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Tuesday, 24 December 2013

भावनाओं से परे...बदल रही है राज ठाकरे की एमएनएस।

सियासत की जुबान सिर्फ शब्दों की नहीं होती है। इसे समझने के लिये शब्दों के बीच दिये जाने वाले संकेतों को पकडना होता है। बिना कहे की जाने वाली हरकतों पर गौर करना पडता है। बीते चंद दिनों से ऐसे ही कुछ इशारे दे रही है राज ठाकरे की पार्टी एमएनएस। आक्रमक मराठी मुद्दे को अपनाकर महाराष्ट्र की सियासी जमीन पर अपने कदम जमाने वाली एमएनएस बदलती नजर आ रही है। वक्त के साथ पुराने मुद्दे पर नरम रवैया अख्तियार करके नये मुद्दों की ओर बढती नजर आ रही है।

क्या हैं बदलाव के संकेत?
बीते सोमवार को राज ठाकरे ने अमिताभ बच्चन को अपनी पार्टी के कार्यक्रम में बुलाया और उनके साथ मंच साझा किया। दोनो ने एक दूसरे की तारीफ की। राज ठाकरे ने बच्चन के साथ अपनी पुरानी कटुता गंगा में बहा देने का ऐलान किया। उनकी हिंदी पर पकड की प्रशंसा की। अगर इस एक कार्यक्रम की मिसाल देकर मैं ये कहने लगूं कि राज ठाकरे अब मराठी के मुद्दे पर नरम पड गये हैं या उत्तर भारतियों से उनका परहेज खत्म हो गया है तो जाहिर तौर पर ये जल्दबाजी होगी। हाल के वक्त में कुछ और भी ऐसी गतिविधियां एमएनएस की ओर से हुईं हैं जो यही इशारा करतीं हैं कि राज ठाकरे अपनी पार्टी के लिये नई दिशा तय कर रहे हैं। बीते अक्टूबर में एनसीपी के उत्तरभारतीय मूल के नेता नवाब मलिक के भाई कप्तान मलिक ने दर्जनों उत्तरभारतियों के साथ एमएनएस की सदस्यता ली। उसके बाद कांदिवली इलाके में भी सैकडों उत्तरभारतीय एमएनएस में शामिल हुए। अपनी हालिया जनसभाओं और प्रेस कांफ्रेंसों में भी राज ठाकरे उत्तरभारतीयों पर निशाना साधने से बचे हैं। ये सब इसी ओर इशारा कर रहे हैं कि एमएनएस के लिये नई जमीन तैयार की जा रही है। राज ठाकरे सीधे तौर पर तो मराठी का मुद्दा नहीं छोड सकते, लेकिन ये कयास लगाये जा रहे हैं कि मराठी का मुद्दा आने वाले वक्त में उनकी पार्टी के लिये निष्क्रीय (Passive) मुद्दा रहेगा।

क्या हो सकता है नया एजेंडा? - भावनाओं की जगह ले सकता है विकास और भ्रष्टाचार।
अगर एमएनएस मराठी के मुद्दे पर नरम हो जायेगी तो फिर कौन से मुद्दे पर उसकी सियासत चलेगी? पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक नये एजेंडे को लेकर एमएनएस के भीतर विचार मंथन चल रहा है। ये उम्मीद बन रही है कि पार्टी 2007 में महाराष्ट्र के विकास के जिस मुद्दे को लेकर बनाई गई थी, उसी मुद्दे पर वापस लौट सकती है। कुछ ने ये भी सुझाव रखा कि अगर एमएनएस ने उत्तर भारतीय विरोध की नीति न अपनाई होती तो शायद पिछले विधानसभा चुनावों में उसकी सीटों की संख्या 13 से कहीं ज्यादा होती। 2007 में करीब 60 हजार उत्तर भारतियों ने एमएनएस का सदस्य बनने का आवेदन किया था। एमएनएस मराठी का राग अलापना कम करके अब भ्रष्टाचार और विकास जैसे मुद्दों को अपनाने की तैयारी में है इसके संकेत इस बात से भी मिले जब एमएनएस विधायक बाला नांदगांवकर की अगुवाई में पार्टी का एक प्रतिनिधिमंडल अन्ना हजारे के लोकपाल की खातिर किये गये अनशन का समर्थन करने के लिये रालेगण पहुंचा। एमएनएस टोल टैक्स हटाने और मुंबई की सडकों पर गड्ढे भरने को लेकर हुए भ्रष्टाचार के खिलाफ भी मुहीम चला चुकी है।

आप फैक्टर
पार्टी दिल्ली में आम आदमी पार्टी की कामियाबी का भी बारीकी से अध्ययन कर रही है। कैसे बिना भावनाओं को छुए, लोगों की जिंदगी से जुडे वास्तविक मुद्दों को उठा कर कम समय में ही ये सत्ता पर काबिज हो गई ? एमएनएस इस सवाल का जवाब तलाश रही है। आम आदमी पार्टी ऐलान कर चुकी है कि वो महाराष्ट्र में भी चुनाव लडेगी और ऐसे में वो एमएनएस की एक प्रतिद्वंदवी भी होगी।

क्या दोस्त के लिये साथ आयेंगे दुश्मन ?
चुनावों में अब ज्यादा वक्त नहीं है और भूतकाल में एमएनस की इमेज के मद्दे्नजर ये देखना दिलचस्प होगा कि एमएनएस अपने आप को किस तरह से बदलती है। बीते लोकसभा चुनाव में एमएनएस की वजह से ही बीजेपी-शिवसेना गठजोड के वोट कटे थे। अकेले मुंबई शहर की 6 लोकसभ सीटों पर बीजेपी-सेना का एक भी उम्मीदवार नहीं जीत सका। इस बार मामला जटिल है। बात उन नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की है जो राज ठाकरे और उदध्व ठाकरे दोनो के दोस्त हैं। एमएनएस ने अगर अपना पुराना रूख बरकरार रखा तो एनडीए की सीटें कम होने की आशंका है। ऐसे में सवाल यही है कि दोनो दुश्मन ठाकरे क्या अपने कॉमन फ्रेंड को प्रधानमंत्री बनाने के लिये साथ आयेंगे ?

1 comment:

अमिताभ श्रीवास्तव said...

सटीक आकलन / देखना दिलचस्प होगा /