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Wednesday, 8 August 2007

स्टिंग ऑपरेशन

स्टिंग ऑपरेशन की तैयारी

टाईम्स औफ इंडिया अखबार ने अगस्त 2004 के पहले हफ्ते में एक खबर छापी थी कि किस तरह से मुंबई के बांद्रा कोर्ट के बाहर शादी और तलाक के फर्जी कागजात बनाने का गोरखधंदा चल रहा है। उस खबर में सरिता नाम की एक महिला का किस्सा भी था कि किसतरह से उसके पति ने उसके कम पढे लिखे होने का फायदा उठाते हुए फर्जी कागजात पर उसके दस्तखत लिये और उसके बच्चे को अपने कब्जे में ले लिया।

खबर बडी ही चौंकाने वाली थी।ठीक कानूनके दरवाजे के सामने कानून का मखौल उडाया जा रहा था। कुछ लोगों से बात करने पर पता चला कि ये रैकेट काफी बडा था। जो जानकारी हाथ लगी उसके सामने टाईम्स की रिपोर्ट अधूरी लग रही थी। इस गोरखधंदे के कई और भी पहलू थे जिनका पर्दाफाश किया जा सकता था।

मेरा बडा मन कर रहा था कि मैं इस खबर पर काम करूं...पर सवाल ये था कि इसे टीवी की स्टोरी कैसे बनाया जाये और किस तरह इसको पेश किया जाये कि लोग दांतों तले उंगली दबा लें। इस बात की भी चिंता था कि कहां ये स्टोरी टाईम्स की खबर का सामान्य फॉलो अप न लगे।

सुबह खबर पढने के बाद मैं ये सब सोच ही रहा था कि मिलिंदजी का फोन आया और फोन पर उन्होने जो कहा वो बिलकुल मेरे मन की बात थी और उसमें मेरे सवालों का जवाब भी था।

दीक्षितजी आपको एक स्टिंग ऑपरेशन पर काम करना है। बांद्रा कोर्ट के बाहर जो शादी तलाक का धंदा तलता है उसपर खबर बनानी है। आप किसी लडकी रिपोर्टर को साथ ले जाकर वहां शादी कर आईये और 24 घंटे में तलाक भी ले लेना। मिलिंदजी ने जरूरी निर्देश देवे के बाद फोन रखा। इस खबर को तैयार करने के लिये मझे एक हफ्ते का वक्त दिया गया।
मिलिंद का फोन रखते ही मैं उछल पडा। सबसे पहले मैने अपने खास कैमरामैन डीके गौतम को फोन लगाया। उसको जब पूरी खबर समझाई तो वो भी काफी उत्साहित हो गया। हमने तय किया कि अगले दिन बांद्रा कोर्ट के बाहर मुआयना कर के आयेंगे और फिर पूरे शूट को प्लान करेंगे।
मिलिंद खांडेकर के आदेश के बाद मैं खबर पर काम करने को तैयार तो हो गया, लेकिन दिक्कत ये थी कि शादी करने के लिये मैं इतनी जल्दी लडकी कबां से लाऊं। शूट थोडा रिस्की था और मुझे नहीं लग रहा था कि आसानी से कोई लडकी इसके लिये तैयार होगी। तभी मुझे ख्याल आया मयूरी डोंगरे का। मयूरी भी मुंबई ब्यूरो में एक क्राईम रिपोर्टर थी और ट्रेनिंग के दौरान एक बार उसने मुझसे कहा था कि जोखिमभरे शूट पर जाना उसे पसंद है। मेरी समस्या मुझे हल होती दिख रही थी। मैने फोन पर उसे पूरे ऑपरेशन के बारे में जानकारी दी और खबर से जुडे जोखिम के बारे में भी बताया। खबर का ब्यौरा सुनकर वो भी काफी खुश हो गई, पर उसने कहा कि उस खबर पर काम करने से पहले वो अपने घरवालों से बात करना चाहती है। घर के लोगों से सहमति मिलने के बाद उसने ऑपरेशन में शामिल होने के लिये हां कर दी।

अगले दिन कैमरा मैन गौतम के साथ मुआयने पर निकलने से पहले मैने मिलिंदजी से फिर एक बार बात की। मिलिंदजी की सलाह था कि शूट के वक्त सुरक्षा के लिये मैं अपने आसपास 5-6 लोगों को रखूं, ताकि अगर पकडे गये और पिटने की नौबत आई तो वे लोग मदद के लिये पहुंच सकें। उन्होने इस बात का भी खास ध्यान रखने को कहा कि लोग मुंझे पहचान न सकें।

रेकी करते वक्त मैने गाडी से बांद्रा की उस पूरी गली का चक्कर काटा जहां ये गोरखदंदा चलता था। मैं ये तय करने की कोशिश कर रहा था कि किस वकील की दुकान से ऑपरेशन शुरू किया जाये जहां से कैंमरे को लाईट भी ठीक से मिले, वहां का माहौल भी स्थापित हो और पकडे जाने पर निकल भागने में आसानी हो। इस दौरान गौतम पैदल ही घूम रहा था। उसने 6-7 वकीलों से बात करके शादी और तलाक के मामलों में उनकी फीस की जानकारी ले ली।एक दो वकीलों से वो कह कर भी आया कि कल उसका दोस्त एक लडकी को भगाकर लायेगा। उसकी शादी करवानी है।
इलाके का मुआयना करने के बाद अब बारी थी कानूनी तैयारी करने की। इसमें मेरी मदद की मेरे पत्रकार दोस्त तुलसीदास भोईटे की पत्नी ने। वे आपराधिक मामलों की वकील हैं, लेकिन पारिवारिक विवाद से जुडे मुकदमों की भी जानकार हैं। मैने उनसे मिलकर शादी और तलाक से जुडे कानूनों की जानकारी ली। उन्होने मुझसे कुछ सावधानियां बरतने को कहा। मामला वकीलों से पंगा लेने का था।

इलाके का मुआयना और कानूनी तैयारी के बाद अब आखिरी काम रह गया था, कैमरे का। शाम के वक्त गौतम ने मुझे कैमरे से जुडी जानकारी दी और बताया कि शूट के वक्त कैमरे कहां होगा, ऑडियो कैसे रिकॉर्ड होगा वगैरह वगैरह।
ऑपरेशन का पहला दिन

अगले दिन सुबह 11 बजे के करीब हम बांद्रा कोर्ट के पास बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लैक्स पहुंचे। मैने एक शर्ट पहन रखी थी और सिर पर थी मंकी कैप। आमतौर पर मैं कैंमरे पर शूट करते वक्त सादा चश्मा पहनता हूं, लेकिन उस दिन मैने काला चश्मा पहना था। कोई मुझे पहचान न पाये इसके लिये हर मुमकिन उपाय किया। मयूरी भी साडी पहव कर आई। मैने हाथ में एक बडा बैग ले रखा था ये बताने के लिये हम मुंबई के बाहर से अभी अभी सफर करके सीधे कोर्ट पहुंचे हैं। हालांकि, अंदर से हमें लग तो रहा था कि हम पहचानें जा सकते हैं, लेकिन हम अपने आप को विश्वास दिलाने की कोसिश कर रहे थे कि हम नहीं पकडे जायेंगे। मेरे हाथ में एक फॉल्डर था जिसमें गौतम ने कॉर्ड लेस माईक छुपा रखा था। माईक बडा ही छोटा था और ध्यान से देखने पर ही किसी की नजर में आता।
खुफिया कैमरे के लैंस को गौतम ने अपने बैग के पट्टे पर लगाया। देखने में वो बिलकुल उस बैग का बटन लग रहा था। किसी को शायद ही शक होता कि ये बटन नहीं कैमरे का लेंस है। बैग के अंदर गौतम ने कैमरा छुपा रखा था जिसमें सारी रिकॉर्डिंग होनी थी।

पूरी तैयारी के साथ हम बढ चले बांद्रा कोर्ट की ओर जिसके बाहर हमें पूरे ऑपरेशन को अंजाम देना था। गौतम और मयूरी के अलावा और 5 लोग भी मेरे साथ थे।ये लोग मेनै मिलिंदजी की सलाह पर एक सूत्र से कहकर मंगवाये थे। ये सूत्र पुलिस का खबरी था और मुंबई के एक बदनाम इलाके में एक राजनैतिक पार्टी का छुटभैया नेता भी। हम तीनों एक ऑटो रिक्शा में बैठकर अपनी मंजिल की तरफ निकले। हमारे पांचों अंगरक्षक एक काले रंग की मारूति जिप्सी जीप में हमारे पीछे पीछे चले।

हमारा ऑटो रूका बांद्रा कोर्ट के सामने जहां वकीलों की तमाम दुकामों में से एक थी वकील मिश्रा की दुकान। गौतम ने मिश्रा को एक दिन पहले ही कह रखा था कि कल मेरा दोस्त आने वाला है शादी करने के लिये। एडवोक्ट मिश्रा के साथ और भी 2 लोग मौजूद थे, उसमें से एक का सरनेम पांडे था और दूसरे का चौबे। उन्होने हमें बडे ध्यान से देखा। हमने चेहरे पर ऐसे भाव ला रखे थे जैसे कि हम बडे परेशान और डरे हुए हैं। गौतम खुफिया कैमरे पर रिकॉर्डिंग क बटन दबा चुका था।

कोर्ट के ठीक सामने वे हमें एक संकरी गली में ले गये, जिसकी दोनो ओर छोटे छोटे कमरे थे। इन कमरों में कई जोडों की शादी करवाई जा रही थी। कहीं फेरे हो रहे थे तो कहीं वरमाला पहनाई जा रही थी। ऐसे ही कमरों के बीच एक कमरा मिश्रा का भी था, जिसे मिश्रा ने अपना दफ्तर बना रखा था। हमारे वहां पहुंचने से पहले वकील साहब के और 2 मुवक्कील उनका इंतजार कर रहे थे। वकील मिश्रा ने झटपट उनका काम निपटाया और फिर हमारी ओर मुखातिब हुए।

मैने इनको बताया कि मेरा नाम प्रभात सिंह है और मेरे साथ आई लडकी यानी कि मयूरी का नाम संगीता थॉमस है। ( उसका जानबूझकर इसाई नाम रखा गया ताकि हम ये साबित कर सकें कि किस तरह से इस गोरखधंदे में स्पेशल मैरेज एक्ट की अनदेखी की जाती है। इस कानून के मुताबिक अगर कोई हिंदू लडका किसी गैर हिंदू लडकी से शादी करता है तो उस लडकी को अपना धर्म परिवर्तन करना पडता है।) हमने कहा कि हम अपने घरवालों की मर्जी के बगैर भागकर शादी कर रहे हैं। हम बहुत जल्दी में हैं, हमें तुरंत मुंबई से बाहर निकलना है। हमारे पास हमारी उम्र या रहने का स्थान साबित करने के लिये भी कोई कागजात नहीं हैं।

हमारी बात सुनकर तीनों वकीलों ने आपस में कुछ देर तक मशवरा किया फिर कहा कि काम हो जायेगा, लेकिन इसके लिये 12 हजार रूपये लगेंगे। थोडीसी न नुकुर करने के बाद ने 7 हजार में शादी का सर्टीफिकेट देने को तैयार हो गये। कागजात हाथ लगने से पहले जो बातचीत उन्होने हमसे की उसमें असली खबर थी।

पांडे ने मयूरी से कहा – मैडम। आप इसाई हैं। इनसे शादी करने से पहले आपको धर्म परिवर्तन करना पडेगा। ये सिर्फ फॉरमेलटी है। आप पेपर पर साईन कर दो, बाकी सब हम संभाल लेंगे।
मयूरी ने रूखी आवाज में जवाब दिया – नहीं नहीं...ये सब नाटक हमें नहीं चाहिये।हम धर्म में विश्वास रखते ही नहीं। इसी धर्म की वजह से आज हमें भागकर सादी करनी पड रही है। आप कुछ कीजिये।

पांडे ने कहा- अच्छा चलो ठीक है। वो हम संभाल लेंगे। बस आप भगवान की मूर्ति के सामने हार पहना कर इनके साथ 7 फेरे ले लीजिये। हम आपको शादी का प्रमाणपत्र दे देंगे।

मैने इस पर ऐतराज जताया – ये सब ही करना था तो भाईसाहब आपके पास आते ही क्यों। अभी आपको बताया न कि धर्म वर्म रीति रिवाज में हमारा कोई विश्वास नहीं। हमें आप बस सर्टीफिकेट दे दीजिये। पेपर पर हम शादीशुदा हैं न...बाकी दुनिया गई भाड में।

मिश्रा मेरी बात सुनकर सकपकाये फिर कहा- ठीक है आप लिख दीजिये कि हमने आज सुबह गोरेगांव के वागेश्वरी मंदिर में शादी की है।
हमसे उन्होने 2 हजार रूपये एडवांस लिये और आधे घंटे बाद आने को कहा। इस बीच वक्त गुजारने के लिये हमने चाय पीने की सोची और मिश्रा के काले कोट वाले साथी चौबे को भी आमंत्रित किया। यहीं पर हम एक गलती कर बैठे।

बाल बाल बचे।
हम पास ही के एक दक्षिम भारतीय रेस्तरों में बैठे और 4 चाय का आर्डर दिया। हमने उस कालेकोट से बातचीत तक ये जानने की कोशिश की कि वहां रोजाना कितने लोग शादी करवाते हैं, कितने लोग तलाक लेते हैं, क्या पुलिस की नजर उनपर नहीं पडती वगैरह वगैरह। इस दौरान गौतम एक बार हल्का होने के बहाने टेप बदलने बाहर गया।

जब इस कालेकोट से हमारी बातचीत हो रही थी, तब मैने महसूस किया कि बगल के टेबल पर बैठा एक दूसरा वकील हमारी बातचीत सुनने की कोशिश कर रहा है। वो लगातार मुझे ही घूर रहा था, जैसे कि याद करने की कोशिश कर रहा हो कि मुझे पहले इसने कहां देखा है।..और मेरा डर सही निकला। उसकी याददाश्त ने उसका साथ दिया।
दीक्षित। आज तक न।

उस वकील की इस हरकत पर मेरे मन में एक साथ 3 भाव आये, खुशी, गुस्से और डर के। खुशी इस बात की थी कि आज तक छोडे तो मुझे 2 साल हो चुके थे, लेकिन वहां किये काम की वजह से मेरी जो पहचान बनी वो लोगों को अब तक याद है। गुस्सा इसलिये आया कि इस वकील ने गलत वक्त पर अपना मुंह खोलकर हमारी पोल खोल दी और अब सबकुछ गुडगोबर होने को था। डर ये ता कि पोल खुलने के बाद वकील कहीं हिंसक न हो जायें। मयूरी साथ थी और मुझे उसकी सुरक्षा की फिक्र होने लगी..खुद तो पिटने के पूरे आसार लग ही रहे थे। मेरी आंखों के सामने 26 अगस्त 2002 की वो तस्वीरें छा गईं जब ठाणे में शिवसेना नेता आनंद दिघे की मौत के बाद शिवसैनिकों ने उस पूरे सिंघानिया अस्पताल को जला डाला जहां वे भर्ती थे। पत्रकारों की भी उन्होने जमकर पिटाई की। मेरी और मेरे कैमरा मैन राजू इनामदार की जान सिर्फ इसलिये बच पाई क्योंकि हमने मरने का नाटक किया था।

मैने उस वकील के सवाल का कोई जवाब नही दिया, पर शायद उसको पक्का विश्वास हो चुका था कि में जीतेंद्र दीक्षित ही हूं और इस वक्त किसी ऑपरेशन पर लगा हूं।

रेस्तरां से बाहर निकलने के बाद उस वकील ने जो हरकत की उसने हमारी मुसीबत में और इजाफा कर दिया। रेस्तरां के बाहर पांडे और मिश्रा खडे थे। ये वकील उनके पास जाकर हमारी ओर उंगली दिखाते हुए उनके कानों में कुछ फुसफुसाया। वकील ने दोनों के कान में जो कुछ भी कहा उसे सुनकर पांडे और मिश्रा के चेहरे से पसीना टपकने लगा। दोनो घबराकर अंदर आये। हमारा साथ उनका जो साथी चौबे बैठा था उसने अभी चाय पीना शुरू भी न किया था कि वे उसे अपने साथ ले गये। जाते जाते मिश्रा ने हमें तुरंत अपने दफ्तर में आने को कहा।

मैं अब मान चुका था कि हमारा ऑपरेशन नाकामियाब हो चुका है। हम पहचान लिये गये थे। बार बार ये सोच कर दिल बैठा जा रहा था कि खाली हाथ वापस लौटना होगा। अब वापस उस वकील के पास जाना मूर्खता होगी। शादी का सर्टिफिकेट तो हमें मिलने से रहा।अगर मिश्रा के दफ्तर में वकीलों ने हमें घेर लिये तो भागने में भी दिक्कत होगी क्योंकि उसका दफ्तर एक संकरी गली के काफी अंदर था।

क्या किया जाये कुछ समझ नहीं आ रहा था। तुरंत वहां से नौ दो ग्यारह हो जायें या फिर मिश्रा के दफ्तर में जाकर देखें कि क्या होता है। मैने मयूरी ौर गौतम से उनकी राय पूछी। दोनो फिर एक बार मिश्रा के दफ्तर में जाने का जोखिम उठाने को तैयार थे। मैने भी सोच लिया कि ये ऑपरेशन इतनी आसाली से नहीं छोडूंगा। ऑपरेशन फेल तो फेल, पिटे तो पिटे, जो होना होगा सो होगा।

मिश्रा के दफ्तर की ओर बढने से पहले मैने अपने सूत्र को मोबाईल पोन पर बता दिया कि मामला गडबड है। अगर बात ज्यादा बिगडती दिखे तो कम से कम मयूरी को वहां से निकाल लेना। मैने सूत्र को स्तानीय डीसीपी का नंबर भी दे दिया ताकि जरूरत पडने पर उससे संपर्क किया जा सके। पांचो लडकों को गली के मुहाने पर खडे रहने को कह दिया।

हम फिर पहुंचे मिश्रा के दफ्तर। वहां पांडे और चौबे भी मौजूद थे। तीनों बडे घबराये लग रहे थे।

अरे बाहर सब वकील लोग बोल रहे हैं कि आप आज तक वाले दीक्षित हैं।
मिश्रा ने चेहरे पर का पसीना पोंछते हुए कहा।

मैने चेहरे पर बनावटी हंसी लाई – हां हां लोग कई बार मुझे वही समझ लेते हैं। में टीवी सीरियल्स में छोटे मोटे रोल करता हूं न...और आज तक में निखिल दीक्षित नाम का एक रिपोर्टर भी है जो मेरी तरह दिखता है। कई बार लोग कन्फ्यूज हो जाते हैं कि मैं वही हूं।

मयूरी ने भी इस झूंठ में सहायता की और उनके शक को कम करने के लिये मुझसे पूछा – क्या आज तक कौन दीक्षित ये लोग क्या बोल रहे हैं।

इससे पहले कि मैं मयरी को कोई बनावटी जवाब दे पाता, पांडे बोल पडा- आपके पति एकदम आज तक के रिपोर्टर दीक्षित की तरह लगते हैं। आप कभी टीवी पर न्यूज नहीं देखतीं हैं क्या।

पांडे का जवाब सुनकर मैं मन ही मन हंसा और मेरी चिंता भी तेडी कम हुई।

अच्छा आपके पेपर तैयार हो चुके हैं। आपको हमारे आदमी के साथ जाकर जज के सामने दस्तखत करना है। बाकी का पैसा अब हमको दे दीजिये।

हम पांच हजार रूपया मिश्रा को देकर उसके भेजे एक लडके के साथ गली के नाके पर के एक नोटरी के दफ्तर पहुंचे। ये नोटरी मिक्श्रा का बताया हुआ जज था।

नोटरी के सामने रखे रजिस्टर पर मैने और मयूरी ने दस्तखत कर दिया। गवाह के तौर पर गौतम और उस सूत्र को दस्तखत करने के लिये बुला लिया। इस बीच मिश्रा का लडका स्टांप पेपर पर नोटरी की मुहर लगवा लाया।

नोटरी के दफ्तर से बाहर निकले तो हमें मिश्रा और पांडे मिल गये। हाथ मिलाकर उन्होने हमें शादी की मुबारकबाद दी। मैने उनसे पूछा – अभी कोई लफ्डा तो नहीं रहेगा न। पुलिस कोई प्रोब्लम तो नहीं करेगी न।

नहीं नहीं। अब कोई तकलीफ नहीं होगी।मियां-बीवी राजी तो क्या करेगा काजी। अब आप कानूनी रूप से शादीसुदा हैं।

शादी का वो कथित प्रमाणपत्र सारे नियम कानूनों को ताक पर रखकर सिर्फ घंटे भर में हमारे हाथ आ गया। हमने झटपड ऑटोरिक्शा पकडी और वहां से रफूचक्कर हो गये।

फर्जी तलाक

शादी का वो प्रमाणपत्र तो हमारे हाथ आ चुका था लेकिन काम अभी आधा ही हुआ था। बॉस के आदेश के मुताबिक हमें 24 घंटे के भीतर तलाक भी लेना था।अगले दिन मैं और गौतम फिर एक बार तैयार होकर उसी गली में पहुंचे। मैंने इस बार नीले रंग का टी शर्ट पहन रखा था और आंखों पर काले रंग का चश्मा था। इस बार पकडे जाने की रिस्क ज्यादा लग रही थी, लेकिन आधे ऑपरेशन की सफलता ने हमारा आत्मनिश्वास बढा दिया था।

इस बार हम बांद्रा रेल्वे स्टेशन के पास मैरेज ब्यूरो चलाने वाले एक वकील के पास गये। जब हमने उसकी दुकान में कदम रखा तो वकील महोदय पहले से ही किसी की शादी करवाने में व्यस्त थे। जिस सहजता से वो मंत्रोच्चार करके उस छोटी से दुकान में एक युवा जोडे की शादी करना रहा था उसे देखकर हम सोच में पड गये- ये वकील है या पंडित। जब शादी का कार्यक्रम खत्म हुआ तो मुझसे रहा नहीं गया। मैने चुटकी ली – आप तो टू इन वन हैं। वकालत भी करते हैं और शादी भी करवाते हैं।

यहां के ज्यादातर वकील दोनो काम करते हैं। शादी की रस्में भी हम ही पूरी करवा देते हैं। इससे पार्टी को अलग से पंडित नहीं बुलवाना पडता। उसका टाईंम और पैसा भी बच जाता है क्योंकि हम सबकुछ शॉर्ट कट में कर देते हैं।

इस बीच गौतम चिंतित हो रहा था। कैंमरा चालू था और हमारी बातचीत से टेप बर्बाद हो रहा था। वो सीधे काम की बात पर आया – अच्छा वकील साब अभी तो आपने एक शादी करवाई है, अब एक तलाक भी करवा दीजिये।
हां बताईये। किसका तलाक करवाना है।
यही मेरे दोस्त प्रभात का। गौतम ने मेरी ओर इशारा करते हुए कहा।
ओह तो आप ही तलाक चाहते हैं। शादी कब हुई थी।
इसी साल 14 फरवरी को। मैने जवाब दिया।
इसमें तो लफ्डा है। इतनी जल्दी तो तलाक नहीं मिल सकता।
अरे तो भाईसाब आप किसलिये बैठे हो। आप फटाफट हमारा काम करवा दोगे उसी उम्मीद में तो आयें हैं आपके पास। गौतम ने कहा।
अच्छा। बताईये शादी कहां की।
शादी यहीं के गोरेगांव मंदिर में की थी भागकर।
कोई फोटू वोटू, सर्टीफिकेट वगैरह है प्रूफ के लिये।
नहीं वो सब तो नहीं है अभी। आप ही कुछ तरीका निकालिये।

हमारी बात सुनकर वकील ने एक लंबी सांस ली और कहा- अच्छा ठीक है। निपटा तो देंगे, लेकिन आप का काम काफी लफडे वाला है। 4 हजार रूपये लगेंगे।

थोडी देर तक बहस करने के बाद वो ढाई हजार रूपये में हमारा काम करने को तैयार हो गया। हमने उसे पहले की ही तरह फर्जी नाम और पता दिया एक हजार रूपये एडवामस देकर हमने उससे कहा कि हम आधे घंटे में दुल्हन को लेकर आते हैं। इस दौरान वो तलाक के पेपर्स तैयार रखे।
इस आधे घंटे के दौरान गौतम ने कैमरे में से टेप बदला और चेक किया कि पिछले टेप में सब ठीकठाक रिकॉर्ड हुआ है या नहीं।

आधे घंटे बाद हम वकील की दुकान पर मयूरी के साथ पहुंचे। मयूरी ने लाल रंग की पंजाबी ड्रेस पहव रखी थी और गले में मंगलसूत्र डाल रखा था।
वकील साहब के हाथ में एक स्टांप पेपर तैयार था, जिसपर लिखा था – डीड औफ डिवोर्स।

आप दोनो इसे पढ लो और फिर साईन कर दो। आप के पास ्भी भी वक्त है। सोच लो। चाहो तो अपना फैसला वापस ले सकते हो। वकील ने मेरी ओर पेपर बढाते हुए कहा।
मैने उस पेपर पर एक नजर डाली और मयूरी की ओर इशारा करते हुए गौतम को दिया- दे दे इसको और बोल कि साईन करके जल्दी मुकित दे।
ऐसा करके हम वकील के सामने ये जताना चाहते थे कि हम वाकई में एक दूसरे से अलग होना चाहते हैं और हमारे बीच बोलचाल भी बंद है।

हां हां इनके साथ रहना भी कौन चाहता है। मुझे भी पीछा छुडाना है।
...तो भाषण मत दे और साईम कर इस पे। ज्यादा टाईम नहीं है मेरे पास।

हमारे झगडे के नाटक को देख वकील साहब को यकीन हो गया कि वाकई में इनका विवाहित जीवन ठीक नहीं चल रहा है। मेरे और मयूरी के पेपर पर साईन करने के बाद गवाहों के तौर पर फिरसे गौतम और उस सूत्र ने दस्तखत किये।

लिखा पढी होने के बाद मैने वकील साहब से पूछा- हां तो अब सब हो गया न...अब तो मेरी इससे जान छूटी।

हां काम तो हो गया बस आपको खाली जज के सामने साईन करना है।
वकील के शब्द सुनकर हम चौंक गये। किस जज के सामने ले जा रहा है ये। क्या वाकई में ये पेपर फैमिली कोर्ट में जायेंगे।

हमारे चिंतित चेहरों को देखकर वकील ने कहा – आप लोग हमारे साथ चलिये। हम तुरंत आपका काम करवा देंगे।

हम चारों उसके पीछे चल दिये। वो जिस जगह हमें ले गया वहां पहुंच कर हमारी सिट्टी पिट्टी गुम हो गई। ये तो कोर्ट के सामने नोटरी का वही दफ्तर था जहां हमने एक दिन पहले फर्जी शादी के स्टांप पेपर को रजिस्टर करवाया था।

अरे बार रे । ये नोटरी तो हमें पहचान लेगा। कल तो इसी के पास आये थे। गौतम मेरे कान में फुसफुसाया।

ऑपरेशन प्लॉप होने की तलवार फिर हमारे गले पर लटक रही थी, लेकिन हिम्मत जुटा कर हम उसके दफ्तर में घुस ही गये।

ये जज साहब हैं। इनके रजिस्टर में आप साईन कर दीजिये। आपका काम हो गया फिर। वकील ने नोटरी की तरफ इशारा करते हुए कहा।

नोटरी ने कागजात देखे फिर हमारे चेहरे की ओर ध्यान से देखा। हमें लगा कि अब पकडे गये। दूल्हा भी वही, दुल्हन भी वही और दोनो गवाह भी वही....पर हमारी चिंता बेकार साबित हुई। नोटरी ने मयूरी की ओर देखते हुए पूछा – संगीता। मालूम है न क्या लिखा है इसमें।

हां मालूम है।

ठीक है। बच्चा-वच्चा। कोई इश्यू।

नहीं कोई इश्यू नहीं।

ओके फिर इधर साईन करो। विटनेस लोग को लाया है क्या।

मेरे और मयूरी के साईन करने के बाद गौतम और उस सूत्र ने भी बतौर गवाह नोटरी के रजिस्टर में दस्तखत किये।

नोटरी के दफ्तर से बाहर निकलने के बाद मैने वकील से पूछा – अभी कोई लफ्डा तो नहीं होगा न।

नहीं नहीं अब कोई लफ्डा नहीं होगा। आप दोनो अगर दूसरी शादी करना चाहो तो कर सकते हो।

थैंक यू वकील साहबय़ आप ने तो हमारा काम झटपट करवा दिया।

भाई यो तो हमारा काम ही है। वैसे ये बडा रिस्की काम होता है।

इसमें रिस्क क्या है। मैने उसे कुरेदा।

अरे भई इस तरह से बिना कोई पेपर के, बिना कोई नोटिस और फॉर्मेलिटी के तुरंत से तलाक करवाना गैर कानूनी है। पकडे गये तो पुलिस केस हो सकता है। हमारी वकालत की पदवी छिन सकती है।

वकील का शुक्रिया अदा कर हमें वहां से एक ऑटो रिक्शा में निकल लिये।

हमारा ऑपरेशन कामियाब रहा था। 24 घंटे के भीतर हमारे हाथ में शादी के पेपर भी थे और तलाक के भी। ये सारा रैकेट किस तरह से चलता है। पैसे के आगे कानून किस तरह से ताक पर रख दिया जाता है और अहम कागजात भी किस तरह से गैरजरूरी हो जाते हैं, ये सब हमारे खुफिया कैमरे में कैद हो चुका था। अब बस बाकी था तो बस इस रैकेट का टीवी पर भंडाफोड करना।

खबर का असर
इस शादी और तलाक को शूट करने में हमें 6 टेप लगे। कुल 3 घंटे का फुटेज था। एडिटिंग में हमें पूरा एक दिन लगा। कुल 10 मिनट का एक पैकेज तैयार किया गया। 19 अगस्त 2004 को शाम साढे आट बजे स्टार न्यूज पर पहली बार इस खबर को दिखाया गया। हमारी खबर के साथ ही पूजा कांबले नाम की उस महिला का भी उसके घर से लाईव इंटरव्यू लिया गया, जिसमें उसने बताया कि किस तरह से वो इस गोरखधंदे का शिकार बनी और किस तरह से पुलिस ने भी उसकी शिकायत को नजरअंदाज कर दिया। 2 और भी पैकेज दिखाये गये जिसमें बताया गया कि शादी करने और तलाक लेने का कानूनी तरीका क्या है।

स्टार न्यूज पर खबर चलने के बाद अगले ही दिन पूजा कांबले को निर्मलनगर पुलिस थाने से फोन आया। तुरंत उसका बयान दर्ज किया गया और 4 दिनों बाद उसका बच्चा उसे वापस मिल गया।

सामाजिक संगठमों की ओर से बनाये गये दबाव के बाद मामला मुंबई पुलिस की क्राईंम ब्रांच को सौंप दिया गया। क्राईम ब्रांच के अफसरों ने छापा मारकर अदालत के बाहर फर्जीवाडा चला रहे कई वकीलों को गिरफ्तार भी किया जिसमें वो नोटरी भी था, जिसमे हमारे फर्जी शादी और तलाक के कागजात पर दस्तखत किये। पुलिस ने उसके खिलाफ धोखाधडी का मामला दर्ज किया।

इस बीच मजलिस नाम की एक संस्था ने हमारी रिपोर्ट को आधार बनाते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी। हाईकोर्ट के निर्देश पर बार काउंसिल ने मामले की जांच शुरू की।
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Tuesday, 7 August 2007

हवाई अड्डे पर होशियार - जीतेंद्र दीक्षित

मुंबई के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर एक ऐसा गिरोह काम कर रहा है, जिसपर विदेशी मुसाफिरों से ठगी करने का आरोप है। हवाई अड्डे के टैक्सीवालों ने बाम्बे हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर शिकायत की है कि इस गिरोह के लोग खुद को बतौर लोडर पेश करके विदेशी मुसाफिरों का सामान चुराते हैं और उनसे ठगी करते हैं। हाईकोर्ट ने इनपर पाबंदी लगा दी है, लेकिन हवाई अड्डे के बाहर अब भी इनका कारोबार जारी है। इनके गले में लटके आईकार्ड को देखकर लोगों को भ्रम होता है कि ये Airport Authority of India की ओर से नियुक्त किया गया अधिकृत लोडर है, लेकिन ऐसा नहीं है। ये आई कार्ड है हमाल एकता संगठन का, जिसे एयरपोर्ट प्रशासन से कोई मान्यता नहीं मिली है। इनके खिलाफ एयरपोर्ट के टैक्सीवालों ने बाम्बे हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की है। आरोप है कि मदद के नाम पर ये विदेशी मुसाफिरों के साथ ठगी करते हैं।
एयरपोर्ट अथोरिटी ने कई बार इन अनधिकृत लोडरों के खिलाफ मुंबई पुलिस के पास शिकायत भी दर्ज कराई है। पुलिस ने शिकायतों पर कार्रवाई भी की, लेकिन इसके बावजूद इनकी गतिविधियां पूरी तरह से थमीं नहीं हैं। जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए बाम्बे हाईकोर्ट ने भी इनपर पाबंदी लगा दी है, पर हाईकोर्ट के आदेश का यहां कोई असर नहीं दिखता।
हमाल एकता संगठन इन आरोपों को बेबुनियाद बताता है।

इस मामले ने एयरपोर्ट पर सिर्फ विदेशी मुसाफिरों की सुरक्षा का सवाल ही खडा नहीं किया है। सवाल ये है कि परदेस से आये मुसाफिर यहां से भारत की कैसी छवि लेकर अपने देश लौटते हैं।

बांग्लादेश से घुस्पैठ का सच - जीतेंद्र दीक्षित

इस्माइल 1995 में भारत में घुस्पैठ करके आया और तबसे हरसाल वो बांग्लादेश बडी आसानी से आता जाता रहता है। उसका कहना है कि सीमा पर बसे दलाल दोनों देशों की सुरक्षा एजेंसियों की मिलीभगत से हर साल हजारों लोगों की घुस्पैठ कराते हैं। हमसे बातचीत में इस्माइल ने ये बातें बताईं-

- सीमा से सटे गांवों में दलालों का डेरा।
इस्माइल के मुताबिक भारत और बांग्लादेश में सीमा से सटे गांव वाले दलालों का काम करते हैं। लोगों को 50 से 100 के जत्थों में बॉर्डर क्रॉस कराया जाता है। दलालों की भूमिका भी आपस में बंटी होती है। एक दलाल बॉर्डर क्रास करने के इच्छुक लोगों को सीमा तक लाता है। दूसरा दलाल उन्हें अपने साथ बॉर्डर क्रॉस करवाता है, तीसरा दलाल बॉर्डर क्रॉस कर लेने के बाद देश के अंदरूनी हिस्से की ओर निकलने में मदद करता है।

- सुरक्षा बलों से मिलीभगत।
इंटरव्यू में इस्माइल मे बताया कि दोनों देशों के सुरक्षा बलों की दलालों के साथ मिलीभगत है। दलाल प्रति व्यकित बॉर्डर क्रास कराने के लिये 2500 रूपये लेते हैं लेकिन सुरक्षाकर्मियों को ये प्रति व्यकित 50 से 100 रूपये देते हैं। मतलब कि 50 या 100 रूपये में होता है देश की सुरक्षा से खिलवाड।

कौन हैं घुस्पैठियों के दलाल।
इस्माइल के मुताबिक बांग्लादेश से भारत में घुस्पैठ का काम खास तौर पर अब्दुल्ला, कासम और बच्चू नाम के दलाल देखते हैं। दोनों देशों के सुरक्षा बलों के बीच इनके हितैषी मौजूद हैं। घुस्पैठ का सारा नेटवर्क ये दलाल ही कंट्रोल करते हैं।

- कैसे क्रास कराते हैं बॉर्डर।
बार्डर अक्सर रात के वक्त क्रास कराया जाता है। सुरक्षा बलों के साथ अपने रिश्तों के चलते दलालों को पता चल जाता है कि कब किस इलाके में गश्त होगी या नहीं होगी। उसी मुताबिक बॉर्डर क्रास कराने का वक्त और जगह तय होती है।कई बार किन्ही कारणों से अगर सीमा पर सुरक्षा चुस्त की जाती है तो घस्पैठियों को 2-3 दिन तक ठहरने के लिये कहा जाता है। इनके रूकने का इंतजाम सीमा से सटे गांवो में हो जाता है।घुस्पैठियों को अपना सामान लेकर तेजी से एक ओर से दूसरी ओर भागने के लिये कहा जाता है।

डीपोर्ट का नाटक।
हर साल भारत भर से हजारों बांग्लादेशी वापस डीपोर्ट किये जाते हैं। ज्यादातर लोग निम्न वर्ग के होते हैं जो गरीबी के चलते रोजगार की तलाश में भारत में घुसते है...लेकिन डीपोर्ट किये जाने वाले तमाम लोग ज्यादा से ज्यादा 2 से 3 महीने में दलालों की मदद से वापस भारत पहुच जाते हैं।

इस्माइल की अपनी कहानी।
इंटर्व्यू में इस्माइल ने खुद अपनी कहानी भी बताई है कि किस तरह से वो गरीबी के चलते 1995 में बांग्लादेश से घुस्पैठ करके भारत आया।अब वो मुंबई में कपडों का छोटा मोटा कारोबार कर रहा है और मुंबई पुलिस के लिय खबरी का भी काम करता है। जबसे ये खुलासा हुआ है कि मुंबई में ट्रेन धमाकों के लिये इस्तेमाल किया गया आरडीएक्स बांग्लादेश के रास्ते से आय़ा है, पुलिस के लिये इस्माइल का काम बठ गया है।

इस घुस्पैठिये के इंटरव्यू पर हमने मुंबई में बांग्लदेशी घुसपैठियों के मसले पर काम करने वाले आईजी सत्यपाल सिंह से बात की। सिंह ने ये बाते बताईं-

- पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई एस आई अब भारत में आतंकी साजिशों को अंजाम देने के लिये बांग्लादेश का इस्तेमाल कर रही है। 11 जुलाई 2006 को मुंबई की 7 ट्रेनों में हुए धमाकों के लिये पाकिस्तानी आरडीएक्स के साथ नेपास के रास्ते से ही भारत आये थे। बांग्लादेश में न केवल आतंकियों ने ट्रेनिंग कैंप बना लिये हैं, बल्कि वहां से हथियारों, बारूद और नार्कोटिक्स की स्मगलिंग भी होती है।
- बांग्लादेश सीमा से सटे इलाकों में बांग्लादेशी घुस्पैठिये बडे पैमाने पर बस गये हैं। इनका प्रभाव दिनोंदिन इस कदर बढ रहा है कि चंद सालों बाद ये वहां के जनप्रतिनिधि भा तय करेगे।
- दुर्भाग्य से बांग्लादेशी सीमा के पास हमारा सीमा कवच कमजोर है। ये बात सही है कि सीमा से सटे गांव बांग्लदेसियों के प्रभाव में हैं और इस हालत के पीछे भ्रष्टाचार एक बडा कारण है।

नहीं चाहिये दाऊद का भाई - जीतेंद्र दीक्षित

दाऊद के भाई इकबाल कासकर ने बरी होते वक्त कहा था कि जेल से रिहा होने के बाद वो बाहर आकर समाज सेवा करना चाहता है और उसके बाद सियासत में भी अपने पैर जमाने की कोशिश करेगा। उसने 2 साल पहले भी जेल से विधानसभा चुनाव लडने की कोशिश की थी, लेकिन पुलिस के दबाव में आकर उसने अपना पर्चा वापस ले लिया। अब इकबाल कैद से आजाद है और न ही उसके खिलाफ कोई आपराधिक मामला चल रहा है, लेकिन फिर भी महाराष्ट्र की कोई राजनैतिक पार्टी उसे लेने को तैयार नहीं।

शिवसेना और बीजेपी जैसी हिंदुत्ववादी पार्टियां तो उसे लेने से रहीं, लेकिन हमने कांग्रेस, एनसीपी और समाजवादी पार्टी जैसे खुद को सेकुलर बताने वाले राजनैतिक दलों के आला नेताओं से जब ये पूछा कि क्या वो इकबाल कासकर को अपनी पार्टी की सदस्यता देंगे तो उनके बडे दिलचस्प जवाब मिले-

कांग्रेस (हुसैन दलवई, प्रवक्ता)
"कांग्रेस पार्टी ऐसे ही कोई ज्वाईन नहीं कर सकता। ज्वाइन करनेवाले का इतिहास देखा जाता है। उसका चरित्र देखा जाता है। इकबाल ने कहा है कि वो सामाजिक काम करना चाहता है तो करने दो उसे...अच्छी बात है। कांग्रेस पार्टी मे ऐसे गैर तत्वों को नहीं लिया जाता।"

समाजवादी पार्टी ( अबू हासिम आजमी)
"जब अरूण गवली नेता बन सकते हैं तो इकबाल कासकर भी पॉलिटिक्स में आ सकते हैं। कोई पार्टी ज्वाईन कर सकते हैं खुद की पार्टी बना सकते हैं, लेकिन हमारी अभी कोई बातचीत उनसे नहीं हुई है तो ये सवाल हमसे क्यों पूछा जा रहा है।"

एनसीपी ( अरूण गुजराती, महाराष्ट्र प्रमुख)
"मैं उस स्थिति के बारे में कुछ नहीं कह सकता। आज वो सबजेक्ट नहीं है, वो इश्यू नहीं है इसलिये मैं इस सवाल का जवाब नहीं देना चाहता।"

अब जब कि कोई राजनैतिक पार्टी इकबाल को लेने को तैयार नहीं है तो उसके सामने यही विकल्प बचता है कि वो खुद की पार्टी गठित करे।

दाऊद की पाठशाला !

मुंबई अंडरवर्लड के सबसे बडे डॉन दाऊद इब्राहिम को उसी के एक सहपाठी ने नाकों चने चबवाये। मुंबई के उर्दू मीडियम स्कूल में दाऊद ने करीब 6 साल तक उसके साथ पढाई की थी।
मैट्रिक पास करने के बाद दाऊद ने गुनाह की राह पकडी, जबकि उसके सहपाठी ने पुलिस में अपना करियर बनाया। हम मिले दाऊद के इसी सहपाठी से जो अब भी पुलिस महकमें में है और दाऊद के सबसे बडे दुश्मनों में से एक है।उसने हमें बताईं दाऊद के बचपन के दिनों से जुडी कई सारी बातें, जो इस डॉन का एक अलग ही चेहरा पेश करतीं हैं। हम दाऊद के टीचर से भी मिलें और उन्होने जो बातें हमें बताईं उसे सुनकर आप सोचेंगे कि क्या ये वही शख्स है, जिसे आज दुनिया के सबसे खतरनाक आदमियों में गिना जाता है।

उन्होने साथ साथ पढाई की, टीचर की डांट खाई, खेले कूदे, लेकिन आज वे है एक दूसरे के जानी दुश्मन। ये कहानी है अंडरवर्लड डॉन दाऊद इब्राहिम और स्कूली दिनों में उसके साथी कादर खान की। जहां दाऊद आज गुनाह की दुनिया में बहुत बडा नाम बन चुका है, वहीं कादर खान मुंबई पुलिस में एक सीनियर इंस्पेक्टर है। वैसे मुंबई पुलिस में डी कंपनी के तमाम दुश्मन हैं, लेकिन कादर खान एक ऐसा इंस्पेक्टर है, जिसे दाऊद शायद ही भूल पाये।
अंडरवर्लड के खूनी खेल में पुलिस और दुश्मन गिरोहों से निपटने के लिये दाऊद इब्राहिम ने शूटरों की फौज खडी कर रखी थी और इन्ही शूटरों के ट्रेनिंग देने के लिये उसने नियुक्त किया था खुद पुलिस का ही एक आदमी और वो भी पुलिस का एक ऐसा आदमी जो मुंबई पुलिस के हथियार खाने में काम करता था और तमाम तरह के हथियार चलाना जानता था।
सीनियर इंस्पेक्टर कादर खान। मुंबई के वडाला पुलिस थाने के इचार्ज। पुलिस महकमें में अपने करियर के दौरान इन्होने कई अपराधों की गुत्थियां सुलझाईं हैं और इनके काम के लिये इन्हें राष्ट्रपति पदक भी मिल चुका है। पर कादर खान की मुंबई पुलिस में एक और पहचान भी है। ये पहचान है अंडरवर्लड डॉन दाऊद इब्राहिम के सहपाठी के रूप में। दाऊद के साथ दक्षिण मुंबई के अहमद सेलर स्कूल में इन्होने 6 साल तक पढाई की...पर पुलिस महकमें में मौजूद अपने इस पुराने साथी से दाऊद कोई फायदा नहीं उठा सका। उलटा कादर खान ने दाऊद गिरोह के शूटरों को ट्रेनिंग देने वाले अपने ही महकमें के एक कांस्टेबल को खत्म कर दाऊद को एक करारा झटका दिया। दाऊद के लिये काम करने वाला ये कांस्टेबल था राजेश इगवे उर्फ राजू।
अंडरवर्लड के खूनी खेल में पुलिस और दुश्मन गिरोहों से निपटने के लिये दाऊद इब्राहिम ने शूटरों की फौज खडी कर रखी थी और इन्ही शूटरों के ट्रेनिंग देने के लिये उसने नियुक्त किया था खुद पुलिस का ही एक आदमी और वो भी पुलिस का एक ऐसा आदमी जो मुंबई पुलिस के हथियार खाने में काम करता था और तमाम तरह के हथियार चलाना जानता था।
-जी हां राजू की पोस्टिंग मुंबई पुलिस के हथियार खाने में की गई थी। कहने को तो राजू एक पुलिस वाला था, लेकिन उसकी खाकी वर्दी के पीछे छुपा था एक खतरनाक अपराधी। पुलिस की नौकरी से मिलने वाला साधारण वेतन इगवे की अय्यशियों को पूरा सकरने के लिये कम पडता था। शराब और शबाब के शौकीन इगवे को चाहिये थी ऊपरी कमाई और उसकी इसी कमजोरी का फायदा उठाया दाऊद इब्राहिम ने। दाऊद जानता था कि राजू को पिस्तौल और रिवॉल्वर से लेकर राईफल, मशीन गन और एके 47 जैसे तमाम अत्याधुनिक हथियार चलाने आते हैं। दाऊद के लिये ये आदमी बडे काम का था। 1991 में दाऊद का एक शूटर माया डोलस मुंबई के लोखंडवाला इलाके में पुलिस एनकाउंटर में मारा गया था। दाऊद चाहता था कि उसके शूटर दुश्मन गिरोह के शूटरों को तो ठिकाने लगाने में सक्षम हों हीं, जरूरत पडने पर पुलिस वालों पर भी गोलियां बरसाने के काबिल हों। इसी इरादे से मोटी रकम पर उसने राजू इगवे की भर्ती कर ली। इगवे को जिम्मेदारी दी गई डी कंपनी के शूटरों को हथियार चलाने की ट्रेनिंग देने की।इस काम के लिये उसने जगह चुनी संजय गांधी नेशनल पार्क के जंगलों को।
जिस दौरान राजू इगवे, दाऊद के शूटरों को ट्रेनिंग दे रहा था, उस वक्त कादर खान मुंबई पुलिस की क्राईम ब्रांच में थे। कादर खान मुंबई के उसी नागपाडा इलाके में पले बढे थे, जहां दाऊद का बचपन बीता और जहां से दाऊद उस वक्त भी अपनी आपराधिक गतिविधियां चला रहा था।कादर खान को दाऊद के इस नये ट्रेनर के बारे में पता चला और वे उसके पीछे लग गये। इसी दौरान खान को टिप मिली कि राजू इगवे से दाऊद सिर्फ ट्रेनिंग ही नहीं करवा रहा है, बल्कि उसे दाऊद ने एक बडा मिशन भी सौंप रखा था। ये मिशन था 3 लोगों की हत्या का। ये तीनो लोग थे शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे और 1993 के मुंबई बमकांड की तहकीकात कर रहे अफसर एम एन सिंह और राकेश मारिया।...पर इससे पहले कि इगवे अपने इस मिशन में कामियाब हो पता वो कादर खान के जाल में फंस गया। 17 नवंबर 1995 में को एक मुठभेड में कादर खान की रिवॉल्वर से निकली गोलियों ने इगवे को छलनी कर दिया।
भले ही कादर खान ने दाऊद गिरोह का भारी नुकसान किया हो, लेकिन दाऊद का सहपाठी होना वे अपने लिये एक कलंक मानते हैं। उनके मुताबिक दाऊद का सहपाठी होने की वजह से उन्हे हमेशा शक की नजरों से देखा जाता रहा और कभी कोई संवेदनशील पोस्टिंग नहीं दी गई।
वैसे तो दाऊद के सैकडों शूटरों को मुंबई पुलिस के एनकाउंटर स्पेशलिस्ट अफसर एनकाउंटर्स में ढेर कर चुके हैं, लेकिन दाऊद ने शायद ही सोचा हो कि खुद उसका एक सहपाठी गुनाह की राह में उसके लिये कांटा बनकर उभरेगा।