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Wednesday, 8 October 2014

शिवसेना और गवली गैंग : दोस्ती...दुश्मनी...दोस्ती...


इस बार के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में शिवसेना ने 2 बेटियों के खिलाफ अपने उम्मीदवार नहीं उतारे हैं। एक बेटी है बीजेपी के दिवंगत नेता गोपीनाथ मुंडे की सुपुत्री पंकजा और दूसरी है अंडरवर्लड डॉन अरूण गवली की बेटी गीता। शिवसेना ने कहा कि गोपीनाथ मुंडे के सम्मान में वे पंकजा के खिलाफ उम्मीदवार नहीं उतार रहे भले ही बीजेपी इस बार अलग चुनाव लड रही हो। शिवसेना का ये फैसला मुंडे और बाल ठाकरे के रिश्तों के मद्देनजर समझ में आता है, लेकिन मुझे दिलचस्प लग रहा है शिवसेना का अरूण गवली की बेटी गीता के खिलाफ उम्मीदवार न खडा करने का फैसला। मेरी दिलचस्पी के पीछे गवली गैंग और शिवसेना के रिश्तों का वो इतिहास है जिसमें मैने बतौर एक क्राईम रिपोर्टर दोनो को जिगरी दोस्त के तौर पर भी देखा है और जानी दुश्मन की तरह भी।

1995 के विधानसभा चुनाव में एक प्रचार रैली के दौरान शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने बडे गर्व से ऐलान किया- कांग्रेस के पास अगर दाऊद इब्राहिम है तो हमारे पास अरूण गवली है। ठाकरे की ओर से सार्वजनिक मंच पर बोली गई ये एक लाईन दोनो के रिश्तों के बारे में काफी कुछ कह जाती है। 1993 के मुंबई बमकांड के बाद दाऊद की इमेज एक अंडरवर्लड डॉन से बढकर एक मुसलिम आतंकवादी की भी हो गई थी। ऐसे में दाऊद के दुश्मन अरूण गवली को शिवसेना ने हिंदू डॉन के तौर पर समर्थन दिया था।

...लेकिन ठीक सालभर बाद यानी 1996 में सबकुछ बदल गया। 1995 के चुनाव में शिवसेना-बीजेपी गठबंधन महाराष्ट्र में सत्तासीन हो चुका था। ऐसे में गवली को इस सरकार से जिसे कि एक घटक दल अपना मानता था कई उम्मीदें थीं। गवली को लग रहा था कि अब मुंबई शहर पर उसी का राज होगा। उसके सारे दुश्मन सरकार की मदद से खत्म हो जायेंगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। गवली गिरोह ने मुंबई में कहर बरपाना शुरू किया। बिल्डरों, फिल्मकारों, मिल मालिकों और व्यापारियों की दिनदहाडे हत्याएं होने लगीं। जबरन उगाही के लिये रोजाना दर्जनों फोन कॉल्स किये जाने लगे। गवली गिरोह ने दुश्मन गिरोह के शूटरों पर हमले करने शुरू कर दिये और उससे छिडे गैंगवार में कई बेगुनाह भी मारे गये। उस वक्त महाराष्ट्र के गृहमंत्री बीजेपी के गोपीनाथ मुंडे थे, जिनके पास उपमुख्यमंत्री का भी पद था। सरकार पर हर ओर से दबाव पडा गवली गैंग पर अंकुश लगाने का और सरकार ने गवली के खिलाफ मुहीम छेड दी। गवली गैंग के कई शूटरों को पकड पकड कर जेल में डाला गया या कथित पुलिस एनकाउंटरों में उन्हें मार डाला गया। अरूण गवली तमाम आपराधिक मामलों में फंसा होने के कारण औरंगाबाद जेल में कैद था, लेकिन जेल से ही वो अपना गिरोह चला रहा था। सरकार ने उसके पर कतरने के इरादे से उसे औरंगाबाद जेल से हटाकर अमरावती जेल में भेज दिया।

सरकार की ओर से इस तरह के सलूक से अरूण गवली ने खुद को ठगा हुआ महसूस किया। उसे लगा कि शिवसेना ने चुनाव से पहले उसका इस्तेमाल किया और सत्ता आते ही अब उसे खत्म किया जा रहा है। औरंगाबाद से अमरावती जेल में भेजा जाना गवली के लिये बहुत बडा झटका था। इस घटना ने उसमें बदले की आग पैदा कर दी। उसने बाल ठाकरे से बदला लेने का फैसला किया। अमरावती जेल में पहुंचने के बाद कई दिनों तक गवली का अपने गिरोह के लोगों से संपर्क कट गया, लेकिन जेल प्रशासन के भ्रष्टाचार और पैसे की ताकत के बूते उसने जल्द ही अमरावती जेल से भी अपना काम शुरू कर दिया। अमरावती जेल से ही उसने ठाकरे से बदला लेने की साजिश रची। गवली को पता चला कि उसे औरंगाबाद जेल से अमरावती जेल भिजवाने की साजिश जयंत जाधव नाम के शख्स ने रची थी। जयंत जाधव शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे का बेहद करीबी माना जाता था। उसे बाल ठाकरे का मानस पुत्र भी कहते थे और ठाकरे की ओर से लिये जाने वाले तमाम अहम फैसलों में उसकी भूमिका होती थी। गवली के शूटरों ने 30 अप्रैल 1996 को मुंबई के प्रभादेवी इलाके में जयंत जाधव को उसके घर के पास गोलियों से भून दिया। मौके पर ही उसकी मौत हो गई। इस मामले में पुलिस ने गवली को गिरफ्तार भी किया, लेकिन अदालत में गवाह पलट गये और गवली छूट गया।

बाल ठाकरे के सबसे खास आदमी को मार डालने के बावजूद भी गवली की बदले की आग ठंडी नहीं पडी थी। उसने ठाकरे को राजनीति में भी धूल चटाने की ठानी और शिवसेना की तर्ज पर अपनी एक नई पार्टी शुरू की अखिल भारतीय सेना। अपनी पार्टी के विस्तार के लिये गवली ने शिवसेना को ही निशाना बनाया। शिवसेना के तमाम शाखा प्रमुखों, यूनियन के नेताओं, पदाधिकारियों को डरा धमका कर या पैसों का लालच देकर अखिल भारतीय सेना में शामिल करवाया जाने लगा। तमाम शिवसेना की शाखाओं से शिवसेना का बोर्ड हटा कर अखिल भारतीय सेना के बोर्ड लगाये जाने लगे। शिवसेना को खत्म करने के लिये गवली ने साम, दाम, दंड, भेद सबकुछ अपनाया। मुंबई के बाहर भी गवली की पार्टी फैलने लगी। शिवसेना से जुडे कुछ लोगों की गवली ने हत्या भी करवा दी जो कि उसकी पार्टी का साथ देने को तैयार नहीं थे। अखिल भारतीय सेना के गठित होने के करीब साल भर के भीतर 3 लाख 50 हजार लोग उसके सदस्य बना लिये गये।

गवली के अभियान ने ठाकरे की नींद उडा दी। उस वक्त तो ऐसा लग रहा था जैसे गवली शिवसेना का खत्म कर देगा। गवली पर तुरंत लगाम कसना जरूरी था। 1997 में शिवसेना ने पलटवार करना शुरू किया। जाहिर है महाराष्ट्र में चूंकि शिवसेना-बीजेपी की सरकार थी, तो मुंबई पुलिस को उन्हीं की सुनना था। आर.एस.शर्मा तब मुंबई पुलिस की क्राईम ब्रांच के मुखिया थे। उनकी अगुवाई में क्राईम ब्रांच ने गवली गिरोह के खिलाफ अभियान चलाया (वैसे ये अभियान अंडरवर्लड के सभी गिरोंहों के खिलाफ बताया गया।)। अरूण गवली के कई शूटरों को पुलिस ने ढूंढ-ढूढ कर कथित एनकाउंटरों में मार डाला। कई जेल भी भेजे गये। पुलिस ने गवली गैंग के टॉप 10 शूटरों की एक लिस्ट बनाई और एक एक कर लिस्ट में शामिल सभी शूटरों को खत्म कर दिया गया। एक ओर जहां पुलिस गवली गिरोह के शूटरों को मार रही थी, तो वहीं दूसरी ओर उसकी राजनीतिक पार्टी के पदाधिकारियों की भी हत्याएं होनी शुरू हो गईं। पुलिस की ओर से कहा गया कि इन पदाधिकारियों को गवली के दुश्मन गिरोह जैसे की दाऊद इब्राहिम और अश्विन नाईक के लोग मार रहे थे, लेकिन अंडरवर्लड के जानकार इसे गवली को खत्म करने की एक मुहीम का ही हिस्सा मान रहे थे।

अरूण गवली को सबसे बडा झटका लगा 4 अक्टूबर 1997 को जब उसकी पार्टी के महासचिव जीतेंद्र दाभोलकर को 5 शूटरों ने मुंबई के मिलन सबवे में गोलियों से भून दिया। शरीर में 18 गोलियां लगने की वजह से दाभोलकर की मौके पर ही मौत हो गई। पुलिस के मुताबिक दाभोलकर को मारने वाले शूटर छोटा शकील गिरोह के थे। दाभोलकर की मौत ने गवली की कमर तोड कर रख दी। शिवसेना की मजदूर यूनियन भारतीय कामगार सेना छोड कर आये दाभोलकर ने गवली को सियासी दिमाग दिया था और पार्टी खडी करने में उसकी मदद की थी। गवली के जेल में रहते हुए पार्टी दाभोलकर ही चला रहा था। उसी की रणनीति की वजह से गवली की पार्टी का विस्तार भी हो रहा था।

ऐसा लगा कि दाभोलकर की मौत के बाद गवली की पार्टी खत्म हो जायेगी। गवली का नाम महाराष्ट्र के सियासी हलकों से गायब हो गया, लेकिन 2004 के लोकसभा चुनाव में बतौर उम्मीदवार खडा होकर गवली ने फिर से सबको चौंका दिया। लोकसभा चुनाव तो वो हार गया, लेकिन उसी साल हुए विधानसभा चुनाव जीतकर वो मुंबई के भायखला इलाके से विधायक चुन लिया गया। मुंबई महानगरपालिका में उसके 2 पार्षद भी चुन लिये गये। इस बीच उसने शिवसेना के खिलाफ अपना विरोध जारी रखा। न्यूज चैनलों और अखबारों को दिये गये इंटरव्यू में भी उसने शिवसेना के खिलाफ आग उगली।


गवली फिलहाल जेल में है। दिलचस्प बात देखिये की साल 2007 में मुंबई के जिस पार्षद कमलाकर जामसांडेकर की हत्या के आरोप में गवली जेल के भीतर सजा भुगत रहा है वो पार्षद शिवसेना का था। बाहर वही शिवसेना चुनाव जीतने के लिये उसकी बेटी की मदद कर रही है। सही है। इस कहानी से फिर एक बार यही विश्वास पुख्ता होता है सियासत में किसी को किसी से परहेज नहीं होता। शिवसेना को उस पार्टी को समर्थन देने से कोई परहेज नहीं है जिसके मुखिया पर शिवसेना के पार्षद की हत्या करने का आरोप अदालत में साबित हो चुका है।