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Saturday, 2 November 2013

'साहेब' का अधूरा ख्वाब: महाराष्ट्र के बाहर शिवसेना।


इस महीने शिवसेना प्रमुख बालासाहब ठाकरे के निधन की पहली बरषी है। जाने से पहले 86 साल के ठाकरे का एक सपना तो पूरा हो गया कि महाराष्ट्र के विधान भवन पर भगवा लहराये। 1995 में उनकी पार्टी बीजेपी के साथ मिलकर एक बार सत्ता में आ पायी। 80 के दशक में हिंदुत्व का मुद्दा अपनाने के बाद बालासाहब को उम्मीद थी कि पार्टी महाराष्ट्र के बाहर भी अपने पैर पसारेगी और एक राष्ट्रीय पार्टी की शक्ल ले लेगी, लेकिन इस दिशा में कदम अधूरे मन से उठाये गये नजर आते हैं।
शिवसेना की ओर से हिंदुत्व का मुद्दा अपनाने और बालासाहब की निजी छवि ने महाराष्ट्र के बाहर भी खासकर उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान और जम्मू-कश्मीर में कई युवाओं को आकर्षित किया। शिवसेना ने भी इस बात को प्रदर्शित किया कि वो गैर मराठियों के लिये खुली है और इसी के मद्देनजर साल 1993 में दोपहर का सामना नामक हिंदी सांध्यदैनिक निकाला और 1996 में मुंबई के अंधेरी स्पोर्ट्स कॉम्प्लैक्स में उत्तर भारतीय महासम्मेलन का आयोजन किया।
अगर महाराष्ट्र के बाहर किसी राज्य में शिवसेना को अधिकतम कामियाबी मिली तो वो राज्य था उत्तर प्रदेश, जहां पार्टी ने 1991 के चुनाव में एक विधानसभा सीट जीती। अकबरपुर सीट से एक स्थानीय बाहुबली नेता पवन पांडे शिवसेना का विधायक चुन लिया गया। शिवसेना ने उस दौरान लखनऊ, मेरठ, वाराणासी, अकबरपुर, बलिया और गोरखपुर के स्थानीय निकाय चुनावों में भी तगडी मौजूदगी हासिल की। बहरहाल, ये कामियाबी ज्यादा वक्त तक टिकी नहीं। पवन पांडे जो उत्तर प्रदेश में शिवसेना का सबसे मजबूत चेहरा बनकर उभरा था, अगला चुनाव हार गया। उत्तर प्रदेश का कुख्यात अपराधी श्रीप्रकाश शुक्ला पहले पवन पांडे के साथ ही काम करता था। जब मायावती मुख्यमंत्री बनीं तो उन्होने अपने उन सियासी दुश्मनों को निशाना बनाना शुरू किया जिनका आपराधिक रिकॉर्ड था। चूंकि पवन पांडे खुद एक आपराधिक इमेज का शख्स था इसलिये मायावती की मुहीम से खुद को बचाने के लिये उसे उत्तर प्रदेश छोडकर भागना पडा। पांडे की गैर मौजूदगी ने यूपी में शिवसेना के विस्तार को प्रभावित किया। यूपी से भागने के बाद पांडे मुंबई में आकर बस गया और नवी मुंबई के जुईनगर में उसने एक डांस बार खोला पर मुंबई में भी पांडे की कथित आपराधिक गतिविधियां जारी रहीं और पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। उसकी संजय निरूपम से भी अनबन हो गई जिन्हें शिवसेना ने राज्यसभा सांसद और अपने उत्तर भारतीय कार्यक्रम का प्रभारी बना दिया था। आपराधिक मामले में पांडे की गिरफ्तारी से निरूपम को उसे पार्टी से निकाल फैंकने का एक मौका मिल गया। पांडे के निकाले जाने से शिवसेना य़ूपी में बुरी तरह से लडखडा गई। हालांकि शिवसेना ने 90 के दशक में यूपी में 3 बार विधान सभा चुनाव लडा लेकिन बाल ठाकरे कभी खुद वहां चुनाव प्रचार के लिये नहीं गये। ठाकरे के उत्तर प्रदेश न जाने के पीछे हमेशा ये कारण बताया गया कि खुफिया जानकारी के मुताबिक उनकी जान को खतरा है। ठाकरे एकमात्र बार लखनऊ गये थे बाबरी कांड से जुडी एक अदालती कार्रवाई में पेश होने के लिये। शिवसेना से निकाले जाने के बाद पवन पांडे बहुजन समाजवादी पार्टी से जुड गया। हालांकि, बीजेपी नेताओं ने कभी खुले तौर पर ये बात नहीं कही, लेकिन उन्हें डर था कि अगर शिवसेना महाराष्ट्र के बाहर बढी तो उसके वोटर कट सकते हैं।
यूपी के विपरीत दिल्ली में शिवसेना आज तक एक भी विधानसभा सीट नहीं जीत पायी है, लेकिन पार्टी की दिल्ली इकाई अक्सर खबरों में रही है। जब बाल ठाकरे ने पाकिस्तानी खिलाडियों के खिलाफ अपने बैन का ऐलान किया तो जनवरी 1999 में शिवसैनिकों ने दिल्ली के फिरोज शाह कोटला मैदान की पिच खोद डाली। शिवसैनिकों ने शांति प्रक्रिया के तहत शुरू की गईं भारत-पाकिस्तान के बीच बसों की हवा निकाल दी। साल 2000 में अजय श्रीवास्तव जो कि भारतीय विद्यार्थी सेना (शिवसेना की छात्र इकाई जिसके प्रमुख राज ठाकरे हुआ करते थे।) से जुडे थे एकाएक मशहूर हो गये जब उन्होने इनकम टैक्स विभाग की ओर से आयोजित की गई नीलामी में दाऊद इब्राहिम की संपत्ति पर बोली लगई। पिछले साल शिवसैनिकों ने यासीन मल्लिक पर हमला कर दिया जब अफजल गुरू को फांसी दिये जाने के बाद वो दिल्ली आये। शिवसैनिकों ने दिल्ली में ही एक पाकिस्तानी सूफी गायिका के कार्यक्रम में भी तोडफोड की। हालांकि, दिल्ली के शिवसैनिकों की इस तरह की गतिविधियों को अखबारों और टीवी चैनलों पर जगह तो मिली लेकिन इसका कोई चुनावी फायदा पार्टी को नहीं मिला। जयभगवान गोयल, अजय श्रीवास्तव और मंगतराम मुंडे शिवसेना की दिल्ली इकाई के संस्थापक सदस्य थे, लेकिन ये आपस में ही लडते रहते थे। यूपी की तरह ही ठाकरे कभी भी चुनाव प्रचार के लिये दिल्ली नहीं आये।। मार्च 1999 में उनका सम्मान करने के लिये दिल्ली के ताल कटोरा स्टेडियम में एक रैली आयोजित की गई थी, लेकिन ठाकरे उसमें भी शरीक नहीं हुए और अपने बेटे उदध्व को भेज दिया। उस वक्त तक उदध्व शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष भी नहीं बने थे। बार बार गुजारिशों के बावजूद बालासाहब ठाकरे के दिल्ली न आने से उनके कार्यकर्ता हतोत्साहित हुए। दिल्ली के शिवसैनिकों की एक बडी तादाद भारतीय विद्यार्थी सेना की सदस्य थी, लेकिन जब राज ठाकरे ने शिवसेना छोडकर अपनी अलग पार्टी बनाना तय किया तो इन शिवसैनिकों को भी पार्टी में अपना कोई भविष्य नजर नहीं आया। हालांकि, दिल्ली के ये शिवसैनिक राज ठाकरे के साथ उनकी नई पार्टी में शामिल नहीं हो पाये क्योंकि राज ठाकरे ने अपनी नई पार्टी एमएनएस को महाराष्ट्र तक सीमित रखा है। अजय श्रीवास्तव अब शिवसेना के सक्रीय सदस्य नहीं हैं और जयभगवान गोयल ने भी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ अनबन के बाद शिवसेना छोड दी है।
शिवसेना के लिये गुजरात में उस वक्त एक मौका था जब शंकरसिंह वाघेला ने बीजेपी से बगावत की। बीजेपी से निकलने के बाद वाघेला ने खुद की एक पार्टी बनाई, लेकिन उससे पहले उन्होने शिवसेना से एक पेशकश की। वाघेला ने ठाकरे को संदेश भिजवाया कि वो अपने समर्थकों के साथ शिवसेना में शामिल होना चाहते हैं, लेकिन ठाकरे ने उनकी ये पेशकश ठुकरा दी क्योंकि वो बीजेपी से अपने रिश्ते नहीं बिगाडना चाहते थे। ठाकरे को इस बात की शंका भी थी कि गुजरात में शिवसेना कोई झंडे गाड पायेगी क्योंकि शिवसेना के जन्म के बाद शुरूवाती सालों तक उसकी इमेज गुजराती विरोधी रही थी।
दिल्ली की तरह ही शिवसेना की राजस्थान विधानसभा में भी कोई मौजूदगी नहीं है। बहरहाल, 2010 के पिछले स्थानीय निकाय चुनावों में पार्टी को नागौर नगर निगम में 2 और गंगानगर नगर निगम में 7 सीटें मिलीं। हाल ही में उदयपुर विश्वविद्यालय के छात्रसंघ चुनाव में शिवसेना की युवा इकाई युवा सेना का उम्मीदवार अध्यक्ष चुना गया। जयपुर और भरतपुर विश्वविद्यालयों के छात्रसंघ चुनावों में भी युवा सेना ने कुछेक सीटें जीतीं। हालांकि, शिवसेना 1998 से राजस्थान में विधान सभा चुनाव लड रही है, लेकिन बाल ठाकरे एक बार भी वहां चुनाव प्रचार के लिये नहीं गये। साल 2003 के चुनाव में सिर्फ एक बार उदध्व ठाकरे प्रचार के लिये् आये थे। शिवसेना के हिंदुत्ववादी एजेंडे ने कुछ समर्थक जम्मू में भी जुटाये। शिवसेना का एक उम्मीदवार पिछले नगर निगम के चुनाव में पार्षद चुना गया।
हालांकि, शिवसेना का इरादा एक बहुराज्यीय पार्टी बनने का है, लेकिन मौजूद वक्त में वो अपने घरेलू मैदान महाराष्ट्र में खुद के पैर टिकाये रखने के लिये संघर्ष कर रही है।राज ठाकरे की पार्टी एमएनएस, शिवसेना के राज्य में अस्त्तिव पर सीधा हमला कर रही है। एमएनएस की ओर से साल 2009 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में जो नुकसान पहुंचाया गया उससे तो सियासी समीक्षक ये मान बैठे कि शिवसेना का अस्तित्व खतरे में है। बहरहाल साल 2012 के बीएमसी चुनाव जीतकर शिवसेना ने इन समीक्षकों को ये संदेश दे दिया कि अभी उसका अंत उतना निकट नहीं है जितना वो मान रहे हैं। शिवसेना इस बार दिल्ली और राजस्थान के विधान सभा चुनाव लडने जा रही है, लेकिन अगल साल होने जा रहे लोकसभा और महाराष्ट्र विधान सभा के चुनावों के नतीजे ही शिवसेना का भविष्य तय करेंगे।