब। अंग्रेजी में एक कहावत है Public memory is short lived जब ये जनता 5 साल तक राजनेताओं के हाथों लुटती पिटती है और फिर 5 साल बाद उन्ही को वोट देने निकल सकती है तो टीवी पत्रकार का मजाक उडाती ये अदनी सी फिल्म क्या चीज हैं। इसमें तो आमिऱ खान ने खुद एक्टिंग भी नहीं की है। 

Saturday, 14 August 2010

सालभर पहले आज के दिन: जिंदगीभर न भूलेगी...वो खौफनाक दोपहर



जिंदगीभर न भूलेगी वो बरसात की दोपहरबीते सोमवार मैं और मेरा कैमरामैन अजीत एक मछुआरे की छोटी सी नौका लेकर अरब सागर में डूबे जहाज MSC CHITRA की तस्वीरें लेने पहुंचे।मुंबई बंदरगाह के पास इस जहाज को अल खलीजिया नाम के दूसरे जहाज ने टक्कर मार दी थी। दोपहर 2 बजे के करीब हम बीच समुद्र में पहुंचे ही थे कि तेज आंधी के साथ भारी बारिश शुरू हो गई...हॉलीवुड की किसी फिल्म की तरह पहली मंजिल जितनी ऊंची लहरें हमारी कश्ती से टकरा रहीं थीं। लहरों के हमले से नौका 2 बार पलटते पलटते बची। सिर नीचे और टांगें ऊपर हो गईं थीं। मैने कई समुद्री सफर किये हैं लेकिन इतनी खतरनाक और डरावनी समुद्री यात्रा पहले कभी नहीं की।

जब तेज बारिश और आंधी शुरू हुई तो मुझे लगा कि अब जहाज तक पहुंचना मुमकिन नहीं है और मैने नाव चला रहे मछुआरों से कहा कि वापस चलते हैं..मौसम ठीक होने पर फिर लौटेंगे। मछुआरों का कहना था कि मौसम मानसून में ऐसा ही रहेगा। उन्होने भरोसा दिलाया कि कुछ नहीं होगा, घबराने की कोई बात नहीं है। मैने भी उनपर यकीन करके रिस्क लेने की ठान ली। ये सोचकर कि बहुत दिनों बाद कोई एडवेंचरस स्टोरी करने का मौका मिला है हम बिना लाईफ जैकेट पहने बीच समुद्र में मौसम का हमला झेलते हुए आगे बढने लगे। वक्त के साथ साथ समुद्र में हालत और बदतर होती जा रही थी। लहरों के टकराने से कभी हमारी नाव रॉकेट की तरह सीधी खडी हो जाती थी तो कभी कार की तरह समतल। नाव पर कभी इस ओर गिरते कभी उस ओर। सिर बुरी तरह चकराने लगा था। कैमरामैन अजीत के सामने दोहरी चुनौती थी। अजीत को खुद को भी संभालना था और कैमरे को भी।

जो दोनो मछुआरे शुरूवात में हमें बेफिक्र रहने के लिये कह रहे थे उनके चेहरे भी खौफजदा हो गये। मैने चिल्लाकर पूछा- अरे हम बचेंगे या नहीं। साले तुमको पहले ही कह रहा था वापस चलो।
उसने घबराई आवाज में जवाब दिया- भगवान का नाम लो..भगवान का ...भगवान चाहेगा तो बच जायेंगे।
इतना कहकर अविनाश कोली नाम का वो मछुआरा लहरों की ओर देखकर जोर जोर से नारे लगाने लगा- गणपति बाप्पा मौर्या.. देवा वाचवा रे वाचवा (भगवान बचा लो..)

नाव के तेजी से हिलने डुलने की वजह से मेरा जी मिचलाने लगा। मुझे तैरना आता है। मन कर रहा था कि नाव से छलांग लगाकर पानी में कूद जाऊं..लेकिन समुद्र के आक्रमक बहाव को देखकर अंदाजा लग रहा था कि तैरने के लिये मैं हाथ पैर भी शायद न हिला पाऊं और पलों में नाव से दूर बहकर चला गया तो फिर लौटूंगा कैसे? अजीत को भी तैरना आता था, लेकिन कैमरे साथ होने की मजबूरी और समुद्र के तेवर ने उसे भी ऐसा करने से रोका। समुद्र के पानी में जहाज से रिसा काला तेल और जहरीले कैमिकल भी नजर आ रहे थे। समुद्र में डूबने से बच भी गये तो ऐसे पानी में उतरने के बाद जो तमाम बीमारियां हमें अपनी चपेट में लेतीं उनसे बचने का भरोसा न था।

गनीमत रही कि 10 मिनट बाद समुद्र थोडा शांत हुआ और हम सागर में विसर्जित होने से बच गये। 2 दिन बाद ही दिन इसी जगह एक टीवी क्रिव की नाव से गिरकर एक मछुआरा डूब गया। उसकी लाश को कोस्ट गार्ड इस ब्लॉग के लिखे जाने तक तलाश रही है।

Tuesday, 3 August 2010

ऑपरेशन वडा पाव

लखनऊ की रेवडियां मशहूर हैं, आगरे का गजक मशहूर है, दिल्ली की चाट मशहूर है, हैद्राबाद की बिर्यानी मशहूर है और मुंबई का मशहूर है वडापाव...बेसन में लिपटा आलू का ये गोला झटपट तैयार हो जाता है और इसीलिये ये मुंबई की भागती दौडती जिंदगी का हिस्सा बन गया है...लेकिन इन बारिश के दिनों में मुंबई वालों को रहना होगा वडा पाव खाते वक्त सावधान। स्टार न्यूज के रिपोर्टरों ने मुंबई के अलग अलग इलाकों से 10 मशहूर वडा पाव खरीदे और लैब में भेजकर उनका वैज्ञानिक टेस्ट करवाया।रिपोर्ट में पाया गया कि उनमें से सिर्फ 4 जगहों के वडापाव ही खाने लायक हैं। ये हैं नतीजे:

1- Jain Wada Pav, Kandivali -unsafe

2-M.M.Mithaiwala, Malad. -unsafe

3- Kirti College Wada Pav -safe

4-Graduate Wada Pav, Byculla. -unsafe

5- Jumbo Wada Pav, Sion -Eat at your risk

6- Krishna Wada Pav, Dadar -safe

7-Elphinstone Road Station -unsafe

8- Mithibai College Wada Pav -unsafe

9- Shiv Wada Pav, Vadala -safe

10- Manchekar Wada Pav, Worli -safe

ये टेस्ट ठाणे जिले के रिलायबल लैब में अंतरराष्ट्रीय मानकों के आधार पर किये गये। लैब को सिर्फ वडापाव के सैंपल नंबर ही बताये गये थे और उन्हें ये नहीं मालूम था कि कौनसा वडा पाव किस जगह का है।
आम स्नैक्स की तुलना में वडापाव बहुत सस्ता है और मुंबई के हर गली कोने में बेचा जाता है...लेकिन अगर आपने गडबड वडापाव खा लिया तो समझिये आपकी सेहत की छुट्टी हुई ही, इलाज पर पैसे खर्चने होंगे सो अलग।इस जांच रिपोर्ट का यही संकेत है- वडा पाव, संभलकर खाओ।

Thursday, 1 July 2010

कबाब में हड्डी: मुंबई में लवर्स पोईंट्स का हाल

मुंबई एक बहुत बडा शहर भले ही हो लेकिन कुछ लोगों की नजर में ये शहर बहुत छोटा है। ये लोग हैं कपल्स यानी युवा प्रेमी जोडे जो एक दूसरे के साथ वक्त बिताने के लिये तनहाई चाहते हैं। तनहाई या प्राईवेसी की तलाश में ऐसे कपल्स निकल पडते हैं शहर के कुछ ऐसे ठिकानों की ओर जो लवर्स पॉइंट के नाम से जाने जाते हैं..लेकिन क्या वहां भी उन्हें तनहाई मिल पाती है या फिर वहां भी मिल जाती है कबाब में हड्डी, इसकी पडताल के लिये निकली हमारे 4 सवाददाताओं की टीम।


बांद्रा
मुंबई का एक फश्चिमी उपनगर है बांद्रा। समुद्र किनारे बसे इस उपनगर में भी कुछ ऐसे ठिकाने भी हैं जहां युवा जोडे प्यार के 2 पल बिताने आते हैं..लेकिन क्या ये पल मिल पाते हैं उन्हें ये जानने की कोशिश की हमारे संवाददाता गणेश ठाकुऱ और प्रमाली कापसे ने जो कि एक प्रेमी जोडे की शक्ल में यहां पहुंचे।

गणेश और प्रणाली पहुंचे बैंड स्टैंड। समुद्र किनारे एक टीले पर मौजूद ये लवर्स पॉइंट प्रेमी जोडों के लिये बडा ही रोमांटिक समां बनाती है। मानसून में कई बार यहां प्यार के आगोश में डूबे कपल्स को लहरें भी निगल लेतीं हैं.. फिर भी तनहाई की चाहत में प्यार करने वाले इस खतरे को नजरअंदाज कर बडी तादाद में यहां पहुंचते हैं। गणेश और प्रणाली अभी यहां बैठे ही थे कि भिनभिनाती हुई मक्खियों की तरह उनकी प्राईवेसी छीननेवाले भी यहां पहुंचने लगे। सबसे पहले आया एक हिजडा:

गणेश- क्या चाहिये,

हिजडा-पैसा चाहिये..और क्या

गणेश- क्या यहां बैठने का पैसा लगता है क्या?

हिजडा- नया आया है क्या?

गणेश ने पैसे नहीं दिये। हिजडा गणेश को घूरकर चला गया, लेकिन उससे पीछा छूटा ही था कि एक और हिजडा यहां आ धमका और पैसे ऐंठने के लिये इनके पीछे ही पड गया। देखिये किस तरह से ये कभी गणेश के सिर पर हाथ फिराकर तो कभी उसके गाल नोंचकर पैसे मांग रहा है... आखिर उसे दफा करने के लिये गणेश को 11 रूपये ढीले करने ही पडे। हिजडे तो चले गये लेकिन कपल्स को तंग वाले और भी थे। कई भिखारी आपस में गुफ्तगू कर रहे कपल्स को तंग कर रहे थे। बातचीत में खल न पडे इसलिये इन्हें भी पैसे देना जरूरी था।

बैंड स्टैड की हकीकत तो हमने जान ली। भले ही ये लवर्स पॉइंट हो लेकिन लवर्स के लिये यहां दिक्कतें कईं हैं। गणेश और प्रणाली अब बैंड स्टैंड से कुछ ही फासले पर आ पहुंचे बांद्रा रिक्लेमेशन।

बैंड स्टैंड की तरह ही बांद्रा रिक्लेमेशन भी समुद्र किनारे ही है और रोमांस की चाह रखने वाले जोडे यहां भी बडी तादाद में पहुंचते हैं। ये जगह भी लवर्स पॉइंट के तौर पर मशहूर है..लेकिन ये क्या..यहां भी लगी है प्यार पर बंदिश...यहां एक वॉचमैन आ पहुंचा दिसका कहना था कि अब यहां कपल्स के बैठने की इजाजत नहीं है...ये गणेश और प्रणाली को यहां से भगाने लगा..

पीटीसी- तो ये था मुंबई के 2 लवर्स स्पॉट बांद्रा रिक्लेमेशन और बांद्रा बैंड स्टैंड का हाल लेकिन इनके अलावा भी मुंबई में कई और लवर स्पॉट्स हैं जहां युवा जोडे तनहाई की खोज में आते हैं। मध्य मुंबई के लवर्स स्पॉट्स पर क्या होता है इसकी पडताल की योगेश पांडे और प्रमाली कापसे के पास जो एक प्रेमी जोडे की शक्ल में वहां पहुंचे। हैं।

फाईव गार्डन-
मध्य मुंबई के माटुंगा इलाके का फाईव गार्डन। इस जगह का नाम ऐसा इसलिये पडा है क्योंकि यहां एक दूसरे के बगल में 5 बागीचे हैं। सुबह के वक्त इस जगह पर मॉर्निंग वॉक करते हर उम्र के लोग नजर आते हैं और दोपहर बाद से युवा जोडे।हमारे दोनो संवादादाता भी किसी प्रेमी जोडे की तरह फाईव गार्डन में एक बेंच पर जाकर साथ साथ बैठ गये। कुछ देर तक तो कोई उनके पास नहीं फटका लेकिन जैसे चीनी को सूंघ चींटियां उस तक पहुंचने लगतीं हैं इस जोडे की तनहाई छीनने वाले भी उन तक पहुंचने लगे...सबसे पहले छापा पडा हिजडों का। ये हिजडे गार्डन में बैठे हर कपल से वसूली कर रहे थे। एक हिजडा योगेश और स्वाती के पास आ धमका और जब योगेश ने उसे पैसे दिये तब ही वो उस जगह से हटा। हिजडों से तो जान छूटी लेकिन इनके तनहा पलों में खलल डालने कई और भी थे। एक बुजुर्ग शख्स की हरकतें देखने लायक थीं। लगता था ये हर रोज मुफ्त की फिल्म देखने ही इस गार्डन में आते हैं और प्रेमी युगलों के तनहा पलों का बढिया व्यू मिल सके इसके लिये भरपूर कोशिश भी करते हैं....ये प्रेमी यूगलों को अपनी निगाहों से इस कदर घूरे जा रहे थे कि आखिर स्वाती को उन्हें डांटना ही पडा।स्वाती की डांट खाकर ये शख्स तो यहां से खिसक लिया लेकिन इस गार्डन में आंखें सेंकने के लिये आनेवाले कई और भी थे। सिगरेट का घुआं उडाते कुछ युवक इस गार्डन में सिर्फ कपल्स को देखकर मजा लेने आये थे। बेचारे कपल्स के पास इन्हें नजरअंदाज करने से सिवा कोई और चारा नहीं। रही सही कसर फेरीवालों ने पूरी कर दी। पहले इनके पास इडली दोसा वाला आया और फिर चाय वाला।

दादर चौपाटी
दादर चौपाटी- फाईव गार्डन में तो प्राईवेसी मिलने से रही। हमारे दोनो संवाददाता उस जगह को छोड अब आ पहुंचे दादर चौपाटी। कीर्ति कॉलेज के पीछे इस समुद्र तट पर शाम के वक्त युवा जोडे बडी तादाद में नजर आते हैं।

स्वाती और योगेश भी समुद्र किनारे एक ओर बाकी प्रेमी जोडों की तरह खडे हो गये। बारिश के मौसम में शाम का समां और सामने खूबसूरत समंदर यानी रोमांस करने के लिये एक ठीकठाक जगह...लेकिन कुछ ही देर में यहां भी आ पहुंचे प्यार के दुश्मन। वैसे तो मुंबई में खुलेआम शराब पीना गैरकानूनी है लेकिन कुछ युवाओं को कानून की कोई फिक्र नहीं थी। ये युवक स्वाती और योगेश के पास ही आकर बैठ गये..इस उम्मीद में कि शराब की चुस्कियों के साथ शायद मुफ्त आंखें सेंकने भी मिल जायें। इन मुस्तंडों से पंगा लेने का कोई मतलब नहीं था क्योंकि अगर ये पीटने लग जायें तो आसपास बचाने के लिये कोई पुलिस वाला भी न था। इनको नजरअंदाज करने में ही भलाई थी....लेकिन यहां भी मुसीबत कम न थी। भिखारी आ पहुंचे।ये भिखारी जानते हैं कि कपल कुछ पल की तनहाई के हासिल करने के लिये इन्हें पैसे देकर जरूर दफा कर देंगे इसलिये ये तब तक कपल्स को डिसटर्ब करते रहते हैं जब तक कि उन्हें पैसे नहीं मिल जाते।मक्खियों की तरह फेरीवाले यहां भी भुनभुना रहे थे।

संजय गांधी नेशनल पार्क
न तो फाईव गार्डन पर बात बनी और न ही दादर चौपाटी पर..मुंबई का एक और मशहूर लवर्स पॉइंट है संजय गांधी नेशनल पार्क। स्वाती और योगेश अब प्राईवेसी की तलाश में वहीं पहुंचे। 103 वर्गफुट में फैला मुंबई का संजय गांधी नेशनल पार्क। मानसून के दौरान तेंदुए अक्सर शिकार की तलाश में उन इलाकों में भी आ जाते हैं जहां इंसानों की बस्ती है और जहां युवा जोडे तनहाई में वक्त बिता रहे होते हैं...फिर भी प्यार करने वाले इस जोखिम को झेलने के लिये भी तैयार रहते हैं..उन्हें बस बिताना है साथ में चंद पल....लेकिन यहां भी वे पल उन्हें नसीब नहीं होते..तांकझांक कर टाईम पास करने वाले लोग भी आ जाते हैं और उनकी निगाहें तीर की तरह प्रेमी जोडों के चुभ रही होतीं हैं। कपल्स की तनहाई में खलल डालने के लिये फेरीवाले यहां भी मंडरा रहे होते हैं।

तो इस पडताल का नतीजा यही है कि मुंबई भले ही शहर बडा हो लेकिन यहां प्यार करने वालों के लिये जगह बहुत कम है। हर जगह मिल ही जाती है कबाब में हड्डी। ऐसे में सवाल यही है कि लवर्स जायें तो जायें कहां..

Sunday, 27 June 2010

The No Nonsense Blog: मुंबई में हर हफ्ते होता है "भूतों" का जमावडा।

The No Nonsense Blog: मुंबई में हर हफ्ते होता है "भूतों" का जमावडा।: "मुंबई में हर गुरूवार एक जगह होता है ऐसे लोगों का जमावडा जिनके बारे में नाते रिश्तेदार मानते हैं कि उन्हें भूत-प्रेत ने जकड रखा है। ये लोग वह..."

मुंबई में हर हफ्ते होता है "भूतों" का जमावडा।

मुंबई में हर गुरूवार एक जगह होता है ऐसे लोगों का जमावडा जिनके बारे में नाते रिश्तेदार मानते हैं कि उन्हें भूत-प्रेत ने जकड रखा है। ये लोग वहां नाचते हैं गाते हैं, ऊट पटांग हरकतें करते हैं और अपने आप से बातें करते हैं।मैने खुफिया कैमरे से जब इसकी पडताल की तो पाया कि मुंबई जैसे शहर में भी कई पढे लिखे लोग अंधविश्वास में यकीन करते हैं और अपने बीमार नाते रिश्तेदारों का इलाज कराने तंत्र-मंत्र का सहारा लेते हैं। डेढ करोड की आबादी वाला महानगर मुंबई देश के सबसे आधुनिक शहरों में से एक गिना जाता है...लेकिन अपनी इस पडताल में मैने जो तस्वीर देखी वो मुंबई की इस इमेज से मेल नहीं खाती और आपको सोचने पर मजबूर कर देती है कि क्या वाकई में हम 21 वीं सदी में रहते हैं।


ये जगह है मुंबई के हार्बर लाईन रेल स्टेशन रे रोड के करीब दातार दरगाह।यहां हर गुरूवार की शाम सैकडों लोग जमा होते हैं। दरगाह के बाहर का माहौल बडा ही अजीब और डरावना होता है। कोई औरत लगातार 2 घंटे से झूम रही होती है। उसे लग रहा होता है कि उसके शरीर में किसी खतरनाक चुडैल की आत्मा घुस गई है। खुद को राक्षस समझ रहा एक आदमी बडी देर से इसी तरह अपना सिर हिला रहा होता है।कई महिलाएं चिल्ला चिल्लाकर अपने बाल घुमा रही होतीं है। उन्हें भी लग रहा होता है कि इनमें किसी शैतान की आत्मा समा गई है। दरगाह के बाहर मौजूद कई शख्स इसी तरह की ऊट पटांग हरकतें करते नजर आते हैं। उन्हें उनके रिश्तेदार यहां लेकर आते हैं। तांत्रिकों की जुबान में जब कोई शख्स ऐसी हरकत करे तो इसका मतलब है कि उसे हाजिरी आई है। हाजिरी आने का मतलब है कि उस शख्स के जिस्म में कोई सैतानी रूह हाजिर हुई है।इस जगह के बारे में ये प्रचारित हुआ है कि जो भी 5 या 7 गुरूवार इस दरगाह पर चक्कर लगा ले तो भूत, प्रेत वगैरह उसे तंग करना बंद कर देते हैं। यहां मुंबई के अलग अलग इलाकों से तो लोग आते ही हैं आसपास के शहरों से भी लोग यहां पहुंचते हैं। शाम को दरगाह पर सलामी के वक्त तो यहां पैर रखने की जगह भी मुश्किल से मिल पाती है और जब नगाडे की आवाज के साथ सलामी दी जाती है तो उस वक्त ऐसा लगता है मानो सारे भूत प्रेत एक साथ नाच उठे हों। इस तरह के अड्डे भारत के कई गाम्रीण इलाकों में भी हैं लेकिन मुंबई जैसे शहर में इसका होना मुझे अजीब लगा।

मुसीबत का मारा इंसान अपनी समस्या का हल पाने के लिये हर तरीका अपनाता है। जब दवा से काम नहीं चलता तो दुआ का सहारा लेता है..लेकिन कई ऐसे भी होते हैं जो इलाज के लिये दवा के बजाय सीधे तंत्र-मंत्र का सहारा लेते हैं।यहां आने वाले ज्यादातर मरीजों के रिश्तेदार ये मानते ही नहीं कि मरीज को कोई मानसिक बीमारी है। उनकी नजर में ये रूहानी ताकतों की चपेट में हैं और इनसे निपटने का तरीका तंत्र-मंत्र ही है न कि मेडिकल साईंस। यहां कई लोग ऐसे हैं जिनका दावा है कि बिना कोई बाहरी इलाज किये सिर्फ यहां आने से ही उनकी हालत में सुधार हुआ है। हमने वहां बात की एक शख्स से जिसका नाम है दशरथ गौतम। दशरथ ने बारहवीं तक पढाई की है और एक चश्मे के स्टोर में काम करता है। दिखने में वो एक आम सेहतमंद नौजवान जैसा ही है...लेकिन कई बार दशरथ अपना होश-ओ हवास खो देता है और उट पटांग हरकतें करने लगता है। तेजी से अपना सिर हिलाने लगता है..जोर जोर से चिल्लाने लगता है...बेहोश हो जाता है। दशरथ के घरवालों का मानना था कि उसे कोई रूहानी ताकत तंग कर रही है। उसके शिक्षक फूफा किसी की सलाह पर उसे दातार दरगाह ले आये। यहां 4 हफ्ते आने के बाद दशरथ का कहना है कि वहां जाने के बाद उसकी तबियत में सुधार हुआ है।

अपने मोबाईल कैमरे में दरगाह के बाहर की तस्वीरों को शूट करके मैं मनोचिकित्सक डॉ. यूसुफ माचिसवाला के पास पहुंचा। उन्हें तस्वीरें दिखाकर मैने पूछा कि लोग ऐसी हरकतें क्यों कर रहे हैं और मनोविज्ञान की नजर में ये सब क्या है। उनका कहना था कि मनोवैज्ञालिक जुबान में इस बीमारी को पजेशन सिंड्रम (POSSESSION SYNDROME) कहते हैं।कई बार लोग बचपन से ही भूत प्रेत वगैरह की कहानियां सुनते हैं और जब किन्ही कारणों से दिमागी सिस्टम अस्त व्यस्त हो जाता है तो लोगों को ये लगता है कि वे किसी आत्मा की गिरफ्त में हैं। ऐसे में कई लोग लोग मनोचिकित्सक के पास जाते हैं तो कई दरगाहों पर मत्था टेकने। डॉ माचिसवाला के मुताबिक अगर दरगाह पर जाने के बाद किसी की तबियत ठीक हो रही है तो इसके पीछे भी मनोवैज्ञानिक कारण है। वे इसे वैकल्पिक इलाज (ALTERNATE THERAPY) मानते हैं। लोगों से सुन सुन कर पीडित व्यकित के दिमाग में ऐसी आस्था जगह बना लेती है कि दरगाह पर जाने से वो ठीक हो जायेगा। उसका यही विश्वास धीरे धीरे उसे बीमारी से पीछा छुडाती है। ऐसी बीमारी का जन्म भी दिमाग में गहरे बैठे खयालों से होता है और उनका निदान भी दिमाग में खयालों से ही हो जाता है।

खैर मनोविज्ञान चाहे जो भी कहता है लेकिन इस रिपोर्ट पर काम करने के बाद मैं इसी निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि भले ही हम 21 वीं सदी में पहुंच गये हों लेकिन आज भी आस्था और अंधविश्वास के बीच की लकीर बहुत धुंधली है।

Friday, 25 June 2010

"दाऊदभाई न होते तो मुसलमानों का क्या होता.."

गुरूवार की सुबह मुझे हल्का बुखार लग रहा था और शरीर में कमजोरी भी महसूस हो रही थी। कार चलाकर दफ्तर जाने का मूड नहीं था इसलिये मैं टैक्सी से महालक्ष्मी में अपने दफ्तर पहुंचा। शाम को मुझे नानी से मिलने दक्षिण मुंबई के बॉम्बे अस्पताल जाना था, जहां वे मोतीबिंदू के ऑपरेशन के लिये भर्ती हुईं थीं। मैने महालक्ष्मी से बॉम्बे अस्पताल जाने के लिये टैक्सी पकडी। टैक्सी वाला एक बुजुर्ग शख्श था।चेहरे पर हल्की सफेद दाढी उग आई थी। तेज बारिश के कारण टैक्सी काफी धीमी रफ्तार से आगे बढ रही थी। उस टैक्सी वाले ने मुझसे पूछा- साब 2 दिन टैक्सी हडताल पर थी तो पब्लिक को बहुत तकलीफ हुई होगी न?


टैक्सीवाले का सवाल एक दिन पहले हुई टैक्सी की हडताल से था। टैक्सी वाले सीएनजी की कीमत बढने की वजह से टैक्सी का किराया बढाने की मांग को लेकर हडताल पर उतरे थे। बाद में जब सरकार ने किराया बढाने का ऐलान किया तो उन्होने अपनी हडताल वापस ली।

टैक्सी वाले के सवाल पर मैने उससे उलटा सवाल पूछा- तकलीफ तो हुई थी। तुम किस यूनियन के हो...क्वाड्रोस के? शिवसेना के या किसी दूसरी यूनियन के?

टैक्सी ड्राईवर-हम तो सबके हैं और किसी के भी नहीं..सब यूनियन वाले चोर हैं..सब को अपनी फिक्र पडी है..हम लोग तो रोज कमाने खाने वाले आदमी हैं भाई। वो क्या हैं न कि वो एक मंत्री के बेटे (महाराष्ट्र के मंत्री नारायण राणे के बेटे नितेश राणे के संगठन स्वाभिमान) के आदमी लोग ने गाडियों की तोडमताडी शुरू कर दी थी न.. इसके लिये घबराकर बाकी सब टैक्सी वालों ने भी अपनी गाडी खडी कर दी। मैं तो भाडे की(किराये पर) गाडी चलाता हूं। दूसरे की गाडी का नुकसान होता तो अपने को ही जेब से भरना पडता न...उसलिये मैने गाडी खडी कर दी और मालिक को फोन करके बता दिया। एक-दो दिन नही कमाना गाडी तुडवाने से बेहतर है।

मैं-हां ये बात तो सही है। आप लोगों के साथ तो जबरदस्ती हो रही थी।

टैक्सी ड्राईवर-टैक्सी वालों पर तो हर कोई जुल्म करता है भाई। यूनियन वाले से लेकर सिग्नल पर खडे पुलिस वाले तक...सरकार भी तो जुल्म कर रही है। अभी नया रूल बना दिया कि 25 साल पुरानी गाडी निकाल कर नई गाडी खरीदों...क्या जरूरत है इसकी..अभी हमको हमारी पुरानी फिएट बेचकर नई सेंट्रो-वैंट्रो या फिर मारूति की गाडियां खरीदनी पड रहीं हैं..ये भी कोई बात है...आजकल की ये गाडियां मजबूत नहीं हैं...गाडियां तो फिएट और एंबेसेडर जैसी ही होनी चाहिये...एकदम मजबूत...पुराने जमाने में अंडरवर्लड के बडे बडे भाई लोग भी इन्ही गाडियों में फिरते थे।

मैं - आपकी बात सही है। आपको मालूम है कि दाऊद ने अपने गुनाहों के करियर का पहला गुनाह भी काले रंग की एक एंबैसेडर कार से किया  था। मसजिद बंदर इलाके में एक ज्वेलर को लूटा था उसने। वो भी जब मुंबई में था तो फिएट और एंबैसेडर में ही घूमा करता था।

अंडरवर्लड के बारे में मुझसे ये जानकारी सुनकर वो चौंका, लेकिन अपने हाव भाव के छुपाने की कोशिश करते हुए उसने कहा- हां मालूम है न भाई। इन सब भाई लोगों को मैने काफी करीब से देखा है। मैं उनके इलाके में ही पला बढा हूं।


मैं-कौन से इलाके में रहते हैं आप?

टैक्सी ड्राईवर- अभी तो मैं कुर्ला में रहता हूं लेकिन मेरा बचपन कमाठीपुरा में बीता (कमाठीपुरा मुंबई का रेड लाईट इलाका है और दाऊद और पठान गिरोहों के अड्डों के काफी करीब है।) हमारे अब्बा का तंबाकू कि डिबिया बनाने का काम था। हम घर में ही वो काम करते थे।

मैं-फिर तो आपने दाऊद को भी बचपन में देखा होगा?

टैक्सी ड्राईवर- मैने सबको देखा है। दाऊद भाई को, अमीरभाई को (पठान गैंग का अमीरजादा), आलमभाई को (पठान गैंग का आलमजेब) और समदभाई को (पठान गैंग का समद खान) मैं तो नागपाडा के उसी अहमद सैलर स्कूल में पढा हूं जिसमें दाऊदभाई ने पढाई की है। दाऊद भाई ने दसवीं तक पढाई की थी और मैने सातवीं तक..वो मेरे से उम्र में थोडा बडे थे...अभी मैं 53 साल का हूं और उनकी उम्र् 57-58 होगी।

मुझे इस टैक्सीवाले की बातें काफी दिलचस्प लगीं..लेकिन वो सच बोल रहा है क्या ये परखने के लिये मैने अपने मोबाईल में स्टोर की हुई एक पुरानी ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर उसे दिखाई। इस तस्वीर में युवा दाऊद अपने पठान गिरोह के दुश्मनों अमीरजादा, आलमजेब और समद खान के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खडा दिख रहा है। चंद सालों बाद दाऊद ने इन तीनों की हत्या करवा दी।

टैक्सीवाले ने टैक्सी एक सडक किनारे रोकी और एक एक कर तस्वीर में मौजूद हर इंसान का नाम बताने लगा...य़े आलमभाई हैं..ये अमीरभाई हैं..ये समदभाई हैं..मुझे आश्चर्य हुआ कि उसने सभी के नाम बिलकुल सही बताये थे।

टैक्सी ड्राईवर- साब ये फोटो आलमभाई की बहन की शादी की है। नूरबाग में रिशेप्शन हुआ था। मैं भी मौजूद था जब ये फोटो खींची जा रही थी। आलम भाई बडे डॉन थे लेकिन उनके बात करने की अदा क्या प्यारी थी..किसी से पानी भी मांगते थे तो बडे अदब से। क्या वक्त था वो भी...ये सभी दोस्त थे..लेकिन पैसों को लेकर आपस में ही खून खराबा कर डाला...इनकी वजह से ही आज हिसाब किताब काफिरों के हाथ में जा रहा है....अभी तो सब भाई लोग खत्म हो गये। उस वक्त क्या वट था उनका...

अब तक की बातचीत से उस टैक्सी वाले को भ्रम हो गया था कि मैं अंडरवर्लड का आदमी हूं और मुसलिम भी हूं फिर भी उसने जब मेरा नाम पूछा तो मैने उसे बताया कि मेरा नाम उमर है। मुझे लगा कि शायद अगर मैने अपना असली नाम बता दिया तो वो खुलकर मुझसे बात नहीं कर पायेगा। मेरा नाम बताने पर उसे पक्का यकीन हो गया कि मैं मुसलिम ही हूं तो वो और बेफिक्र होकर मुझसे बात करने लगा।

टैक्सी ड्राईवर-भाईजान मैं तो दाऊदभाई को मानता हूं। आज दाऊदभाई की वजह से ही हिंदुस्तान में मुसलमान शान से जी पा रहा है। अगर दाऊद भाई ने 1993 में बम नहीं फोडे होते तो अपने लोगों का जीना मुश्किल हो जाता। मुसलमानों का रास्ते पर निकलना भारी हो जाता भाई।

मैने उसके हां में हां मिलाई लेकिन कहा – दाऊदभाई भी आज कहां सुकून से जी रहे हैं। उनके गैंग के कितने लोग तो पुलिस की गोलियों से मारे गये।

टैक्सी ड्राईवर-आप सही फरमा रहे हैं भाई। अभी वो जमाना गया...अब तो पुलिस किसी के नाम पर 2 N.C.( अदखलपात्र गुनाह) होने के बाद तीसरी बार में सीधा ठोंक डालती है। अभी अंडरवर्लड में कोई दम नहीं है। एक जमाने में जिगर वाले भाईलोग हुआ करते थे। वो पुलिस से कुत्ते जैसा सलूक करते थे। पुलिस भी उनसे डरती थी।आज तो पुलिस ही भाई है।

मैं-चचा आप इतने सारे भाई लोगों के बीच पले बढे हो...कभी इन लोग के लिये काम नहीं किया?

टैक्सी ड्राईवर-भाई इसके लिये मैं अपने वालिद का शुक्रगुजार हूं। उन्होने मेरे को कभी इन लोग के बीच घुसने नहीं दिये। मुझपर बचपन में उनकी कडी नजर रही। आज मैं टैक्सी चला के खुश हूं। अपने बीवी बच्चों के साथ हूं। मैंने दाऊद के पिता इब्राहिम चचा का जनाजा उठते हुए देखा है। मुझे बडा बुरा लगा।हर बाप चाहता है कि उसके जनाजे को बेटे का कंधा नसीब हो...दाऊदभाई आज करोडों में खेल रहे हैं लेकिन क्या वो अपने बाप को ये खुशी दे पाये? खैर जो हो गया सो हो गया...खुदा उनके गुनाहों को माफ करे और उनको बरकत दे हम तो यही दुआ करेंगे।

इस बीच मेरी मंजिल आ गई थी और मैं किराया चुका कर अस्पताल की सीढियां चढने लगा..लेकिन मेरे दिमाग में अभी भी टैक्सी वाला का वो वाक्य गूंज रहा था-दाऊदभाई की वजह से हिंदुस्तान में मुसलमान शान से जी पा रहा है। मेरे मन में ये सवाल आया कि क्या मुंबई के सभी निचले वर्ग के कम पढे लिखे मुसलिम दाऊद के प्रति ऐसा ही भाव रखते हैं?

Thursday, 10 June 2010

स्वार्थी डॉन दाऊद इब्राहिम

अंडरवर्लड डॉन दाऊद इब्राहिम खुदगर्ज है। वो अपने साथियों का इस्तेमाल करके उन्हें उनके हाल पर छोड देता है। ये कहना है मंगलवार को अबू धावी से गिरफ्तार किये गये मुंबई बमकांड के आरोपी ताहिर मर्चंट उर्फ टकल्या का। पहले भी दाऊद के कुछ साथी उसपर यूज एंड थ्रो की नीति अपनाने का आरोप लगा चुके हैं।


ताहिर टकल्या को अपनी गिरफ्तारी से ज्यादा मलाल अपने आका दाऊद इब्राहिम की अनदेखी का है। ताहिर टकल्या पर दाऊद की ओर से रची गई मुंबई बमकांड की साजिश में हिस्सा लेने का आरोप है। पिछले सत्रह सालों से सीबीआई उसे तलाश रही थी। मंगलवार को उसे अबू धाबी से प्रत्यर्पित करके भारत लाया गया। सीबीआई सूत्रों के मुताबिक हवालात में टकल्या दाऊद इब्राहिम को कोस रहा है। टकल्या के मुताबिक 12 मार्च 1993 के मुंबई बमकांड के बाद कुछ दिनों तक तो दाऊद और उसके साथी टाईगर मेमन ने साजिश में शामिल लोगों की देखभाल की..लेकिन जैसे जैसे वक्त आग बढा दाऊद ने उनकी अनदेखी करनी शुरू कर दी। दाऊद इब्राहिम से रू बरू मिल पाना भी मुश्किल हो गया। एक तो कभी भी पकडे जाने की तलवार सिर पर लटक रही थी उसपर दाऊद ने दाना पानी भी देना बंद कर दिया। ऐसे में टकल्या खुद ही खाडी देशों में यहां वहां भटक कर अपना पेट पाल रहा था।ताहिर का कहना है कि दाऊद बमकांड में साथ देने वाले साथियों की न तो आर्थिक मदद करता था और न ही आपराधिक मामलों में पकडे जाने पर उन्हें छुडाता था। वहीं दूसरी ओर दाऊद के भाई, रिश्तेदार या गैंग के कोई खास सदस्य अगर खाडी देशों में पकडे जाते तो दाऊद अमीर शेखों के नेटवर्क का इस्तेमाल करके उन्हें छुडा लेता था।

ताहिर टकल्या जैसे ही आरोप पिछले साल गिरफ्तार किये गये बमकांड के एक और आरोपी करीमुल्ला खान ने लगाये थे। करीमुल्ला ने बताया था कि दाऊद उन्हें बमकांड के बाद हर महीने 10 हजार रूपये खर्चे के लिये देता था। उसके परिवार को भी पैसे पहुंचाये जाते थे लेकिन कुछ सालों बाद दाऊद ने पैसे देने बंद कर दिये। जब भी वो पैसे मांगता उससे गाली गलौच की जाती और धमकियां दी जातीं। बमकांड की साजिश में साथ देने वाले बाकी लोगों के साथ भी यही सलूक किया गया।

सूत्र बताते हैं कि दाऊद अपने लोगों पर इस वक्त इसलिये ध्यान नहीं दे पा रहा क्योंकि दुनियाभर की एजेंसियों ने पाकिस्तान पर उसकी गिरफ्तारी के लिये दबाव बना रखा है। ऐसे में दाऊद की प्राथमिकता पहले खुद को महफूज रखने की है।

Wednesday, 9 June 2010

अंडरवर्लड डॉन छोटा राजन का इंटरव्यू

( हाल ही में मुंबई के चेंबूर इलाके में छोटा राजन के खास गुर्गे फरीद तनाशा की हत्या कर दी गई। इस हत्या के पीछे एक शक खुद छोटा राजन पर भी जताया जा रहा है। राजन ने 07-06-2010 को मुझे फोन किया और फरीद तनाशा समेत मुंबई अंडरवर्लड के नये समीकरणों और दाऊद के मौजूदा ठिकाने पर कई बातें बताईं। उस इंटरव्यू के कुछ खास अंश यहां पेश हैं)
जीतेंद्र-आपकी जानकारी के मुताबिक फरीद तनाशा की हत्या किसने करवाई?छोटा राजन- ये भरत नेपाली का काम है। नेपाली पहले मेरे साथ काम करता था। पैसा की खातिर और अपना नंबर बढाने का वास्ते उसने ये काम किया..लेकिन उसके पास इतने छोकरे लोग नहीं है कि वो मेरे एरिया में आकर इतना बडा काम करे। यूपी-वीपी से छोकरे लाकर ही उसने तनाशा का काम किया..पर ये बरोबर नहीं है। चेंबूर, सहकार नगर कॉलोनी पीसफुल एरिया है। उधर ऐसा किया ये मेरे को बराबर नहीं लगा। लोगों को कन्फ्यूजन है कि ये मैने किया है..लेकिन ये भरत नेपाली का काम है।

जीतेंद्र- क्या फरीद तनाशा ने आपके दुश्मन छोटा शकील से हाथ मिला लिया है? तनाशा और छोटा शकील के बीच करीबी कैसे आई ?
छोटा राजन- तनाशा जब जेल में था तो बमकांड के आरोपियों के साथ रहता था। उनके साथ चाय वगैरह पीता था। वही टाईम से उन लोगों ने धरम के नाम का वास्ता देकर उसको अपने साथ में करने के लिये ब्रेन वॉश करना शुरू किया। शकील ने भी बात किया कि तू अपने धरम का है अपने साथ आजा। इसलिये वो फूट गया।

जीतेंद्र-क्या छोटा शकील के लोगों से दूर रहने की चेतावनी आपने कभी तनाशा को दी थी?
छोटा राजन – जब मेरे को ये मालूम पडा तो 2 बार मैने तनाशा को वार्निंग दिया। मैं उसको बोला क्या रे मा@#$%द वो लोग के साथ काय को घूमता है तो मेरे को जवाब दिया कि क्या भाई वो लोग अगर अपुन को सलाम करेंगा तो क्या अपुन जवाब भी नहीं देंगा। मैने उसको समझाया कि वो लोग दुश्मन हैं, ब्लास्ट वाले हैं उनसे सलाम काहे को लेने का। इसके अलावा कुछ और भी बातें मुझे पता चली।वो नहीं माना। अगर भरत नेपाली ने उसका मर्डर नहीं करवाया होता तो शायद मेरे को ही अपना हाथ खराब करना पडता। मेरे लिये इस तरह किसी का छोड कर जाना कोई नई बात नहीं है।

जीतेंद्र -भरत नेपाली आपसे क्यों अलग हुआ?
छोटा राजन- साल 2000 में किसी ने मुझे भरत नेपाली के नाम की सिफारिश की थी कि ये अपनी कॉलनी का लडका है। अपने एक दोस्त के यहां ड्राईवर का काम करता था। अच्छा लडका है, वफादार रहेगा ये बताया गया था इसलिये मैने उसको काम पर रखा। ये सब लोग पैसा के लिये काम करने वाला आदमी निकला। भरत नेपाली बाद में संतोष शेट्टी के चक्कर में आ गया। शरद शेट्टी ने नेपाली को दुबई में शकील से मिलवाया था। दोनो ने मलेशिया में मेरे आदमी बालू डोकरे का मर्डर कर दिया। बालू डोकरे को संतोष शेट्टी इंडोनेशिया में बोला था कि वो भी शकील गैंग ज्वाइन कर ले..लेकिन डोकरे ने उसके साथ गाली गलौच किया था।जब से मैं दाऊद से अलग हुआ हूं ये सब मेरे से फूटने लगे। सुनील सावत्या, रवि पुजारी, हेमंत पुजारी, गुरू साटम, अनिल परब सब अलग हो गये। भरत नेपाली और संतोष शेट्टी, दाऊद से मिलकर मेरी हत्या करना चाहते हैं। ये फरीद तनाशा भी छोटा शकील को बोल रहा था कि नेपाली और संतोष तो छोटा राजन का कुछ नहीं कर सकते। मैं तुम्हारा काम करके बता सकता हूं।

जीतेंद्र-हाल ही में दाऊद इब्राहिम की बहन हसीना पारकर से भी आपकी एक बार बात हुई है। ये किस सिलसिलें में हुई थी?
छोटा राजन- 2-3 महीने पहले दाऊद की बहन हसीना पारकर ने मेरे को मैसेज भिजवाया था कि उसको मेरे से बात करने का है। मैने फोन किया तो उसने मेरे को बताया कि कोई उसे मेरे नाम से धमकी दे रहा है, गाली गलौच कर रहा है, पैसे मांग रहा है। मैने उसको पूछा कि क्या आपको लगता है कि मैं इस तरह का काम करुंगा? मैने क्लियर किया कि देखो आपके साथ मेरे को कोई प्रॉब्लम नहीं है। काहे को मैं आपको तकलीफ देंगा। मैं ऐसा कभी करता नहीं। आपको दाऊद भाई से भी आप ये बात पूछ सकती हो। वो भी बताएंगा। मेरे को आपके भाई को ठीक करने का है।आपसे मेरे को कोई प्रोब्लम नहीं। मैं जब दाऊद के साथ तो आपको बहन जैसा मानता था। अभी भी वैसा ही है।

जीतेंद्र- आपकी सेहत कैसी है? खबरें आ रही थीं कि आपकी तबियत बेहद खराब चल रही है? आपकी किडनी खराब हो गई है?
छोटा राजन- (हा हा हा।) ये सब दाऊद के लोगों ने गलत फैलाया है मेरे बारे में। वो क्या हुआ था कि बैंकॉक के फायरिंग में मेरे को एक गोली पेट में लगी और एक थाई (जांघ) में। पेट में जो गोली लगी थी तो उससे इंटेस्टाईन फट गया था (अंतडियों को नुकसान पहुंचा था) उसमें इंफैक्शन फैल गया। डॉक्टरो ने ऑपरेशन करके उसके ठीक कर दिया। अभी मैं एकदम फिट हूं। भागता दौडता हूं।

जीतेंद्र-हर इंसान अपने दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रख रखता है। आपका दुश्मन दाऊद इन दिनों कहां है और वो क्या कर रहा है?

छोटा राजन- दाऊद ठीक इस वक्त किधर है ये मैं आपको नहीं बताउंगा..लेकिन मैं आपको ये बता सकता हूं कि वो गये 3 साल से कराची में नहीं है। वो मिडिल इस्ट में एक जगह है। वो आईएसआई की गोद में बैठा हुआ है। मशीनगनों का पहरा है। मैं 16 साल से उससे लड रहा हूं और मेरी उसपर नजर है।मेरे को दाऊद को खत्म करने का है। मेरे को मेरा देश से प्यार है। मैं इंडियन है। बैंकॉक में मेरे साथ जो कुछ हुआ उसके बाद से ये सब लोग पैसा के चक्कर में पड गया और अपना अलग काम करने लगा। मैंने कभी किसी बेगुनाह आदमी को तकलीफ दिया नहीं। आप चेक करो। मैने गये 10 सालों में किसी बेगुनाह को एक्सटोर्शन के लिये मारा नहीं। किसी बिल्डर का मर्डर किया नहीं। हां मैने दाऊद के लोगों को मारा है। मैं दाऊद के खिलाफ हूं, रहूंगा और मरते दम तक रहूंगा।

जीतेंद्र-क्या ये बात सच है कि 15 सितंबर 2000 को जब बैंकॉक में आप पर हमला हुआ तो उसके बाद से आपका गिरोह कमजोर पडने लगा?
छोटा राजन- अगर ऐसा है तो फिर सावत्या का मर्डर मैने कैसे करवाया, शरद शेट्टी को मैने कैसे मरवाया, नागपाडा में घर में घुसकर छोटे मियां और आशिफ दाढी पर फायरिंग कैसे करवाई? खबरी अमजद पटेल और हिमांशु को कालाघोडा में कैसे मारा। ओ.पी.सिंह को कैसे मारा? अभी गये साल नेपाल में कमल नेपाली का गेम कैसे बजाया? मैं कैसे कमजोर हो गया? ये सारी गलत बातें मेरे दुश्मन मेरे बारे में फैला रहे हैं। उन्होने तो ये तक अफवाह फैला दी कि मेरी किडनी खराब हो गई है। नेपाली मुझे छोड कर चला गया...ये चला गया...वो चला गया...मेरे को कई फर्क नहीं पडता है। जो मुझे करना है वो मैं करूंगा। उसके लिये मुझे मरना भी पडे तो कोई गम नहीं है। अपने ऊपर गोली चलने के बाद भी मैने दाऊद के कई लोगों को मारा..लेकिन वो एक बालू डोकरे को छोडकर कुछ नहीं कर पाया।

जीतेंद्र- डीके राव और विकी मल्होत्रा जैसे आपके गैंग मेंबर भी फरीद तनाशा के साथी थे। क्यो दोनो अब भी आपके प्रति वफादार हैं या उन्होने भी आपसे गद्दारी कर दी है?
छोटा राजन- डी.के.राव भी मेरे साथ है और विकी मल्होत्रा भी मेरे साथ है। इन लोगों की भावनाएं अभी मरीं नहीं हैं। ये लोग प्रिंसिपल से चलते हैं।

जीतेंद्र- आप विदेश में छुपकर अपना गैंग चला रहे हैं। क्या आपका भारत वापस लौटने का कोई इरादा है?
छोटा राजन- नहीं। भारत की मुझे बहुत जरूरत है लेकिन देखिये जैसे रॉ की गुप्ता जैसी औफिसर वहां पाकिस्तान में बैठ कर देशभक्तों को मरवाती थी तो हम किस पर भरोसा करें? वहां कई बडे पोस्ट पर दाऊद के लोग बैठे हैं। ऐसा नहीं है कि सभी औफिसर्स की भावनाएं मर गईं हैं। कई औफिसर जाने अनजाने में मेरी मदद करते हैं। आई अप्रीशिएट दैट.

जीतेंद्र-पिछली बार जब विधान सभा चुनाव में आपके भाई दीपक निकालजे खडे हुए तो ये खबर आई कि उनका राजनीति में जाना आपको पसंद नहीं है। क्या ये सच है?
छोटा राजन- नादान है वो। उसकी बुद्धि राजनीति के लायक नहीं है। राजनीति में आकर वो लोगों का क्या भला करेगा। उसपर खुदका अपना नाम बनाने की सनक सवार है।

Thursday, 3 June 2010

क्या छोटा राजन गिरोह खात्में के कगार पर है ?

गैंगस्टर फरीद तनाशा की हत्या के बाद अब अंडरवर्लड में ये सवाल उठ रहे हैं कि क्या छोटा राजन का गिरोह खत्म हो गया है। बीते 10 सालों में राजन के कई खास साथियों ने उससे गद्दारी करके अलग गिरोह बनाया, कुछ दुश्मनों या पुलिस के हाथों मारे गये और कुछ गिरफ्तार हुए। इससे अंडरवर्लड में छोटा राजन की पकड लगातार ढीली पडती गई।
फरीद तनाशा उन चंद बचे खुचे गैंगस्टरों में से था जो अब तक छोटा राजन के साथ थे। तनाशा ही इन दिनों मुंबई में राजन गिरोह का काला कारोबार संभाल रहा था। तनाशा की हत्या ने राजन गिरोह के ताबूत में एक और कील ठोंक दी है। अंडरवर्लड में सवाल उठ रहा है कि अब क्या छोटा राजन का खौफ बरकरार रह पायेगा? क्या उसके धमकी भरे फोन कॉल्स से डरकर फिल्मी हस्तियां, बिल्डर और बडे कारोबारी उस तक मोटी रकम पहुंचायेंगे? क्या राजन के कट्टर दुश्मन दाऊद इब्राहिम के लोगों को उससे छुपने की जरूरत पडेगी ? हाल के सालों में राजन गिरोह की जो दुर्दशा हुई है उस पर गौर करें तो जवाब मिलता है नहीं।
15 सितंबर 2000 को राजन पर बैंकॉक में हमला हुआ और तबसे राजन गिरोह ने बिखरना शुरू कर दिया। ये हमला अंडरवर्लड डॉन दाऊद इब्राहिम के निशानदेही पर हुआ था। हमले में राजन तो बच गया लेकिन उसका दाहिना हाथ रोहित वर्मा मारा गया। इसके चंद दिनों बाद ही साल 2002 में उसके खास साथी ओ.पी.सिंह की नासिक जेल में मौत हो गई। शक जताया जा रहा है कि राजन ने ओपी सिंह की हत्या करवा दी थी क्योंकि वो एक पुलिस अधिकारी के साथ मिलकर अलग गिरोह बनाने जा रहा था। चार साल बाद राजन ने अपने एक और बडे साथी बालू ढोकरे को खो दिया। मलेशिया की राजधानी क्वालालुमपुर में उसकी हत्या हो गई।
राजन के कई पुराने साथी भी इस बीच उससे अलग होकर अपना अलग गिरोह चलाने लगे। रवि पुजारी, हेमंत पुजारी, बंटी पांडे, इजाज लाकडावाला और भरत नेपाली उससे अलग होकर खुद ही अपना अपना अलग गिरोह चलाने लग गये हैं। इस बीच पुलिस ने राजन गिरोह पर काफी दबाव बनाया। बीते 15 सालों में पुलिस ने छोटा राजन से जुडे करीब 100 गैंगस्टरों को एनकाउंटर्स में मार दिया। राजन की पत्नी सुजाता निकालजे और भाई दीपक निकाजले को भी आपराधिक मामलों में गिरफ्तार किया गया। राजन के फिलहाल 2 बडे साथी ही बाहर है डी.के.राव और विकी मल्होत्रा। दोनो इसी साल लंबा वक्त जेल में गुजार कर बाहर निकले हैं और इनकी हर हरकत पर पुलिस की नजर रहती है।
छोटा राजन का गिरोह कमजोर तो हुआ है लेकिन वो अब भी अपने दुश्मन दाऊद इब्राहिम की हिटलिस्ट पर है। यही वजह है कि उसे लगातार अपना ठिकाना बदलते रहना पडता है।

Saturday, 8 May 2010

कसाब का मुकदमा: क्या दिखा? क्या छुपा?

न तो जज ने अजमल कसाब को फांसी की सजा सुनाकर अपनी कलम की निप तोडी और न ही कसाब अदालत में चिल्लाया – जज साब मैं बेकसूर हूं। ऐसा कुछ भी नहीं हुआ जो आप फिल्मों में किसी को फांसी की सजा सुनाये जाते वक्त देखते हैं...लेकिन इसके बावजूद 26-11-2008 को हुए मुंबई हमले का मुकदमा ड्रामें से भरपूर है। अदालत से जुडे हर शख्स के किस्से बडे दिलच्सप हैं।

जज तहिलयानी

उज्जवल निकम भले ही अब ये बात कबूल न करें, लेकिन जब 26-11 के मुकदमें की सुनवाई के लिये जज तहिलयानी की नियुक्ति हुई तो निकम चिंतित हो गये थे।

चिंता इसलिये थी क्योंकि तहिलयानी की अदालत में निकम एक मामले में बहुत बडा झटका झेल चुके थे। ये मामला था कैसेट किंग गुलशन कुमार की हत्या का। तहिलयानी के फैसला सुनाने के कुछ दिन पहले ही निकम चंद पत्रकारों से कहते पाये गये –तहिलयानी साब की इमेज अक्विटल मांइंडेड (आरोपियों को बरी कर देने वाले) जज की है। पता नहीं क्या होगा? उस मामले में निकम का डर सही भी निकला। 18 में से सिर्फ एक आरोपी रऊफ दाऊद मर्चंट को छोडकर सभी आरोपियों को तहिलयानी ने बरी कर दिया। उज्जवल निकम के लिये ये एक करारा झटका था। इसी मामले से उस वक्त निकम की बनी ये इमेज भी टूटी थी कि उज्जवल निकम को कोई भी मुकदमा सौंपों तो जीत पक्की। फैसले की शाम दुखी उज्जवल निकम को उनके कुछ खास पत्रकारों ने ये कहते हुए दिलासा दी – छोडिये न निकम साब। सचिन क्या हर मैच में सेंचुरी मारता है? अमिताभ बच्चन की क्या हर फिल्म हिट होती है ?...आप एक मुकदमा हार गये तो क्या फर्क पडता है।

26-11 के मामले में फिर एक बार निकम का सामना जज तहिलयानी से हुआ। जज तहिलयानी के इस फैसले से कि कसाब को फांसी दी जाये उज्जवल निकम की वाहवाही तो हुई, लेकिन साथ ही उन्हें 2 आरोपियों के बरी हो जाने की टीस भी झेलनी पडी।



तहिलयानी बडे ही मिलनसार शख्स हैं। कोर्ट के गंभीर माहौल को अक्सर वे हलका करने की कोशिश करते थे..कभी निकम की खिंचाई कर देते तो कभी कसाब या पत्रकारों पर कोई चुटकी लेते। कई बार उन्होने कुछ पत्रकारों के साथ सख्ती भी दिखाई और कुछ अखबारों को नोटिस भी भेजा, लेकिन आमतौर पर मीडियाकर्मियों की जरूरतों का वे पूरा ख्याल रखते थे। फैसला सुनाये जाने के पहले एक अंग्रेजी अखबार ने खबर छाप दी कि जज तहिलयानी फैसला तैयार करने में इतने व्यस्त थे कि महीनेभर तक उन्होने अपनी पत्नी तक से बात नहीं की। इसपर जज तहिलयानी ने खबर लिखने वाली रिपोर्टर की भरी अदालत में क्लास ले ली और कहा कि तुम्हारी खबर से मेरी फैमिली में प्रोब्लम हो गया। मेरे नाते रिश्तेदारों के फोन आ रहे हैं और मुझे उन्हें सफाई देनी पड रही है।


उज्जवल निकम

निकम अगर अब वकालत का पेशा छोडकर टीवी पत्रकार बनना चाहें तो उन्हें कोई दिक्कत नहीं होगी। भारत का कोई सरकारी वकील जिसे पूरी तरह से इलेक्ट्रोनिक मीडिया की नब्ज पता है तो वो हैं उज्जवल निकम। पिछले 15 सालों में निकम ने इतनी बार टीवी कैमरों का सामना किया है कि अब वे टीवी के तकनीक शब्दों से भलीभांति परिचित हो गये हैं और अक्सर अदालत के बाहर मीडिया को संबोधित करने से पहले उनसे सुना जा सकता था – ऐ मैं पहले हिंदी में बाईट दूंगा। मैं टिकटैक नहीं दूंगा...लाईव के लिये टाईम नहीं है फोनो या फिर डिफर्ड लाईव ले लो...मेरे होटल के बाहर ओ.बी.वैन खडी करने की जगह ज्यादा नहीं है..वगैरह। निकम लगभग सभी टीवी पत्रकारों को उनके नाम से जानते हैं।



कई बार पत्रकारों से उनकी नोंकझोंक भी होती। अदालत में जब कसाब को फांसी की सजा दिये जाने पर वे अपनी दलीलें दे रहे थे तो उन्होने कसाब को न जाने कौन कौनसा जानवर बना डाला...कसाब सांप है..कसाब पागल कुत्ता है... कसाब घोडा है..कसाब गधा है..कसाब मगरमच्छ है...फिर कहा कि कसाब की तुलना इन जानवरों से करना, इन जानवरों के अपमान करने जैसा है। निकम की ये दलीलें सुनकर कोर्ट में मौजूद तमाम युवा पत्रकार हंसने लगे। निकम ने गुस्से में उनकी ओर देखते हुए कहा – सर ये लोग इमैच्योर हैं। सिर्फ हंसते रहते हैं...



निकम के साथ उनके पुलिसिया ड्राईवर सौदे पिछले 15 सालों से है। जब भी निकम टीवी चैनलों को बाईट देने के लिये आते तो सौदे सीना तानकर उनके पीछे खडा हो जाता। निकम के साथ टीवी पर दिखना सौदे को पसंद है। फैसला सुनाये जाने वाले दिन एक दिलचस्प वाक्या हुआ। सौदे नया सूट-बूट पहनकर अदालत आया। हालांकि सौदे ड्राईविंग सीट पर था, लेकिन उस दिन वो पीछे की सीट पर बैठे निकम से ज्यादा स्मार्ट लग रहा था...सौदे को पता था कि आज पूरी दुनिया उज्जवल निकम को लाईव दिखाएगी और निकम के बगल में खडा होने पर वो भी सभी को दिखेगा ही। हमेशा पुलिस की वर्दी में रहने वाला सौदे जब सूट बूट में आया तो वहां मौजूद फोटोग्राफरों ने उसकी तस्वीरें लेनी शुरू कर दीं। वहां मौजूद डीसीपी वर्के और एसीपी मराठे ने जब ये देखा तो उन्होने तुरंत सौदे को बुलाया और सभी के सामने उसकी क्लास ले ली। उसका सूट उतरवा लिया गया और कहा गया कि इसकी शिकायत पुलिस कमिश्नर के पास की जायेगी। सौदे गिडगिडा कर सफाई देने लगा कि उसकी शादी की सालगिरह थी इसलिये वो वर्दी के बजाय सूट में आया था। वहां मौजूद पत्रकारों को सौदे पर हंसी भी आई और दया भी।



फैसले वाले दिन सभी चैनल उज्जवल निकम का लाईव इंटर्वयू दिखाना चाहते थे। एक अनार सौ बीमार वाले हालात पैदा हो गये। उज्जवल निकम एक और हिंदी, अंग्रेजी और मराठी के मिलाकर चैनल करीब 20 थे। इस समस्या से निपटने के लिये निकम ने अपने होटल पर फैसले के चंद दिनों पहले सभी चैनलों की एक बैठक बुलाई और तय किया कि अदालत का फैसला आने के बाद वे सभी चैनलों को 15 मिनट का समय लाईव करने के लिये देंगे। फैसले वाले दिन वे दोपहर से लगातार देर रात तक एक चैनल से दूसरे चैनल पर लाईव देते रहे। लगभग एक जैसे सवाल और एक जैसे जवाब..लेकिन निकम के चेहरे को देखकर लग रहा था कि न तो वे ऊबे हैं और न ही कोई थकान है। हर लाईव में वही एनर्जी। इस बीच उन्होने 15 मिनट के कुछ ब्रेक का समय भी अपने लिये रख छोडा था ताकि वे कुछ खा-पी सकें, फोन कर सकें और वे काम कर सकें जिन्हें रोका नहीं जा सकता।


अजमल कसाब

अजमल कसाब को पहली बार मैने तब देखा था जब दक्षिण मुंबई के सेशंस कोर्ट में वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये आर्थर रोड जेल से उसकी पेशी हुई थी। उस वक्त जेल के भीतर विशेष अदालत नहीं बनी थी। सीएसटी स्टेशन पर गोलियां चलाते हुए अगर उसकी तस्वीरें और सीसीटीवी का वीडियो न देखा होता तो यकीन करना मुश्किल हो जाता कि यही वो शख्स है जिसने 26 नवंबर 2008 की रात मुंबई में अपने साथियों के साथ कहर बरपाया था। वो एक मध्यमवर्गीय परिवार का आम किशोर दिख रहा था। शक्ल भोली भाली लग रही थी और जज की हर बात का जवाब वो बहुत ही सभ्यता से जी हुजूर कहकर देता था।

कसाब से अगली बार सामना आर्थर रोड जेल की अदालत में हुआ। इस बार उसके चेहरे से भोलापन गायब था। वो एक एक कर खुद ही अपने गुनाहों का कबूल कर रहा था। उसे देखकर घृणा हो रही थी। उसके चेहरे पर न तो कोई झिझक थी और न ही अपनी करतूतों के लिये कोई शर्मिंदगी। इसके बाद मैं तब अदालत गया जब वो अपने इकबालिया बयान से पलट गया। उसने अदालत को बताया कि मुंबई पुलिस ने उसे 26-11 के पहले ही पकड कर रखा था और वो बेकसूर है। ये झूठी कहानी सुनाते वक्त उसकी आंखों में शरारती हंसी साफ दिखाई दे रही थी। हमें अंदाजा हो गया था कि बचाव पक्ष के किसी वकील ने उसे अच्छे से सबकुछ रटाया है।



कसाब का अगला रूप पत्रकारों ने फैसला सुनाये जाने के आखिरी दिन देखा, जब वो मौत की सजा सुनाये जाने पर रोने लगा। वो फिदायीन जो धर्मांधता के वशीभूत होकर मुंबई में नरसंहार करते हुए अपनी जान देने आया था, आज उसे खुद अपनी मौत से डर लग रहा था...अपने किये पर पछतावा हो रहा था।



मुझे जेल अधिकारियों ने बताया कि पहचान परेड के लिये जब कुछ गवाह पुलिसकर्मी जेल में आये थे तो कसाब की सुरक्षा का खास ध्यान रखना पडता था। जेल अधिकारियों को डर था कि कहीं ये पुलिसकर्मी ही भावनाओं के बेकाबू हो जाने पर कसाब की हत्या न कर दें। एक पुलिसकर्मी तो कसाब को देखते ही आपा खो बैठा। वो कसाब पर हमला करने जा ही रहा था कि जेलकर्मियों ने उसे पकड लिया। बडी मुश्किल से वो काबू में आया। वो पुलिसकर्मी बार बार ये चिल्ला रहा था- भले ही मुझे फांसी दे दो..लेकिन मैं इसे जिंदा नहीं देखना चाहता।


मीडिया

इस मुकदमें को कवर करना मीडिया के लिये भी एक बडी चुनौती थी। पुलिस की ओर से मुकदमा शुरू होने से पहले सभी चैनलों, पत्रिकाओं और अखबारों से उन पत्रकारों के नाम मंगवाये गये जिन्हें कि मुकदमें के कवरेज की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। मुंबई पुलिस की स्पेशल ब्रांच ने ऐसे सभी पत्रकारों की खुफिया जांच की और उनकी ओर से मंजूरी मिलने के बाद विशेष पास दिये गये। मुकदमें के पहले दिन हडकंप मच गया। अदालत में बैठने की जगह पत्रकारों की संख्या से कम थी जिसकी वजह से पुलिस ने कई पत्रकारों को अदालत में जाने ही नहीं दिया। पुलिस के इस व्यवहार का पत्रकारों ने कडा विरोध किया। जब बात जज तहिलयानी तक पहुंची तो उन्होने अदालत में और कुर्सियों का इंतजाम करवाया लेकिन साथ ही ये भी कहा कि अदालत में पत्रकारों का प्रवेश पहले आओ, पहले पाओ वाले फार्मूले पर होगा।

अदालत तक पहुंचना भी काफी पेचीदा था। पत्रकार अदालत के बाहर सडक पर लाईन लगाकर खडे रहते। फिर एक एक कर उन्हें छोडा जाता। मोबाईल फोन समेत कोई भी इलेक्ट्रोनिक सामान भीतर ले जाने की इजाजत नहीं थी। यहां तक कि पुलिस कलम भी रखवा लेती। पत्रकारों को पुलिस की ओर से कलमें दी जातीं। पहले घेरे में पुलिसकर्मी मेटल डिटेक्टर से पत्रकारों के पूरे शरीर की जांच करते। यहां तक कि जूते तक उतरवा कर देखे जाते कि कहीं उसमें तो कुछ आपत्तीजनक नहीं रखा है। बायोमेट्रीक कार्ड के जरिये पत्रकारों की कंप्यूटर में एंट्री होती। इसके बाद अगला घेरा भारत-तिब्बत सीमा पुलिस का होता। यहां जांच के बाद ये पुलिसकर्मी अपनी ओर से एक दूसरा पास देते और भीतर जाने वाले पत्रकार की रजिस्टर में एंट्री करते। तीसरा और आखिरी घेरा कोर्टरूम के ठीक बाहर होता। यहां भा.ति.सी.पु की मौजूदगी में मुंबई पुलिस के जवान फिर एक बार मेटल डिटेक्टर से पत्रकारों की तलाशी लेते और फिर उन्हें अदालत के भीतर जाने दिया जाता।

जैसे ही अदालत की कार्रवाई खत्म होती सारे टीवी पत्रकार पूरी ताकत के साथ मुख्य गेट की ओर दौड लगाते। सभी को अपने चैनल पर सबसे पहले खबर दिखाने की जल्दी रहती(हालांकि सभी चैनल पर खबर उतरने में सिर्फ कुछ सेकंदों का ही फासला रहता) शुरूवात में तो पुलिसकर्मी पत्रकारों की ये रेस देखकर घबरा जाते कि क्या हो गया...लेकिन चंद दिनों में ही उन्हें पूरा खेल समझ में आ गया।

अदालत में कुछ पत्रकार अपने गले पर उंगली फेर कर कसाब को छेडने की कोशिश करते तो वहीं कसाब इन शरारतों से बेफिक्र होकर महिला पत्रकारों को निहारता रहता।


कसाब के वकील

पूरे मुकदमें के दौरान 3 लोगों ने कसाब की वकालत की। पहले तो मुंबई के वकीलों ने फरमान जारी कर दिया कि कोई भी वकील उसका मुकदमा नहीं लडेगा..लेकिन जब सरकार ने कसाब को वकील देना तय किया तो एडवोकेट अंजली वाघमारे का नाम सामने आया। कसाब की वकालत लेने पर वाघमारे को काफी विरोध झेलना पडा। एक पुलिस अफसर की पत्नी होकर कसाब का केस लेने पर भी लोग उसे धिक्कार रहे थे। वर्ली में वाघमारे का घर हमले में शहीद हुए तुकाराम ओंबले के घर से बस कुछ ही फासले पर था। आखिर में वाघमारे को अपने आप ही केस से हटना पडा क्योंकि पता चला कि वो हमले में घायल हुए एक शख्स की भी वकील है।

वाघमारे के हटने के बाद ये केस दिया गया एडवोकेट अब्बास काजमी को। काजमी ने भी कसाब का केस लेकर मुसीबत मोल ली। मुंबई के मुसलमानों ने भी ऐलान किया था कि हमले के दौरान मारे गये 9 आतंकियों के शव को मुंबई में दफन नहीं होने देंगे, ऐसे में एक मुंबई का मुसलमान वकील कसाब को फांसी के फंदे से बचाने की जिम्मेदारी ले रहा था। काजमी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुए और उन्हें मुंबई के मशहूर इस्लामिक जिमखाना के प्रबंधन से भी बर्खास्त कर दिया गया। काजमी ने एक लंबे वक्त तक बिना किसी अडचन के मुकदमा चलाया लेकिन मुकदमें के खात्मे से चंद महीने पहले उनकी जज के साथ कहासुनी हो गई। जज ने काजमी को अदालत को गुमराह करने के आरोप में मुकदमें से हटा दिया। काजमी ने भी इसे अपना अपमान माना और बॉम्बे हाईकोर्ट में तमाम आरोपों के साथ विशेष अदालत के जज तहिलयानी के खिलाफ अदालत की अवमानना की अर्जी दायर की है।



काजमी के बाद कसाब का केस गया एडवोकेट के.पी.पवार के पास। पवार के कार्यकाल के दौरान कोई विवाद नहीं हुआ। हमें ताज्जुब हुआ कि पावर की कसाब के वकील के तौर पर नियुकित के वक्त न तो किसी राजनीतिक दल ने विरोध किया और न ही किसी धार्मिक संगठन ने।



विशेष अदालत ने फैसला तो सुना दिया है, लेकिन कसाब के फांसी के फंदे पर लटकने में अभी काफी वक्त है। इस दौरान बस यही मनाईये कि आतंकी कहीं किसी बडे राजनेता का अपहरण कर या कोई हाईजैकिंग कर उसे छुडा न ले जायें। भारत में कुछ भी हो सकता है।



जीतेंद्र दीक्षित

वरिष्ठ संपादक एवं ब्यूरो प्रमुख

स्टार न्यूज एवं स्टार माझा।

Monday, 29 March 2010

के.पी.रघुवंशी का तबादला: अहसान फरामोशी की मिसाल

एक कर्तव्यनिष्ठ, हिम्मती, ईमानदार और सूझबूझ वाले पुलिस अधिकारी के साथ हमारी राजनीतिक व्यवस्था क्या सलूक करती है उसकी एक मिसाल आज देखने मिली। साथ ही फिर एक बार सत्ताधारी राजनेताओं ने ये साबित कर दिया कि वे Use & throw की गंदी रणनीति में यकीन रखते हैं।महाराष्ट्र Anti Terrorist Squad (ATS) के प्रमुख के.पी.रघुवंशी आज आखिरी बार अपने दफ्तर गये। सरकारी आदेश के मुताबिक उन्होने अपना चार्ज दस्ते के नये मुखिया राकेश मारिया को सौंप दिया। वैसे तो जल्द ही रघुवंशी का तबादला सामान्य तौर पर ATS से होना ही था..लेकिन उनका इस तरह से हटाया जाना काफी चौकानेवाला है...खासकर मेरे जैसे पत्रकारों के लिये जो रघुवंशी को, उनके काम करने के तरीके को और उनकी शख्सियत को कई सालों से जानते हैं।


के.पी.रघुवंशी को हटाये जाने की घटना से मुझे दुख भी है और रोष भी। दुख इस वजह से कि एटीएस को दिनरात एक करके खडे करने वाले अफसर को इस तरह से फोर्स से हटाया गया और रोष सत्ताधारी राजनेताओं और अपने ही व्यावयायिक सहयोगियों यानी कि इलेक्ट्रोनिक मीडिया पर।

रघुवंशी को एटीएस से सिर्फ एक छोटी सी गलती की वजह से हटना पडा और थोडा गहराई से देखे तो ये गलती भी न थी। 2 हफ्ते पहले एटीएस ने 2 संदिग्ध लोगों को गिरफ्तार किया था जिनपर शक था कि वे ओनजीसी समेत मुंबई के कई ठिकानों का निशाना बनाने की साजिश का हिस्सा हैं और जिनके आका पाकिस्तान में हैं। ये खबर मीडिया में फैली..लेकिन चैनल पर खबर चलाने से पहले जरूरी था कि कोई पुलिस अधिकारी अधिकृत तौर पर इसकी पृष्टि करे। सभी चैनल और अखबारों के पत्रकार बार बार फोन और एसएमएस करके रघुवंशी से कैमरे पर बाईट देने की फरियाद करने लगे। मीडिया से लगातार हो रही गुजारिश से रघुवंशी दबाव में आ गये और उन्होने सीमित जानकारी कैमरे पर पत्रकारों को दी। कैमरे पर दी गई यही जानकारी उनके लिये मुसीबत बन गई।

रघुवंशी की टीवी चैनलों पर बाईट देखने के बाद केंद्रीय गृहमंत्रालये ने आपत्ती जताई और महाराष्ट्र सरकार से मामले की जानकारी मीडिया में लीक करने के आरोप में रघुवंशी के खिलाफ कार्रवाई करने को कहा। केंद्र से पडे इसी दबाव के तहत महाराष्ट्र सरकार ने एटीएस से रघुवंशी का तबादला कर दिया। हालांकि महाराष्ट्र सरकार ने सफाई दी कि ये तबादला रूटीन है और रघुवंशी को ज्यादा अहम पद पर भेजा गया है..लेकिन महकमें में सभी को ये मालूम था कि रघुवंशी का तबादला एक सजा के तौर पर किया गया है।

इस मामले में मेरी पूरी सहानुभूति के.पी.रघुवंशी के साथ है। उनके साथ सरासर नाइंसाफी हुई है। रघुवंशी ने जो भी बातें उस रविवार मीडिया को बताईं थीं उनमें से कुछ भी गोपनीय नहीं था। सभी बातें या तो एफआईआर या फिर रिमांड एप्लिकेशन का हिस्सा थीं जो कि कोई भी आम आदमी हासिल करके पढ सकता है। उस दिन मीडियावालों को रघुवंशी ने खुद नहीं बुलाया था, कोई प्रेस कांफ्रेंस नहीं ली थी बल्कि मीडिया खुद उनके पास गई थी। रघुवंशी की इमेज ऐसे अधिकारियों की न थी जो कि स्व प्रचार के भूखे हों और अक्सर कैमरे पर अपनी पीठ थपथपाते हों। ऐसे में मेरे अनुमान से मीडिया अफवाहों को खबर के तौर पर न पेश करे और गलत जानकारी न चलाये इस इरादे से वे कैमरे पर बात करने को तैयार हुए थे। ऐसे में क्या ये इतनी बडी गलती थी कि केंद्रीय गृहमंत्रालय ने उनको एटीएस से हटाने की ही सिफारिश कर डाली। शर्म तो खुद केंद्रीय एजेंसियों के अफसरों को आनी चाहिये जो कि आधी-अधूरी और अस्पष्ट खुफिय़ा जानकारी पुलिस को देकर अपना पल्ला झाड लेते हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो पुणे में धमाका भी न होता...ये केंद्रीय एजेंसियों की ही ढिलाई, कामचोरी और दूसरों के सिर ठीकरा फोडनेवाले रवैया का नतीजा था कि आतंकी अपने मकसद में कामियाब हुए। ऐसे अफसरों के खिलाफ केंद्रीय गृहमंत्रालय सख्त कार्रवाई क्यों नहीं करता? गैरजिम्मेदारी उन्हें सिर्फ रघुवंशी में ही क्यों नजर आई?

इस पूरे मामले में महाराष्ट्र सरकार की भूमिका भी शर्मनाक है। अपने काबिल अफसरों में से एक रघुवंशी की ढाल बनने के बजाय केंद्र के दबाव में आकर राज्य सरकार ने उन्हीं पर तलवार चला दी थी। सरकार की इस हरकत में अहसान फरामोशी की बू आती है। जब एटीएस का गठन किया गया था तब भी कांग्रेस एनसीपी की यही सरकार थी। 2 बडे आईपीएस अफसर एटीएस प्रमुख बनने के लिये लड रहे थे। ऐसे में रघुवंशी को उनकी काबिलियत की बदौलत सरकार ने एटीएस प्रमुख बनाया था और इस तरह से आईपीएस अफसरों के बीच चल रहे गैंगवार को रोका था। रघुवंशी ने ही एटीएस की बुनियाद खडी की, उसे एक पहचान दी और जो भी मामले एटीएस के सामने आये उनकी तहकीकात में जान लडा दी। 26-11-2008 को जब तत्कालीन एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे शहीद हुए तो उसके बाद कोई भी आईपीएस अफसर एटीएस प्रमुख की कुर्सी संभालने को तैयार नहीं था। ऐसे में फिर एक बार सरकार को रघुवंशी ही नजर आये। रघुवंशी ने फिर एक बार ऐसी कुर्सी संभाली जो अब पुलिस महकमें में “अशुभ” के तौर पर बदनाम हो चुकी थी...लेकिन जो रघुवंशी को जानते हैं उन्हें ये पता है कि रघुवंशी ने अपने पुलिसिया करियर में अक्सर ऐसे पदों को अपनाया है जिनसे कि बाकी अफसर दूर भागते थे...महाराष्ट्र सरकार ये भूल गई कि 1992-93 के मुंबई दंगों पर श्रीकृष्ण आयोग की रिपोर्ट पर जांच और कार्रवाई के लिये बनाये गये SPECIAL TASK FORCE के मुखिया यही रघुवंशी ही थे और उस पद रहते हुए इन्हें अपने ही महकमें के कई वरिष्ठ, रिटायर्ड और मौजूदा अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करनी पडी थी...उन्हें गिरफ्तार करना पडा था। इस “गंदे काम” के लिये कोई दूसरा अफसर तैयार नहीं था।

रघुवंशी के एटीएस से तबादले की खबर को कई न्यूज चैनलों ने बडे चटकारे ले लेकर दिखाया और उनके वहां से हटने पर इस तरह के SLUGS और SCROLLS चलाये जिन्हें देखने पर निश्चित ही रघुवंशी दुखी और अपमानित महसूस कर रहे होंगे।मैं अपनी बिरादरी के लोगों को याद दिलाना चाहूंगा कि आज जिस “अपराध” के लिये रघुवंशी को सजा दी गई वो “अपराध” तो उन्होने आप ही के कहने पर किया था। इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने उनके समर्थन में आवाज उठा कर सरकार को घेरने के बजाय सरकार की अहसान फरामोशी में साथ दिया। मीडिया ने भी जो किया वो बिलकुल शर्मानक है।

के.पी.रघुवंशी कभी किसी POWER STRUGGLE में नहीं रहे और न हीं उन्होने किसी महत्वकांक्षा के वश में आकर कोई गलत काम किया। उनपर कभी भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा। न तो रघुवंशी ने किसी राजनेता की चाटुकारिता की और न ही कोई खास पद हासिल करने के लिये अपने “फाईनेंसरों का नेटवर्क” तैयार किया। भ्रष्टाचार, चाटुकारिता, अंदरूनी गैंगवार से ग्रस्त महाराष्ट्र पुलिस को रघुवंशी जैसे अफसरों की जरूरत है। अफसोस कि ऐसे अफसरों की हौसला अफजाई के बजाय उन्हें हतोत्साहित और अपमानित किया जा रहा है।

Friday, 12 March 2010

If you hate "Hate Politics"

Dear Friend,

I am disturbed with too much of hate politics around..We Indians are being fooled by selfish politicians on the basis of religion, language, region, caste & so on….and this is happening at a time when our countrymen need to unite themselves against external threats. Such hate preachers seem to be successful in their campaign & are becoming stronger with the time. If we want our nation to survive, such elements need to be contained. I & like minded friends have decided not to keep quiet & have a long term plan of reactionary movement against the hate preachers. We need people from varied fields like media, law, administration, corporates, education to join us & create a force. Ex-personnels from Police, army & intelligence agencies can also add great strength to the movement by joining us. Tentatively we have named our organization as Unite India Force. (UIF). UIF would initially begin as a youth organization from & would gradually transform into a political party spreading across other areas of the nation. The philosophy of UIF, its agenda, mode of operation, its constitution will evolve with the time. Our organization will not hesitate to confront the hate preachers by their own means..but that will be the last resort.

If above words make sense to you & you feel that you can do something against the hate campaign by joining us then please do get in touch with me to inform your affirmation.

Even, if you disagree, you are welcome to express your views. Those friends who are presently working with governmental agencies & cant join UIF like police, intelligence, para-military forces, but want to support the movement can do so without formally putting their names on the membership rolls. Thank you.

Jai Hind.

Jitendra Dixit

E-mail: starnews79@gmail.com & jitendradixit@rediffmail.com

Blog: www.jitendradiary.blogspot.com (The No Nonsense Blog)

Networking sites: Facebook & Orkut

Wednesday, 10 February 2010

खेल बयानों का....

सब बयानों का ड्रामा चल रहा है। मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने उदधव ठाकरे की सुरक्षा हटाने की धमकी दी और पलटवार करते हुए उदधव ने खुद ही सुरक्षा वापस करने का ऐलान किया…लेकिन ठाकरे के बंगले के सामने सारी हकीकत साफ हो जाती है। एक भी पुलिसकर्मी को हटाने का आदेश सरकार ने नहीं दिया है और न ही उदधव ठाकरे ने अपनी सुरक्षा में लगे किसी पुलिसकर्मी को घर से निकल जाने को कहा है। ठाकरे के घर के इर्द गिर्द का इलाका आज भी हमेशा की तरह एक छावनी लग रहा है।

Tuesday, 9 February 2010

बडा तरस आ रहा है पुलिसवालों पर।

बडा तरस आ रहा है पुलिसवालों पर। बीते गुरूवार मुंबई पुलिस के 59 वर्षीय कमिश्नर डी. शिवानंदन को राहुल गांधी के पीछे भागते देखा। उनके साथ ज्वाईंट कमिश्नर से लेकर कांस्टेबल तक कई पुलिसकर्मी इस प्रयास में जुटे थे कि शिवसैनिक राहुल के कार्यक्रम में अडचन डालने के अपने मंसूबे में कामियाब न हो पायें। अब खबर आई है कि शाहरूख खान की फिल्म माई नेम इज खान के रिलीज में शिवसैनिक रूकावट न डाल सकें इसके लिये मुंबई पुलिस ने अपने कर्मचारियों की साप्ताहिक छुट्टी (वीकली औफ) रद्द कर दिया। एक तो पुलिसकर्मी वैसे ही तमाम तरह के दबावों में रहते हैं उसपर इस तरह के राजनीतिक ड्रामों की वजह से उनकी हालत और भी खराब हो जाती है। ठाकरे पिता-पुत्र का अपनी पार्टी को जिंदा रखना है, राहुल गांधी को अपनी इमेज बनानी है और शहरूख खान को अपनी फिल्म चलवानी है… ऐसे में एक पुलिस वाला मरे क्या न करे..लोकतंत्र को बचाने की जिम्मेदारी उसी की लाठी पर है।
हर साल करीब डेढ दर्जन मुंबई पुलिस के कर्मचारी काम से जुडे दबाव की वजह से मरते हैं।

Wednesday, 27 January 2010

विदेश में फंसे दोस्त की मदद करने से पहले करो एक फोन

इंटरनेट के जरिये लोगों को ठगने वाले नाईजीरियाई बदमाशों ने अब निकाला है ठगी का नया तरीका। वे आपका ईमेल अकाउंट हैक करके आपकी एड्रेस बुक से तमाम लोगों को संदेश भेजते हैं कि आप विदेश में हैं, आपका बटुआ गुम हो गया है और मुसीबत से बचाने के लिये आपको एक बडी रकम ऑनलाईन भेजी जाये। जिसने भी इस संदेश पर यकीन किया उसके बैंक बैलेंस को जीरो होते देर न लगी। इन बदमाशों ने हाल ही में मालेगांव बम धमाके की आरोपी साध्वी प्रज्ञा सिंह और मराठी अखबार लोकसत्ता के संपादक कुमार केतकर के ईमेल अकाउंट हैक करके भी इसी तरह के संदेश भेजे।


एडवोकेट गणेश सोवानी फोन पर अपने दोस्तों और शुभचिंतकों को समझाते समझाते थक गये हैं कि वे भारत में ही हैं, लंदन में नहीं और न ही उन्हें पैसों की कोई जरूरत है। दरअसल मालेगांव बम धमाके की आरोपी साध्वी प्रज्ञा सिंह के वकील सोवानी का ईमेल अकाउंट किसी ने हैक कर लिया। हैक करने के बाद बदमाशों ने सोवानी के अकाउंट में जितने भी लोगो के ई मेल एड्रेस थे उन सब पर एक ईमेल भेजा। ईमेल में लिखा गया था – “ कैसे हैं आप। उम्मीद है आप और आपके परिवार में सब ठीक है। माफ कीजिये मैने आपको एक ट्रिप के लिये इंग्लैंड के सफर के बारे में नहीं बताया। मुझे आपसे एक मदद चाहिये क्योंकि मैं होटल जाते वक्त अपना पर्स भूल आया हूं। कृपया मुझे 3500 डॉलर्स का एक सॉफ्ट लोन दे दें ताकि मैं होटल के बिल चुका सकूं और वापस घर लौट सकूं। अगर आप मदद कर सकते हैं तो बताइये ताकि मैं पैसे किस तरह भिजवाने हैं उसका ब्यौरा भेज सकूं”

सोवानी ने तुरंत इसकी शिकायत ठाणे पुलिस की साईबर क्राईम सेल से कर दी। तहकीकात में पता चला कि दरअसल इस तरह के ई मेल कुछ नाईजीरियाई ठगों की ओर से रोजाना लाखों की तादाद में भेजे जा रहे हैं। ईमेल पाने वाला अगर मदद करने का इरादा रखता है तो उसे किसी विदेशी बैंक का अकाउंट नंबर दिया जाता है और उसमें ऑनलाईन पैसे ट्रांसफर करने को कहा जाता है। सोवानी के अकाउंट से ईमेल भेजने वालों का इरादा न केवल उनके शुभचिंतकों से 3500 डॉलर की रकम हासिल करना था बल्कि वे सोवानी के शुभचिंतकों का ऑनलाईन अकाउंट नंबर और पासवर्ड भी जान लेते। बेचारा शुभचिंतक सोवानी की मदद के इरादे से 3500 डॉलर तो अपनी मर्जी से देता ही उसके खाते की बाकी की रकम पर भी नाईजीरियाई ठग हाथ साफ कर देते।

गणेश सोवानी की तरह ही मराठी अखबार लोकसत्ता के संपादक कुमार केतकर का भी किसी ने ईमेल अकाउंट हैक कर लिया। केतकर के ईमेल से उनके तमाम शुभचिंतकों को संदेश भेजा गया कि वे विदेश में फंस गये हैं और उन्हें पैसों की जरूरत है। उन्होने भी साईबर क्राईम सेल के पास शिकायत दर्ज कराई है।

इस तरह के मामलों की तहकीकात भी टेढी खीर है क्योंकि आरोपी किसी दूसरे देश में होते हैं, बैंक अकाउंट किसी दूसरे देश का होता है और इसमें कई विदेशी एजेंसियों की मदद लगती है।

जानकारों के मुताबिक इस तरह के फ्रॉड से बचने का एकमात्र तरीका है अपने ईमेल पासवर्ड की सुरक्षा। अगर आप साईबर कैफे किसी ऐसे कंप्यूटर पर अपना ईमेल चैक कर रहे हैं जिसपर कई लोग काम करते हैं तो सावधान रहिये। संदेहास्पद ईमेल के जरिये भी अगर आपसे आपका पासवर्ड मांगा जा रहा है तो न दें।

ईमेल ने हमारी जिंदगी आसान और सुविधाजनक तो बनाई है, लेकिन इस दुनिया में कई ऐसे लुटेरे भी घूम रहे हैं जो कि आपकी जरा सी लापरवाही पर आपको कंगाल बना सकते हैं।

Tuesday, 12 January 2010

मुंबई में अब कोई नहीं एनकाउंटर स्पेशलिस्ट

प्रदीप शर्मा की गिरफ्तारी के बाद अब मुंबई पुलिस में कोई एनकाउंटर स्पेशलिस्ट अफसर नहीं बचा है। मुंबई पुलिस को अपने जिन एनकाउंटर स्पेशलिस्टों पर कभी फख्र हुआ करता था वही आज उसकी बदनामी के सबसे बडे कारण बने हैं। शर्मा के अलावा हर एनकाउंटर स्पेशलिसट अफसर किसी न किसी आपराधिक मामले में फंसकर फर्स से बाहर हो गया।


विजय सालस्कर: 26-11-2008 को मुंबई पर हुए आतंकी हमले में शहीद हुए विजय सालस्कर ही एकमात्र ऐसे एनकाउंटर स्पेशलिस्ट अफसर थे जिनके खिलाफ उनकी मौत के वक्त कोई बडा आपराधिक मामला नहीं चल रहा था। फर्जी एनकाउंटरों के आरोप सालस्कर पर भी लगे थे, लेकिन गिरफ्तारी की नौबत कभी नहीं आई थी....लेकिन बाकी एनकाउंटर स्पेशलिस्ट इतने खुशनसीब नहीं निकले।

दया नायक: विजय सालस्कर और प्रदीप शर्मा के बाद एनकाउंटर स्पेशलिस्टों पुलिसवालों की नस्ल में सबसे बडा नाम था दया नायक। साल 2005 में नायक और उनके 2 दोस्तों को आय से ज्यादा संपत्ति रखने का मामले में एंटी करप्शन ब्यूरो ने गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी के बाद से करीब 80 एनकाउंटर करने वाले दया नायक फिलहाल स्सपेंड कर दिये गये।

एसीबी ने नायक को गिरफ्तार तो कर लिया लेकिन उनके खिलाफ कोई चार्जशीट दायर नहीं की। महाराष्ट्र के पूर्व डीजीपी एस.एस.विर्क भी अपने रिटायरमेंट से पहले नायक को क्लीन चिट दे गये। नायक की बहाली होनी अभी बाकी है और उनके खिलाफ अब एक विभागीय जांच भी की

सचिन वाजे: दया नायक के अलावा प्रदीप शर्मा के दूसरे खास साथी थे सचिन वाजे। साल 2004 में सीआईडी ने सचिन वाजे को इस आरोप में गिरफ्तार कर लिया कि उन्होने हिरासत में बाकी पुलिस कर्मियों के साथ मिलकर घाटकोपर बमकांड के आरोपी ख्वाजा यूनुस की हत्या की साजिश रची और अपने गुनाह को छुपाने के लिये यूनुस के हिरासत से फरार होने की झूठी कहानी बनाई। ये मामला अब भी अदालत में चल रहा है।सस्पेंड होने के बाद सचिन वाजे ने पुलिस सेवा छोडने का ऐलान किया और वे अब शिवसेना से जुड गये हैं।

रवींद्र आंग्रे: एनकाउंटर स्पेशलिस्टों में एक और बडा नाम है रवींद्र आंग्रे का। आंग्रे ने मुंबई और ठाणे में कई मंचेकर गिरोह, चोटा राजन के गिरोह और अमर नाईक के गिरोह के कई बडे शूटरों कोएनकाउंटर में मारा। आंग्रे ठाणे पुलिस के सबसे तेज तर्रार पुलिस अधिकारी माने जाते थे, लेकिन साल 2007 में एक बिल्डर ने उनके खिलाफ धमाकाने और जबरन उगाही की शिकायत दर्ज कराई। बिल्डर की शिकायत पर आंग्रे को गिरफ्तार कर लिया गया। आंग्रे को करीब सालभर का वक्त जेल की सलाखों के पीछे गुजारना पडा। आंग्रे रिहा तो हो गये हैं, लेकिन उनका खिलाफ दर्जे आपराधिक मामला अब भी अदालत में चल रहा है और ये तय नहीं कि वे फिर से पुलिस महकमें में लौट पायेंगे या नहीं

चाहे वो प्रदीप शर्मा हों, दया नायक हो, सचिन वाजे हा या फिर रवींद्र आंग्रे.. ..इन सभी अफसरों ने मिलकर पिछले 20 सालों में करीब 500 कथित गैंगस्टरों को यमलोक पहुंचाया और करीब 3 बजार आरोपियों को सलाखों के पीछे भेजा...लेकिन जानकारों का मानना है कि अंडरवर्लड से लडाई लडते लडते ये अपनी मर्यादाएं भूल गये और यही इनके मौजूदा हश्र का कारण है।

इन अफसरों ने अंडरवर्लड के खिलाफ लडाई लड कर अपनी पहचान बनाई थी...लेकिन अब मुंबई पुलिस की प्राथमिकता अंडरवर्लड नहीं बल्कि आतंकवाद है। इसी वजह से आला पुलिस अफसरों की नजर में इन एनकाउंटर स्पेशलिस्टों की अहमियत भी कम हुई है।

Monday, 11 January 2010

अंडरवर्लड : गोलियों की जुबान से गालिब की जुबान तक

गोलियों, गालियों और धमकी की जुबान बोलने वाली डी कंपनी का एक गुर्गा इन दिनों बोल रहा है शेर-ओ-शायरी और कविताओं की जुबान। दाऊद इब्राहिम गिरोह से ताल्लुक रखने वाले इस शख्स ने जेल की सलाखों के पीछे कैद रहकर तैयार किया है एक कविता संग्रह। डॉन के गुर्गे ने शायरियों और कविताओं के जरिये नैनो कार और जेल की जिंदगी से लेकर रोमांस और कॉमेडी तक पर अपनी कलम चलाई है।


अंडरवर्लड की जुबान यानी कि मौत की जुबान, धमकी की जुबान, गालियों की जुबान...लेकिन अंडरवर्लड से जुडा होने का आरोपी ये शख्स इन दिनों बोल रहा है मिर्जा गालिब की जुबान...शेर-ओ-शायरी की जुबान। ये शख्स है दाऊद इब्राहिम गिरोह का कथित सदस्य रियाज सिद्धिकी। एक कविता इसने अपनी जेल की जिंदगी पर लिखी है-


तकदीर का देखो खेल कि भईया आ गये हम तो जेल

जेल के किस्से क्या क्या बताएं, जेल तो भईया जेल

बडे बडो की यहां पर आके हो जाती है बुद्धि फेल

एक बार जो हत्थे चढा इसके फिर पता न कब होगी बेल

तकदीर का देखो खेल कि भईया आ गये हम तो जेल



सलाखों के पीछे की अपनी जिंदगी को तो रियाज ने इस कविता के जरिये तो बयां किया ही है, जेल के बाहर की जिंदगी पर भी उसने कविताएं लिखीं हैं जैसे कि नैनो कार लांच के वक्त लिखी ये कविता-

देख जमाना बदला देख, टाटा का निर्माण तो देख

इस महंगाई के मौसम में, एक लाख की नैनो देख

बरसों से ये ख्वाब था सबका, ख्वाब हुआ अब पूरा देख

ख्वाबों की ताबीर है नैनो, एक नया फिर ख्वाब तो देख



दाऊद के इस गुर्गे रियाज ने रोमांस पर भी अपनी कलम आजमाई है जैसे “याद में उसकी” नाम की ये कविता-

हम कैद में भी नगमा गर हैं याद में उसकी

बहला रहे हैं दिल को फक्त याद में उसकी

हर सुबह नई आस, नई सोच, नया जोश

हर शाम बुझा दिल है फकत याद में उसकी
रियाज सिद्धिकी 1993 के मुंबई बमकांड में टाडा का आरोपी है। संजय दत्त को जो ए.के.56 राईफल अबू सलेम ने कथित तौर पर दी थी उस वक्त रियाज सिद्धिकी भी साथ था। मई 2003 में दुबई से डीपोर्ट होने के बाद उसे सीबीआई ने गिरफ्तार कर लिया था। तब से रियाज आर्थर रोड जेल में है और वही अक्सर कविताएं लिखता है।


रियाज ने जेल से अपनी रिहाई के इंतजार में भी “कैदी परिंदे” नाम की एक कविता लिखी है-

कैदी परिंदे पिंजरे में ये गाते हैं

कब छूटेंगे मौसम बीतते जाते हैं

फिरसे टूट कर रोने की रूत आई है

फिरसे दिलों के घाव ये बढते जाते हैं

वैसे डी कंपनी का शेरो शायरी से लगाव पहले भी रहा है। दाऊद का मृत भाई नूरा फिल्मों के लिये गाने लिखता था। दाऊद का दाहिना हाथ छोटा शकील ने भी भले ही अपने शूटरों की गोलियों से कईयों को ढेर करवाया हो, लेकिन अपनी माशूकाओं को खुश करने के लिये वो गालिब की भाषा यानी शेरो शायरी का इस्तेमाल करता है..

Monday, 4 January 2010

डॉन के पालतू...

अंडरवर्लड डॉन छोटा राजन के गुर्गों के साथ पार्टी में रंगरलियां मनाने वाले एसीपी प्रकाश वाणी पर पहले भी गैंगस्टरों से रिश्तों के आरोप लग चुके हैं और उनपर कार्रवाई भी हुई है। इस बार वाणी फिर एक बार पकडे जाने पर निलंबित हुए हैं। वाणी पर तो कार्रवाई हुई है, लेकिन वाणी की तरह ही महाराष्ट्र के पुलिस महकमें और दूसरी एजेंसियों के कई लोग वर्दी में रहकर अंडरवर्लड की काली दुनिया के लिये काम करते आये हैं।

एसीपी प्रकाश वाणी की वर्दी रहेगी या जायेगी ये उस जांच की रिपोर्ट के बाद तय होगा जो कि मुंबई पुलिस की क्राईम ब्रांच कर रही है। वाणी पर 25 दिसंबर को चेंबूर के एक क्लब में छोटा राजन के गुर्गे डी.के राव और फरीद तनाशा जैसे गु्र्गों के साथ शराब पीकर नाचने का आरोप है। वैसे अंडरवर्लड के साथ रिश्तों को लेकर वाणी पर लगा ये कोई पहला आरोप नहीं है। 1998 में मुंबई के त्तकालीन पुलिस कमिश्नर रोनी मेंडोंसा ने भी अंडरवर्लड से वाणी के रिश्तों की शिकायत मिलने पर उनका तबादला मुंबई के बाहर करवा दिया था। उस वक्त इंस्पेक्टर रैंक के वाणी के तबादले का आदेश तो आ गया ,लेकिन वाणी राजनीतिक दबाव डलवा कर संयुक्त राष्ट्र के मिशन के लिये कोसोवो चले गये। जब वाणी की वापसी हुई तो उनपर लगे आरोपो को नजरअंदाज करते हुए उन्हें एसीपी बना दिया गया।

गौर करने वाली बात है कि क्राईम ब्रांच सिर्फ इस बात की जांच कर रही है कि एसीपी प्रकाश वाणी उस पार्टी में थे या नहीं। ये जांच कई अहम सवालों को नजरअंदाज कर रही है जैसे कि एसीपी प्रकाश वाणी के छोटा राजन गिरोह से रिश्ते किस तरह के रहे हैं। गिरोह के लिये उसने क्या क्या काम किये..गिरोह के कितने दुश्मनों को फर्जी मामलों में फंसाया...गिरोह के कितने शूटरों के मामले कमजोर करवाये और इसके एवज में छोटा राजन का गिरोह प्रकाश वाणी को कितने पैसे देता था। वैसे राजन ही नहीं डॉन दाऊद इब्राहिम ने भी कई पुलिसकर्मियों को अपना पालतू बना रखा था और उनका खूब इस्तेमाल भी किया।
दाऊद इब्राहिम ने पैसों के दम पर मुंबई पुलिस के हथियारखाने में काम करने वाले एक कांस्टेबल राजेश इगवे उर्फ राजू को अपने गिरोह में शामिल कर लिया था। इगवे को एके-47 जैसे हथियार चलाने आते थे। दाऊद ने इगवे का इस्तेमाल न केवल अपने शूटरों को संजय गांधी नेशनल पार्क में ट्रेनिंग देने के लिये करता था, बल्कि उसे एक मिशन भी सौंप रखा था। ये मिशन था शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे, मुंबई पुलिस के पूर्व कमिश्नर एम एन सिंह और ज्वाइंट कमिश्नर की हत्या का... पर इससे पहले कि इगवे अपने मिशन में कामियाब हो पाता 17 नवंबर 1995 को पुलिस के साथ हुई मुठभेड में वो मारा गया। 12 मार्च 1993 को मुंबई में हुए बम धमाकों के लिये भी आरडीएक्स भी दाऊद गिरोह ने 5 पुलिसकर्मियों और एक कस्टम अधिकारी एसएन थापा को रिश्वत देकर उतरवाया था। इस मामले में मुंबई की विशेष टाडा अदालत ने पांचो पुलिसकर्मियों और थापा को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी।

मुंबई पुलिस का ध्येय वाक्य है सदरक्षणाय, खल निग्रहणाय यानी अच्छों की रक्षा और बुराई का खात्मा... लेकिन पुलिस वाले जब खुद ही गुनहगारों के कंध से कंधा मिलाकर चलते नजर आयें तो ये ध्येय वाक्य किसी मजाक से ज्यादा कुछ नहीं है।