Search This Blog

Tuesday, 31 December 2013

A Brief Review of "Dalit Millionaires" (by Milind Khandekar)

A fresh and positive way to begin the new year is to read this book, especially for those who feel that they are victim of circumstances and life has been unfair to them. With 15 interesting case studies, the book inspires to deal with life head on, brave the hostilities and have a positive approach towards life. The book is about those people who started their life with a scratch and made it big with their attitude and hardwork. Every page of the book generates feeling of optimism and inner strength. Translated in simple English, anybody with basic knowledge of the language can read it without referring to a dictionary. It is also like a guide book for aspiring businessmen. Reading this book is a delight for non fiction book buffs & also an antidote for those who are feeling low in life. The book is originally written in Hindi and has been translated in English.

Tuesday, 24 December 2013

भावनाओं से परे...बदल रही है राज ठाकरे की एमएनएस।

सियासत की जुबान सिर्फ शब्दों की नहीं होती है। इसे समझने के लिये शब्दों के बीच दिये जाने वाले संकेतों को पकडना होता है। बिना कहे की जाने वाली हरकतों पर गौर करना पडता है। बीते चंद दिनों से ऐसे ही कुछ इशारे दे रही है राज ठाकरे की पार्टी एमएनएस। आक्रमक मराठी मुद्दे को अपनाकर महाराष्ट्र की सियासी जमीन पर अपने कदम जमाने वाली एमएनएस बदलती नजर आ रही है। वक्त के साथ पुराने मुद्दे पर नरम रवैया अख्तियार करके नये मुद्दों की ओर बढती नजर आ रही है।

क्या हैं बदलाव के संकेत?
बीते सोमवार को राज ठाकरे ने अमिताभ बच्चन को अपनी पार्टी के कार्यक्रम में बुलाया और उनके साथ मंच साझा किया। दोनो ने एक दूसरे की तारीफ की। राज ठाकरे ने बच्चन के साथ अपनी पुरानी कटुता गंगा में बहा देने का ऐलान किया। उनकी हिंदी पर पकड की प्रशंसा की। अगर इस एक कार्यक्रम की मिसाल देकर मैं ये कहने लगूं कि राज ठाकरे अब मराठी के मुद्दे पर नरम पड गये हैं या उत्तर भारतियों से उनका परहेज खत्म हो गया है तो जाहिर तौर पर ये जल्दबाजी होगी। हाल के वक्त में कुछ और भी ऐसी गतिविधियां एमएनएस की ओर से हुईं हैं जो यही इशारा करतीं हैं कि राज ठाकरे अपनी पार्टी के लिये नई दिशा तय कर रहे हैं। बीते अक्टूबर में एनसीपी के उत्तरभारतीय मूल के नेता नवाब मलिक के भाई कप्तान मलिक ने दर्जनों उत्तरभारतियों के साथ एमएनएस की सदस्यता ली। उसके बाद कांदिवली इलाके में भी सैकडों उत्तरभारतीय एमएनएस में शामिल हुए। अपनी हालिया जनसभाओं और प्रेस कांफ्रेंसों में भी राज ठाकरे उत्तरभारतीयों पर निशाना साधने से बचे हैं। ये सब इसी ओर इशारा कर रहे हैं कि एमएनएस के लिये नई जमीन तैयार की जा रही है। राज ठाकरे सीधे तौर पर तो मराठी का मुद्दा नहीं छोड सकते, लेकिन ये कयास लगाये जा रहे हैं कि मराठी का मुद्दा आने वाले वक्त में उनकी पार्टी के लिये निष्क्रीय (Passive) मुद्दा रहेगा।

क्या हो सकता है नया एजेंडा? - भावनाओं की जगह ले सकता है विकास और भ्रष्टाचार।
अगर एमएनएस मराठी के मुद्दे पर नरम हो जायेगी तो फिर कौन से मुद्दे पर उसकी सियासत चलेगी? पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक नये एजेंडे को लेकर एमएनएस के भीतर विचार मंथन चल रहा है। ये उम्मीद बन रही है कि पार्टी 2007 में महाराष्ट्र के विकास के जिस मुद्दे को लेकर बनाई गई थी, उसी मुद्दे पर वापस लौट सकती है। कुछ ने ये भी सुझाव रखा कि अगर एमएनएस ने उत्तर भारतीय विरोध की नीति न अपनाई होती तो शायद पिछले विधानसभा चुनावों में उसकी सीटों की संख्या 13 से कहीं ज्यादा होती। 2007 में करीब 60 हजार उत्तर भारतियों ने एमएनएस का सदस्य बनने का आवेदन किया था। एमएनएस मराठी का राग अलापना कम करके अब भ्रष्टाचार और विकास जैसे मुद्दों को अपनाने की तैयारी में है इसके संकेत इस बात से भी मिले जब एमएनएस विधायक बाला नांदगांवकर की अगुवाई में पार्टी का एक प्रतिनिधिमंडल अन्ना हजारे के लोकपाल की खातिर किये गये अनशन का समर्थन करने के लिये रालेगण पहुंचा। एमएनएस टोल टैक्स हटाने और मुंबई की सडकों पर गड्ढे भरने को लेकर हुए भ्रष्टाचार के खिलाफ भी मुहीम चला चुकी है।

आप फैक्टर
पार्टी दिल्ली में आम आदमी पार्टी की कामियाबी का भी बारीकी से अध्ययन कर रही है। कैसे बिना भावनाओं को छुए, लोगों की जिंदगी से जुडे वास्तविक मुद्दों को उठा कर कम समय में ही ये सत्ता पर काबिज हो गई ? एमएनएस इस सवाल का जवाब तलाश रही है। आम आदमी पार्टी ऐलान कर चुकी है कि वो महाराष्ट्र में भी चुनाव लडेगी और ऐसे में वो एमएनएस की एक प्रतिद्वंदवी भी होगी।

क्या दोस्त के लिये साथ आयेंगे दुश्मन ?
चुनावों में अब ज्यादा वक्त नहीं है और भूतकाल में एमएनस की इमेज के मद्दे्नजर ये देखना दिलचस्प होगा कि एमएनएस अपने आप को किस तरह से बदलती है। बीते लोकसभा चुनाव में एमएनएस की वजह से ही बीजेपी-शिवसेना गठजोड के वोट कटे थे। अकेले मुंबई शहर की 6 लोकसभ सीटों पर बीजेपी-सेना का एक भी उम्मीदवार नहीं जीत सका। इस बार मामला जटिल है। बात उन नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की है जो राज ठाकरे और उदध्व ठाकरे दोनो के दोस्त हैं। एमएनएस ने अगर अपना पुराना रूख बरकरार रखा तो एनडीए की सीटें कम होने की आशंका है। ऐसे में सवाल यही है कि दोनो दुश्मन ठाकरे क्या अपने कॉमन फ्रेंड को प्रधानमंत्री बनाने के लिये साथ आयेंगे ?

Tuesday, 3 December 2013

शिवसेना की अंतर्कलह : क्योंकि हर आदमी का कोई खास आदमी होता है...



फिर कोई शिवसेना से अलग हुआ है और फिर वही एक नाम सामने आया है-मिलिंद नार्वेकर। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे के बाद जिसने भी शिवसेना छोडी उसने मिलिंद नार्वेकर को जरूर गरियाया। ताजा मामला है शिवसेना के पूर्व सांसद और दबंग नेता मोहन रावले का। इन्होने भी पार्टी से बाहर होने के पहले मिलिंद नार्वेकर की करतूतों का मीडिया के सामने भंडाफोड किया था। आखिर ये मिलिंद नार्वेकर है कौन जिसने महाराष्ट्र की सबसे ताकतवर सियासी पार्टियों में से एक शिवसेना के भीतर कोहराम मचा रखा है और जिसके बुरे बर्ताव का हवाला देकर कट्टर शिवसेना नेता भी पार्टी छोड रहे हैं ?

कहने को तो मिलिंद नार्वेकर शिवसेना के कार्याध्यक्ष उदध्व ठाकरे का निजी सहायक है, लेकिन वो पार्टी में बहुत कुछ है। 1996 में उदध्व से जुडा मिलिंद नार्वेकर शिवसेना की रैलियों में मंच पर भाषण नहीं देता, वो जनसभाएं नहीं लेता, वो चुनाव नहीं लडता, वो टीवी चैनलों की बहस में हिस्सा नहीं लेता, उसकी तस्वीरें अखबारों में नहीं छपतीं, वो कोई बयान नहीं जारी करता, वो शिवसेना के हिंसक आंदोलनों में हिस्सा नहीं लेता और न ही शिवसेना की ओर से शहर में उसके कभी बैनर पोस्टर लगाये गये, फिर वो इतना ताकतवर कैसे हो गया? इसे जानने के लिये राजनीति शास्त्र के उस हिस्से पर नजर डालनी पडेगी जो कॉलेजों में नहीं पढाया जाता है और पढाया भी जाता है तो शायद इसे REALPOLITIK का लेबल दिया जाता है। राजनीति में हर आदमी का कोई खास आदमी होता है। नरेंद्र मोदी का खास आदमी अमित शाह है, राहुल गांधी का खास आदमी कनिष्क सिंह है, सोनिया गांधी के खास अहमद पटेल हैं और उसी तरह उदध्व ठाकरे का खास आदमी मिलिंद नार्वेकर है। दरअसल, राजनीति के तमाम दिग्गज चेहरे अपने साथ एक ऐसे आदमी को रखते हैं, जो उनकी खातिर पंचिंग बैग या डस्टबिन का स्वेच्छा से काम करे। जो उस राजनेता की ओर से लिये गये कडवे फैसलों को उसके समर्थकों तक पहुंचाये और राजनेता को मिलने वाली गालियां खुद खाये। राजनेता अगर पार्टी के सदस्यों को खुश करे तो उसका श्रेय उसे खुद मिले, लेकिन उसके फैसलों से अगर कोई नाराजगी पैदा हो रही हो तो बिल इस खास आदमी पर फटे

ये आश्चर्यजनक है कि शिवसेना के मंझे हुए राजनेता मिलिंद नार्वेकर को गालियां देकर पार्टी छोड रहे हैं, लेकिन वे ये नहीं समझ पाये कि नार्वेकर तो उदध्व ठाकरे का ही बनाया हुआ है और वो उदध्व से बडा नहीं है। नार्वेकर की सारी ताकत उदध्व से ही आती है। कुछ सियायी समीक्षकों का कहना है कि मान लीजिये कि कल को नार्वेकर उदध्व ठाकरे से अलग हो जाये तो क्या उसकी हैसीयत एक नगरसेवक(पार्षद) के तौर पर चुने जाने की भी है? शिवसेना से अलग होकर क्या वो 50 लोगों की भी भीड जुटा सकता है? नहीं। मोहन रावले ने आरोप लगाया कि नार्वेकर की वजह से उसे सांसद रहते हुए उदध्व ठाकरे से आमने-सामने मुलाकात का वक्त पाने के लिये भी 4 साल लग गये...पर श्रीमान रावलेजी ये तो सोचिये कि आखिर एक ऐसा शख्स जो 1995 तक शाखाप्रमुख भी नहीं था, उसे शिवसेना के सांसद को एक छोटी सी मीटिंग के लिये 4 साल तक लटकाने का अधिकार किसने दिया? नार्वेकर जो भी करता है वो उदध्व ठाकरे की मर्जी से और उसकी जानकारी में करता है। वो ज्यादा से ज्यादा उदध्व के फैसलों पर अपनी राय रख सकता है, उन्हे बदल नहीं सकता और न तो उनपर अमल किया जाना रोक सकता है।  


अगर नार्वेकर को देखें तो वो महज अपनी नौकरी कर रहा है। जो उदध्व नार्वेकर को कहते हैं वो नार्वेकर करता है। चूंकि उदध्व के अप्रिय फैसलों को पार्टी में प्रसारित करने का काम नार्वेकर ही करता है इसलिये लोग उसे ही विलेन समझ बैठे हैं। ये तो उदध्व का ही बनाया गया सिस्टम है कि उनसे मिलने के लिये पार्टी नेताओं को नार्वेकर से संपर्क करना पडेगा। ये अलग बात है कि लोग नार्वेकर को उदध्व का करीबी मानकर उसे खुश करने की कोशिश में रहते है। जो नारायण राणे नार्वेकर को गालियां देकर शिवसेना छोड गये वो किसी वक्त में इसी नार्वेकर के अच्छे दोस्त हुआ करते थे। जो लोग नार्वेकर पर निशाना साध रहे हैं, वे लोग ऐसा करके शिवसेना की दुर्दशा के लिये अनजाने में उदध्व को उनकी जिम्मेदारी से बचा रहे हैं...आखिर उदध्व ने नार्वेकर को रखा भी तो इसी काम के लिये ही है।    

Monday, 25 November 2013

"द सीज "- 26/11 के 10 सच।


26 नवंबर 2008 को मुंबई में जो आतंकी हमला हुआ था, उसे 5 साल पूरे हो रहे हैं। इन 5 सालों में उस हमले को लेकर तमाम किताबें लिखीं गईं, कई डॉक्यूमेंट्रिज बनाईं गईं, जांच रिपोर्ट्स वगैरह तैयार की गईं, लेकिन वो हमला इतना बडा था कि उससे जुडी तमाम बातों का अब तक पूरी तरह से खुलासा नहीं हो पाया है। यही वजह है कि हमले के 5 साल बाद भी उसे लेकर नई बातें सामने आ रहीं हैं, नये खुलासे हो रहे हैं। इसी कडी में 2 अंग्रेजी पत्रकारों की एक किताब सामने आई है- द सीज। इस किताब को पढने के बाद कम से कम 10 ऐसे सच सामने आते हैं, जिनका या तो अब तक खुलासा नहीं हुआ था या जिनपर ज्यादा गौर नहीं किया गया। अद्रीयान लेवी और कैथी स्कॉट क्लार्क नाम के दो अंग्रेजी पत्रकरों की ओर से लिखी गई ये किताब उन लोगों के बयान पर आधारित है जो 26-11 के हमले के दौरान ताज होटल में फंसे थे। पत्रकारों ने आतंकियों से लोहा लेने वाले पुलिसकर्मियों और एनएसजी कमांडोज से भी बातचीत की। दोनो पाकिस्तान में उन सभी आतंकियों के घर भी पहुंचे जो मुंबई हमले में शामिल थे।किताब में अमेरिकी खुफिया अधिकारियों से मिली जानकारी भी शामिल की गई। इस पूरी कसरत का निचोड ये निकला कि कई ऐसे तथ्य सामने आये जो अब तक किसी को पता नहीं थे या जिनपर अब तक गौर नहीं किया गया था। किताब का शुरूवाती हिस्सा कुछ बोरियत भरा लग सकता है जिसमें लेखकों ने ताज में फंसे लोग हमले से पहले दिनभर क्या कर रहे थे इसका ब्यौरा दिया है।

1-आतंकी हमले के महज घंटेभऱ बाद पुलिस के हाथ एक ऐसा सुनहरा मौका आया जो उसी रात ताज होटल के ऑपरेशन को खत्म कर सकता था। रात करीब 10 बजकर 50 मिनट होटल के अंदर घुसे चारों आतंकवादी एक साथ एक ही वक्त में होटल की पांचवीं मंजिल पर रूम नंबर 551 में दाखिल हुए। ये आतंकवादियों की ओर से की गई एक बडी गलती थी जिसका पुलिस इस्तेमाल कर सकती थी। डीसीपी नागरे पाटिल ने सीसीटीवी पर जब चारों को एक साथ देखा तो उन्होने तुरंत ही आधुनिक हथियारों से लैस असॉल्ट फोर्स को अपने पास भेजने का संदेश भेजा, लेकिन असॉल्ट फोर्स होटल की भूल भुलैया में नागरे पाटिल को खोज ही नहीं पायी। 10 मिनट बाद चारों आतंकवादी कमरा नंबर 551 से निकल कर 6वीं मंजिल पर चले गये और उन्होने आगजनी शुरू कर दी। पुलिस आतंकियों को घेरने का एक बहुत बडा मौका चूक गई। करीब रात 3 बजे तक डीसीपी नागरे पाटिल सीसीटीवी में सभी आतंकियों की हरकत देखते रहे, लेकिन वे कुछ नहीं कर सकते थे। आखिरकर आतंकियों ने उनके सीसीटीवी रूम पर ही हमला बोल दिया और उन्हें होटल से बाहर निकलना पडा।

2-हमले से महीनों पहले पुलिस को खुफिया जानकारी मिली थी कि आतंकी मुंबई के 5 सितारा होटलों को निशाना बना सकते हैं। इसके मद्देनजर इलाके के डीसीपी विश्वास नागरे पाटिल ने ताज होटल की सुरक्षा का जायजा लिया था और वहां पुलिस की सुरक्षा भी मुहैया कराई थी...लेकिन ताज होटल के प्रबंधन को होटल की 5 सितारा चकाचौंध के बीच वर्दी और बंदूकधारी पुलिसकर्मी खटक रहे थे। इसलिये जैसे ही डीसीपी नागरे पाटिल छुट्टी पर गये, ताज के प्रबंधन ने उनकी ओर से लगाई गई सुरक्षा को दरकिनार कर दिया।
होटल पर हमले का सबसे पहला खुफिया अलर्ट साल 2006 में आया था। उस अलर्ट के मुताबिक एक पाकिस्तानी जिहादी संगठन मुंबई के कई पांच सितारा होटल पर हमले की योजना बना रहा है जिसमें ट्राईडेंट-ओबेरॉय और ताज का भी नाम है। उस पहले अलर्ट के बाद उस जैसे 25 अलर्ट और भी आये जो कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने भारतीय एजेंसियों को दिये थे। कुल 26 में से 11 अलर्ट में ये बताया गया था कि आतंकी एक साथ कई ठिकानों पर हमला करने की तैयारी कर रहे हैं। 6 अलर्ट में ये साफ किया गया था कि आतंकी समंदर के रास्ते हमला करने पहुंचेंगे। आईबी को 2 ऐसे अलर्ट भी मिले जिनमें तारीखों के साथ जिक्र था कि आतंकी ताज महल होटल पर हमला कर सकते हैं। ये तारीखें थीं 24 मई 2008 और 11 अगस्त 2008। हालांकि दोनो तारीखों को हमले नहीं हुए।
ताज को लेकर बार बार आ रहे खुफिया अलर्ट्स ने स्थानीय डीसीपी विश्वास नागरे पाटिल को चिंतित कर दिया। इन तमाम अलर्ट्स के मद्देनजर उन्होने 12 अगस्त 2008 को ताज के सुरक्षा प्रमुख सुनील कुडीयाडी के साथ 9 घंटे तक मीटिंग की और बताया कि किस तरह से होटल की सुरक्षा व्यवस्था कमजोर है। डीसीपी पाटिल ने होटल की सुरक्षा मजबूत करने के लिये कुल 26 उपाय बताये जिनमें अहम दरवाजों पर हथियारबंद पुलिसकर्मियों की मौजूदगी भी शामिल थी। होटल ने इन सुरक्षा उपायों को सिरे से खारिज कर दिया, लेकिन 20 सितंबर 2008 को जब पाकिस्तान के इस्लामाबाद में एक 5 सितारा होटल पर आतंकी हमला हुआ तो ताज के प्रबंधन को डीसीपी पाटिल की बातों की गंभीरता समझ में आई। अक्टूबर के दूसरे हफ्ते तक पाटिल की ओर से सुझाये गये कुछ उपायों पर ताज होटल ने अमल किया...लेकिन ये सिर्फ कुछ दिनों तक ही रहा। डीसीपी पाटिल कुछ दिनों के लिये जैसे ही छुट्टी पर गये सबकुछ जस का तस हो गया।होटल के उत्तरी दरवाजे पर कोई सुरक्षा नहीं थी। मुख्य दरवाजे पर तैनात पुलिसकर्मियों को भी होटल ने हटवा दिया ये कहकर कि वे हरदम जंग की तैयारी जैसा माहौल नहीं बर्दाशत कर सकते। ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी होटल से खाने की मांग करते थे और ताज के प्रबंधन को ये अखर रहा था।

3-मुंबई के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर हसन गफूर ने ताज में मौजूद पुलिसकर्मियों के एक तरह से हाथ बांध दिये थे। उनका आदेश था कि एनएसजी के पहुंचने तक कुछ नहीं करना है। यहां तक कि जब शुरूवात में पास के नेवी नगर से मरीन कमांडोज की एक टुकडी पहुंची तो गफूर ने उसे दिशानिर्देश देने के लिये भी डीसीपी नागरे पाटिल को साथ जाने से रोक दिया।
एनएसजी को दिल्ली से पहुंचने में वक्त लगने वाला था। इसलिये तब तक आतंकियों को घरेन के लिये मार्कोस यानी मरीन कमांडोज बुलाये गये। इन मरीन कमांडोज को होटल की भौगौलिक जानकारी और आतंकियों की हलचल के बारे में बताने वाले किसी गाईड की जरूरत थी। चूंकि डीसीपी पाटिल हमले के शुरूवाती कुछ मिनटो के बाद ही होटल पहुंच गये थे और आतंकियों से उनका सामना हो चुका था इसलिये वे मार्कोस के गाईड बनने को तैयार हो गये...तभी उन्हें पुलिस कमिश्नर हसन गफूर का फोन आया। गफूर ने पाटिल को हिदायत दी- तुम ऊपर नहीं जाओगे। मैं दोहरा रहा हूं। तुम ऊपर नहीं जाओगे। मार्कोस खुद ऊपर जायेंगे। तुम नीचे ही ताज की घेरेबंदी करोगे।गफूर का मानना था कि उस वक्त हालात जंग जैसे थे और मुंबई पुलिस अत्याधुनिक हथियारों से लैस आतंकियों से लडने के काबिल नहीं थी। ये काम एनएसजी ही कर सकती थी।
ज्वाइंट कमिश्नर लॉ एंड आर्डर भी ताज चेंबर्स में छुपे मेहमानों को निकालने के लिये ताज की सिक्यूरिटी टीम के साथ अंदर दाखिल होना चाहते थे, लेकिन कमिश्नर गफूर ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया। कुछ देर बाद आतंकी ताज चेंबर्स की तरफ आये और उन्होने कई लोगों की हत्या कर दी।

4-एनएसजी का मानना है कि जब वो 27 नवंबर की सुबह मुंबई पहुंची तो पुलिस और खुफिया एजेंसियों की ओर से उसे सही सही नहीं बताया गया कि शहर में और खासकर ताज में कुल कितने आतंकवादी हैं। एनएसजी को बताया गया कि आतंकवादियों की संख्या 20 हो सकती है जबकि रात में ही अजमल कसाब से पूछताछ में ये साफ हो गया था कि सिर्फ 10 आतकंवादी आये हैं और उनमें से सिर्फ 4 ही ताज होटल में हैं।
आतंकी अजमल कसाब को हमले की पहली रात ही गिरगांव चौपाटी पर हुए एनकाउंटर में जिंदा पकड लिया गया था। रात में 2 बार उससे लंबी पूछताछ हुई। पहली पूछताछ अस्पताल में एसीपी तानाजी घाडगे ने की, जिसके बाद उसे क्राईम ब्रांच लाया गया। क्राईम ब्रांच में ज्वाइंट कमिश्नर राकेश मारिया ने दोबारा उससे पूछताछ की। दोनो पूछताछ में कसाब ने बता दिया था कि कुल 10 आतंकवादी आये थे, वे कैसे आये थे, किस तरह के हथियार उनके पास थे और किसे क्या जिम्मेदारी दी गई थी।
हालांकि कसाब ने सबकुछ बता दिया था, लेकिन पूरी जानकारी एनएसजी तक नहीं पहुंची।

5-वैसे तो हवाई जहाज से दिल्ली और मुंबई की दूरी महज 2 घंटे की है, लेकिन एनएसजी को मुंबई पहुंचते पहुंचते पूरी रात बीत गई। जैसे तैसे विमान का इंतजाम करके एनएसजी कमांडोज को मुंबई तो ले आया गया लेकिन मुंबई हवाई अड्डे से तुरंत उन्हें दक्षिण मुंबई जहां 3 अलग अलग ठिकानों पर आतंकी कहर बरपा रहे थे, उन्हें लाने का कोई इंतजाम नहीं था।
27 नवंबर की सुबह साढे पांच बजे एनएसजी जवानों का विमान मुंबई पहुंचा...लेकिन उन्हें तब झटका लगा जब वादे के मुताबिक उन्हें हवाई अड्डे से आतंकी हमले के ठिकानों तक पहुंचाने के लिये कोई वाहन नहीं आया। वहीं दूसरी ओर साथ आये होम सेक्रेटरी को रिसीव करने के लिये सफेद एंबेसेडर कारें आ पहुंचीं थीं। विमान से असलहा उतारने और स्थानीय बसों का इंतजाम करने में कई और कीमती घंटे बर्बाद हुए। इस दौरान आतंकी ताज के कीचन वाले इलाके तक पहुंचकर कई लोगों की जान ले चुके थे।

6-भले ही 26-11 का हमला आतंकवादियों की टीम वर्क का नतीजा हो, लेकिन हमले के दौरान एटीएस ने आंतकियों की पाकिस्तान में बैठे उनके आकाओं से जो बातचीत रिकॉर्ड की उससे एक दिलचस्प हकीकत सामने आती है। ताज में मौजूद चारों आतंकवादी न केवल आपस में झगड रहे थे बल्कि पाकिस्तान से आ रहे निर्देशों पर अमल भी नहीं कर रहे थे।
ताज में मौजूद उमर नाम का आतंकी गुस्से में बंधक बनाये गये लोगों की पिटाई कर रहा था। उमर का साथी अब्दुल रहमान कराची से फोन पर हैंडलर वसी के साथ था। वसी उमर को फोन पर कुछ निर्देश देना चाहता था, लेकिन उमर फोन पर आने में आनाकानी कर रहा था। इस वजह से अब्दुल रहमान और उमर के बीच गाली गलौच भी हो गई। अब्दुल रहमान ने उमर को गधा और बेवकूफ कहा। वसी ने अब्दुल रहमान से कहा कि वो उमर को आग लगाने का निर्देश दे, लेकिन उमर सुनने को तैयर नहीं था। वो बंधकों को लात और घूसों से पीटने में ही लगा रहा। एक बार वो कुछ पलों के लिये फोन पर आया भी, लेकिन फिर उसने फोन वापस अब्दुल रहमान को थमा दिया।

7-होटल के भीतर जो 4 आतंकी दाखिल हुए थे उनमें से एक आतंकी खुद अपनी ही गोली से घायल हो गया था। ये आतंकी था अबू अली।
अबू अली ने जब ताज होटल में घुसकर अपनी एके-47 राईफल से फायरिंग करनी शुरू की तो एक गोली फर्श से टकराकर बाऊंस हुई और अबू अली के पैर में जाकर लगी। एटीएस ने आतंकियों की उनके हैंडलर से जिस बातचीत को रिकार्ड किया उससे ये बात सामने आई। अली हैंडलर वसी से कहता है- मेरे लिये दुआ करो। अपने पैर की वजह से मैं वो नहीं कर पा रहा हूं जो दिल में है। चलते वक्त दर्द होता है। जो काम अकेले मेरा था वो सभी को मिलकर करना पड रहा है। मेरा पैर मेरा साथ नहीं दे रहा। अल्लाह से दुआ करो कि हम उन्हें नाच नचायें

8-पाकिस्तान अब तक इस बात से इंकार करते आया है कि मुंबई पर हमला करने वाले आतंकवादियों को सरकारी मदद मिली, लेकिन ये किताब पाकिस्तान की केंद्रीय जांच एजेंसी एफआईए के सूत्रों के हवाले से बताती है कि हमले को पाक एजेंसियों का आधिकारिक सहयोग मिला था।
अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद पाकिस्तान की फेडरल इनवेस्टीगेटिव अथॉरिटी ने अपने देश में हमलों की जांच शुरू की। हालांकि, पाकिस्तान ये कहता रहा कि भारत ने इस मामले में पुख्ता सबूत नहीं दिये हैं जो कि कुछ हद तक सच है, जांच से जुडे एफआईए के कुछ अफसर निजी तौर पर ये मानते हैं कि जिस पैमाने पर ऑपरेशन बॉम्बे को अंजाम दिया गया, वो बिना आधिकारिक जानकारी और मंजूरी के नहीं हो सकता.

9-दाऊद गिलानी उर्फ डेविड कॉलमैन हेडली आतंकी संगठन लष्कर ए तैयबा के लिये काम करता था, लेकिन उसके रिश्ते पाकिस्तान सरकार और वहां के आला राजनेताओं से भी थे। इस बात का खुलासा हुआ हेडली के पिता की मौत होने पर। 26-11 के हमले के एक महीने के बाद हेडली के पिता सय्यद सलीम गिलानी की लाहौर में मौत हो गई। हेडली उस वक्त देश से बाहर था, लेकिन पाकिस्तान के प्रधानमंत्री गिलानी परिवार से अपनी संवेदनाएं जताने के लिये उनके घर आये।हेडली की ओर से अपने दोस्त को भेजे गये एक ईमेल से ये बात सामने आई।

10- धवार पार्क-वो जगह जहां 26 नवंबर 2008 की शाम पाकिस्तान से आये 10 आतंकवादी उतरे थे। मछुआरों की बस्ती के पास मौजूद इस जगह को लैंडिंग पॉइंट के तौर पर इस्तेमाल करने की सलाह आईएसआई के एक डबल एजेंट ने दी थी। हेडली ने बाद में आकर इस जगह की तस्वीरें लीं और यहां का जीपीआरएस लोकेशन नोट किया।


इन खुलासों से ये साफ होता है कि सुरक्षा एजेंसियों के सामने कई ऐसे मौके आये जब आतंकियों पर काबू पाया जा सकता था और जान ओ माल के नुकसान को काफी कम किया जा सकता था...लेकिन किसी की लापरवाही, किसी की ढिलाई, किसी की कडे फैसले न ले पाने की कमजोरी और किसी की बेवकूफी ने मुंबई के दुश्मनों को उनके मंसूबों में कामियाब कर दिया। 5 साल बाद ताज और ट्राईडेंट आज फिर गुलजार हैं, सीएसटी रेल स्टेशन पर मुसाफिरों की चहल पहल भी पहले जैसी ही है, लेकिन उन तारीखों के दौरान इन इमारतों में जो नरसंहार हुआ था वो इसके इतिहास का हमेशा के लिये काला हिस्सा बन गया है

Monday, 11 November 2013

डाईबिटीज: 200 साल जीने का वरदान !!!

बधाई हो। अब तुम 200 साल जी सकते हो। ये प्रतिक्रिया थी मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर और मेरे मित्र डी.शिवानंदन की जब उन्हें ये पता चला कि मैं भी डाईबिटिक हूं। उनके लफ्ज सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ और लगा कि शायद वो कोई व्यंग कर रहे हैं। जो डाईबिटीज आज दुनिया के तमाम शहरी इलाकों में हौवा बन चुकी है और जिसे लोग साईलेंट किलर मानते हैं उसके होने से किसी की उम्र कैसे बढ सकती है? शिवानंदन ने बात को स्पष्ट किया। उनका कहना था कि डाईबिटिज होने के बाद इंसान को अपनी जिंदगी में जिस अनुशासन की जरूरत पडती है अगर उस पर सख्ती से अमल किया जाये तो इंसान की उम्र और बढ सकती है। डाईबिटीज से होने वाले नुकसान को तो रोका ही जा सकता है उम्र के साथ आनेवाली दूसरी बीमारियों से भी बचा जा सकता है।

करीब सालभर पहले ही डाईबिटिज ने मुझे अपनी गिरफ्त में लिया है। चूंकि मेरे माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी, वगैरह तमाम रक्त संबंधभी डाईबिटिक हैं तो मैं भी मानसिक तौर पर तैयार था कि एक न एक दिन मुझे भी डाईबिटीज होना ही है...लेकिन डाईबिटज इतनी जल्दी हो जायेगी इसका अंदाजा न था...लगा था और 8-10 साल बाद होगी। मेरी तरह ही उसी दौरान दफ्तर के 4-5 और भी हमउम्र सहकर्मियों को डाईबिटीज होने की खबर मिली...कुछ मुंबई के थे, कुछ नोएडा के। भारत में डाईबिटीज के बढते आंकडे जो आये दिन हम अखबरों में पढ रहे थे, वे सभी अब आसपास ही नजर आने लगे। डाईबिटीज कितनी व्यापक हो चुकी है इसका अंदाजा तब आया जब लोगों से इस मुद्दे पर बात करने पर पता चला कि लगभग हर दूसरा व्यकित डाईबिटीज का डॉक्टर है और उसके पास शुगर को कंट्रोल में रखने या डाईबिटीज पूरी तरह से खत्म कर देने का नुस्खा है। कोई खुद डाईबिटीज से ग्रस्त निकलता या किसी के घर में किसी न किसी को डाईबिटीज होती। कोई कहता कि कच्ची भिंडी को रातभर पानी में भिगो कर सुबह पानी पी लीजिये, कुछ दिनों में डाईबिटीज गायब। किसी की सलाह थी कि करी पत्ते को उबाल कर उसका पानी पीजिये, डाईबिटीज खत्म हो जायेगी। करेला, जामुन और नीम के रस पीने की भी सलाह दी गई। हो सकता है कि इन तमाम उपायों से शुगर काबू में रहे, लेकिन इनसे डाईबिटीज खत्म हो जायेगी, ये मानना बेवकूफी है। आज तक ऐसी कोई मिसाल सामने नहीं आई है। डाईबिटीज शरीर में होने वाला वो बिगाड है, जिसकी मरम्मत नहीं हो सकती।

डाईबिटीज से ग्रस्त होने का मतलब है कि अपनी जीवन शैली, रहन-सहन और आदतों में भारी परिवर्तन करना। अगर शिवानंदन के मामले को केस स्टडी के तौर पर देखें तो उन्होने डाईबिटिक होने के बाद अपनी जिंदगी में कई बडे फेरबदल किये और अपने आप को अनुशासित किया। 63 साल के शिवानंदन डाईबिटीज की गिरफ्त में साल 1998 में आये जब वो मुंबई क्राईम ब्रांच के मुखिया थे। ये वो दौर था जब अंडरवर्लड मुंबई शहर पर हावी था। कोई ऐसा दिन न बीतता था जब गैंगस्टर किसी की हत्या न करते हों। ऐसे हालात में शिवानंदन पर काम का दबाव और तनाव बढ गया। रात रात भर जाग कर गैंगस्टरों को खत्म करने की रणनीति बनाना, वारदात के ठिकानों का मुआयना करना, अदालती मामलों का अध्ययन करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गई थी। न नींद मिल पाती थी और न वक्त पर खाना मिल पाता था और नतीजतन हो गई डाईबिटीज। डाईबिटीज ग्रस्त होने के बाद शिवानंदन ने अपनी जो दिनचर्या अपनाई उसके मुताबिक वे दिन में 5 बार खाना खाते हैं, लेकिन पांचों बार खाने की मात्रा काफी कम रहती है।हर बार खाने के बीच 3 घंटे का अंतर रहता है। रात का खाना वे सोने से 2 घंटे पहले 8 बजे ही कर लेते हैं। आमतौर पर वे शाकाहारी खाना खाते हैं। हफ्ते में 5 दिन वे 1 घंटे के लिये व्यायामशाला जाते हैं और 2 दिन घंटेभर तक पैदल चलते हैं। डाईबिटीज होने के बाद से उन्होने अपना वजन बरकरार रखा है। 15 साल पहले भी उनका वजन 82 किलो था और आज भी 82 किलो ही है। शिवानंदन के मुताबिक न तो वे शराब के शौकीन हैं और न ही उन्हें सिगरेट की आदत है। उन्होने कॉल्ड ड्रिंक्स से भी परहेज रखा है। वे शुगर कंट्रोल करने वाली गोलियां नियमित रूप से लेते हैं, जिसके अलावा डाईबिटीज को लेकर वे दूसरा कोई नुस्खा नहीं अपना रहे। शिवानंदन का कहना है कि वे अब हमेशा अपने आप को खुश रखने की कोशिश करते हैं और जीवन के प्रति सकारात्मक नजरिया रखते हैं।इस बात को शिवानंदन बडे गर्व से बताते हैं कि डाईबिटीज होने के बाद उन्होने जो जीवनशैली अपनाई है उससे वे कभी बीमार नहीं पडे, कभी अस्पताल में भर्ती नहीं होना पडा और अब भी पूरी तरह से तंदुरूस्त हैं।


शिवानंदन की अपनाई हुई जीवन शैली तो उनके लिये काम करती दिख रही है, लेकिन कितने युवा डाईबिटिक उनके जैसी लाईफस्टाइल अपनाने को तैयार होंगे? कईयों के लिये उनकी तरह जीना तो शायद जीने की परिभाषा में भी फिट न बैठता हो। नहीं चाहिये ऐसा 200 साल जीने का वरदान..लीवर सडे तो सडे, किडनी बेकार हो रही हो तो हो जाये, आंखों से रोशनी कम हो रही हो तो हो जाये, ब्लड प्रेशर बढता हो तो बढे, दिल में दर्द होता हो तो हो। हैप्पी वर्लड डाईबिटीज डे !!!. 

Saturday, 2 November 2013

'साहेब' का अधूरा ख्वाब: महाराष्ट्र के बाहर शिवसेना।


इस महीने शिवसेना प्रमुख बालासाहब ठाकरे के निधन की पहली बरषी है। जाने से पहले 86 साल के ठाकरे का एक सपना तो पूरा हो गया कि महाराष्ट्र के विधान भवन पर भगवा लहराये। 1995 में उनकी पार्टी बीजेपी के साथ मिलकर एक बार सत्ता में आ पायी। 80 के दशक में हिंदुत्व का मुद्दा अपनाने के बाद बालासाहब को उम्मीद थी कि पार्टी महाराष्ट्र के बाहर भी अपने पैर पसारेगी और एक राष्ट्रीय पार्टी की शक्ल ले लेगी, लेकिन इस दिशा में कदम अधूरे मन से उठाये गये नजर आते हैं।
शिवसेना की ओर से हिंदुत्व का मुद्दा अपनाने और बालासाहब की निजी छवि ने महाराष्ट्र के बाहर भी खासकर उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान और जम्मू-कश्मीर में कई युवाओं को आकर्षित किया। शिवसेना ने भी इस बात को प्रदर्शित किया कि वो गैर मराठियों के लिये खुली है और इसी के मद्देनजर साल 1993 में दोपहर का सामना नामक हिंदी सांध्यदैनिक निकाला और 1996 में मुंबई के अंधेरी स्पोर्ट्स कॉम्प्लैक्स में उत्तर भारतीय महासम्मेलन का आयोजन किया।
अगर महाराष्ट्र के बाहर किसी राज्य में शिवसेना को अधिकतम कामियाबी मिली तो वो राज्य था उत्तर प्रदेश, जहां पार्टी ने 1991 के चुनाव में एक विधानसभा सीट जीती। अकबरपुर सीट से एक स्थानीय बाहुबली नेता पवन पांडे शिवसेना का विधायक चुन लिया गया। शिवसेना ने उस दौरान लखनऊ, मेरठ, वाराणासी, अकबरपुर, बलिया और गोरखपुर के स्थानीय निकाय चुनावों में भी तगडी मौजूदगी हासिल की। बहरहाल, ये कामियाबी ज्यादा वक्त तक टिकी नहीं। पवन पांडे जो उत्तर प्रदेश में शिवसेना का सबसे मजबूत चेहरा बनकर उभरा था, अगला चुनाव हार गया। उत्तर प्रदेश का कुख्यात अपराधी श्रीप्रकाश शुक्ला पहले पवन पांडे के साथ ही काम करता था। जब मायावती मुख्यमंत्री बनीं तो उन्होने अपने उन सियासी दुश्मनों को निशाना बनाना शुरू किया जिनका आपराधिक रिकॉर्ड था। चूंकि पवन पांडे खुद एक आपराधिक इमेज का शख्स था इसलिये मायावती की मुहीम से खुद को बचाने के लिये उसे उत्तर प्रदेश छोडकर भागना पडा। पांडे की गैर मौजूदगी ने यूपी में शिवसेना के विस्तार को प्रभावित किया। यूपी से भागने के बाद पांडे मुंबई में आकर बस गया और नवी मुंबई के जुईनगर में उसने एक डांस बार खोला पर मुंबई में भी पांडे की कथित आपराधिक गतिविधियां जारी रहीं और पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। उसकी संजय निरूपम से भी अनबन हो गई जिन्हें शिवसेना ने राज्यसभा सांसद और अपने उत्तर भारतीय कार्यक्रम का प्रभारी बना दिया था। आपराधिक मामले में पांडे की गिरफ्तारी से निरूपम को उसे पार्टी से निकाल फैंकने का एक मौका मिल गया। पांडे के निकाले जाने से शिवसेना य़ूपी में बुरी तरह से लडखडा गई। हालांकि शिवसेना ने 90 के दशक में यूपी में 3 बार विधान सभा चुनाव लडा लेकिन बाल ठाकरे कभी खुद वहां चुनाव प्रचार के लिये नहीं गये। ठाकरे के उत्तर प्रदेश न जाने के पीछे हमेशा ये कारण बताया गया कि खुफिया जानकारी के मुताबिक उनकी जान को खतरा है। ठाकरे एकमात्र बार लखनऊ गये थे बाबरी कांड से जुडी एक अदालती कार्रवाई में पेश होने के लिये। शिवसेना से निकाले जाने के बाद पवन पांडे बहुजन समाजवादी पार्टी से जुड गया। हालांकि, बीजेपी नेताओं ने कभी खुले तौर पर ये बात नहीं कही, लेकिन उन्हें डर था कि अगर शिवसेना महाराष्ट्र के बाहर बढी तो उसके वोटर कट सकते हैं।
यूपी के विपरीत दिल्ली में शिवसेना आज तक एक भी विधानसभा सीट नहीं जीत पायी है, लेकिन पार्टी की दिल्ली इकाई अक्सर खबरों में रही है। जब बाल ठाकरे ने पाकिस्तानी खिलाडियों के खिलाफ अपने बैन का ऐलान किया तो जनवरी 1999 में शिवसैनिकों ने दिल्ली के फिरोज शाह कोटला मैदान की पिच खोद डाली। शिवसैनिकों ने शांति प्रक्रिया के तहत शुरू की गईं भारत-पाकिस्तान के बीच बसों की हवा निकाल दी। साल 2000 में अजय श्रीवास्तव जो कि भारतीय विद्यार्थी सेना (शिवसेना की छात्र इकाई जिसके प्रमुख राज ठाकरे हुआ करते थे।) से जुडे थे एकाएक मशहूर हो गये जब उन्होने इनकम टैक्स विभाग की ओर से आयोजित की गई नीलामी में दाऊद इब्राहिम की संपत्ति पर बोली लगई। पिछले साल शिवसैनिकों ने यासीन मल्लिक पर हमला कर दिया जब अफजल गुरू को फांसी दिये जाने के बाद वो दिल्ली आये। शिवसैनिकों ने दिल्ली में ही एक पाकिस्तानी सूफी गायिका के कार्यक्रम में भी तोडफोड की। हालांकि, दिल्ली के शिवसैनिकों की इस तरह की गतिविधियों को अखबारों और टीवी चैनलों पर जगह तो मिली लेकिन इसका कोई चुनावी फायदा पार्टी को नहीं मिला। जयभगवान गोयल, अजय श्रीवास्तव और मंगतराम मुंडे शिवसेना की दिल्ली इकाई के संस्थापक सदस्य थे, लेकिन ये आपस में ही लडते रहते थे। यूपी की तरह ही ठाकरे कभी भी चुनाव प्रचार के लिये दिल्ली नहीं आये।। मार्च 1999 में उनका सम्मान करने के लिये दिल्ली के ताल कटोरा स्टेडियम में एक रैली आयोजित की गई थी, लेकिन ठाकरे उसमें भी शरीक नहीं हुए और अपने बेटे उदध्व को भेज दिया। उस वक्त तक उदध्व शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष भी नहीं बने थे। बार बार गुजारिशों के बावजूद बालासाहब ठाकरे के दिल्ली न आने से उनके कार्यकर्ता हतोत्साहित हुए। दिल्ली के शिवसैनिकों की एक बडी तादाद भारतीय विद्यार्थी सेना की सदस्य थी, लेकिन जब राज ठाकरे ने शिवसेना छोडकर अपनी अलग पार्टी बनाना तय किया तो इन शिवसैनिकों को भी पार्टी में अपना कोई भविष्य नजर नहीं आया। हालांकि, दिल्ली के ये शिवसैनिक राज ठाकरे के साथ उनकी नई पार्टी में शामिल नहीं हो पाये क्योंकि राज ठाकरे ने अपनी नई पार्टी एमएनएस को महाराष्ट्र तक सीमित रखा है। अजय श्रीवास्तव अब शिवसेना के सक्रीय सदस्य नहीं हैं और जयभगवान गोयल ने भी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ अनबन के बाद शिवसेना छोड दी है।
शिवसेना के लिये गुजरात में उस वक्त एक मौका था जब शंकरसिंह वाघेला ने बीजेपी से बगावत की। बीजेपी से निकलने के बाद वाघेला ने खुद की एक पार्टी बनाई, लेकिन उससे पहले उन्होने शिवसेना से एक पेशकश की। वाघेला ने ठाकरे को संदेश भिजवाया कि वो अपने समर्थकों के साथ शिवसेना में शामिल होना चाहते हैं, लेकिन ठाकरे ने उनकी ये पेशकश ठुकरा दी क्योंकि वो बीजेपी से अपने रिश्ते नहीं बिगाडना चाहते थे। ठाकरे को इस बात की शंका भी थी कि गुजरात में शिवसेना कोई झंडे गाड पायेगी क्योंकि शिवसेना के जन्म के बाद शुरूवाती सालों तक उसकी इमेज गुजराती विरोधी रही थी।
दिल्ली की तरह ही शिवसेना की राजस्थान विधानसभा में भी कोई मौजूदगी नहीं है। बहरहाल, 2010 के पिछले स्थानीय निकाय चुनावों में पार्टी को नागौर नगर निगम में 2 और गंगानगर नगर निगम में 7 सीटें मिलीं। हाल ही में उदयपुर विश्वविद्यालय के छात्रसंघ चुनाव में शिवसेना की युवा इकाई युवा सेना का उम्मीदवार अध्यक्ष चुना गया। जयपुर और भरतपुर विश्वविद्यालयों के छात्रसंघ चुनावों में भी युवा सेना ने कुछेक सीटें जीतीं। हालांकि, शिवसेना 1998 से राजस्थान में विधान सभा चुनाव लड रही है, लेकिन बाल ठाकरे एक बार भी वहां चुनाव प्रचार के लिये नहीं गये। साल 2003 के चुनाव में सिर्फ एक बार उदध्व ठाकरे प्रचार के लिये् आये थे। शिवसेना के हिंदुत्ववादी एजेंडे ने कुछ समर्थक जम्मू में भी जुटाये। शिवसेना का एक उम्मीदवार पिछले नगर निगम के चुनाव में पार्षद चुना गया।
हालांकि, शिवसेना का इरादा एक बहुराज्यीय पार्टी बनने का है, लेकिन मौजूद वक्त में वो अपने घरेलू मैदान महाराष्ट्र में खुद के पैर टिकाये रखने के लिये संघर्ष कर रही है।राज ठाकरे की पार्टी एमएनएस, शिवसेना के राज्य में अस्त्तिव पर सीधा हमला कर रही है। एमएनएस की ओर से साल 2009 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में जो नुकसान पहुंचाया गया उससे तो सियासी समीक्षक ये मान बैठे कि शिवसेना का अस्तित्व खतरे में है। बहरहाल साल 2012 के बीएमसी चुनाव जीतकर शिवसेना ने इन समीक्षकों को ये संदेश दे दिया कि अभी उसका अंत उतना निकट नहीं है जितना वो मान रहे हैं। शिवसेना इस बार दिल्ली और राजस्थान के विधान सभा चुनाव लडने जा रही है, लेकिन अगल साल होने जा रहे लोकसभा और महाराष्ट्र विधान सभा के चुनावों के नतीजे ही शिवसेना का भविष्य तय करेंगे।

'Saheb's Unfulfilled Dream: Shiv Sena Outside Maharashtra.



This month will see the first death anniversary of Shiv Sena supremo Balasaheb Thackeray.  Before departing at the age of 86 years, he had seen at least one of his dreams fulfilled-saffron flag at Maharashtra’s legislative assembly. Shiv Sena managed to attain power once in 1995 by winning assembly elections in partnership with BJP. After adopting the ideology of Hindutwa in the decade of 80s Bal Thackeray also hoped to see his party spreading out of Maharashtra and eventually becoming a national party, but the efforts in this direction were half hearted.

Shiv Sena’s adoption of Hindutwa ideology & Bal Thackeray’s personal charisma appealed to numerous youngsters outside Maharashtra, especially in Hindi speaking states like Uttar Pradesh, Delhi, Rajasthan & Jammu & Kashmir. Shiv Sena also displayed it openness for non Maharashtrians by launching a Hindi newspaper “Dopahar Ka Saamana” in 1993 and organizing “Uttar Bhartiya Mahasammelan” at Mumbai’s Andheri Sports Complex in 1996.

The maximum success of Shiv Sena outside Maharashtra was seen in Uttar Pradesh, where the party was able to win one assembly seat in 1991. A local ganglord Pawan Pande got elected as MLA from Akbarpur seat on Shiv Sena’s ticket. Shiv Sena also made strong presence in corporations of Lucknow, Meerut, Varanasi, Akbarpur, Baliya & Gorakhpur. However, the success didn’t continue for long. Pawan Pande who was the key for Shiv Sena’s operations in Uttar Pradesh lost his seat in the next elections. Notorious gangster of Uttar Pradesh Shriprakash Shukla belonged to his gang. When Mayawati became Chief Minister of U.P, she started targeting her political opponents who were having criminal records. Pande being a history sheeter & boss of gangters like Shukla had to run away from U.P to escape Mayawati’s tirade. Pande’s absence affected Shiv Sena’s progress in U.P. After escaping from U.P, Pande settled in Mumbai & opened a dance bar in Juinagar area of Navi Mumbai. However, in Mumbai also Pande was booked for his notorious activities & was arrested. He also had differences with Sanjay Nirupam whom Shiv Sena had made Rajya Sabha MP & relied upon for expansion in North India. Nirupam got an opportunity to sack Pande from the party on the basis of his criminal record. With sacking of Pande, Shiv Sena crippled in Uttar Pradesh. Although, Shiv Sena contested assembly elections thrice in U.P in the decade of 90s, Bal Thackeray never personally went to the state for political campaign. He never visited Uttar Pradesh on the pretext that there was intelligence input indicating threat to his life. The only time he visited Lucknow was to attend a court hearing in Babri demolition case. Pawan Pande joined BSP after getting booted out from Shiv Sena. Although, BJP leaders were never vocal about it, but they feared that growth of Shiv Sena outside Maharashtra could damage the voters’ base.

Unlike UP, Shiv Sena never managed to win a single seat in Delhi assembly, but the party’s state unit was often in news for its activities. When Bal Thackeray announced his ban against playing of Pakistani cricketers in India, his party workers dug up pitch of Phiroze Shah Kotla Maidan in January 1999. Shiv Sena workers also punctured tyres of buses plying between India & Pakistan which were launched by the governments of both the countries to foster peace efforts. In year 2000 Ajay Shrivastava who belonged to Bhartiya Vidyarthi Sena (Student’s wing of Shiv Sena which was then headed by Raj Thackeray) became famous by bidding on Dawood Ibrahim’s property in an auction organized by the Income Tax Department. Last year Shiv Sainiks attacked Yaseen Mallik when he came to Delhi after hanging of Afzal Guru & also vandalised a programme of Pakistani sufi singer. Although, such activities by Shiv Sainiks of Delhi attracted good news space in television channels & newspapers, they were never able to fetch votes for the party. Jaibhagwan Goyal, Ajay Shrivastava & Mangatram Munde were some of the founding members of party’s Delhi state unit. However, they fought amongst themselves. Like UP, Bal Thackeray also never visited Delhi for political campaigning. In March 1999 a grand rally was organised in Talkatora stadium of Delhi to felicitate Bal Thackeray, but instead of coming himself, Bal Thackeray chose to send his son Uddhav. Uddhav was not even the working president of the party at that time. Bal Thackeray’s avoidance to visit Delhi inspite of repeated requests led to discouragement of state party workers. Shiv Sena’s adherence to Marathi issue on and off post 2004 also led to disillusionment of workers in Delhi. A large number of Shiv Sainiks in Delhi belonged to Bhartiya Vidyarthi Sena of Raj Thackeray, but when Raj Thackeray chose to quit Shiv Sena & raise his own party, his followers in Delhi too didn’t see any sense in continuing with Shiv Sena. However, they were unable to follow Raj because Raj chose to confine activities of his new party MNS only within the state of Maharashtra. Ajay Shrivastava ceased to be an active member of the party & Jaibhagwan Goyal also left Shiv Sena due to differences with senior leadership in Mumbai.

There was an opportunity for Shiv Sena in the state of Gujarat when Shanker Singh Waghela revolted from BJP. After defecting from BJP Waghela established his own political party, but before that he made an offer to Shiv Sena. Waghela sent a message to Bal Thackeray that he wished to join Shiv Sena alongwith his supporters. However, the offer was declined by Bal Thackeray who didn’t want to disturb Shiv Sena’s relation with ally BJP. Moreover, Thackeray was sceptical that his party will do well in Gujarat as Shiv Sena had acquired an anti Gujarati image during the initial years of its formation.

Like Delhi, Shiv Sena has no presence in Rajasthan’s legislative assembly also. However, during last local self government elections in 2010 party was able to win 2 seats in Nagor municipal council & 7 seats in Ganganagar municipal council. Recently Shiv Sena’s youth wing got a boost when it won the presidentship of students’ council in Udaipur University. It also managed to win student council seats in Jaipur & Bharatpur universities. Although, Shiv Sena has been fighting assembly elections in Rajasthan since 1998, Bal Thackeray never visited the state to address any political rally. It was only in 2003 elections that Uddhav Thackeray came for the campaigning. Shiv Sena’s Hindutwa rhetorics attracted some followers in Jammu also. A Shiv Sena candidate got elected as a corporator during last civic elections in Jammu.


Although, Shiv Sena aspires to be a multistate party, it is struggling to keep itself strong at the home turf-Maharashtra. MNS of Raj Thackeray is directly threatening the survival of party in the state. Damage done by MNS during 2009 assembly & parliamentary elections led the political experts to conclude that Shiv Sena’s very existence is in danger. However, Shiv Sena managed to do the damage control by retaining Mumbai municipal corporation in 2012. Although, Shiv Sena is now fielding candidate’s in Rajasthan & Delhi assembly elections, results of assembly & parliamentary elections next year in Maharashtra will truly indicate the party’s future.  

Saturday, 26 October 2013

Why India needs an effective Witness Protection Programme?


Last week I appeared as a witness in special MCOCA court to depose on a case of firing by an underworld gang. Being a witness for the prosecution is tough, especially if you are deposing against an organized crime syndicate or a terrorist group. I have been witness for the prosecuting agencies in around half a dozen cases mostly related with Mumbai underworld. The Prosecuting agencies made me witness mostly for some of the extra judicial confessions which mafia gang bosses have done on phone to me in which they claimed responsibility for some high profile shootouts in the city of Mumbai. My depositions were damaging for the mafia & his gang members. Although, being aware of the risks of becoming a prosecution’s witness, I treat a police summon asking me to become a witness as a certificate for participating in the war against organized crime. Being a crime reporter for over a decade, I believe, becoming a witness is another opportunity to know underworld from a different perspective & contribute to the fight against crime in a way other than the journalism.
When somebody becomes a witness against an organized crime syndicate, the gang undertakes all means to prevent that witness to depose in the court. Efforts are made so that the witness turns hostile & the arrested gang members are let off. Gangs adopt various tactics including offer of bribe, threat to kill, kidnap or maim to discourage a witness from deposing adversely in the court. Although, being a witness myself I am not an exception to such jeopardy, I chose to take comfort in having some sort of confidence on the prosecuting agencies that they will defend me or warn me if any danger is assessed. Moreover, in most of the cases whenever I have spoken to any mafia boss, I have made it clear before them that he is making an extra judicial confession before me & I might have to depose against his interests in the court. Mostly they say that they don’t care about it.

I enjoy my dates at the courts; especially at the time when defence lawyers cross examine me. With red eyes, harsh tone, aggressive body language, they try their best to prove before the court that I am lying & that I work for the cops. I keenly observe their facial expressions and choice of words. Most of the defence lawyers who confront me in the courts are the ones whom I have befriended during my professional endeavors. We often share cup of tea in the court campus & discuss high profile cases, but when I am in the witness box, the circumstances make us appear hostile against each other. Once the court hearing is over, the hostility ends.
I may not be feeling threatened & alarmed on being a witness, but such may not be the case with hundreds of other witnesses who have deposed or have to depose in organized crime & terror related cases before the court. Not much care has been taken in India to protect witnesses in criminal cases so that they are not threatened or eliminated before deposing in front of the court or turn hostile during deposition. Most of the investigating agencies doesn’t hold good track record of convictions & in many cases accused are acquitted due to witnesses turning hostile in the courts.
Fight against terrorism not only encompasses the prevention of terrorist acts but also apprehending those who conspire for such acts or have committed such acts. Bringing hostile elements to justice is also a significant component of counter terror strategies so that they are not let off after the trial & once again engage in planning terrorist attacks. To get them punished & keep them behind the bars as long as possible, it is imperative that prosecuting agency’s witnesses fearlessly provide evidence to the court. They should be covered with immunity from threats to them & their families before & after their deposition in the witness box. However, it is impractical for the government to provide armed physical security to each of its witnesses. Neither the finances, nor the strength of police forces will allow all the witnesses to move around with guards. Moreover, in many cases such effort could also cause inconvenience to the witnesses & it doesn’t provide a 100 percent guarantee that you will be unharmed after being surrounded by armed bodyguards.
During my visit to Washington DC, I was introduced to an effective & multifaceted initiative of the US government for the protection of its witnesses. The Witness Protection Program (WPP) in the US is run by a federal agency called United States Marshall Services (USMS), which reports to Department of Justice. USMS plays a key role in federal judicial trials. The responsibilities of USMS includes protection of judges and other officials of the court, protection of court buildings, lookout for & arrest fugitives, transport accused & witnesses to the court and protect witnesses. As far as the witness protection program goes, USMS not only provides security to a witness before the court appearance, but also during the deposition and even after the deposition is over.
Witness Protection Program of the US in its present form was started in 1971 when Organized Crime Control Act of 1970 was passed. One of the most important features of this program is that a witness who has a grave threat to his life from the accused or group against whom he has deposed could be permanently relocated along with his/her family to a different part of the country. The USMS assists the witness in generating a new identity, official documentation, getting employment and so on. Witnesses also get monetary help to meet basic living expenses and health care. Marshals keep on visiting the relocated witness to ensure that he or she doesn’t feel threatened and lives in a safe environment. One of the interesting features of the WPP is that even a witness with a criminal record gets protection under this program. However, a witness gets protection only on the instructions of an attorney from the Department of Justice & protection could be withdrawn on attorney’s orders. During a meeting Marshal Rick Green informed-“Under WPP we have provided protection to 8300 witnesses and 9800 family members of those witnesses since the inception of this program in 1971.”
Apart from the USMS, various states too have their own witness protection units. Such units get financial & technological assistance from federal agencies. However, state witness protection programs are not as broader as the one by the USMS.
In India there is no such program to protect witnesses and they have to take care of themselves once the trial is over. The only terror related case in which a witness was well taken care was of a taxi driver Jaishankar Dube (name changed) who deposed in the Gateway of India bomb blast case of 25 August 2003. An individual named Hanif Sayyed & his wife Fahmida hired his taxi from Andheri, a western suburb of Mumbai towards downtown. After placing explosives in the bomb surreptitiously in the taxi, they alighted at Gateway of India and told Jaishanker Dube that after having their lunch at a nearby restaurant they will return in few minutes. Fortunately, Jaishaker Dube also got out of the taxi to answer nature’s call & minutes after the taxi exploded. The bomb blast killed 8 people including tourists which came from various parts of India. At the same time another blast happened at Zaveri Bazar, the prime gold market of Mumbai in another taxi. Unfortunately, in that blast the taxi driver was on the driving seat at the time of explosion and his body split into several pieces of human flesh. Around 60 people died and more than 100 people were injured in both the blasts. These twin blasts were seen as the second biggest terrorist attack in Mumbai after serial bombings of 12 March 1993.
After the blast, Jaishanker Dube rushed to nearby Colaba police station from where he was taken to Police Commissioner’s Office at Crawford Market. I met Dube outside commissioner R.S.Sharma’s cabin. He looked frightened & his khaki colored uniform was wet due to excessive sweating. While all other journalists were busy taking updates on the investigation from Commissioner Sharma, I took this as a good opportunity to interview him. (I decided to record his statement on camera & then hide his face to protect his identity during the broadcast.) However, as soon as I started interviewing him, some police officers rushed towards us and took him away. That was the last when I saw him before he appeared as a witness in POTA (Prevention of Terrorist Act) court 5 years later.
Jaishanker Dube was relocated to some other place by the police and nobody except his close family members knew about his whereabouts. He was provided armed security round the clock. Media tried its best to locate him so that the story of the blasts could be fetched from the horse’s mouth, but no publication or news channel was successful. Meanwhile in 2005, it was also reported that the accused Hanif Sayyed had forwarded a note from Mumbai’s Arthur Road Prison to one gunman from the underworld to trace and eliminate Jaishanker Dube before he deposes before the court. However, the cops arrested the said gunman before he could execute the operation.
Jaishanker Dube was examined by the prosecutors and then cross examined by a battery of defence lawyers. The defence was trying to establish that Dube was an unreliable witness and the explosion in his taxi could be a result of his bad maintenance of the fuel tank of his car. However, Dube although apparently scared, stood by the theory of prosecution. In July 2009, POTA court delivered the verdict and imposed death penalty on Hanif Sayyed, Fahmida Sayyed & another accused Ashrat Ansari. The court accepted the charges leveled by the prosecution that the trio executed the twin blasts at the behest of Pakistan based terrorist organization Lashkar-E-Taiyyaba. (LET) The testimony given by witness Dube played an important role in the conviction.
The conviction in twin blasts case was a significant legal victory for Mumbai Police, However, Jaishanker Dube’s case is just an exception of how witnesses are treated by prosecuting agencies in India. We haven’t seen Dube after his deposition in POTA court and we don’t know what he is doing to support his family. Assistant Commissioner of Police Suresh Wallishetty who was the investigating officer of the twin blast case told me after his retirement – “Although Jaishanker Dube has been provided police security after his deposition, his financial condition is very bad. There has been no official monetary support to him. I took care of him from my own pocket till the time I was in service, but after my retirement it is not possible for me to provide him monetary help.  Today his condition is so bad that he even could not offer a cup of tea to the policemen who are deployed for his protection.”

गवाहों की हिफाजत : अमेरिका से सीखे भारत।

बीते हफ्ते मुंबई की विशेष मकोका अदालत में अंडरवर्लड की ओर से साल 2011 में करवाये गये एक शूटआउट के सिलसिले में बतौर गवाह पेश हुआ। वैसे तो बीते 13-14 सालों में दर्जनों बडे अदालती मुकदमें बतौर पत्रकार मैने कवर किये हैं, लेकिन एक गवाह की हैसीयत से अदालत में पेशी के दौरान अलग ही अनुभव हुए। कठघरे में बैठे आरोपियों की लाल निगाहें घूर रहीं थीं, बचाव पक्ष के वकील  मेरी ओर देखकर आपस में खुसपुसाते थे फिर आरोपियों से आंखों के जरिये मेरी ओर इशारा करते थे, गवाही के लिये अपनी बारी आने के इंतजार में पहले से चल रहे एक अन्य मामले की बोरियत भरी बहस सुननी पडी और इस अनिश्चतता से भी दो चार होना पडा कि मेरी गवाही क्या इसी सुनवाई में ही पूरी हो जायेगी या फिर 2-3 दिन और बर्बाद होंगे?  गवाही से पहले सरकारी वकील से चर्चा हुई जो महाराष्ट्र सरकार की ओर से बनाई गई उस कमिटी के सदस्य हैं जो ये सुझायेगी कि राज्य में गिरता हुआ Conviction Rate कैसे सुधारा जाये (Conviction का मतलब पुलिस की ओर से पकडे गये आरोपी का अदालत में दोषी करार दिया जाना।) महाराष्ट्र का conviction rate फिलहाल 7.8 फीसदी ही है। बाकी सारे मामलों में पुलिस केस हार जाती है और आरोपी छूट जाते हैं।

सरकारी वकील महोदय से चर्चा में ये निष्कर्ष निकला कि ज्यादातर मामले पुलिस इसलिये हार जाती है क्योंकि अदालत में गवाह अपने बयान से मुकर जाते हैं। खासकर संगठित अपराध गिरोहों से जुडे मामलों में ऐसा ज्यादा होता है। ऐसा इसलिये क्योकि संगठित गिरोह अपने साथियों को सजा से बचाने के लिये साम, दाम, दंड, भेद हर मुमकिन कोशिश करते हैं। गिरोह की एक इकाई तो सिर्फ गवाहों को संभालने के लिये ही पूरी तरह से काम करती है। अमेरिका में संगठित गिरोहों की इस रणनीति का तोड सालों पहले 1971 में निकाल लिया गया था जिसके साकारात्मक नतीजे रहे हैं। अमेरिका में United States Marshall Service (USMS)  नाम का एक सुरक्षा संगठन बनाया गया है, जिसकी जिम्मेदारी पूरी तरह से आपराधिक मामलों के गवाहों की हिफाजत और न्यायिक अफसरों की सुरक्षा से जुडी होती है। साल 2011 में अपनी अमेरीका यात्रा के वक्त मैने इस संगठन के कामकाज के तरीके का काफी विस्तार से अध्ययन किया।ये एजेंसी Witness Security Program (WSP) नाम की एक योजना भी चलाता है जिसकी जिम्मेदारी होती है कि किसी बडे मामले के अहम गवाह को परिवार समेत देश में किसी अन्य जगह पर नई पहचान के साथ बसाया जाये। ये एजेंसी उस गवाह को नया नाम देती है, उसके नये कागजात बनवाये जाते हैं, उसके लिये नया ठिकाना खोजा जाता है और वहां उसके रोजगार का इंतजाम किया जाता है। गवाह को आर्थिक मदद भी की जाती है और बीमार होने पर उसका इलाज भी सरकारी खर्च से होता है। गवाह के नये ठिकाने के बारे में जानकारी USMS के चुनिंदा अफसरों को ही होती है। एक अफसर खास तौर पर उस गवाह के लिये नियुक्त किया जाता है जो वक्त वक्त पर गवाह से मिलकर उसकी खैरियत जानता रहता है। USMS की तरह ही अमेरिका के कई राज्यों ने भी अपने अपने संगठन गवाहों की हिफाजत के लिये बना रखे हैं।

भारत में भी Witness Protection Program पर अक्सर चर्चा हो चुकी है, लेकिन कभी गंभीरता से इसपर काम नहीं किया गया। जो एकमात्र मामला मुझे याद आता है वो है साल 2003 के मुंबई में हुए दोहरे बम धमाकों का। 25 अगस्त 2003 को मुंबई के मुंबादेवी मंदिर और गेटवे औफ इंडिया के बाहर 2 बम धमाके हुए थे, जिनमें करीब 60 लोग मारे गये। मुंबादेवी मंदिर के बाहर जिस टैक्सी में बम फटा उसमें टैक्सी ड्राईवर भी मारा गया था, लेकिन गेटवे औफ इंडिया के बाहर जिस टैक्सी में बम रखा गया था उसका ड्राईवर जयशंकर दुबे (बदला हुआ नाम) खुशनसीबी से बम फटते वक्त टैक्सी से दूर था। जयशंकर दुबे मुंबई पुलिस के लिये सबसे अहम गवाह साबित हुआ। उसी की दी हुई जानकारी पर काम करते हुए पुलिस आतंकवादियों तक पहुंची। धमाके वाले दिन के बाद से ही पुलिस ने जयशंकर दुबे को किसी गुप्त ठिकाने पर छुपा दिया था और 3 साल बाद अदालत में गवाही वाले दिन वो सीधे कठघरे में गवाही देते हुए नजर आया। दुबे की गवाही के आधार पर विशेष पोटा अदालत ने मामले के 3 आरोपियों को मौत की सजा सुनाई। गवाही के बाद भी पुलिस ने उसका ठिकाना गुप्त रखा और आज तक किसी को नहीं पता कि जयशंकर दुबे अब कहां है और क्या करता है। सूत्र बताते हैं कि पुलिस की ओर से उसे आर्थिक मदद भी दी गई।


जयशंकर दुबे भारत में एक कामियाब Witness Protection Program की अकेली मिसाल है। इस योजना को औपचारिक तौर पर शुरू किये जाने की जरूरत है ताकि गुनहगारों का ये आत्मविश्वास खत्म हो सके कि गवाहों को डरा धमका कर वे बाहर आ सकते हैं और कानून उनका कुछ नहीं बिगाड सकता।

Monday, 21 October 2013

फिल्म "शाहिद": जांच एजेंसियों की कडवी हकीकत।


बीते रविवार को फिल्म शाहिद देखी। फिल्म को तमाम समीक्षकों ने खूब सराहा है और अपने सितारों वाले मापदंड के मुताबिक इसे कई सितारों से नवाजा है...पर मैं समीक्षकों की ओर से की गई फिल्म की प्रशंसा से प्रभावित होकर इस देखने नहीं गया था। दरअसल फिल्म जिस वकील शाहिद आजमी की कहानी पर आधारित है, वो मेरा अच्छा परिचित था। बतौर पत्रकार मैंने शाहिद का कई बार इंटरव्यू लिया, अदालत में उसके तर्क-कुतर्क सुने और अदालत के गलियारों में वक्त मिलने पर चाय की चुस्कियों के साथ गपशप भी की। शाहिद और मैं हमउम्र ही थे। एक शाम अचानक खबर आई कि शाहिद की गोली मारकर हत्या कर दी गई है। हत्या से चंद दिनों पहले ही एक मित्र के गृह प्रवेश के मौके पर उससे देर तक बात हुई थीं, जिसमें उसने बताया था कि किस तरह से उसकी निजी जिंदगी चुनौतीपूर्ण हो गई थी और किन हालातों में उसे अपनी पत्नी से तलाक लेना पडा। मैं जानना चाहता था कि फिल्मकार ने उसकी कहानी को किस तरह से पेश किया है। ये उम्मीद भी थी कि शायद इस शख्स के बारे में कुछ और भी दिलचस्प जानने को मिल जाये जो कम उम्र में ही आतंकवाद से लेकर पत्रकारिता और वकालत का तजुर्बा हासिल कर चुका था।

मैं कोई फिल्म समीक्षक नहीं हूं, लेकिन फिल्म देखने के बाद ये अहसास हुआ कि फिल्मकार ने शाहिद के व्यकितत्व के साथ इंसाफ करने की ईमानदार कोशिश की है। फिल्म में कई सारी कमियां भी हैं जैसे सांप्रादायिक दंगों के बाद शाहिद का सीधे आतंकवाद से जुडने को विश्वसनीय तरीके से पेश नहीं किया गया है और न ही 26-11 के मुकदमें का फिल्मांकन असल मुकदमें का अहसास देता है (जो कि फिल्म के बाकी हिस्सों में है)। बहरहाल, जो बात इस फिल्म में मुझे सबसे अहम लगी वो थी इसकी ओर से पेश की गई एक कडवी हकीकत। ये हकीकत कि किस तरह से हमारी जांच एजेंसियां तमाम दबावों से प्रभावित होकर आतंकवाद से जुडे मामलों में बेगुनाह लोगों को आरोपी बना देतीं हैं। ऐसे लोग साल दर साल सलाखों के पीछे सडते रहते हैं और असली गुनहगार धमाके पर धमाके करते रहते हैं। फिल्म में जहीर और फहीम नाम के 2 आरोपी जिनके केस शाहिद बतौर बचाव पक्ष का वकील लड रहा था, यही संदेश देते हैं। साल 2002 में हुआ घाटकोपर का बम धमाका, साल 2006 और 2008 में मालेगांव में हुआ धमाका, साल 2006 में मुंबई में हुए लोकल ट्रेनों के बम धमाकों के मामले में जांच एजेंसियों की ओर से की गई गलतियां अब जग जाहिर हैं। जिन लोगों को अदालत मुकदमें के बाद बेगुनाह भी साबित करती है, उनकी जिंदगी शायद ही वापस पटरी पर लौट पाती है। अदालत से बरी होने पर भी जब देश में कहीं कोई धमाका होता है तो पुलिस इन्हें ही सबसे पहले पूछताछ के लिये बुलाती है। हालांकि, मैं इस तरह से बेगुनाहों को आतंकवाद के मामले में फंसाने के लिये सिर्फ जांच एजेंसियों को ही पूरी तरह से जिम्मेदार नहीं मानता हूं। इसके पीछे सियासी दांव पेंच, मीडिया का जरूरत से ज्यादा दबाव और आला पुलिस अफसरों के बीच और अलग अलग जांच एजेंसियों के बीच होने वाली प्रतिद्वंदविता भी शामिल है। ये भी सच है कि कई बार असली आरोपी भी पुलिस की लचर जांच और गवाहों के मुकर जाने की वजह से बरी हो जाता है।


शाहिद कोई मसाला फिल्म नहीं है। न तो इसमें बडे अभिनेता है, न तो कोई आईटम नंबर, न एक्शन, न विदेशी लोकेशन, न अच्छा संगीत, न रोमांस और न कॉमेडी। अगर फिल्म में कुछ देखने लायक है तो वो है इसकी कहानी और नये चेहरों की ओर से किया गया स्तरीय अभिनय। बीते महीने भर में लंच बॉक्स के बाद ये दूसरी ऐसी फिल्म मैने देखी जो कम बजट वाली और आम फिल्मों से हटकर है। जिन लोगों को लंच बॉक्स पसंद आई है, वे इसे पसंद कर सकते हैं।

Saturday, 12 October 2013

अपना गुडलक किधर है भाय?- आर.टी.आई का काला सच।

बीते हफ्ते खबर आई कि एक आर.टी.आई कार्यकर्ता की राजस्थान में ग्राम सरपंच ने पीट पीटकर हत्या कर दी क्योंकि उसने सरपंच के कई घोटालों का पर्दाफाश किया था। ये कोई पहला मौका नहीं है जब किसी आर.टी.आई कार्यकर्ता को जनहित के लिये उसकी ओर से जुटाई गई जानकारी के लिये मारा गया हो। आर.टी.आई ने जहां एक ओर बडी हद तक सरकारी महकमों में भ्रष्टाचार कम करने में मदद की है तो वहीं सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करने वाले हिंसा की भी भेंट चढे हैं। जाहिर है इस तरह की वारदातें इस क्रांतिकारी कानून का इस्तेमाल करने वालों के खौफजदा भी कर रहीं है और हतोत्साहित भी...लेकिन आर.टी.आई कार्यकर्ताओं का एक अलग वर्ग भी है, एक अलग चेहरा भी है जिससे मैं आपको मुखातिब कराना चाहता हूं। आर.टी.आई का ये चेहरा खासकर मुंबई में देखने मिलता है।

मुंबई का लगभग हर बिल्डर एक गुप्त रजिस्टर रखता है। इस रजिस्टर में ऐसे लोगों के नाम की लिस्ट होती है जिन्हें किसी इमारत बनाने के प्रोजक्ट के दौरान बतौर रिश्वत उन्हें एक तय रकतम देनी पडती है। रजिस्टर में एक लिस्ट होती है स्थानीय राजनेताओं की जिनमें इलाके के पार्षद, विधायक और तमाम बडी पार्टियों के स्थानीय पदाधिकारी शामिल होते हैं, एक लिस्ट होती है स्थानीय पुलिस कर्मियों की जिनमें बीट कांस्टेबल से लेकर इलाके के डीसीपी तक के नाम होते हैं, एक लिस्ट होती है जिनमें बीएमसी के तमाम अलग अलग विभाग के अफसरों के नाम होते हैं, एक लिस्ट होती है फायर ब्रिगेड अफसरों की, एक लिस्ट होती है स्थानीय छुटभैये पत्रकारों की, एक लिस्ट होती है इलाके के गुंडों की जिनका बिल्डर अक्सर जमीन हथियाने के लिये या किसी को डराने के लिये इस्तेमाल करते हैं और एक लिस्ट होती है आर.टी.आई कार्यकर्ताओं की। दक्षिण मुंबई में रहने वाले एक मित्र, जो कि वहां के एक बिल्डर का परिचित है के मुताबिक इलाके के हर बिल्डर की लिस्ट में कम से कम 15 तथाकथित आर.टी.आई कार्यकर्ताओं के नाम होते हैं। प्रोजेक्ट शुरू होने की भनक लगते ही ये कार्यकर्ता बिल्डर के पास पहुंच जाते हैं अपना गुडलकमांगने (मुंबईया जुबान में इसे तोडपानी भी कहते हैं)। प्रोजेक्ट के आकार के मुताबिक बिल्डर को हर आर.टी.आई कार्यकर्ता को 5 से 25 हजार रूपये का लिफाफा थमाना पडता है। लिफाफा न मिलने पर कोई भी कार्यकर्ता नई इमारत खडी करने के बिल्डर के गुडलकको बैडलकमें तब्दील कर सकता है। पैसे न मिलने पर आर.टी.आई कार्यकर्ता सूचना का अधिकार का इस्तेमाल कर बीएमसी अफसरों, फायर ब्रिगेड और पुलिस से ऐसे सवाल पूछते हैं, जिनका जवाब देना संबधित अफसरों को भारी पड सकता है। मसलन 7 मंजिल से ऊपर की इमारत में फायर रेस्यू एरिया होना जरूरी है, लेकिन कई बिल्डर वो नहीं बनाते। आर.टी.आई कार्यकर्ता ऐसे में बीएमसी और फायर ब्रिगेड से सवाल करते हैं कि आखिर इमारत को मंजूरी क्यों दी गई? ऐसे में ये अफसर ही बिल्डर पर दबाव डालते हैं कि वो आर.टी.आई कार्यकर्ता की जेबें गर्म करके उसका मुंह बंद करे। कई बार बिल्डर एक दूसरे के खिलाफ भी इन आर.टी.आई कार्यकर्ताओं का इस्तेमाल करते हैं।

आर.टी.आई का इस्तेमाल करना बडा आसान है। बस एक बार पूरी प्रक्रिया समझने की जरूरत है। आर.टी.आई के इस्तेमाल के लिये आपको ज्यादा पढे-लिखे होने की जरूरत भी नहीं है। यही वजह है कि अबसे चंद साल पहले तक आपके मोहल्ले का जो चरसी लोगों से उधार मांग कर या छोटी मोटी चोरी चकारी करके अपना काम चलाता था आज वो खुद को आर.टी.आई कार्यकर्ता कहता है और आलीशान गाडी में घूमता है, बडे ब्रैंड के कपडों और सोने की मोटी चैन और अंगूठियों से लदा दिखता है। मैं कुछेक ऐसे आर.टी.आई कार्यकर्ताओं को भी जानता हूं जिनका आपराधिक रिकॉर्ड रहा है और जो जेल में दिन गुजार कर आये हैं। इन लोगों ने अब एक छोटासा गिरोह बना लिया है जो नये लडकों को आर.टी.आई करना सिखाते हैं या ये कहें कि आर.टी.आई के माध्यम से वसूली करना सिखाते हैं। दक्षिण और मध्य मुंबई के कई ऐसे इलाके हैं जहां हर गली में एक-दो तथाकथित आर.टी.आई कार्यकर्ता आपको मिल जायेंगे।


मुंबई शहर में कई अच्छे आर.टी.आई कार्यकर्ता मौजूद हैं जैसे समीर जवेरी, चेतन कोठारी, कृष्णा राव, अनिल गलगली और सुलेमान भिमानी, जिनके जरिये जुटाई गई जानकारियों ने वाकई में कई घोटालों और अनियमितताओं का पर्दाफाश किया है और भ्रष्ट अफसरों की नींद उडाई है, लेकिन जैसा कि हमारे देश में हर सकारात्मक प्रयोग के साथ होता आया है, वही आर.टी.आई के साथ भी हो रहा है। जिस कानून को अच्छी नीयत और सकारात्मक बदलाव की उम्मीद के साथ लाया गया आज वो अपराधियों और वसूलीखोरों का हथियार बन गया है। अगर ऐसा ही चलता रहा तो जल्द ही ये कानून अपनी धार खो देगा और इसका इस्तेमाल करने वाले सच्चे लोग अपना सम्मान। इन तथाकथित आर.टी.आई कार्यकर्ताओं को गुडलकमिलना बंद न हुआ तो देश का गुडलक छिन सकता है। 

Where is my goodluck bro? Black truth of RTI in Mumbai.

Last week news came that a RTI activist was murdered by a village head whose several scams the activist had exposed. This is not the first case where such an activist has been killed for the kind of information which he sought. Although, RTI to a large extent has helped in limiting corruption in government offices, the activist applying this law to seek information have been victims of violence. Obviously, such incidents are terrorizing & discouraging activists…but there is another section of RTI activists which is very different from this. They have a different face which I want to introduce readers today. This face of RTI activists is especially seen in Mumbai.

Almost, all builders in Mumbai maintain a secret register. This register consists name of those people whom the builder has to pay money as bribes while working on a building construction project. In this register there is a list of local politicians which includes local corporator, MLA & local office bearers of major parties. Another list is of policemen which includes cops from the rank of beat marshalls upto the DCP. There is also a list of BMC officials, fire brigade officials, local journalists & street goons whom the builders use to threaten or evict somebody. A friend residing in south Mumbai who is also an associate of a builder informed me that city builders also maintain a list of RTI activists. Every builder has a list of around 15 RTI activists whom he has to pay from Rs 5000 upto 25000 depending upon the size of his project. Once the builder starts his work, these activists get a whiff of it & approach the builder to demand their share of “Goodluck”. The builder has to present them cash packed envelopes, else, his "goodluck" can turn into “badluck”. If the activists don’t get money, they use RTI & ask such questions to  BMC, Fire Brigade & police officials which could invite trouble for them. For instance, if a building is having more than 7 floors then it is mandatory for the builder to provide a fire rescue assembly area, but many builders don’t do that. In such a case RTI activists may ask BMC & fire brigade, how the permission was given to the builder to start the project? In such cases the officials advise the builders to pay up RTI activists so that they keep their mouth shut. Many a times rival builders use RTI activists against each other.

It is easy to use RTI act. You just have to understand the process once. You need not be highly educated to use it. This is the reason why that a drug addict residing in your neighborhood who was struggling to meet his daily dose few years back by borrowing or stealing now travels in a high end car, wears clothes of expensive brands & is loaded with gold jewelry & calls himself a RTI activists. I know few RTI activists who have criminal records & have spent days in prison. Now they have formed a small gang & train youngsters on how to extort using RTI act.

 Mumbai has been home of several genuine RTI activists like Sameer Zaveri, Chetan Kothari, Krishna Rao, Anil Galgali & Suleman Bhimani but as it happens with any good initiative in our country, RTI act has also become a victim of mockery. A law which was enacted with pure intent & hope of positive change has become an instrument of criminals & extortionists. If this continues, the act will become toothless & genuine activists using it will loose their respect. These so called RTI activists should stop getting their “goodlucks”, else the country will have to forfeit its goodluck.

Monday, 7 October 2013

ठहरो...ठहरो...रामलीला अभी बाकी है।



दशहरे का दिन दस दिवसीय रामलीला आयोजन का आखिरी दिन होता है। इस दिन रामलीला शाम 7 या 8 बजे शुरू होने के बजाय 6 या 7 बजे ही शुरू हो जाती है। दर्शकों की सबसे ज्यादा भीड रामलीला मैदान में इसी दिन दिखाई देती है। मैदान के एक किनारे रंगबिरंगा और भीमकाय रावण का पुतला राख में तब्दील होने के लिये तैयार रहता है। आमतौर पर इस दिन हनुमानजी के हाथों अहिरावण वध का प्रसंग दिखालाया जाता है और उसके बाद होता है राम और रावण का महायुद्ध। विभीषण की सलाह पर राम, रावण की तोंद का निशाना लगाते हैं और रावण ढेर हो जाता है। कई रामलीला मंडलियां रावण की मौत से पहले उस प्रसंग को भी दिखातीं है जिसमें राम, लक्ष्मण से कहते हैं कि वो अंतिम सांसे गिन रहे रावण से राजनीति की शिक्षा लेकर आयें। रावण के मरते ही सभी दर्शकों के चेहरे मंच से हटकर मुड जाते हैं रावण के पुतले की तरफ। आसमान में रंग बिरंगी आतिशबाजी शुरू हो जाती है। बम पटाखों की गर्जना असत्य पर सत्य की विजय की सालाना घोषणा करती है। रावण के पुतले में जडे आतिशबाजी के तमाम आईटम सक्रीय हो जाते हैं और कुछ मिनटों में ही बीते दस दिनों की मेहनत से तैयार की गई ये कलाकृति आग को समर्पित हो जाती है। जैसे ही रावण का पुतला भस्म होता है, भीड रामलीला मैदान से निकलने लगती है। कुछ लोग घर जल्दी पहुंचना चाहते हैं, कुछ दशहरे के मेले में वक्त गुजारना चाहते हैं तो कुछ डांडिया रास के आखिरी दिन का लुत्फ उठाना चाहते हैं। मंच से रामलीला के संचालक गुहार लगाते हैं- भाईयों और बहनों...ठहरिये..ठहरिये...लीला अभी खत्म नहीं हुई है। अभी सीता मैया की अग्नि परीक्षा और भगवान का राज्याभिषेक का प्रसंग बाकी है।...लेकिन संचालक की गुहार को अनसुना करके भीड मैदान से बाहर निकलती रहती है। मैदान 70 फीसदी के करीब खाली हो चुका होता है। संचालक फिर फरियाद करता है- अगर आप राम भक्त हैं तो पूरी लीला देख कर जाईये। आपने अब तक भगवान राम को वन में दर दर भटकते देखा है, अब उन्हें राजा बनते नहीं देखेंगे क्या? संचालक की इस भावनात्मक विनती के बाद कुछ बुजुर्ग लोग रूक जाते हैं, लेकिन ज्यादातर को वहां से निकलने की जल्दी रहती है।

अबसे बीस साल पहले मैने दशहरे के दिन आखिरी बार रामलीला देखी थी। मेरे दादा, दादी, नाना, नानी रामलीला देखने के बडे शौकीन थे और हर साल वे पूरे घर को मुंबई के क्रास मैदान में रामलीला दिखाने ले जाते थे। हम बच्चों को बडा मजा आता था। खासकर राम विवाह वाले दिन होने वाला हंसी मजाक और लंका दहन वाला दिन हमें खासा पसंद था। रामलीला से ही प्रेरित होकर मैं हर साल अपने मोहल्ले के बच्चों को इकट्ठा करके दोपहर के वक्त रावण का छोटासा पुतला खुद बनाकर जलाता था। रावण को आग कौन लगायेगा इस बात पर बच्चों में अक्सर झगडा भी हो जाता। रामलीला का हमें साल भर इंतजार रहता। बीती रात मैं यूं ही दक्षिण मुंबई के एक रामलीला मैदान पहुंचा। लगा कि बचपन की यादें ताजा होंगीं, लेकिन रामलीला में काफी कुछ बदल गया था। राम विवाह का प्रसंग था भीड पहले के मुकाबले काफी कम थी। रामलीला मैदन में जहां पहले हर ओर सिर्फ राम, लक्ष्मण,सीता और हनुमानजी की तस्वीरें लगतीं थीं और इक्का दुक्का मारवाडी प्रायोजकों की दुकानों के बैनर लगते थे, वहीं अब राजनेता के तस्वीरों वाले कट आउट्स नजर आ रहे थे।

अबसे 20 साल पहले तक रात 1 बजे तक रामलीलाएं चलतीं थीं, लेकिन अब अदालती आदेश के बाद 10 बजे ही समापन आरती कर देनी पडती है, नहीं तो पुलिस वाले लाऊड स्पीकर समेत वाद्ययंत्र उठा ले जाते हैं और जुर्माना ठोंकते हैं। नवरात्रि के दौरान मुंबई में बसे 2 तरह के परप्रांतीय देर रात तक जागते मिलते थे। उत्तरभारतीय लोग रामलीला में दिखाई देते तो गुजरातियों की भीड डांडिया रास के आयोजनों में रहती।

मुंबई की रामलीलाओं के दर्शक ज्यादातर मध्यम वर्गीय हिंदू परिवारों से होते थे। 90 के दशक की शुरूवात में जब रामायण और महाभारत दूरदर्शन पर दिखाये गये तो लगा कि रामलीलाओं के मंचन का युग खत्म हो जायेगा, लेकिन तब ऐसा नहीं हुआ। वो दौर ऐसा नहीं था जब हर किसी के घर में टीवी हुआ करता था। कलर टीवी का होना तो और भी बडी बात थी। रामलीलाओं से दर्शक छिनने शुरू हुए सैटेलाईट टीवी का दौर आ जाने से। केबल और डीटीएच के जरिये तो अब शहरों की झुग्गी बस्तियों और गांवों में भी सैटेलाईट चैनलों की पहुंच हो चुकी है। जाहिर है कि टीवी के तमाम चैनलों पर रामायण और हनुमानजी की लीलाओं पर आधारित दर्जनों धारावाहिकों ने भी रामलीला पर अपना प्रभाव छोडा है। जब भगवान आपके टीवी सेट पर ही रोज प्रकट होकर अपनी लीला दिखा रहें हैं तो खुले मैदान में बैठकर रामलीला देखने जाने की जहमत कौन उठाये? पहले बडी रामलीलाओं के ज्यादातर आयोजन मथुरा, वृंदावन वगैरह से पेशेवर कलाकारों की टोलियां बुलाते थे, लेकिन अब ज्यादातर रामलीला आयोजक स्थानीय लोगों से ही रामलीला का मंचन करवाते हैं, जो दिन में कुछ और काम करते हैं और रात में रामलीला के कलाकार बन जाते हैं। हिंदी अखबारों में पहले हर रोज बडे रामलीला आयोजक प्रत्येक दिन की लीला के विज्ञापन दिया करते थे, लेकिन बीते चंद सालों से रामलीला के विज्ञापन अखबारों से गायब हैं।

मुंबई में रामलीला से ग्लैमर जगत भी दूर रहा है। एक ओर जहां मुंबई के बडे गणपति पंडालों में बडे बडे फिल्मी सितारे शीश नवाने जाते हैं और डांडिया में उनकी मौजूदगी आयोजकों की आमदनी बढा देती है तो वहीं फिल्म जगत को अपने में समेटे रहने वाले शहर मुंबई की रामलीलाओं में शायद ही कोई हिट फिल्मस्टार आता हो।


रामलीलाओं में होने वाली भीड भले ही साल दर साल सिमट रही हो, लेकिन अगर रामकथा का ये माध्यम बदलते वक्त के साथ अगर खुद में कुछ बदलाव करे तो शायद फिर पुराने दिन वापस आ सकते हैं।