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Monday, 11 March 2019

Still Undecided : किसे वोट दूं? Whom to vote? An objective analysis of Modi Govt.


मैं वोट किसे दूं ?
(An objective analysis of Modi government’s tenure by an urban, middle class Hindu)

न मैं बीजेपी का कार्यकर्ता हूं, न कांग्रेस का। न तो मैं मोदीभक्त हूं और न ही उनका अंधविरोधी। मैं एक आम मध्यमवर्गीय, शहरी, नौकरीपेशा शख्स हूं। मैं आस्थावान हिंदू हूं और मुझे हिंदू परिवार में जन्म लेने पर गर्व है। मैं दूसरे धर्म और उनके मानने वालों का आदर करता हूं लेकिन समुदाय विशेष के तुष्टीकरण के भी खिलाफ हूं। अयोध्या में भव्य राम मंदिर बने या नहीं (मंदिर तो जन्मभूमि पर अभी भी है) मुझे इससे मतलब नहीं। मैं सप्ताह में एक बार घर के पास वाले मंदिर में अपने आराध्य की प्रतिमा के सामने कुछ वक्त बिता लेता हूं, यही मेरे लिये पर्याप्त है। कश्मीर में धारा 370 रहे या हटे इससे मेरे जीवन में कोई फर्क नहीं पडता। चूंकि चुनाव की तारीख आ गई है और मुझे तय करना है कि इस बार किसे वोट दिया जाये तो मैने नापतौल शुरू की है कि बीजेपी फिर एक बार सत्ता में आनी चाहिये या नहीं। जुमले, लुभावने वादे, आरोप-प्रत्यारोप हर राजनीतिक पार्टी चुनाव से पहले करती है। मैं जानता था कि 15 लाख खाते में आने की बात सिर्फ चुनावों के लिये है। मैंने कभी इसे सच नहीं माना और न ही उम्मीद की। बीजेपी ने कश्मीर में अलगावादियों का समर्थन करनेवाली पीडीपी के साथ सरकार बनाई, इससे भी मुझे मतलब नहीं। इन सबको फिल्टर करके सीधे सीधे उन मुद्दों के आधार पर फैसला लेना है कि जिनसे मेरे जीवन पर असर पडता हो या जिनमें मैं दिलचस्पी रखता हूं। फिलहाल बीजेपी सरकार के कार्यकाल के सकारात्मक और नकारात्मक फैसलों के आधार पर ये आत्ममंथन शुरू कर रहा हूं। लिस्ट में आने वाले दिनों में मुद्दे जुडते जायेंगे। आप भी अपनी राय देते जाईये। जिन बिंदुओं पर मैं लिख रहा हूं वे सिर्फ चुनाव के चंद महीनों पहले लिये गये फैसलों पर ही नहीं, बल्कि पूरे 5 साल के कार्यकाल से जुडे हैं।

सकारात्मक
+देश में इंफ्रास्ट्रकचर से जुडे कई काम , तेज रफ्तार से काम।
कांग्रेस के शासन में भी इंफ्रा से जुडे कई बेहतरीन काम हुए हैं। अगर मुंबई की ही बात करें तो बांद्रा-वर्ली सीलिंक, इस्टर्न फ्रीवे, मेट्रो लाईन वन ये सब कांग्रेस की ही देन हैं, लेकिन इस मामले में बीजेपी का पलडा कांग्रेस से भारी है। मुंबई समेत देश के कई शहरों में मेट्रो ट्रेन का जाल बिछाया जा रहा है, चौडी सडकें बनाईं जा रहीं हैं, 6 और 8 लेन के हाईवे से बडे शहरों को जोडा जा रहा है, छोटे शहरों को हवाई जहाज से जोडा जा रहा है, जल यातायात शुरू किया जा रहा है। रेल सेवाओं में भी बडे सकारात्मक परिवर्तन हो रहे हैं। ये सभी काम तेज रफ्तार से हो रहे हैं। हालांकि, बुलेट ट्रेन के लिये मुंबई-अहमदाबाद के रूट का चयन गलत है, लेकिन फिर भी देश को तेज गति यातायात का नया माध्यम मिल रहा है, ये बात स्वागत योग्य है।

+कश्मीर के बाहर कोई आतंकी हमला नहीं।
ये गौर करने वाली बात है कि बीते 5 सालों में जम्मू-कश्मीर को छोडकर देश के बाकी हिस्सों में कोई बडे आतंकी हमले नहीं हुए जिनमें आम नागरिकों की जान गई हो। नक्सलवाद लेकिन अभी भी बडी चुनौती है।

+दुश्मन को संदेश शब्दों के बजाय बारूद से।
जब भी पाकिस्तान समर्थित दहशतगर्द हमारे सशस्त्र बलों पर हमला करते थे तो हमें ये सुनने की आदत पड गई थी – हम कडी निंदा करते हैं...हम करारा जवाब देंगे वगैरह लेकिन बीजेपी सरकार शाब्दिक हमलों से आगे गई। बीजेपी सरकार के कार्यकाल में 2 बार ऐसे मौके आये जब देश के नागरिकों ने देखा कि हमारे सैनिकों ने दुश्मन के इलाके में घुसकर कार्रवाई की।पुलवामा कांड के बाद हुई एयर स्ट्राईक में दहशतगर्द मरे या नहीं, इसपर विवाद है, लेकिन मेरे लिये ये जान लेना ही संतोषजनक है कि सरकार ने सेना को बॉर्डर पार करने की इजाजत दी और हमने दुश्मन को ये संदेश दिया कि जरूरत पडने पर हम तुम्हारे अंगने में भी आ सकते हैं। बीजेपी जरूर इसे चुनावी फायदे के लिये भुना रही है, लेकिन एयर स्ट्राईक का फैसला मेरी नजर में काबिले तारीफ है।   

+कूटनीति में कामियाबी।
मोदी की विदेश यात्राओं की निंदा होती रही है, लेकिन इनसे अगर हमारे देश को कूटनातिक फायदे हो रहे हों तो इनपर मुझे कोई ऐतराज नहीं।
मुझे लगता है कि देश इन सालों में कूटनीतिक स्तर पर काफी मजबूत हुआ है। आतंकवाद के मुद्दे पर भारत को दुनिया के कई बडे देशों का साथ मिला है। पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान के अलग थलग पडने और पायलट अभिनंदन के वापस भारत जीवित लौट पाने को मैं ऐसी ही एक उपलब्धि मानता हूं।

+स्वच्छ भारत और योगा डे जैसी मुहीम।
निश्चित तौर पर इन मुहीमों का फायदा हुआ है। सफाई के प्रति लोगों में जागृति फैली है। खुले मैं शौच कम हुई है। सार्वजनिक शौचालय बढ रहे हैं। योगा डे जैसे आयोजनों ने भी लोगों को सेहत के प्रति जागरूक किया है। मैं व्यकितगत तौर पर कई ऐसे लोगों को जानता हूं जिन्होने इस मुहीम से प्रभावित होकर योग को अपने जीवन का हिस्सा बनाया। आज दुनिया के कई देशों के लोग योग सीख रहे हैं (पहले भी सीखते थे, लेकिन बीते 5 सालों में योग के प्रति जागृति बढी है।)

+भ्रष्टाचार पर लगाम।
भ्रष्टाचार के मामले में मोदी सरकार को क्लीन चिट तो नहीं दी जा सकती, लेकिन इतना जरूर है कि बडे स्तर पर भ्रष्टाचार पर लगाम लगी है, विशेषकर अगर यूपीए के कार्यकाल से तुलना की जाये तो मौजूदा सरकार साफ सुथरी नजर आती है। दूसरी बात ये है कि भ्रष्टाचार खत्म करने की सरकार की नीयत तो है, लेकिन अधिकारी-कर्मचारी वर्ग उसपर अमल नहीं होने देते...ऊपरी कमाई का रास्ता निकाल ही लेते हैं। आम आदमी को अब भी सरकारी कामकाज के दौरान भ्रष्टाचार का सामना करना पडता ही है।

नकारात्मक

नोटबंदी-
जिस तरह इमरजेंसी को इंदिरा गांधी का सबसे गलत फैसला माना जाता है, उसी तरह से मैं नोटबंदी को मोदी का सबसे गलत फैसला मानता हूं। कुछ लोगों के टैक्स नेट में आने से ज्यादा नोटबंदी से कुछ भी ठोस हासिल नहीं हुआ। न आतंकवाद पर लगाम लगी, न काले धन पर। उलटे छोटे आकार के बडे मूल्य वाले नोट जारी करके सरकार ने कालाधन छुपाना भौतिक तौर पर और आसान ही कर दिया। बेवजह लोगों को अपने ही पैसे के लिये घंटों कतार में खडे रहना पडा। कई लोगों की बेवजह मौत हो गई। नोटबंदी गलत थी। मगरमच्छ पकडने के लिये तालाब सुखाया। मगरमच्छ तो मिला नहीं, मछलियां नाहक मारीं गईं। नकदी पर चलने वाले कई छोटे कारोबारों की कमर टूट गई और ये आज तक उबर नहीं पाये हैं।

बैंकों को लूट की आजादी-
नोटबंदी के बाद अथाह पैसा बैंकों में आया। ऐसे में बैंकों को अपने ग्राहकों को कई तरह की रियायतें देनी चाहिये थीं। हुआ इसका उलटा। बैंकों ने अपने ग्राहकों पर तमाम तरह के चार्ज लाद दिये। बैंक के तमाम लेनदेन पर अब आपको ट्रांसेक्शन चार्ज, सर्विस चार्ज, कनविनियंस चार्ज तो चुकाना है ही, इनपर सेवा कर भी चुकाना है। बैंक में खुद का पैसा डालने या निकालने के लिये अब आपको कीमत चुकानी पडती है। सिस्टम भी ऐसा बन गया है कि बिना बैंक के आप किसी तरह का लेन देन कर ही नहीं सकते। ऐसे में बैंक ग्राहकों को बेधडक लूट रहे हैं। एक मध्यमवर्गीय व्यकित के लिये ये तकलीफदेह है।

डिजिटल इंडिया या दर्दनाक इंडिया?
मोदी सरकार ने डिजिटल इंडिया का नारा तो दिया, लेकिन उसपर अमल करने के लिये जो कुछ करना चाहिये था वो पर्याप्त तौर पर नहीं किया। देश के बडे हिस्से में आज भी इंटरनेट उपलब्ध नहीं है। शहरी इलाकों में 4जी होने के बावजूद इंटरनेट पर भरोसा करना मुश्किल है। पीएम मोदी के डिजिटल इंडिया के नारे की कैसी धज्जियां उड रहीं हैं, इसकी एक बडी मिसाल महाराष्ट्र में देखने मिल रही है।महाराष्ट्र में संपत्ति के खरीद फरोख्त की रजिस्ट्री के लिये जो सब रजिस्ट्रार के केंद्र हैं, वे महीने में करीब 15 दिन बंद रहते हैं।
इसके पीछे कारण है कि इन केंद्रों का सर्वर डाऊन हो जाता है, जिसकी वजह से रजिस्ट्रेशन का काम नहीं हो पाता। कई बार नेटवर्क न मिलने की वजह से सिस्टम बंद हो जाता है।
इस वजह से अपने घर की रजिस्ट्री कराने वाले लोगों को खासी दिक्कतों का सामना करना पडता है। कई बार लोग पूरा दिन सब रजिस्ट्रार ऑफिस में इस उम्मीद में गुजार देते हैं कि सर्वर शुरू हो जायेगा, लेकिन अपना काम करवाने के लिये उन्हें कई दिन यहां के चक्कर लगाने पडते हैं। नौकरीपेशा लोग अपने दफ्तर से छुट्टी लेकर यहां आते हैं, लेकिन उनका दिन बर्बाद जाता है। बुजुर्ग नागरिकों और महिलाओं को भी काफी दिक्कतें होती हैं क्योंकि य़हां उनके बैठने के लिये पर्याप्त इंतजाम नहीं हैं। ये सबकुछ उस जनता को भुगतना पडता है जो कि घर खरीदने पर उसकी कीमत का 6 फीसदी बतौर स्टांप ड्यूटी सरकार को चुकाती है और 30 हजार रूपये बतौर रजिस्ट्रेशन शुल्क अदा करती है। इतना पैसा सरकार को अदा करने के बाद भी उसे मिलती है काम होने की अनिश्चितता, घंटों का इंतजार, रजिस्ट्री दफ्तर के कई बार चक्कर और असुविधा। मुंबई से 150 किलोमीटर दूर धसई गांव को देश के पहले डिजिटल लेनदेन वाले गांव के तौर पर प्रचारित किया गया था। आज वहां डिजिटल लेनदेन सिर्फ इक्का-दुक्का दुकानदार ही करते हैं। बैंकों की ओर से लोगों को डिजिटल लेनदेन के लिये प्रोत्साहन मिलना चाहिये था, उसके बजाय उन्होने भारी भरकम चार्ज लगाकर लोगों को हतोत्साहित किया।

टैक्स की टेंशन-
अब तक लोग स्टॉक मार्केट में अपनी जमापूंजी SIP या Mutual Funds में ये सोचकर लगाते थे कि लंबी अवधि के लिये किये गये निवेश पर टैक्स नहीं लगेगा। मध्यमवर्गीयों के लिये अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने का ये अच्छा माध्यम था, लेकिन बीजेपी सरकार ने Long Term Capital Gain Tax लगाकर ये मौका भी उनसे छीन लिया। दूसरी अहम बात ये है कि अब इनकम टैक्स विभाग नौकरीपेशा और छोटी आय वाले लोगों को भी नोटिसें भेजकर तंग करता है। पहले ऐसा नहीं होता था।

बडे उद्योगपतियों को फायदा-
एक ओर जहां मध्यमवर्गीय लोगों की जेब पर मार हुई है तो वहीं ये नजर आता है कि सरकार अंबानी और अडानी जैसे उद्योगपतियों पर मेहरबान रही है। सरकार की नीतियां और फैसले चंद अरबपतियों को और ज्यादा अमीर बनने में मदद कर रहे हैं। राफेल के जरिये अनिल अंबानी को फायदा पहुंचाने की कोशिश हुई या नहीं ये भी एक सवाल है। मोदी प्रिय एक उद्योगपति की वजह से बाकी सारी टेलिकॉम कंपनियों के बुरे हाल हैं।

भगवाधारी गुंडों का नंगा नाच-
मोदी सरकार आने के बाद कईयों को ऐसा लगने लगा कि सईंया भये कोतवाल तो अब डर काहे का। गोहत्या या राष्ट्रवाद के नाम पर हिंसा करने वाले लोग बैखौफ हो गये हैं। ये ऐसे भस्मासुर हो गये हैं जो अब सरकार से भी संभाले नहीं संभल रहे। सांप्रदायकिता का जहर फैलाने वाले, हिंदू-मुसलिम दंगा भडकाने वाले लोगों के लिये ये एक तरह से स्वर्णकाल था। ये उसी नस्ल के लोग हैं जिन्होने पुलवामा हमले के बाद देश के अलग अलग हिस्सों में बेगुनाह कश्मीरियों को निशाना बनाया। इन बेवकूफों को ये नहीं मालूम कि अगर कश्मीर हमारा है तो कश्मीरी भी हमारे ही हैं।

कश्मीर की समस्या बिगडी-
बीते 5 सालों में कश्मीर में समस्या और ज्यादा बिगडी नजर आती है। पत्थरबाजों की तादाद बढी है। सुरक्षाबलों पर हमले बढे हैं। ऐसा नहीं है कि सरकार ने हालात को सुधारने के लिये कोशिशें नहीं कीं। कश्मीर में जब बाढ आई थी तब सरकार से जो भी उम्मीद थी, सरकार उसपर खरी उतरी, लेकिन इसके बावजूद हालात 5 साल पहले जैसे थे, आज उससे खराब हैं।

मीडिया का पतन-
इस सरकार के कार्यकाल ने ये भी देखा। जिसने सत्ता का गुणगान नहीं किया उसके प्रति साम, दाम, दंड, भेद सबका इस्तेमाल करके उसे लाईन पर लाया गया। लिखने को काफी कुछ है, लेकिन चूंकि इसी इंडस्ट्री से जुडा हूं इसलिये सीमाएं हैं और छोटे में बडी बात बोल रहा हूं।

इस सकारात्मक और नाकारात्मक लिस्ट में शामिल होने लायक कई और भी मुद्दे हैं जैसे शिक्षा, रोजगार, महंगाई, तेल की कीमत, आंकडों का छुपाया जाना वगैरह जो आने वाले दिनों में जुडते जायेंगे। अब ये पढकर आप सुझाव दीजिये कि किसे वोट दिया जाये और क्यों?