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Sunday, 31 May 2015

सफरनामा: श्रीलंका


साल 2004 में CNN की पूर्व भारत ब्यूरो प्रमुख अनीता प्रताप की लिखी किताब Island of Blood पढी थी। अनीता ने 1983 में LTTE प्रमुख प्रभाकरन का सबसे पहला इंटरव्यू किया था। जाफना में प्रभाकरन तक पहुंचने की कहानी और श्रीलंका के गृहयुद्ध के इतिहास का उन्होने अपनी किताब में बडा ही दिलचस्प ब्यौरा दिया है। उस किताब को पढकर मैं भी प्रेरित हुआ था कि अपने पत्रकारिता के करियर में मैं भी कभी प्रभाकरन तक पहुंचूं और उससे अपने सवाल पूछूं। मुझे खुद देखना था कि किस जज्बें के साथ वो तमिलों को श्रीलंकाई सरकार से जंग के लिये तैयार करता है, किस तरह लोग उसके कहने पर अपनी जान देने को तैयार हो जाते हैं...पर वो तो सिर्फ एक ख्वाब ही रह गया। 2005 से हिंदी न्यूज चैनलों का सबसे घृणित दौर शुरू हुआ। गंभीर खबरों के बजाय नाग-नागिन, खली पहलवान, राखी सावंत के ड्रामें, उडनतश्तरी, राधा बन नाचने वाले डीआईजी, भूत-प्रेत, अश्लील एमएमएस, शाहिद-करीना लिपलॉक जैसी खबरें हिंदी न्यूज चैनलों पर हावी हो गईं। ऐसे में प्रभाकरन के बारे में कोई क्यों सोचता ? 2009 तक जब  हिंदी न्यूज चैनल अपने इस काले दौर से उबरे और गंभीर खबरों के पुराने दिन लौटने लगे तब तक प्रभाकरन और LTTE को श्रीलंकाई फौज खत्म कर चुकी थी। खैर, प्रभाकरन के इंटरव्यू के लिये तो मैं श्रीलंका नहीं जा सका लेकिन हाल ही में मुझे टापू पर बसे इस छोटे से खूबसूरत देश को घूमने का मौका मिला अंतरराष्ट्रीय ब्लॉगर्स कॉन्फ्रेंस में शिरकत करते वक्त। श्रीलंका के हफ्तेभर के दौरे में जो देखा, सुना और समझा यहां पेश है।

ढाई दशक का नर्क।
श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में आज सबकुछ सामान्य नजर आता है। लोग बेखौफ होकर सफर करते हैं, बाजार सजते हैं, पर्यटकों की चहल पहल रहती है, स्कूल-कॉलेज चलते हैं। कोलंबो आज बेहद साफ सुथरा और अनुशासित शहर नजर आता है...पर दशक भर पहले तक कोलंबो की ऐसी तस्वीर नहीं थी।

स्वतंत्र तमिल ईलम (राष्ट्र) बनाने के लिये तमिल टाईगर्स और श्रीलंका सरकार के बीच ढाई दशक तक जो जंग चली उसने श्रीलंका निवासियों की आम जिंदगी को तारतार कर दिया था। इस लडाई में 80 हजार लोग मारे गये और लाखों लोग घायल हुए। कोलंबो पुलिस के एक अधिकारी मेरे मित्र हैं। उन्होने बताया कि दशकभर पहले तक कोई शख्स अगर सुबह घर से निकलता था, तो उसके जिंदा वापस लौटने की कोई गारंटी नहीं थी। बम धमाके होना आम बात हो चुकी थी। पति-पत्नी अगर घर से निकल कर एक ही ठिकाने पर जा रहे हैं तो दोनों एक ही वक्त पर नहीं निकलते थे, न एक ही ट्रेन या बस में साथ सफर करते थे। ऐसा ये सोच कर किया जाता था कि अगर बम धमाके में कोई एक मर गया तो बच्चों को संभालने के लिये दूसरा जिंदा बच सके। बस में भी सफर करने वाले लोग एक दूसरे को शक की नजरों से देखते थे कि पता नहीं किसके बैग या थैले में बम रखा हो। जगह-जगह पर पुलिस की तलाशी आम बात थी। शहर के मुख्य इलाके में अब कारें पार्क की जा सकतीं हैं, लेकिन पहले कार पार्किंग की इजाजत नहीं थी। पुलिस अधिकारी मित्र के मुताबिक गृहयुद्ध के दौर में कोलंबों में अपराध भी काफी बढ गये थे, क्योंकि पुलिस की पूरी ताकत आतंकवाद से निपटने के लिये लगी हुई थी। गुनहगारों की तरफ ध्यान नहीं था, इसलिये उनके हौंसले बुलंद थे, लेकिन अब अपराध काफी कम हो गये हैं। यहां तक कि ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करने वालों पर भी बारीकी से नजर रखी जाती है। कोई राहगीर अगर लालबत्ती पर सडक पार कर ले या कोई सार्वजनिक ठिकाने पर सिगरेट फूंकता नजर आ जाये तो उस पर कार्रवाई की जाती है।


सिंहली vs तमिल नहीं, अब सिंहली vs मुसलिम
बीते ढाई दशकों के दौरान आम सिंहली और तमिल एक दूसरे को नफरत की नजर से देखते थे। दोनो समुदायों के बीच कई दंगे हुए जिनमें काफी खूनखराबा हुआ। सिंहली बहुल श्रीलंका में तमिल खुद को असुरक्षित महसूस करते थे, लेकिन अब दौर बदल रहा है। दोनो समुदायों के बीच कटुता खत्म हो रही है। तमिल अब अपने त्यौहार खुलकर मना सकते हैं। कांडी से नुरूवा इलिया नाम की जगह जाते वक्त हमें तमिलों का जुलुस दिखाई दिया। तमिल ग्रामीणों ने गणपति, देवी और मुरूगन की प्रतिमाओं के साथ एक झांकी निकाली थी। इस त्यौहार को तिरूला कहा जाता है जो कि लोगों की अच्छी सेहत के लिये मनाया जाता है। जुलूस में शिरकत करने वाले लोग बैखौफ और उत्साह से भरे हुए थे, जो कि ये बताता है कि तमिलों के मन से असुरक्षा की भावना खत्म हो रही है।
सफर के दौरान मैने कई सिंहली और तमिलों से बात की और उन सभी का यही कहना था कि दोनो समुदायों के बीच दूरी सियासत की वजह से थी, लेकिन अब आम सिंहली और तमिल एक दूसरे के साथ दोस्ताना सलूक करते हैं।

श्रीलंका में तमिल और सिंहली के बीच की खाई भले ही पट रही हो, लेकिन इनका टकराव अब शुरू हो गया है मुसलिम समुदाय के साथ। बीते चंद सालों में बौद्ध धर्म को मानने वाले सिंहली और मुसलिमों के बीच हलके फुलके टकराव हो रहे थे, जिन्होने जून 2014 में भयानक शक्ल ले ली। देश के दक्षिण-पश्चिमी इलाके में सिंहली और मुसलमानों के बीच भीषण दंगे हुए जिनमें 4 लोग मारे गये, 80 घायल हुए और करीब 10 हजार लोग बेघर हुए। कट्टरवादी सिंहली संगठन बोडू बाल सेना (BBS) ने इन दंगों में एक अहम भूमिका अदा की थी। संगठन की ओर से ये प्रचार किया जा रहा है कि मुसलमान सिंहलियों से कारोबार और रोजगार के मौके छीन रहे हैं और अपनी बढती आबादी के चलते एक दिन पूरे देश पर कब्जा कर लेंगे। सफर के दौरान चंद सिंहली लोगों से बातचीत के दौरान मुझे मुसलिमों के प्रति उनकी नफरत का अहसास हुआ। फिलहाल श्रीलंका की 9 फीसदी आबादी मुसलिम है।

बफर स्टेट श्रीलंका।
राजनीतिशास्त्र में एक कॉन्सेप्ट है Buffer State का। Buffer State  का मतलब वो देश जो कि 2 प्रतिदवंद्वी राष्ट्रों के बीच पडता है और सामरिक रूप से दोनो देश जिसपर अपना प्रभुत्व कायम रखने की कोशिश करते हैं। श्रीलंका की स्थिति इस वक्त भारत और चीन के लिये Buffer State  की ही है। दोनो ही देश श्रीलंका को आर्थिक और तकनीकी मदद देकर उसे अपने पाले में रखना चाहते हैं ताकि एक दूसरे पर नजर ऱखी जा सके और कल को अगर चीन और भारत के बीच जंग होती है तो श्रीलंका की समुद्री सीमा और उसके इंफ्रास्ट्रकचर का इस्तेमाल किया जाये।
चीन की ओर से बनाया जा रहा लोटस टॉवर

श्रीलंका के मौजूदा राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरीसेन की सरकार भारत के अनुकूल देखी जा रही है, जबकि उनके पहले महिंदा राजपक्षे की सरकार का झुकाव चीन की ओर था। उन्ही के कार्यकाल में चीन को श्रीलंका में अपने पैर जमाने के मौके मिले। चीन ने यहां कई प्रोजेक्ट्स हासिल किये। उन्ही में से एक प्रोजक्ट है कोलंबो के पश्चिमी तट पर समुद्र को पाट कर एक पोर्ट सिटी बनाने का। नई सरकार ने इस प्रोजक्ट पर कई तरह के ऐतराज जताते हुए रोक लगा दी है, जिसे कि भारत अपने फायदे में देख रहा है। कोलंबों में हमने चीन की ओर से बनाया जा रहा लोटस टावर भी देखा। कहने को तो इसे दूरसंचार के उद्देश्य से बनाया जा रहा है, लेकिन भारत को शंका है कि इसका इस्तेमाल भारत के खिलाफ जासूसी के लिये किया जायेगा। इस टावर का निर्माण कार्य भी नई सरकार ने रोक दिया है। वैसे श्रीलंका की सुरक्षा एजेंसियों में काम करने वाले लोग संयुक्त राष्ट्र में गृहयुद्ध के दौरान मानवाधिकार हनन के मुद्दे पर भारत के श्रीलंका विरोधी रूख से खफा हैं।

फिर लौटे पर्यटक
कोलंबो शहर में वैसे तो मुझे कुछ खास दिलचस्प देखने लायक नहीं लगा, लेकिन श्रीलंका के अंदरूनी इलाकों में कई ऐसे स्थल हैं जो मन मोह लेते हैं। कोलंबो से करीब 150 किलोमीटर दूर कांडी नाम का हिल स्टेशन है। यहां तक पहुंचने का रास्ता ही आपको मुग्ध कर देता है। हरेभरे पहाड, नदियां, चाय के बागान, छोटी-बडी बुद्ध प्रतिमाओं से गुजरते हुए आप कब कांडी पहुंच जाते हैं पता ही नहीं चलता। कांडी में गौतम बुद्ध का दांत एक मंदिर में रखा गया है। यहां पर श्रीलंका के रत्नों का कारोबार भी होता है। पर्यटकों के लिये यहां सांस्कृतिक नृत्य के कार्यक्रमों के इंतजाम रहते हैं। एक चाय की फैकटरी में घूमने का मौका भी मिला और जाना कि किस तरह से चाय की पत्तियां बागान से निकलकर एक जटिल प्रकिया से गुजरते हुए, पैकेट में बंद होकर आपके किराने की दुकान तक पहुंचतीं हैं। इसी दौरान एक क्रूर सच को जानकर मन भी खट्टा हुआ। चाय के बागान अंग्रेजों ने अपने शासनकाल में लगाये थे और इन्हें लगाने के लिये सैकडों की तादाद में उन्होने हाथियों की हत्या करवाई थी। ज्यादा हाथी मारने वालों को वे ईनाम भी देते थे।
नुआरा इलिया नाम का हिल स्टेशन भी गजब का है। इस हिल स्टेशन को श्रीलंका का स्विजरलैंड कहा जाता है। यहीं से 15 मिनट के फासले पर अशोक वाटिका भी है जिसे स्थानीय लोग सीता इलिया नाम से जानते हैं। स्थानीय तमिलों का मानना है कि रामायण के मुताबिक जिस जगह रावण ने सीता को रखा था, वो यही अशोक वाटिका है। यहां से एक नदी गुजरती है, जिससे सटे पत्थरों पर पैरों के रहस्यमयी निशान नजर आते हैं। स्थानीय लोगों के मुताबिक ये हनुमानजी के पैरों के निशान हैं। इस जगह सीता का एक मंदिर बनाया गया है। मंदिर के ठीक सामने एक बडा पर्वत है जो कि दूर से देखने पर एक भीमकाय बंदर की तरह नजर आता है। स्थानीय लोग इस पर्वत को गोरिल्ला हिल कहते हैं। ये जगह रामायण में वर्णित अशोक वाटिका है या नहीं इस पर पुरातत्वविद, इतिहासकार और तर्कणावादियों के अलग अलग विचार हो सकते हैं, लेकिन जिस तरह हिंदू पर्यटक यहां आकर भावविभोर होते दिखे उसके मद्देनजर इस जगह को एक पर्यटन स्थल या तीर्थ स्थल के तौर पर प्रचारित करने की अपार संभावना नजर आती है जो कि श्रीलंकाई सरकार ने किन्ही कारणों से अब तक नहीं किया। यहां हमारे टूर गाईड एंटोन परेरा ने एक दिलचस्प बात बताई। परेरा के मुताबिक श्रीलंका में अगर कोई वस्तु या व्यकित गुम हो जाता है तो उसको वापस पाने के लिये लोग हनुमानजी की पूजा करते हैं। पूजा करने की एक खास विधि होती है और ये पूजा बौद्ध धर्म और ईसाई धर्म मानने वाले कई लोग भी करते हैं।


श्रीलंका से करीब 35 किलोमीटर की दूरी पर है नेगोंबो। समुद्र किनारे बसा ये कस्बा भारत के गोवा की याद दिलाता है। साफ सुथरे समुद्र तट, वॉटर स्पोर्ट्स, छोटी छोटी गलियां, डच नहरें, लगून वगैरह यहां देखने और करने के लिये बहुत कुछ है। मैने नेगोंबो और कोलंबों के बीच एक छोटी सी रेल यात्रा भी की। हरे भरे नारियल पेडों और छोटे छोटे गांवो के बीच से गुजरती हुई ट्रेन सफर को यादगार बनाती है। मुंबई और गोवा के बीच कोंकण रेल के सफर का अहसास इस सिंगल पटरी की छोटी सी रेल यात्रा में मिलता है।
श्रीलंका के किसी भी इलाके में घूमते हुए ऐसा लगता है मानो आप दक्षिण भारत में हों। फर्क इतना है कि यहां आपको साफ सफाई और अनुशासन ज्यादा देखने मिलेगा और भीडभाड थोडी कम। खाने के लिये हर जगह इडली, वडा, दोसा मिल जायेगा। चाहे आप शाकाहारी हों या मांसाहारी, खाने में वो सबकुछ उपलब्ध है जो कि दक्षिण भारत में मिलता है। उत्तर भारतीय रेस्तरां उतने नहीं हैं। कुछ चीजे यहां पर महंगीं नजर आ सकतीं हैं, क्योंकि कीमतें यहां पर गोरे पर्यटकों को ध्यान में रखते हुए डॉलर के मुताबिक तय की गईं हैं।
एंटोन परेरा के मुताबिक गृहयुद्ध के दिनों में ये तमाम पर्यटन स्थल उजड गये थे। लोगों का रोजगार छिन गया था, लेकिन बीते चंद सालों में काफी बदलाव आया है। ये ठिकाने फिर गुलजार हो रहे हैं, इनकी रौनक लौट रही है।

3 comments:

sunita yadav said...

श्रीलंका का इतिहास अब भी हर बदलाव का गवाह है । किसी पैनी निगाह जब उसमें झाँकने लग जाती है तो वह हर स्थिति को नर्क से निकालकर बफर स्टेट में पहुंचा देती है।उम्दा लेखन!

अन्तर सोहिल said...

बहुत बढ़िया और विस्तृत रिपोर्ट
धन्यवाद इस पोस्ट के लिए

sathi said...

सुंदर वर्णन ! आँखाें देखा ही जब आँखाें से पढ़ा जाए ताे यात्रा का पुनःस्मरण जीवंत हाे जाता है.