Search This Blog

Sunday, 31 May 2015

सफरनामा: श्रीलंका


साल 2004 में CNN की पूर्व भारत ब्यूरो प्रमुख अनीता प्रताप की लिखी किताब Island of Blood पढी थी। अनीता ने 1983 में LTTE प्रमुख प्रभाकरन का सबसे पहला इंटरव्यू किया था। जाफना में प्रभाकरन तक पहुंचने की कहानी और श्रीलंका के गृहयुद्ध के इतिहास का उन्होने अपनी किताब में बडा ही दिलचस्प ब्यौरा दिया है। उस किताब को पढकर मैं भी प्रेरित हुआ था कि अपने पत्रकारिता के करियर में मैं भी कभी प्रभाकरन तक पहुंचूं और उससे अपने सवाल पूछूं। मुझे खुद देखना था कि किस जज्बें के साथ वो तमिलों को श्रीलंकाई सरकार से जंग के लिये तैयार करता है, किस तरह लोग उसके कहने पर अपनी जान देने को तैयार हो जाते हैं...पर वो तो सिर्फ एक ख्वाब ही रह गया। 2005 से हिंदी न्यूज चैनलों का सबसे घृणित दौर शुरू हुआ। गंभीर खबरों के बजाय नाग-नागिन, खली पहलवान, राखी सावंत के ड्रामें, उडनतश्तरी, राधा बन नाचने वाले डीआईजी, भूत-प्रेत, अश्लील एमएमएस, शाहिद-करीना लिपलॉक जैसी खबरें हिंदी न्यूज चैनलों पर हावी हो गईं। ऐसे में प्रभाकरन के बारे में कोई क्यों सोचता ? 2009 तक जब  हिंदी न्यूज चैनल अपने इस काले दौर से उबरे और गंभीर खबरों के पुराने दिन लौटने लगे तब तक प्रभाकरन और LTTE को श्रीलंकाई फौज खत्म कर चुकी थी। खैर, प्रभाकरन के इंटरव्यू के लिये तो मैं श्रीलंका नहीं जा सका लेकिन हाल ही में मुझे टापू पर बसे इस छोटे से खूबसूरत देश को घूमने का मौका मिला अंतरराष्ट्रीय ब्लॉगर्स कॉन्फ्रेंस में शिरकत करते वक्त। श्रीलंका के हफ्तेभर के दौरे में जो देखा, सुना और समझा यहां पेश है।

ढाई दशक का नर्क।
श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में आज सबकुछ सामान्य नजर आता है। लोग बेखौफ होकर सफर करते हैं, बाजार सजते हैं, पर्यटकों की चहल पहल रहती है, स्कूल-कॉलेज चलते हैं। कोलंबो आज बेहद साफ सुथरा और अनुशासित शहर नजर आता है...पर दशक भर पहले तक कोलंबो की ऐसी तस्वीर नहीं थी।

स्वतंत्र तमिल ईलम (राष्ट्र) बनाने के लिये तमिल टाईगर्स और श्रीलंका सरकार के बीच ढाई दशक तक जो जंग चली उसने श्रीलंका निवासियों की आम जिंदगी को तारतार कर दिया था। इस लडाई में 80 हजार लोग मारे गये और लाखों लोग घायल हुए। कोलंबो पुलिस के एक अधिकारी मेरे मित्र हैं। उन्होने बताया कि दशकभर पहले तक कोई शख्स अगर सुबह घर से निकलता था, तो उसके जिंदा वापस लौटने की कोई गारंटी नहीं थी। बम धमाके होना आम बात हो चुकी थी। पति-पत्नी अगर घर से निकल कर एक ही ठिकाने पर जा रहे हैं तो दोनों एक ही वक्त पर नहीं निकलते थे, न एक ही ट्रेन या बस में साथ सफर करते थे। ऐसा ये सोच कर किया जाता था कि अगर बम धमाके में कोई एक मर गया तो बच्चों को संभालने के लिये दूसरा जिंदा बच सके। बस में भी सफर करने वाले लोग एक दूसरे को शक की नजरों से देखते थे कि पता नहीं किसके बैग या थैले में बम रखा हो। जगह-जगह पर पुलिस की तलाशी आम बात थी। शहर के मुख्य इलाके में अब कारें पार्क की जा सकतीं हैं, लेकिन पहले कार पार्किंग की इजाजत नहीं थी। पुलिस अधिकारी मित्र के मुताबिक गृहयुद्ध के दौर में कोलंबों में अपराध भी काफी बढ गये थे, क्योंकि पुलिस की पूरी ताकत आतंकवाद से निपटने के लिये लगी हुई थी। गुनहगारों की तरफ ध्यान नहीं था, इसलिये उनके हौंसले बुलंद थे, लेकिन अब अपराध काफी कम हो गये हैं। यहां तक कि ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करने वालों पर भी बारीकी से नजर रखी जाती है। कोई राहगीर अगर लालबत्ती पर सडक पार कर ले या कोई सार्वजनिक ठिकाने पर सिगरेट फूंकता नजर आ जाये तो उस पर कार्रवाई की जाती है।


सिंहली vs तमिल नहीं, अब सिंहली vs मुसलिम
बीते ढाई दशकों के दौरान आम सिंहली और तमिल एक दूसरे को नफरत की नजर से देखते थे। दोनो समुदायों के बीच कई दंगे हुए जिनमें काफी खूनखराबा हुआ। सिंहली बहुल श्रीलंका में तमिल खुद को असुरक्षित महसूस करते थे, लेकिन अब दौर बदल रहा है। दोनो समुदायों के बीच कटुता खत्म हो रही है। तमिल अब अपने त्यौहार खुलकर मना सकते हैं। कांडी से नुरूवा इलिया नाम की जगह जाते वक्त हमें तमिलों का जुलुस दिखाई दिया। तमिल ग्रामीणों ने गणपति, देवी और मुरूगन की प्रतिमाओं के साथ एक झांकी निकाली थी। इस त्यौहार को तिरूला कहा जाता है जो कि लोगों की अच्छी सेहत के लिये मनाया जाता है। जुलूस में शिरकत करने वाले लोग बैखौफ और उत्साह से भरे हुए थे, जो कि ये बताता है कि तमिलों के मन से असुरक्षा की भावना खत्म हो रही है।
सफर के दौरान मैने कई सिंहली और तमिलों से बात की और उन सभी का यही कहना था कि दोनो समुदायों के बीच दूरी सियासत की वजह से थी, लेकिन अब आम सिंहली और तमिल एक दूसरे के साथ दोस्ताना सलूक करते हैं।

श्रीलंका में तमिल और सिंहली के बीच की खाई भले ही पट रही हो, लेकिन इनका टकराव अब शुरू हो गया है मुसलिम समुदाय के साथ। बीते चंद सालों में बौद्ध धर्म को मानने वाले सिंहली और मुसलिमों के बीच हलके फुलके टकराव हो रहे थे, जिन्होने जून 2014 में भयानक शक्ल ले ली। देश के दक्षिण-पश्चिमी इलाके में सिंहली और मुसलमानों के बीच भीषण दंगे हुए जिनमें 4 लोग मारे गये, 80 घायल हुए और करीब 10 हजार लोग बेघर हुए। कट्टरवादी सिंहली संगठन बोडू बाल सेना (BBS) ने इन दंगों में एक अहम भूमिका अदा की थी। संगठन की ओर से ये प्रचार किया जा रहा है कि मुसलमान सिंहलियों से कारोबार और रोजगार के मौके छीन रहे हैं और अपनी बढती आबादी के चलते एक दिन पूरे देश पर कब्जा कर लेंगे। सफर के दौरान चंद सिंहली लोगों से बातचीत के दौरान मुझे मुसलिमों के प्रति उनकी नफरत का अहसास हुआ। फिलहाल श्रीलंका की 9 फीसदी आबादी मुसलिम है।

बफर स्टेट श्रीलंका।
राजनीतिशास्त्र में एक कॉन्सेप्ट है Buffer State का। Buffer State  का मतलब वो देश जो कि 2 प्रतिदवंद्वी राष्ट्रों के बीच पडता है और सामरिक रूप से दोनो देश जिसपर अपना प्रभुत्व कायम रखने की कोशिश करते हैं। श्रीलंका की स्थिति इस वक्त भारत और चीन के लिये Buffer State  की ही है। दोनो ही देश श्रीलंका को आर्थिक और तकनीकी मदद देकर उसे अपने पाले में रखना चाहते हैं ताकि एक दूसरे पर नजर ऱखी जा सके और कल को अगर चीन और भारत के बीच जंग होती है तो श्रीलंका की समुद्री सीमा और उसके इंफ्रास्ट्रकचर का इस्तेमाल किया जाये।
चीन की ओर से बनाया जा रहा लोटस टॉवर

श्रीलंका के मौजूदा राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरीसेन की सरकार भारत के अनुकूल देखी जा रही है, जबकि उनके पहले महिंदा राजपक्षे की सरकार का झुकाव चीन की ओर था। उन्ही के कार्यकाल में चीन को श्रीलंका में अपने पैर जमाने के मौके मिले। चीन ने यहां कई प्रोजेक्ट्स हासिल किये। उन्ही में से एक प्रोजक्ट है कोलंबो के पश्चिमी तट पर समुद्र को पाट कर एक पोर्ट सिटी बनाने का। नई सरकार ने इस प्रोजक्ट पर कई तरह के ऐतराज जताते हुए रोक लगा दी है, जिसे कि भारत अपने फायदे में देख रहा है। कोलंबों में हमने चीन की ओर से बनाया जा रहा लोटस टावर भी देखा। कहने को तो इसे दूरसंचार के उद्देश्य से बनाया जा रहा है, लेकिन भारत को शंका है कि इसका इस्तेमाल भारत के खिलाफ जासूसी के लिये किया जायेगा। इस टावर का निर्माण कार्य भी नई सरकार ने रोक दिया है। वैसे श्रीलंका की सुरक्षा एजेंसियों में काम करने वाले लोग संयुक्त राष्ट्र में गृहयुद्ध के दौरान मानवाधिकार हनन के मुद्दे पर भारत के श्रीलंका विरोधी रूख से खफा हैं।

फिर लौटे पर्यटक
कोलंबो शहर में वैसे तो मुझे कुछ खास दिलचस्प देखने लायक नहीं लगा, लेकिन श्रीलंका के अंदरूनी इलाकों में कई ऐसे स्थल हैं जो मन मोह लेते हैं। कोलंबो से करीब 150 किलोमीटर दूर कांडी नाम का हिल स्टेशन है। यहां तक पहुंचने का रास्ता ही आपको मुग्ध कर देता है। हरेभरे पहाड, नदियां, चाय के बागान, छोटी-बडी बुद्ध प्रतिमाओं से गुजरते हुए आप कब कांडी पहुंच जाते हैं पता ही नहीं चलता। कांडी में गौतम बुद्ध का दांत एक मंदिर में रखा गया है। यहां पर श्रीलंका के रत्नों का कारोबार भी होता है। पर्यटकों के लिये यहां सांस्कृतिक नृत्य के कार्यक्रमों के इंतजाम रहते हैं। एक चाय की फैकटरी में घूमने का मौका भी मिला और जाना कि किस तरह से चाय की पत्तियां बागान से निकलकर एक जटिल प्रकिया से गुजरते हुए, पैकेट में बंद होकर आपके किराने की दुकान तक पहुंचतीं हैं। इसी दौरान एक क्रूर सच को जानकर मन भी खट्टा हुआ। चाय के बागान अंग्रेजों ने अपने शासनकाल में लगाये थे और इन्हें लगाने के लिये सैकडों की तादाद में उन्होने हाथियों की हत्या करवाई थी। ज्यादा हाथी मारने वालों को वे ईनाम भी देते थे।
नुआरा इलिया नाम का हिल स्टेशन भी गजब का है। इस हिल स्टेशन को श्रीलंका का स्विजरलैंड कहा जाता है। यहीं से 15 मिनट के फासले पर अशोक वाटिका भी है जिसे स्थानीय लोग सीता इलिया नाम से जानते हैं। स्थानीय तमिलों का मानना है कि रामायण के मुताबिक जिस जगह रावण ने सीता को रखा था, वो यही अशोक वाटिका है। यहां से एक नदी गुजरती है, जिससे सटे पत्थरों पर पैरों के रहस्यमयी निशान नजर आते हैं। स्थानीय लोगों के मुताबिक ये हनुमानजी के पैरों के निशान हैं। इस जगह सीता का एक मंदिर बनाया गया है। मंदिर के ठीक सामने एक बडा पर्वत है जो कि दूर से देखने पर एक भीमकाय बंदर की तरह नजर आता है। स्थानीय लोग इस पर्वत को गोरिल्ला हिल कहते हैं। ये जगह रामायण में वर्णित अशोक वाटिका है या नहीं इस पर पुरातत्वविद, इतिहासकार और तर्कणावादियों के अलग अलग विचार हो सकते हैं, लेकिन जिस तरह हिंदू पर्यटक यहां आकर भावविभोर होते दिखे उसके मद्देनजर इस जगह को एक पर्यटन स्थल या तीर्थ स्थल के तौर पर प्रचारित करने की अपार संभावना नजर आती है जो कि श्रीलंकाई सरकार ने किन्ही कारणों से अब तक नहीं किया। यहां हमारे टूर गाईड एंटोन परेरा ने एक दिलचस्प बात बताई। परेरा के मुताबिक श्रीलंका में अगर कोई वस्तु या व्यकित गुम हो जाता है तो उसको वापस पाने के लिये लोग हनुमानजी की पूजा करते हैं। पूजा करने की एक खास विधि होती है और ये पूजा बौद्ध धर्म और ईसाई धर्म मानने वाले कई लोग भी करते हैं।


श्रीलंका से करीब 35 किलोमीटर की दूरी पर है नेगोंबो। समुद्र किनारे बसा ये कस्बा भारत के गोवा की याद दिलाता है। साफ सुथरे समुद्र तट, वॉटर स्पोर्ट्स, छोटी छोटी गलियां, डच नहरें, लगून वगैरह यहां देखने और करने के लिये बहुत कुछ है। मैने नेगोंबो और कोलंबों के बीच एक छोटी सी रेल यात्रा भी की। हरे भरे नारियल पेडों और छोटे छोटे गांवो के बीच से गुजरती हुई ट्रेन सफर को यादगार बनाती है। मुंबई और गोवा के बीच कोंकण रेल के सफर का अहसास इस सिंगल पटरी की छोटी सी रेल यात्रा में मिलता है।
श्रीलंका के किसी भी इलाके में घूमते हुए ऐसा लगता है मानो आप दक्षिण भारत में हों। फर्क इतना है कि यहां आपको साफ सफाई और अनुशासन ज्यादा देखने मिलेगा और भीडभाड थोडी कम। खाने के लिये हर जगह इडली, वडा, दोसा मिल जायेगा। चाहे आप शाकाहारी हों या मांसाहारी, खाने में वो सबकुछ उपलब्ध है जो कि दक्षिण भारत में मिलता है। उत्तर भारतीय रेस्तरां उतने नहीं हैं। कुछ चीजे यहां पर महंगीं नजर आ सकतीं हैं, क्योंकि कीमतें यहां पर गोरे पर्यटकों को ध्यान में रखते हुए डॉलर के मुताबिक तय की गईं हैं।
एंटोन परेरा के मुताबिक गृहयुद्ध के दिनों में ये तमाम पर्यटन स्थल उजड गये थे। लोगों का रोजगार छिन गया था, लेकिन बीते चंद सालों में काफी बदलाव आया है। ये ठिकाने फिर गुलजार हो रहे हैं, इनकी रौनक लौट रही है।

Thursday, 14 May 2015

पगले के हाथ में परमाणु बम !

एक बार ओशो ने विश्वयुद्ध पर बात करते हुए अपने प्रवचन में एक वाकया सुनाया। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद किसी ने मशहूर वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टाईन से पूछा कि तीसरे विश्वयुद्ध के बारे में उनकी क्या भविष्यवाणी है। आइंस्टाईन ने जवाब दिया कि मैं तीसरे विश्वयुद्ध के बारे में कुछ नहीं कह सकता लेकिन चौथा विश्वयुद्ध कैसा होगा इसकी भविष्यवाणी मैं कर सकता हूं। फिर उस शख्स ने पूछा कि बताईये चौथा विश्वयुद्ध कैसा होगा? इस पर आइंस्टाईन का जवाब था कि उनकी भविष्यवाणी है - विश्वयुद्ध होगा ही नहीं। तीसरा विश्वयुद्ध ही इतना विनाशकारी होगा कि चौथा विश्वयुद्ध लडने के लिये धरती पर इंसान ही नहीं बचेंगे। जाहिर है आइंस्टाईन का इशारा परमाणु युद्ध की ओर था जो कि हमारी दुनिया की गर्दन पर तलवार की तरह लटका है। इसी संदर्भ उत्तर कोरिया से आई खबर चिंताजनक है। उत्तर कोरिया के शासक किम जों उन ने अपने रक्षा प्रमुख को सिर्फ इसलिये मिसाईल दाग कर मरवा दिया क्योंकि वो एक मीटिंग में सोता हुआ पाया गया। उसकी कोई सुनवाई नहीं हुई, कोई न्यायिक प्रकिया नहीं चली...सीधे सजा-ए-मौत! वो भी क्रूरतम तरीके से मौत!
बीवी के कहने पर पूर्व प्रेमिका को गोली मरवा दी
उत्तर कोरिया एक परमाणु हथियार से लैस देश है ये बात साल 2006 के परमाणु परीक्षणों के बाद साबित हो चुकी है। इस देश के परमाणु हथियार एक ऐसे आदमी के कब्जे में हैं जो कि अपने खिलाफ की हुई छोटी सी बात भी बर्दाश्त नहीं करता, अपनी पत्नी के कहने पर अपनी पुरानी प्रेमिका और उसके ऑरकेस्ट्रा में काम करने वाले साथियों को मरवा देता है, शक के आधार पर अपने सगे चाचा और गुरू जंग सोंग थेक का कत्ल कर देता है। जब थेक की पत्नी इसका विरोध करती है तो उसे भी वो जहर देकर मार देता है, अपने आदेश की जरा सी भी अवमानना होने पर अपने अधिकारियों को जिंदा जला देता है। अपने पिता की मौत के बाद शोक काल के दौरान शराब पीते पाये गये एक मंत्री को बम से उडा देता है। 2013 से अब तक इस तरह से उत्तर कोरिया के करीब 70 अधिकारियों को मारा जा चुका है। ये शख्सियत है उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन की।

नंगी, भूखी प्रजा के साथ बेरहमी उत्तर कोरिया में आम है।
आप सोचेंगे कि किसी तानाशाह की ओर से अपना खौफ बरकरार रखने के लिये और भविष्य में होने वाले किसी विद्रोह को दबाने के लिये ऐसे तरीके अपनाया जाना कोई असामान्य बात नहीं है। दुनिया का इतिहास ऐसी सैकडों मिसालों से भरा पडा है जिसमें तानाशाहों ने अपने खिलाफ उठी आवाज को कुचल दिया। कुछ लोग ताजा उदाहरण दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को भी मान सकते हैं, मद्देनजर उस नीति के जो उन्होने अपनी पार्टी के सहकर्मियों और मीडिया के प्रति अपनाई है। बहरहाल, बात उत्तर कोरिया की। अपने पिता की मौत के बाद शासक बने किम ने जो रवैया अपनाया, जो हरकतें कीं, उनसे किम की मानसिक दशा के बारे में कई संकेत मिलते हैं। उनसे ये पता चलता है कि वो कितना बेरहम है, कितना संवेदनाहीन है, कितना कान का कच्चा है, कितना असुरक्षित महसूस करता है, कितना अपरिपक्व है, कितना दुस्साहसी है और कितना खतरनाक है। ऐसा शासक अपनी प्रजा और सरकारी तंत्र के लिये तो दुर्भाग्य है ही लेकिन आज के वक्त में दुनिया की शांति के लिये भी खतरा है, खासकर दुनिया के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र की सुरक्षा की हालत इसने बेहद नाजुक बना दी है। वैसे तो किम के पिता और दादा भी अपने क्रूर और अजीबोगरीब फरमानों के लिये चर्चा में रहे हैं और अपनी प्रजा से खुद को मसीहा मनवाते रहे हैं, लेकिन किम क्रूरता के नये मापदंड स्थापित कर रहा है। क्रूरता के मामले में उसकी तुलना ISIS  से की जा सकती है। फर्क सिर्फ इतना है कि ISIS अपने क्रूर कृत्यों के वीडियो और तस्वीरें खुद जारी करता है, जबकि किम की हैवानियत की खबरें दक्षिण कोरिया की खुफिया एजेंसियां और समाचार संस्थानों के मार्फत आतीं हैं।


दुनिया की चौथी सबसे बडी फौज।
जबसे किम उत्तर कोरिया का शासक बना है तबसे बीसियों बार वो परमाणु हथियारों के दम पर दक्षिण कोरिया को धमका चुका है और अमेरिका को भी घुडकी दे चुका है। 2013 में खबरें आईँ कि वो Intercontinental Ballistic Missiles बनाने की कोशिश भी कर रहा है जिनसे की वो दूसरे महाद्वीप के देशों को भी अपने निशाने पर ले सकता है। किम किसी की नहीं सुनता सिवाय चीन के, लेकिन जिस तरह की शख्सियत किम की है उससे वो चीन की भी कब सुनना बंद कर देगा इसका भरोसा नहीं। उत्तर कोरिया का सामाजिक जीवन सोनगुन नाम के सिद्धांत पर आधारित है जिसका मतलब है सबसे पहले फौज।यही वजह है कि उत्तर कोरिया का समाज दुनिया का सबसे बडा सैन्यीकरण किया हुआ समाज है। उत्तर कोरिया की सेना दुनिया की चौथी सबसे बडी सेना है। ऐसे में अपनी ताकत के गुरूर में आकर किम जैसा शख्स कभी कोई दुस्साहस नहीं करेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं। रक्षा विश्लेषकों कहते हैं कि पाकिस्तान में जिस तरह आतंकवाद हावी हो रहा है, उससे एक डर है कि कहीं वो सत्ता अपने कब्जे में लेकर परमाणु हथियार हासिल न कर लें। धर्म के नाम पर पागल हुए लोग, परमाणु हथियारों के जरिये विनाशलीला न शुरू कर दें। पाकिस्तान के बारे में जो आशंकाएं हैं वो भविष्य को लेकर हैं, लेकिन उत्तर कोरिया में तो इस वक्त ही एक पागल आदमी परमाणु बम लिये हुए खडा है और इस पागल आदमी को लेकर चिंता सिर्फ दक्षिण कोरिया को ही नहीं करनी चाहिये... 
सटक गई तो सबको ठोंक डालूंगा !!!

Tuesday, 5 May 2015

ऐसे ब्रेक हुई सलमान के हिट एंड रन की खबर !

(तमाम उतार चढावों के बाद सलमान खान के हिट एंड रन का मुकदमा अब अपने अंजाम पर पहुंच रहा है। 28 सितंबर की सुबह मैने इस खबर को ब्रेक किया था। उस वक्त मैं आज तक न्यूज चैनल के लिये काम करता था। ये खबर मेरे टीवी पत्रकारिता के करियर की कुछ रोमांचक और यादगार कवरेजों में से एक है। पढिये 13 साल पहले कैसे ब्रेक हुई थी ये खबर।)


28 सितंबर की सुबह करीब 6 बजने वाले थे। मैं मुंबई के मसजिद बंदर इलाके में अपने नाना के घर पर सो रहा था। मोबाईल फोन की घंटी बजी। आंखें बिना पूरी खोले ही मैने कॉल रिसीव किया। दूसरी ओर एक पुराना सूत्र था सो रहे हो क्या? रात को सलमान ने बांद्रा हिल रोड पर अपनी गाडी ठोंक दी है। 4-5 लोगों को उडाया है। एक दो लोग मर भी गये लगता है। उसकी गाडी टोचन करके (टॉविंग वैन के जरिये) अभी बांद्रा पुलिस स्टेशन के बाहर लेके आ रहे हैं

खबर सुनते ही मैं उठ बैठा। तुरंत बांद्रा पुलिस थाने के एक परिचित अधिकारी को फोन किया। कई बार कोशिश करने पर भी उसने फोन नहीं उठाया। खबर की आधिकारिक पृष्टि करनी थी। मैने मुंबई पुलिस के कंट्रोल रूम को फोन किया। कंट्रोल रूम का फोन लगातार व्यस्त आ रहा था। आखिर मैने उस इलाके के तत्कालीन डीसीपी बिपिनकुमार सिंह को फोन किया। सिंह ने फोन उठाया और मेरे कुछ पूछने से पहले ही कहा- जीतेंद्र। मैं घर से बांद्रा पुलिस स्टेशन ही जा रहा हूं। सलमान के कार के एक्सीडैंट की खबर सही है, लेकिन डिटैल मैं वहीं पहुंच कर दे पाऊंगा

डीसीपी ने खबर की पृष्टि कर दी थी। मैने दिल्ली में असाईनमेंट डेस्क को फोन करके इस बारे में जानकारी दे दी, लेकिन खबर तुरंत न उतारने की गुजारिश की। मै चाहता था कि खबर तस्वीरों के साथ उतरे। निवेदन मान लिया गया और तय हुआ कि जब तक मैं घटनास्थल की तस्वीरें लेकर नहीं आता तब तक खबर नहीं दिखाई जायेगी। इस बीच अगर कोई दूसरा चैनल ये खबर चलाता है तो मेरा भी फोनो लेकर चैनल पर खबर उतार दी जायेगी। मैने तुरंत कैमरामैन गजाजन गूजर को फोन किया। (गूजर अब मराठी चैनल एबीपी माझा के तकनीकी विभाग के मुंबई में प्रमुख है) वे मुंबई के उत्तरी उपनगर बोरीवली में रहते थे। मैने उन्हें कहा कि वे लोकल ट्रेन पकड सीधे बांद्रा उतरें और बांद्रा पुलिस थाने पर पहुंचें...लेकिन बिना कैमरे के गजानन गूजर बिना उस्तरे के हज्जाम होते! कैमरा तो नरीमन पॉइंट में आज तक के ऑफिस में रखा था। मैने अपनी मोटरसाईकिल उठाई और नरीमन पॉइंट के ऑफिस पहुंचकर कैमरा के बैग को गले में डाला। मोटरसाईकिल की मंजिल अब बांद्रा पुलिस थाने थी। आमतौर पर इतनी बडी खबर पर निकलने से पहले मुझे अपने तत्कालीन ब्यूरो चीफ मिलिंद खांडेकर को इत्तला करना चाहिये था, लेकिन उन दिनों मिलिंदजी की सेहत ठीक नहीं थी और ऐसी हालत में इतनी सुबह उन्हें जगाना ठीक नहीं लगा।

मेरी मोटरसाईकिल तुलसी पाईप रोड के रास्ते बांद्रा की ओर आगे बढी। उतनी सुबह सडक बिलकुल खाली थी, न ज्यादा लोग थे और न ही वाहन। मैं 90 किलोमीटर की रफ्तार से आगे बढ रहा था। मेरी मोटरसाईकिल कोई स्पोर्टस बाईक नहीं थी, बल्कि हीरो होंडा कंपनी की साधारण स्पेलेंडर बाईक थी और ऐसी मोटरसाईकिल के लिये 90 किलोमीटर की रफ्तार बहुत ज्यादा होती है। इस रफ्तार से मैने अपने जीवन में सिर्फ 2 बार ही मोटरसाईकिल चलाई है। एक सलमान की इस खबर को ब्रेक करने के लिये और दूसरी बार ठाणे जेल में हर्षद मेहता की मौत की खबर ब्रेक करने के लिये। लोअर परेल फ्लाईओवर से गुजरते वक्त बाईक हवा के थपेडों से कांप रही थी। जरा सी भी फिसलन होने पर जान जाने का खतरा था। आज जब उस सफर को याद करता हूं तो रोंगटे खडे हो जाते हैं, लेकिन 23 साल की उस उम्र में डर का अहसास नहीं था क्योंकि तब रूह में जोश, जुनून और हिम्मत का आगाज ही हुआ था। आज मुझे लगता है कि वो मेरा दुस्साहस था।

आज तक को 24 घंटे का न्यूज चैनल बने पौने 2 साल ही हुए थे। उस वक्त उसके 2 ही प्रतिदव्ंदवी थे- जी न्यूज और स्टार न्यूज (जिसे NDTV चलाता था)।
आज तक ने अपना ध्येय वाक्य बना लिया था सबसे तेज और वाकई में बीते पौने 2 सालों में खबरों को सबसे पहले ब्रेक करने वाले चैनल के तौर पर उसने अपनी पहचान बनाई। चैनल की उस संस्थापक टीम में भी यही जज्बा भरपूर था। बतौर क्राईम रिपोर्टर मेरी कोशिश यही रहती कि मुंबई शहर की अपराध से जुडी हर खबर आज तक पर  ही ब्रेक हो। सलमान खान की खबर भी मुझे ही ब्रेक करनी है, इस भावना ने तेज रफ्तार से होने वाले खतरे के डर को दबा दिया था। करीब 20 मिनट में मैं नरीमन पॉइंट से बांद्रा पहुंचा।

डीसीपी बिपिनकुमार सिंह बांद्रा पुलिस थाने से निकलकर जा ही रहे थे। कैमरामैन गजानन भी वहां पहुंच गये। मैने डीसीपी को रोका और झटपट पुलिस थाने के बाहर ही उनका एक छोटा सा इंटरव्यू कर लिया। इंटरव्यू में उन्होने बताया कि बीती रात सलमान खान की एसयूवी लैंडक्रूजर का अमेरिकन एक्सप्रैस बेकरी के पास एक्सीडैट हुआ है। नुरूल्ला शरीफ नाम के एक बेकरी मजदूर की मौत हो गई है जबकि 4 दूसरे मजदूर घायल हो गये हैं जिन्हें भाभा अस्पताल में भर्ती कराया गया है। कार सलमान खान खुद ही चला रहे थे। वे फिलहाल फरार हैं और पुलिस उनकी तलाश कर रही है। 

बांद्रा पुलिस थाने के सामने ही लैंडक्रूजर कार बेहद बुरी हालत में खडी थी। खासकर कार के बाएं हिस्से को काफी नुकसान पहुंचा था। मैने कार के पास खडे होकर वाक थ्रू किया- कार की हालत देखकर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि जिनका इस कार ने कुचला उनकी हालत क्या हुई होगी। इस हादसे का आरोपी सलमान खान अब भी पुलिस की गिरफ्त से बाहर है। वाक थ्रू खत्म करके मैं घटनास्थल पर पहुंचा जो कि पुलिस थाने से 1 किलोमीटर के फासले पर है और सलमान खान के घर गैलैक्सी अपार्टमेंट्स के करीब है। जिस जगह हादसा हुआ वहां 2 दुकानें हैं अमेरिकन एक्स्प्रैस बैकरी और अमेरिकन एक्सप्रैस क्लीनर्स। हादसे के शिकार मजदूर बेकरी के सामने सोये हुए थे। ये सभी मजदूर चंद कदमों की दूरी पर मौजूद एक दूसरी बेकरी जिसका नाम ए-वन बेकरी था उसमें काम करते थे। सलमान की कार ने बेकाबू होने के बाद बेकरी के बाहर पडे मजदूरों को रौंदा और फिर अमेरिकन एक्सप्रैस क्लीनर्स के शटर से जा टकराई। टक्कर इतनी जोरदार थी कि दुकानों के बाहर की फुटपाथ टूट गई और उसका मलबा बिखरा हुआ था। मैने तुरंत वहां भी एक वाक थ्रू किया।


मैं घायलों से बात करने अस्पताल जाना चाहता था, लेकिन उसमें देर हो सकती थी। चैनल पर जल्द से जल्द घटना की तस्वीरों के साथ खबर ब्रेक करनी थी। तस्वीरों के इंतजार में चैनल ने भी खबर रोक रखी थी। ओबी वैन गुजरात गई हुई थी और दिल्ली को तस्वीरें नरीमन पॉइंट में लगी 2 एमबी लाईन के जरिये ही भेजी जा सकतीं थी। मैने गजानन को भाभा अस्पताल छोडा और मधु भाटिया नाम की रिपोर्टर को वहां पहुंचने के लिये फोन किया। इसके बाद मोटरसाईकिल पर फिर उसी रफ्तार से नरीमन पॉइंट पहुंचा, हालांकि लौटते वक्त सडक पर वाहनों की भीड होने लगी थी। 7 बजे के बुलेटिन में कार, घटनास्थल की तस्वीरों, डीसीपी के इंटरव्यू और ज्यादा से ज्यादा जानकारी के साथ खबर ब्रेक हुई। दिल्लीके असाईनमेंट डेस्क पर बैठे सहकर्मियों ने खबर ब्रेक करने के लिये बधाई दी। ये एक बडी खबर थी और इसमें आज तक अपने प्रतिद्वंद्वियों से काफी आगे था। हां आज तक में खबर उतरने के कुछ देर बाद ही जी न्यूज ने एक घायल मजदूर का फोनो चला दिया था। एबीपी न्यूज में मेरी मौजूदा सहकर्मी विभा कौल भट्ट उस वक्त जी न्यूज में थीं। भाभा अस्पताल पहुंचकर विभा ने उस मजदूर की अपने मोबाईल फोन के जरिये चैनल पर बात करवा दी थी। इसके कुछ देर बाद ही मधु भाटिया ने भी कैमरे पर घायल मजदूरों के इंटरव्यू कर लिये थे।

इस बीच मिलिंदजी का फोन आया। मैने उन्हें पूरी जानकारी दी और कहा कि घर से नहा कर आने के बाद मैं फिर पुलिस थाने पहुंच जाऊंगा। उनकी इजाजत मिलने के बाद मैं घर चला गया।


अपने बॉडीगार्ड शेरा के साथ सलमान खान
करीब साढे 10 बजे मैं फिरसे बांद्रा पुलिस थाने पहुंचा। अब तक वहां मीडिया का जमघट लग चुका था। सभी राष्ट्रीय और स्थानीय चैनलों के कई कैमरे, अखबारों के फोटोग्राफर और संवाददाताओं की भीड जुटी थी। सभी को लग रहा था कि पुलिस कभी भी सलमान को पकड कर वहां ला सकती है, लेकिन सलमान का कुछ अता पता न था। वो अभी भी फरार था। पुलिस उसे ढूंढने गैलैक्सी अपार्टमेंट्स भी गई, लेकिन वो मिला नहीं। हादसे को करीब 10 घंटे होने आ रहे थे और सलमान खान जैसा शख्स मुंबई पुलिस को मिल नहीं रहा है, ये बात मेरे गले नहीं उतर रही थी। मुझे ये भी पता था कि उस इलाके का एक एसीपी सलमान का अच्छा दोस्त है। मैने सीधे पुलिस पर सवाल उठाते हुए एक वाक थ्रू किया कि क्या मुंबई पुलिस सलमान को बचा रही है? क्या सलमान को सेलिब्रिटी होने का फायदा मिल रहा है? क्या सलमान के साथ ढिलाई बरतने के लिये और मामले को रफा दफा करने के लिये पुलिस पर कोई राजनीतिक दबाव है? मेरा ये वाक थ्रू 2-3 बार चला जिसके कुछ देर बाद सलमान खान अपने वकील वारिस पठान (जो अब MIM के विधायक हैं) और बॉडीगार्ड शेरा के साथ पुलिस थाने में हाजिर हुआ। उसपर लापरवाही से गाडी चलाने का आरोप लगाया गया लेकिन सलमान को ज्यादा वक्त थाने में नहीं गुजारना पडा। कुछ देर बाद ही 950 रूपये की जमानत अदा करने पर सलमान को छोड दिया गया। पुलिस थाने से बाहर निकलते वक्त फोटोग्राफर और कैमरामैन सलमान की तस्वीरों के लिये उसपर टूट पडे। सलमान खुद को उनसे बचाते हुए अपनी कार की ओर आग बढा (दूसरी कार जिसमें वो थाने आया था)। अचानक सलमान की नजर मेरी नजरों से टकराई और उसका चेहरा गुस्से से लाल हो गया। वो जगह पर ही कुछ पलों के लिये खडा होकर मुझे एकटक देखने लगा, ठीक उसी अंदाज में जैसे कोई फिल्मी हीरो, विलेन को देखता है। मुझे लगा कि अब ये शायद मुझसे मरपीट करने आयेगा। मैं भी भिडने के लिये तैयार हो गया, लेकिन इससे पहले कि कुछ और हो पाता शेरा और वारिस पठान ने सलमान को कार में ढकेला और वहां से निकल गये।

Saturday, 2 May 2015

दाऊद के खिलाफ क्या सबूत है हमारे पास-टाडा अदालत की नजर में


12 मार्च 1993 को मुंबई में हुए सिलसिलेवार धमाकों के बाद दाऊद इब्राहिम खुद को भारत में सरेंडर करना चाहता था, ये बात सबसे पहले वरिष्ठ कानूनविद राम जेठमालनी ने बताई, जिन्हें फोन करके दाऊद ने अपनी मंशा जताई थी। उसी बात की तस्दीक दिल्ली पुलिस के पूर्व कमिश्नर नीरज कुमार ने भी हिंदुस्तान टाईम्स को दिये इंटरव्यू में की है, हालांकि इंटरव्यू छपने के बाद मचे बवाल से अब वे अपने शब्दों से पीछे हटते नजर आ रहे हैं। बहरहाल, मुंबई की विशेष टाडा अदालत की नजर में दाऊद इब्राहिम बम धामकों का सूत्रधार है और दाऊद की धमाकों में क्या भूमिका थी, इसका ब्यौरा टाडा कोर्ट के आदेश में मिलता। अगर कल को दाऊद भारत आ भी जाता है तो उसके खिलाफ इन्ही सबूतों के तहत कार्रवाई की जायेगी।

टाडा अदालत ने अपने फैसले में पाया कि दाऊद इब्राहिम ने अपने अन्य साथियों के साथ मिलकर भारत में आतंकवादी वारदात की आपराधिक साजिश रची, ताकि लोगों में दहशत पैदा हो, उनमे अलगाव हो, सांप्रदायिकता पनपने से शांति भंग हो और सरकारी तंत्र चरमरा जाये। ये साजिश दिसंबर 1992 से लेकर अप्रैल 1993 के बीच रची और अमल में लाई गई। साजिश को अंजाम देने के लिये 12 मार्च 1993 के दिन 13 बम विस्फोट कराये गये, जिनमें 257 लोगों की मौत हो गई, 713 लोग घायल हो गये और 27 करोड रूपये की संपत्ति का नुकसान हुआ। ( ORDER PART-45, PAGE-3, POINT-3)

दाऊद की पूरी साजिश में भूमिका का खुलासा होता है 19 जनवरी 1993 को दुबई में हुई एक मीटिंग से। ये मीटिंग हुई थी दाऊद इब्राहिम, टाईगर मेमन और दाऊद फणसे उर्फ टकले के बीच। दाऊद टकला, टाईगर मेमन के लिये चांदी स्मगल करवाने का काम देखता था। पर चूंकि इस बार स्मगलिमग चांदी के बजाय RDX और हथियारों की करवानी थी इसलिये टाईगर ने टकले को दाऊद इब्राहिम से मिलवाना जरूरी समझा।

19 जनवरी की रात दाऊद टकला एयर इंडिया के विमान से दुबई पहुंचा। उसके वीसा और टिकट का इंतजाम टाईगर मेमन ने कराया था। एयरपोर्ट पर टाईगर ही उसे रिसीव करने आया। टाईगर उसे दुबई के होटल दिल्ली दरबार ले गया और एक कमरे में उसे ठहराया।
- इसके तीसरे दिन टाईगर शाम को 7-7.30 के करीब होटल आया और दाऊद टकला को अपने साथ चलने के लिये कहा। वो उसे एक टैक्सी में दाऊद इब्राहिम के बंगले पर ले गया। टकले को बाहरी कमरे में रूकने को कहकर वो बंगले के अंदरूनी कमरे में चला गया।
- कुछ देर बाद टाईगर, दाऊद इब्राहिम के साथ टकला के पास आया। चूंकि टकले ने अखबारों में दाऊद इब्राहिम की तस्वीरें देखीं थीं इसलिये वो तुरंत उसे पहचान गया।
- इस मीटिंग में तीनों के बीच कुछ ये बातचीत हुई-
दाऊद इब्राहिम (टकले से)- तुम किसके लिये काम करते हो।
टकला- जी ..टाईगर भाई के लिये।
दाऊद इब्राहिम- क्या तुम मेरे लिये काम करोगे
टकला- काम चांदी के कितने इंगोट्स (बिस्किट) का है
दाऊद इब्राहिम- चांदी का काम अभी बंद कर दिया है। केमिकल, बारूद और हथियार भेजना है।
(दांत पीसते हुए) अपनी बाबरी मसजिद शहीद हो गई है। उसका बदला लेना है।
(टाईगर से पूछते हुए) काम में कितना खर्चा आयेगा।
टाईगर मेमन- 9 से 10 पेटी (यानी 9-10 लाख रूपये)
दाऊद इब्राहिम (टकले से)- काम कराने के लिये तुम्हारे पास क्या इंतजाम है
टकला- जी भाई मच्छीमार ट्रालरों में अपने लोग हैं।
दाऊद इब्राहिम- ठीक है। मैं एक स्पीड बोट भेजूगा। तुम ट्रालरों का इंतजाम कर देना। खर्चे की बात टाईगर से कर लो।

इस बातचीत के बाद तीनों ने चाय पी। दाऊद अपनी मर्सीडीज कार से टाईगर के साथ टकले को दिल्ली दरबार होटल छोडने आया। अगले दिन टाईगर, टकले को दुबई हवाई अड्डे पर छोडने आया और 50 दिरहम उसके हाथ में थमाते हुए कहा कि दाऊद भाई की कही बातों का ध्यान रखे। (ORDER PART-10, PAGE-9, POINT-3)
टाडा अदालत में ये बात साबित हो गई कि टकले ने दाऊद इब्राहिम के निर्देशों पर अमल किया और मुंबई के करीब शेखाडी के समुद्र तट पर आरडीएक्स और हथियारों को उतरवाने में मदद की। दाऊद टकले की बढी हुई उम्र को देखते हुए अदालत ने उसे फांसीं के बजाय उम्रकैद की सजा दी।

मुकदमें के दौरान अदालत के सामने कई और भी सबूत सामने आये, जो इस साजिश में दाऊद इब्राहिम और उसके गुर्गों की भूमिका पर से पर्दा उठाते हैं। बमकांड के 2 आरोपियों सलीम कुत्ता और इजाज पठान के इकबालिया बयानों को अदालत ने सच माना है।इन दोनो आरोपियों ने दुबई में साजिश के लिये होनेवाली मीटिंगों का ब्यौरा दिया है।

सलीम मीरां शेख उर्फ सलीम कुत्ता के बयान के मुताबिक मैं जब जनवरी 1993 के आखिरी हफ्ते में दुबई में था तो एक दिन मुस्तफा मजनू मुझे जुमैरा इलाके में दाऊद इब्राहिम के घर व्हाईट हाउस ले गया। वहां मैने दाऊद, छोटा शकील, सलीम तलवार, फिरोज, इजाज पठान, हाजी अहमद को आपस में बात करते देखा। वे लोग भारत और हिंदूओं के खिलाफ, बाबरी मसजिद और मुंबई दंगों के बारे में बात कर रहे थे। मैं वहां करीब घंटे भर तक था।दाऊद ने वहां भाषण दिया और कहा कि मुसलिमों ने हिंदुओं के हाथो काफी जुल्म सहे हैं क्योंकि दंगों में हिंदुओं के साथ पुलिस मिली हुई थी। मुसलिम महिलाओं को बेइज्जत किया गया। हमें बदला लेने के लिये तैयार रहना चाहिये। हिंदुओं को सबक सिखाने के लिये वो सभी को हथियारों की ट्रेनिग लेने के लिये पाकिस्तान भेजेगा ताकि हिंदुओं, बडे नेताओं और आला पुलिस अफसरों की हत्या की जा सके।
इसके बाद दाऊद ने मुस्तफा मजनू को सभी का पासपोर्ट लेने के लिये कहा ताकि उन्हें पाकिस्तान भेजने का इंतजाम किया जा सके, लेकिन मैने, फिरोज और कय्यूम ने ट्रेनिंग पर जाने से मना कर दिया
दाऊद के साथ हुई इस मीटिंग के 2-3 दिन बाद आरिफ लंबू, सय्यद कुरेशी, यूसूफ बाटला, अबू बकर और शोएब बाबा ट्रेनिंग लेने के लिये पाकिस्तान रवाना हो गये। मैने उन्हे विदा करने दुबई एयरपोर्ट गया था। (ORDER PART-10, PAGE-41, POINT-86)

इस मीटिंग से पहले दुबई में एक और मीटिंग हुई थी, जिसका ब्यौरा इजाज पठान नाम के आरोपी ने अपने इकबालिया बयान में दिया। पठान के मुताबिक मुंबई में दंगों के बाद दुबई में मुस्तफा दोसा के घर एक मीटिंग बुलाई गई। मीटिंग में दाऊद इब्राहिम, अनीस इब्राहिम, मुस्तफा मजनू, यासीन कमजा, हैदर, सलीम तलवार, टाइगर मेमन और याकूब मौजूद थे। मीटिंग में मुंबई दंगों पर चर्चो हो रही थी। ये तय हुआ कि दंगों का बदला लेने के लिये कुछ किया जायेगा । आगे की कार्रवाई अगली मीटिंग में तय होगी, जिसका वक्त सभी को फोन पर इत्तला किया जायेगा। टाईगर मेमन भारत में हथियार भेजने की बात कर रहा था
इन बयानो को टाडा अदालत ने सबूत माना है और अगर कल को दाऊद की गिरफ्त में आने के बाद उसपर मुकदमा चलता है तो इनका इस्तेमाल उसके खिलाफ किया जा सकता है। अदालत ने पाया कि ये बयान दूसरे गवाहों के बयान और सबूतों से मेल खाते हैं। (ORDER PART-10, PAGE 41, POINT-87)

बहरहाल, ये बडा सवाल अब भी बना हुआ है कि क्या दाऊद जीते जी कभी भारत आ पायेगा और यहां टाडा अदालत में उसके खिलाफ मुकदमा चल पायेगा? राष्टीरय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल साहब इस मामले में उम्मीद का चेहरा हैं।