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Monday, 17 November 2008

समझौते के तहत हुई राज की गिरफ्तारी

अचानक खबर आई कि राज ठाकरे सरेंडर करने जा रहे हैं। 2 बजे खबर आई कि वो मजगांव की अदालत में सरेंडर करने के लिये निकले, 3 बजे खबर आई कि मुंबई पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया और ठीक 4 बजे खबर आई कि उन्हें जमानत मिल गई। 2 घंटे में पूरा खेल खत्म हो गया। राजनीतिक पटल पर "सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे " वाली कहावत की ये एकदम ताजा मिसाल है। उत्तरभारतियों के खिलाफ भडकाऊ भाषण देने के आरोप में जमेदपुर की अदालत में एक वकील ने मामला दर्ज कराया। कोर्ट ने राज के खिलाफ नोटिस जारी किया। जब वो नहीं लौटे तो उनके खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया गया। ये वारंट पहुंचा मुंबई पुलिस के पास जिसे वारंट की तामील करते हुए राज ठाकरे को पकड कर जमशेदपुर की अदालत के सामने हाजिर करना था।महाराष्ट्र सरकार के लिये ये दुविधा वाली हालत थी क्योंकि राज की गिरफ्तारी का मतलब था फिरसे राज्य में हिंसक वारदातों का होना, कानून व्यवस्था की हालत का खराब होना। सरकार अगर राज के खिलाफ कार्रवाई न करती तो न केवल न्यायिक प्रक्रिया की अवमानना होती बल्कि सरकार को केंद्र की ओर दबाव का भी सामना करना पडता, क्योंकि केंद्र सरकार खुद बिहारी नेताओं की ओर से राज के खिलाफ कार्रवाई के लिये दबाव में थी। इसलिये सरकार ने राज ठाकरे से समझौता किया। इस समझौते के तहत राज को गिरफ्तार करने कोई पुलिस अधिकारी उनके घर नहीं पहुंचा, राज अपनी ही कार में अदालत पहुंचे, उनके साथ उनकी पत्नी और खास नेता थे। सरकार ने राज को आश्वस्त किया कि अदालती कार्रवाई जल्दी ही खत्म हो जायेगी और उन्हें जमानत दिलाने में मदद करेगी। पुलिस की ओर से भी पहले की तरह एमएनएस के कार्यकर्ताओं की ऐहतियातन कोई गिरफ्तारी नहीं हुई, न ही कोई खास फोर्स मुंबई में लगाई गई। बदले में राज से सरकार ने वादा लिया कि वो पूरी कार्रवाई को लो प्रोफाईल रखेंगे, कोई बयानबाजी नहीं करेंगे, कार्यकर्ताओं की भीड अपने घर और अदालत पर नहीं बुलाएंगे और राज्य में कहीं भी हिंसक प्रतिक्रिया नहीं होने देंगे। दोनो ने समझौते की शर्तों का पालन किया और सारी कार्रवाई झटपट हो गई। पूरा मामला फिर एक बार संकेत दिलाता है कि कांग्रेस एनसीपी आज शिवसेना के पछाडने के लिये राज ठाकरे को बढावा देने के लिये वही रणनीति अपना रही है, जो 60 के दशक में कांग्रेस ने वाम पार्टियों को ठडा करने के लिये शिवसेना को बढावा देकर अपनाई थी।

Tuesday, 11 November 2008

कायरता का जवाब कायरता है हिंदू आतंकवाद

मुंबई, हैद्राबाद, जयपुर, बैंगलोर, अहमदाबाद, दिल्ली में जब भी बम धमाके हुए हमने कई राजनेताओं, धर्मगुरूओं, समाजसेवकों के मुख से बार बार यही वाक्य सुना - "ये एक कायरतापूर्ण कृत्य है।" मैं बिलकुल इस कथन से सहमत हूं। धर्म के नाम पर इस तरह से बेगुनाह लोगों की जान लेना वाकई में धिक्कारने योग्य है। मैं ये मानता हूं कि जो लोग अदालत के सामने इन बमकांड के लिये दोषी पाये जाएं उन्हें बिना किसी दया के फांसीं पर लटका दिया जाना चाहिये (वैसे फांसीं की सजा भी ऐसे लोगों के लिये कम ही नजर आती है) मानवाधिकार का राग अलापने वाले मृत्यूदंड विरोधियों को तनिक भी तरजीह नहीं दी जानी चाहिये...लेकिन यही सलूक सभी के साथ होना चाहिये...चाहे वो आतंकी किसी भी धर्म में विश्वास रखने वाला हो...वे लोग जो हाल ही में मालेगांव बम धमाकों के बाद ये कह रहे हैं कि ये धमाका हिंदुओं का जवाब था...प्रतिक्रिया थी...गुस्सा था...तो उनसे मैं सहमत नहीं हूं। इस मामले में दोगली सोच नहीं हो सकती। साध्वी, ले.कर्नल पुरोहित और उनके सहआरोपियों ने मालेगांव में धमाके किये या नहीं इसका फैसला न्यायिक प्रक्रिया करेगी..लेकिन मान लीजिये कि ये या फिर इनकी जगह किन्ही और हिंदुओं ने मालेगांव में बम रखा था तो वे भी माफी के काबिल नहीं हैं। अगर इस्लामी आतंकी की ओर से देश के अलग अलग हिस्सों में किये गये धमाके कायरतापूर्ण हरकतें थीं तो मालेगांव, पूर्णा, जालना और परभणी के धमाकों को भी उसी तराजू में तौला जाना चाहिये।
जो लोग हिंदू आतंकवाद के हिमायती हैं या फिर आक्रमक हिंदुत्व के नाम पर अपना गला फाडते या कागज रंगते हैं...उनसे मैं सिर्फ यही कहूंगा कि हिंदू की सशक्त प्रतिक्रिया उसे ही माना जायेगा जब वे उन संगठनों को निशाना बनायें जो कि देश भर में आतंकी वारदातों को अंजाम दे रहें हैं, उन संगठनों की पोल खोलें जो आतंकियों को चोरी छुपे पैसे, साहित्य और लोग मुहैया करा रहे हैं या फिर कुछ ऐसा करें जिससे कि ये संगठन फिर बेगुनाहों की जान लेने में नाकाबिल हो जायें। इस्लामी आतंकियों ने कायरता दिखाते हुए चोरी छुपे बम रखकर नरमेध किया, आपने भी वही किया...आप में उनमें फर्क क्या? दोनो ही कायर...

Monday, 10 November 2008

हिंदू आतंकवाद - नांदेड धमाके से मिले थे संकेत

हिंदू आतंकवाद अपने पैर पसार रहा है ये बात एटीएस और सीबीआई जैसी जांच एजेंसियों को साल 2006 में ही पता चल गई थी। उस वक्त नांदेड में हुए बम धमाके की तहकीकात में ही ये बात साफ हो गई थी कि कई कट्टरपंथी एक समुदाय विशेष को निशाना बनाने की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन उस घटना से हासिल जानकारी को अनदेखा किया गया और नतीजतन कट्टरपंथी अपने मंसूबे में कामियाब हो गये। इसका सबूत है नांदेड धमाके के एक गवाह का बयान, जिसके मुताबिक उसने नागपुर के भोसला मिलिटरी स्कूल में कट्टरपंथियों की ट्रेनिंग देखी और पाया कि युवाओं में नफरत का जहर भरने में फौज और आईबी के पूर्व अफसर भी साथ दे रहे थे।
ये बयान है नांदेड धमाके के गवाह समतकुमार भाटे का जो उन्होने एटीएस को दिया था। भाटे फिलीपिंस की लडाकू कला शॉर्ट स्टिक के जानकार हैं। साल 2000 में उन्हें बजरंग दल की ओर से बुलावा आया कि भाटे उनके कार्यकर्ताओं को भी इस कला कि ट्रेनिंग दें। ट्रेनिंग का ठिकाना था नागपुर का भोसला मिलिट्री स्कूल। भाटे ट्रेनिंग के लिये चले तो गये, लेकिन वहां जाकर उन्होने जो कुछ भी देखा उसने उन्हे हिलाकर रख दिया।)
“ मई 2000 में मैं बजरंग दल के शिविर में मिलिंद परांडे (बजरंग दल के नेता) के कहने पर 300 लाठियों और अपने 3 साथियों के साथ नागपुर के भोसला ट्रेनिंग स्कूल में गया। मुझे लगा था कि वहां सिर्फ मेरी कला का प्रशिक्षण देने के लिये ही ये शिविर लगाया गया है, लेकिन वहां जाकर पता चला कि कराटे इत्यादि जैसी कलाओं के प्रशिक्षण के भी वहां दिये जा रहे थे। प्रशिक्षण देनेवालों में 2 पूर्व सैनिक और एक पूर्व वरिष्ठ आईबी अफसर भी थे । उस ट्रेनिंग में देश के अलग अलग राज्यों से 115 प्रशिक्षणार्थी आये थे और ये कैंप 40 दिनों तक चला। कैंप में मैं हिमांशु पानसे से पहली बार मिला (नांदेड ब्लास्ट का आरोपी जो मारा गया) ट्रेनिंग को गौर से देखने पर पता चला कि युवाओं को गलत राह पर ले जाया जा रहा था और उनका भविष्य खराब है। ये देखकर मैं ट्रेनिंग खत्म होने के एक दिन पहले ही लौट आया। न मैने उनसे कोई मानधन लिया और विचार न मिलने के कारण न ही उन्होने मुझे वापस बुलाया”
अपने बयान में भाटे जिस हिमांशु पानसे की बात कर रहे हैं दरअसल वो नांदेड में 4 अप्रैल 2006 को हुए बम धमाके का एक प्रमुख आरोपी है। उस धमाके में हिमांशु और उसका साथी नरेश मारे गये थे, जबकि 4 अन्य आरोपी घायल हो गये। धमाका आरोपी नरेश राजकोंडवार के घर में ही हुई थी। शुरूवात में धमाके को फटाखों के विस्फोट की शक्ल देने की कोशिश की गई, लेकिन एटीएस की तहकीकात में साफ हो गया कि नरेश के घर में रखा बम एक आतंकी साजिश में इस्तेमाल होना था।

गवाह भाटे का बयान तो ये बताता ही है कि कट्टरपंथियों की ओर से युवाओं को आतंकी ट्रेनिंग दी जा रही है, लेकिन इस बयान के अलावा राहुल पांडे और संजय चौधरी के नार्कोएनेलिसिस टेस्ट भी इस बात को विस्तार से बताते है कि हिंदू कट्टरपंथियों के क्या मंसूबे थे, उन्हें बम बनाने की ट्रेनिंग कौन देता था और विस्फोटक कौन मुहैया करा रहा था.

अपने नार्कोएनेलिसिस टेस्ट में आरोपी राहुल पांडे ने बताया कि- “हिमांशु पानसे ने ही जालना, पूर्णा और परभणी के धमाकों को अंजाम दिया था, जिसमें जालना के धमाके में मैने खुद हिमांशु का साथ दिया। कुछ राजनेता और आरएसएस, वीएचपी और बजरंग दल जैसे संगठनों के सदस्य हिमांशु का साथ दे रहे थे। हिमांशु को बम बनाने की ट्रेनिंग 2 लोगों ने दी थी, जिसमें एक का नाम मिथुन चक्रवर्ती है जो कि पुणे का रहनेवाला है।“

राहुल की तरह ही आरोपी संजय चौधरी का नार्कोएनेलिसिस भी कट्टरपंथियों के मंसूबों की कहानी कहता है- “मिथुन चक्रवर्ती जो कि लंबा चौडा और दाढी रखने वाला आदमी था ने 2 से 3 दिन तक बम बनाने की ट्रेनिंग दी। ये ट्रेनिंग पुणे के पास शिवगड में हुई जहां हिमांशु और उसके साथियों ने 3 तरह के बम बनाने सीखे। ट्रेनिंग से लौटते वक्त मिथुन ने एक बैग दिया जिसमें क बम बनाने का सामान था।“
नांदेड के जिस घर में धमाका हुआ वहां से पुलिस ने पुलिस ने 10 जीवित कारतूस भी बरामद हुए। आरोपियों ने इस बात की तैयारी भी कर ऱखी थी कि अगर कोई हादसा होता है तो उसे पटाखों के विस्फोट की शक्ल दी जाये। इसीलिये घर में बडे पैमाने पर पटाखे लाकर रखे गये। अब सत्तारूढ दल के ही विधायक सरकार से जवाब मांग रहे कि जब नांदेड के वक्त कट्टरपंथियों की साजिश का पता लग चुका था तो सरकार ने ढिलाई क्यों बरती।
अंग्रेजी में एक कहावत है- ए स्टिच इन टाईम सेव्स नाईन...यही सीख अगर सरकार ने नांदेड धमाकों से ली होती तो शायद आगे होनेवाली साजिशों को रोका जा सकता था। एटीएस ने न तो भोसला मिलिट्री स्कूल की ट्रेनिंग में शामिल नेताओं से पूछताछ की और न ही अब तक मिथुन चक्रवर्ती नाम के उस शख्स का पता चल सका है जो कि बम बनाने क ट्रेनिंग देता था।