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Tuesday, 12 August 2014

गोविंदा गेला रे गेला...


बीते 12 साल से मैं जन्माष्मी के मौके पर ठाणे के पांच पखाडी इलाके से अपने चैनल पर लाईव देते वक्त देशवासियों का इस त्यौहार से परिचय कुछ इस तरह से कराता था मुंबई का गोविंदा साहस और संस्कृति का प्रतीक है। ये त्यौहार कई तरह के संदेश देता है। ये टीम वर्क सिखाता है। ये सिखाता है कि ऊंचे लक्ष्य तक पहुचने के लिये जोखिम भी उठाना पडता है। ये सिखाता है कि कई बार मंजिल तक पहुंचने के लिये गिरने-पडने के बाद भी कोशिश करनी पडती है। त्यौहार से ये भी संदेश मिलता है कि आधार अगर मजबूत है तो मिनार देर तक टिकती है, नहीं तो लडखडा जाती है।

इस साल भी शायद यही लाईनें कैमरे पर दोहराता, लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब गोविंदा का त्यौहार वैसा नहीं रहने वाला जैसा सालों से मनाया जाता रहा है। बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश से मैं आंशिक रूप से खुश भी हूं और दुखी भी। खुश इसलिये कि हाईकोर्ट ने नाबालिग बच्चों के इस त्यौहार में शिरकत करने पर रोक लगा दी है। मैं खुद भी यही चाहता था। दुखी इस बात से हूं कि अब इस त्यौहार की जान ही निकल गई है। अदालत का आदेश है कि मटकी लटकाने की ऊंचाई 20 फुट से ज्यादा न हो। इसका मतलब ये कि 5 फुट के 4 आदमी भी अगर एक के ऊपर एक खडे होते हैं तो वे मटकी को लपक लेंगें। अब तक त्यौहार में 9 मंजिलों वाली 40 फुट से ऊंची इंसानी मीनारें बनाई जा चुकीं हैं।  इस तरह अगर ये त्यौहार मनाया जाता है तो मेरी नजर में वो सिर्फ एक औपचारिकता भर होगी। इसमें संसकृति तो मिल जायेगी, लेकिन साहस नहीं रहेगा।

गोविंदा का त्यौहार गोकुल में भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं की नकल कर उन्हें याद करने का एक माध्यम भर नहीं है। ये उससे कहीं ज्यादा है। मेरी नजर में ये मुंबईवालों का एडवेंचर स्पोर्ट्स है। मुंबई के निचले और मध्यम वर्गीय युवा जो स्काई डाईविंग, बंगी जंपिंग, पैरा ग्लाईडिंग, स्कूबा डाईविंग, राफ्टिंग वगैरह जैसे महंगे एडवेंचर स्पोर्ट्स का खर्च वहन नहीं कर सकते, उनके लिये तो सालाना त्यौहार गोविंदा ही अपने जोश को अभिव्यक्त करने का मौका देता है। झुग्गियों और छोटी छोटी चालों में रहने वाले युवा महीने भर पहले से इंसानी मीनारें बनाने की प्रैक्टिस शुरू कर देते हैं। जाहिर है चोट लगने की, घायल होने की या बदनीसीबी से मृत्यू की गुंजाईश तो हर एडवेंचर स्पोर्ट्स में रहती है। एडवेंचर स्पोर्ट्स में जोखिम का होना तो स्वाभाविक है। दुनिया भर में एडवेंचर स्पोर्टस के दौरान हादसे होते है रहते हैं, लेकिन क्या उन खेलों को सरकार बंद कर देती है, या फिर उसमें एडवेंचर की खूबी निकाल लेती है। जोखिम है, खतरा है तभी तो उसमें रोमांच है, दिलचस्पी है। गोविंदा की मनोहरता को नष्ट करने के बजाय जरूरत थी कि गोविंदा पथकों की सुरक्षा पर जोर दिया जाता।

गोविंदा के मौजूदा स्वरूप के विरोधी कहते हैं कि इस त्यौहार ने व्यावसायिक रूप ले लिया था, ये राजनेताओं के प्रचार का एक माध्यम बन गया था वगरैह वगैरह। इस पर मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि कोई त्यौहार अगर वक्त के साथ खुद को बदलता चल रहा है तो क्या बुराई है। राजनेता तो हर उस चीज में अपना हित साधते हैं जिनमें जनता की दिलचस्पी हो। राजनेताओं के पैसों ने त्यौहारों को भव्य बनाया। इसमें डीजे जोडा गया, बडी ईनामी रकमें जोडी गईं, स्पेन के मानव पिरामिड बनाने वाली टीमों को मुकाबले के लिये बुलाया गया, मैनेजमेंट के छात्रों को भी यहां प्रबंधन के गुण सीखने के लिये बुलाया जाने लगा। गोविंदा को बडे पैमाने पर आयोजित करने वाले कुछ राजनेता मेरे दोस्त हैं और ये सभी अलग अलग पार्टी के हैं। मैने एक ओर इन्हें जितना त्यौहार की चमक-दमक पर करते देखा तो दूसरी ओर गोविंदा में शामिल होने वालों की सुरक्षा और उनके बीमा का भी इंतजाम करते देखा। मैं 5 ऐसे राजनेताओं को जानता हूं जो कि गोविंदा बडे पैमाने पर मनाने के लिये मशहूर हैं, उनकी मटकी कम से कम 50 फुट की ऊंचाई पर लटकती है, गोविंदा टीमें वहां 9 मंजिलों का मानव पिरामिड बनाने की कोशिश करतीं हैं और वे लाखों रूपये का ईनाम बांटते हैं। इनमें से 3 राजनेता ऐसे हैं जो कि हिंदुत्ववादी पार्टियों से जुडे हुए हैं। अचरज की बात है कि अदालती आदेश के बाद ये तीनों नेता चुपचाप बैठ गये, वहीं हिंदुओं के त्यौहार को प्रभावित करने वाले इस आदेश को वो राजनेता सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की बात कर रहा है, जिसकी पार्टी खुदको सेकुलर मानती है। वैसे गोविंदा को आधुनिक चकाचौंध वाली शक्ल ठाणे के इसी राजनेता ने ही सबसे पहले दी थी। जब उसके गोविंदा की चर्चा होने लगी और तमाम राष्ट्रीय न्यूज चैनल उसके यहां अपनी ओबी वैन लगाकर लाईव दिखाने लगे तो बाकी राजनेताओं को भी ये आईडिया मिल गया। मुंबई में एक विधायक ऐसा है जो गोविंदा के माध्यम से ही राजनीति में दाखिल हुआ। 2009 के पहले इसे मुंबई में कोई नहीं जानता था...लेकिन उसी साल जन्माष्टमी पर इसने बडी ईनामी रकम वाली मटकी लटकाई और अपनी तस्वीरों के साथ मुंबई भर में उसका जोर शोर से प्रचार किया। फार्मूला काम कर गया। राज ठाकरे की पार्टी एमएनएस ने उसे चुनाव का टिकट दे दिया।


बचपन से ही गोविंदा मेरा पसंदीदा त्यौहार रहा है। अभिनेता शम्मी कपूर पर फिलमाये गये गोविंदा आला रे आला…“ गाते हुए गली के बच्चों के साथ मैं भी छोटे-मोटे मानव पिरामिड बना लेता था। कुछेक बार चोट भी लगी, लेकिन फिर भी सालभऱ इस त्यौहार का इंतजार रहता। अब बतौर टीवी पत्रकार इसका इंतजार रहता था। टीवी तस्वीरों का माध्यम है। इस त्यौहार के रंगों को कवर करने की बात ही अलग थी। बनते-गिरते मानव पिरामिड और पानी की बौछार पर नाचते हुए गोविंदाओं की जोशभरी तस्वीरें शायद अब कभी कवर न मिलें...गोविंदा गेला रे गेला...

Wednesday, 6 August 2014

बचपन चाचा चौधरी के साथ।


मैने कॉमिक्सें पढनी अबसे करीब 20 साल पहले छोड दी थीं लेकिन बचपन के उन 7-8 साल की यादें जब मैं कॉमिक्सें पढता था आज भी ताजा हैं। वो दौर नब्बे के दशक का था जब मैं कॉमिक्सों और बाल पत्रिकाओं का आदी हो गया था। चंपक, टिंकल, लोटपोट, पराग और बालहंस मेरी पसंदीदा बाल पत्रिकाएं थीं। इनके अलावा चाचा चौधरी, महाबलि शाका, नागराज, राजन-इकबाल और मोटी-पतलू के कॉमिक्सों को पढने में काफी दिलचस्पी थी। दिलचस्पी इतनी ज्यादा कि अक्सर घर पर बडों से डांट खानी पडती थी कि लडके का पढाई-लिखाई में मन नहीं लग रहा है, स्कूली किताबों के बजाय कॉमिक्सों में ही घुसा रहता है। कॉमिक्सों की ऐसी लत लग गई थी कि मां को एक बार स्कूल में मेरी क्लास टीचर से शिकायत करनी पडी कि इसकी कॉमिक्सों की आदत छूट नहीं रही है, आप ही कुछ कीजिये। सच भी था। स्कूल से लौटने के बाद मेरा ज्यादातर वक्त कॉमिक्सों की कल्पनाभरी दुनिया में ही गुजरता था। घर से स्कूल में खाने पीने के लिये जो भी रूपये-दो रूपये मिलते थे उन्हें बचाकर मैं कॉमिक्सों खरीद लेता था। मेरे पास कॉमिक्सों का भंडार हो गया था। एक वक्त तो ऐसा आया कि मेरे पास 200 से ज्यादा कॉमिक्स इकट्टठा हो गये। पिताजी ने जब ये भंडार देखा तो पीटने दौडे कॉमिक्सों के चक्कर पडा रहेगा को आगे कुछ कर नहीं पायेगा। बडी मुश्किल से मां ने पिटने से बचाया। उसके बाद मैने अपनी सारी कॉमिक्सें पडोस के एक दोस्त के यहां छुपा दीं और पिताजी से झूठ कह दिया कि कॉमिक्सों को अब रद्दी वाले को बेच दिया है। मेरी ही तरह मेरे कई हमउम्र दोस्त भी कॉमिक्स पढने के शौकीन थे। उन दिनों फेसबुक, यू ट्यूब और व्हाट्स अप कहां था भई। आज हम इन सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर तस्वीरें और वीडियो शेयर करते हैं। उन दिनों हम आपस में कॉमिक्सें शेयर करते थे।

इन कॉमिक्सों और बाल पत्रिकाओं में ऐसा क्या था जो ये बच्चों को इतना लुभातीं थीं?  कॉमिक्सों और बाल पत्रिकाओं को छापना इतना आसान काम नहीं है, ये बात थोडी उम्र होने पर ही समझ में आती है, एक बाल पाठक के रूप में नहीं। कॉमिक्सों की कहानी, उनके चित्र और शब्दों के चयन के लिये खुद बच्चा बनकर सोचना पडता है। दिवंगत कार्टूनिस्ट प्राण और अमर चित्र कथा के संस्थापक अनंत पई इसमें पारंगत थे और भारत के कॉमिक्स जगत पर उनका दबदबा था। भारत में कॉमिक्सें सिर्फ बच्चों के मनोरंजन का माध्यम नहीं रहीं। पई ने अमर चित्र कथा के माध्यम से बच्चों को भारतीय संस्कृति, धर्म और मान्यताओं से परिचय करवाने का भी मिशन चलाया। तमाम ऐसे कॉमिक्स बाजार में आये जिनका उद्देश्य शैक्षणिक था। कई बाल पत्रिकाओं ने बच्चों की लेखन प्रतिभा को प्रोत्साहित करने में भी अहम भूमिका निभाई। राजस्थान पत्रिका ग्रुप से एक बच्चों की हिंदी पत्रिका निकलती है जिसका नाम है बालहंस। 90 के दशक में इसमें व्यावसायिक बाल साहित्यकारों की रचनाओं के अलावा बच्चों की रचनाएं भी प्रकाशित की जातीं थीं (पता नहीं अब ऐसा होता है या नहीं)। उस वक्त बालहंस के संपादक अनंत कुशवहा हुए करते थे। मई 1992 के अंक में इस पत्रिका ने एक निबंध लेखन प्रतियोगिता आयोजित की। देशभर के बच्चों से हिंदी में मेरी मां विषय पर निबंध मंगवाये गये। मैं तब आठवीं कक्षा में था। स्कूल में कुछेक कविताओं और निबंध की प्रतियोगिताएं जीत चुका था। सोचा बालहंस की इस प्रतियोगिता में भी हिस्सा लेकर देखा जाये। विजेता को 250 रूपये का ईनाम दिया जाने वाला था। मैने अपना निबंध भेज दिया। 2 महीने बाद के अंक में प्रतियोगिता के नतीजे घोषित हुए। देखकर यकीन नहीं हुआ कि ये प्रतियोगिता मैने जीत ली थी। चंद दिनों बाद ढाई सौ रूपये का चेक बतौर लेखक मेरी पहली कमाई के तौर पर डाकिया लाया। ढाई सौ रूपये उन दिनों मेरे लिये बडी रकम थी लेकिन ज्यादा खुशी पत्रिका में अपना छपा हुआ नाम देखकर हुई। मेरे निबंध को स्कूल के नोटिस बोर्ड पर प्रिंसिपल ने मेरी प्रशंसा करते हुए लगवाया। खुश होकर उन्होने मुझे फादर कामिल बुल्के का हिंदी-इंग्लिश शब्दकोष भी भेंट किया। उसके बाद लिखने का जो सिलसिला शुरू हुआ है वो आज तक थमा नहीं।


आज कॉमिक्सों का दौर खत्म हो चला है...लेकिन ये प्राकृतिक है। हम अपनी उम्र में जो करते थे, उस उम्र में आज के बच्चे वे सब नहीं करते। कॉमिक्सों की जगह इन दिनों कैंडी क्रश, नीड फॉर स्पीड, फील्ड रनर्स, स्ट्राईक ए कैन, रोड रश, बबल ब्रेकर, एंग्री बर्ड्स वगैरह जैसे ऑनलाईन गेम्स ने ले लिया है जिन्हें छोटे छोटे बच्चे भी टैब पर खेल रहे हैं। 80 और 90 के दशक के तमाम बच्चों को कॉमिक्सों और बाल पत्रिकाओं ने प्रभावित किया था, आज के बच्चों को ये कर रहे हैं। आज कार्टूनिस्ट प्राण के निधन पर चाचा चौधरी और साबू को याद किया जा रहा है। कल को ये भी इसी तरह यादों में समा जायेंगे क्योंकि बचपन पर तब कोई और हावी होगा।