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Tuesday, 31 December 2013

A Brief Review of "Dalit Millionaires" (by Milind Khandekar)

A fresh and positive way to begin the new year is to read this book, especially for those who feel that they are victim of circumstances and life has been unfair to them. With 15 interesting case studies, the book inspires to deal with life head on, brave the hostilities and have a positive approach towards life. The book is about those people who started their life with a scratch and made it big with their attitude and hardwork. Every page of the book generates feeling of optimism and inner strength. Translated in simple English, anybody with basic knowledge of the language can read it without referring to a dictionary. It is also like a guide book for aspiring businessmen. Reading this book is a delight for non fiction book buffs & also an antidote for those who are feeling low in life. The book is originally written in Hindi and has been translated in English.

Tuesday, 24 December 2013

भावनाओं से परे...बदल रही है राज ठाकरे की एमएनएस।

सियासत की जुबान सिर्फ शब्दों की नहीं होती है। इसे समझने के लिये शब्दों के बीच दिये जाने वाले संकेतों को पकडना होता है। बिना कहे की जाने वाली हरकतों पर गौर करना पडता है। बीते चंद दिनों से ऐसे ही कुछ इशारे दे रही है राज ठाकरे की पार्टी एमएनएस। आक्रमक मराठी मुद्दे को अपनाकर महाराष्ट्र की सियासी जमीन पर अपने कदम जमाने वाली एमएनएस बदलती नजर आ रही है। वक्त के साथ पुराने मुद्दे पर नरम रवैया अख्तियार करके नये मुद्दों की ओर बढती नजर आ रही है।

क्या हैं बदलाव के संकेत?
बीते सोमवार को राज ठाकरे ने अमिताभ बच्चन को अपनी पार्टी के कार्यक्रम में बुलाया और उनके साथ मंच साझा किया। दोनो ने एक दूसरे की तारीफ की। राज ठाकरे ने बच्चन के साथ अपनी पुरानी कटुता गंगा में बहा देने का ऐलान किया। उनकी हिंदी पर पकड की प्रशंसा की। अगर इस एक कार्यक्रम की मिसाल देकर मैं ये कहने लगूं कि राज ठाकरे अब मराठी के मुद्दे पर नरम पड गये हैं या उत्तर भारतियों से उनका परहेज खत्म हो गया है तो जाहिर तौर पर ये जल्दबाजी होगी। हाल के वक्त में कुछ और भी ऐसी गतिविधियां एमएनएस की ओर से हुईं हैं जो यही इशारा करतीं हैं कि राज ठाकरे अपनी पार्टी के लिये नई दिशा तय कर रहे हैं। बीते अक्टूबर में एनसीपी के उत्तरभारतीय मूल के नेता नवाब मलिक के भाई कप्तान मलिक ने दर्जनों उत्तरभारतियों के साथ एमएनएस की सदस्यता ली। उसके बाद कांदिवली इलाके में भी सैकडों उत्तरभारतीय एमएनएस में शामिल हुए। अपनी हालिया जनसभाओं और प्रेस कांफ्रेंसों में भी राज ठाकरे उत्तरभारतीयों पर निशाना साधने से बचे हैं। ये सब इसी ओर इशारा कर रहे हैं कि एमएनएस के लिये नई जमीन तैयार की जा रही है। राज ठाकरे सीधे तौर पर तो मराठी का मुद्दा नहीं छोड सकते, लेकिन ये कयास लगाये जा रहे हैं कि मराठी का मुद्दा आने वाले वक्त में उनकी पार्टी के लिये निष्क्रीय (Passive) मुद्दा रहेगा।

क्या हो सकता है नया एजेंडा? - भावनाओं की जगह ले सकता है विकास और भ्रष्टाचार।
अगर एमएनएस मराठी के मुद्दे पर नरम हो जायेगी तो फिर कौन से मुद्दे पर उसकी सियासत चलेगी? पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक नये एजेंडे को लेकर एमएनएस के भीतर विचार मंथन चल रहा है। ये उम्मीद बन रही है कि पार्टी 2007 में महाराष्ट्र के विकास के जिस मुद्दे को लेकर बनाई गई थी, उसी मुद्दे पर वापस लौट सकती है। कुछ ने ये भी सुझाव रखा कि अगर एमएनएस ने उत्तर भारतीय विरोध की नीति न अपनाई होती तो शायद पिछले विधानसभा चुनावों में उसकी सीटों की संख्या 13 से कहीं ज्यादा होती। 2007 में करीब 60 हजार उत्तर भारतियों ने एमएनएस का सदस्य बनने का आवेदन किया था। एमएनएस मराठी का राग अलापना कम करके अब भ्रष्टाचार और विकास जैसे मुद्दों को अपनाने की तैयारी में है इसके संकेत इस बात से भी मिले जब एमएनएस विधायक बाला नांदगांवकर की अगुवाई में पार्टी का एक प्रतिनिधिमंडल अन्ना हजारे के लोकपाल की खातिर किये गये अनशन का समर्थन करने के लिये रालेगण पहुंचा। एमएनएस टोल टैक्स हटाने और मुंबई की सडकों पर गड्ढे भरने को लेकर हुए भ्रष्टाचार के खिलाफ भी मुहीम चला चुकी है।

आप फैक्टर
पार्टी दिल्ली में आम आदमी पार्टी की कामियाबी का भी बारीकी से अध्ययन कर रही है। कैसे बिना भावनाओं को छुए, लोगों की जिंदगी से जुडे वास्तविक मुद्दों को उठा कर कम समय में ही ये सत्ता पर काबिज हो गई ? एमएनएस इस सवाल का जवाब तलाश रही है। आम आदमी पार्टी ऐलान कर चुकी है कि वो महाराष्ट्र में भी चुनाव लडेगी और ऐसे में वो एमएनएस की एक प्रतिद्वंदवी भी होगी।

क्या दोस्त के लिये साथ आयेंगे दुश्मन ?
चुनावों में अब ज्यादा वक्त नहीं है और भूतकाल में एमएनस की इमेज के मद्दे्नजर ये देखना दिलचस्प होगा कि एमएनएस अपने आप को किस तरह से बदलती है। बीते लोकसभा चुनाव में एमएनएस की वजह से ही बीजेपी-शिवसेना गठजोड के वोट कटे थे। अकेले मुंबई शहर की 6 लोकसभ सीटों पर बीजेपी-सेना का एक भी उम्मीदवार नहीं जीत सका। इस बार मामला जटिल है। बात उन नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की है जो राज ठाकरे और उदध्व ठाकरे दोनो के दोस्त हैं। एमएनएस ने अगर अपना पुराना रूख बरकरार रखा तो एनडीए की सीटें कम होने की आशंका है। ऐसे में सवाल यही है कि दोनो दुश्मन ठाकरे क्या अपने कॉमन फ्रेंड को प्रधानमंत्री बनाने के लिये साथ आयेंगे ?

Tuesday, 3 December 2013

शिवसेना की अंतर्कलह : क्योंकि हर आदमी का कोई खास आदमी होता है...



फिर कोई शिवसेना से अलग हुआ है और फिर वही एक नाम सामने आया है-मिलिंद नार्वेकर। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे के बाद जिसने भी शिवसेना छोडी उसने मिलिंद नार्वेकर को जरूर गरियाया। ताजा मामला है शिवसेना के पूर्व सांसद और दबंग नेता मोहन रावले का। इन्होने भी पार्टी से बाहर होने के पहले मिलिंद नार्वेकर की करतूतों का मीडिया के सामने भंडाफोड किया था। आखिर ये मिलिंद नार्वेकर है कौन जिसने महाराष्ट्र की सबसे ताकतवर सियासी पार्टियों में से एक शिवसेना के भीतर कोहराम मचा रखा है और जिसके बुरे बर्ताव का हवाला देकर कट्टर शिवसेना नेता भी पार्टी छोड रहे हैं ?

कहने को तो मिलिंद नार्वेकर शिवसेना के कार्याध्यक्ष उदध्व ठाकरे का निजी सहायक है, लेकिन वो पार्टी में बहुत कुछ है। 1996 में उदध्व से जुडा मिलिंद नार्वेकर शिवसेना की रैलियों में मंच पर भाषण नहीं देता, वो जनसभाएं नहीं लेता, वो चुनाव नहीं लडता, वो टीवी चैनलों की बहस में हिस्सा नहीं लेता, उसकी तस्वीरें अखबारों में नहीं छपतीं, वो कोई बयान नहीं जारी करता, वो शिवसेना के हिंसक आंदोलनों में हिस्सा नहीं लेता और न ही शिवसेना की ओर से शहर में उसके कभी बैनर पोस्टर लगाये गये, फिर वो इतना ताकतवर कैसे हो गया? इसे जानने के लिये राजनीति शास्त्र के उस हिस्से पर नजर डालनी पडेगी जो कॉलेजों में नहीं पढाया जाता है और पढाया भी जाता है तो शायद इसे REALPOLITIK का लेबल दिया जाता है। राजनीति में हर आदमी का कोई खास आदमी होता है। नरेंद्र मोदी का खास आदमी अमित शाह है, राहुल गांधी का खास आदमी कनिष्क सिंह है, सोनिया गांधी के खास अहमद पटेल हैं और उसी तरह उदध्व ठाकरे का खास आदमी मिलिंद नार्वेकर है। दरअसल, राजनीति के तमाम दिग्गज चेहरे अपने साथ एक ऐसे आदमी को रखते हैं, जो उनकी खातिर पंचिंग बैग या डस्टबिन का स्वेच्छा से काम करे। जो उस राजनेता की ओर से लिये गये कडवे फैसलों को उसके समर्थकों तक पहुंचाये और राजनेता को मिलने वाली गालियां खुद खाये। राजनेता अगर पार्टी के सदस्यों को खुश करे तो उसका श्रेय उसे खुद मिले, लेकिन उसके फैसलों से अगर कोई नाराजगी पैदा हो रही हो तो बिल इस खास आदमी पर फटे

ये आश्चर्यजनक है कि शिवसेना के मंझे हुए राजनेता मिलिंद नार्वेकर को गालियां देकर पार्टी छोड रहे हैं, लेकिन वे ये नहीं समझ पाये कि नार्वेकर तो उदध्व ठाकरे का ही बनाया हुआ है और वो उदध्व से बडा नहीं है। नार्वेकर की सारी ताकत उदध्व से ही आती है। कुछ सियायी समीक्षकों का कहना है कि मान लीजिये कि कल को नार्वेकर उदध्व ठाकरे से अलग हो जाये तो क्या उसकी हैसीयत एक नगरसेवक(पार्षद) के तौर पर चुने जाने की भी है? शिवसेना से अलग होकर क्या वो 50 लोगों की भी भीड जुटा सकता है? नहीं। मोहन रावले ने आरोप लगाया कि नार्वेकर की वजह से उसे सांसद रहते हुए उदध्व ठाकरे से आमने-सामने मुलाकात का वक्त पाने के लिये भी 4 साल लग गये...पर श्रीमान रावलेजी ये तो सोचिये कि आखिर एक ऐसा शख्स जो 1995 तक शाखाप्रमुख भी नहीं था, उसे शिवसेना के सांसद को एक छोटी सी मीटिंग के लिये 4 साल तक लटकाने का अधिकार किसने दिया? नार्वेकर जो भी करता है वो उदध्व ठाकरे की मर्जी से और उसकी जानकारी में करता है। वो ज्यादा से ज्यादा उदध्व के फैसलों पर अपनी राय रख सकता है, उन्हे बदल नहीं सकता और न तो उनपर अमल किया जाना रोक सकता है।  


अगर नार्वेकर को देखें तो वो महज अपनी नौकरी कर रहा है। जो उदध्व नार्वेकर को कहते हैं वो नार्वेकर करता है। चूंकि उदध्व के अप्रिय फैसलों को पार्टी में प्रसारित करने का काम नार्वेकर ही करता है इसलिये लोग उसे ही विलेन समझ बैठे हैं। ये तो उदध्व का ही बनाया गया सिस्टम है कि उनसे मिलने के लिये पार्टी नेताओं को नार्वेकर से संपर्क करना पडेगा। ये अलग बात है कि लोग नार्वेकर को उदध्व का करीबी मानकर उसे खुश करने की कोशिश में रहते है। जो नारायण राणे नार्वेकर को गालियां देकर शिवसेना छोड गये वो किसी वक्त में इसी नार्वेकर के अच्छे दोस्त हुआ करते थे। जो लोग नार्वेकर पर निशाना साध रहे हैं, वे लोग ऐसा करके शिवसेना की दुर्दशा के लिये अनजाने में उदध्व को उनकी जिम्मेदारी से बचा रहे हैं...आखिर उदध्व ने नार्वेकर को रखा भी तो इसी काम के लिये ही है।