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Tuesday, 24 November 2015

दाऊद की प्रोपर्टी नीलामी के पीछे की असली कहानी !!!


खबर आई है कि एक बार फिर अंडरवर्लड डॉन दाऊद इब्राहिम की संपत्ति की नीलामी होने जा रही है। बीते 16 सालों में दाऊद की संपत्ति की ये चौथी बार नीलामी हो रही है। मैं इससे पहले दाऊद की संपत्तियों की 3 नीलामियां कवर कर चुका हूं और मेरा मानना है कि ऐसी नीलामी एक ड्रामे से ज्यादा कुछ नहीं होती। साल 2000 में सबसे पहली बार नीलामी कोलाबा इलाके के इस होटल डिप्लोमैट में हुई थी...लेकिन तब किसी की हिम्मत नहीं हुई कि वो डॉन की संपत्ति पर बोली लगाये। उसके अगले साल 28 मार्च 2001 को दूसरी बार फिरसे नीलामी की गई जिसमें दिल्ली के शिवसैनिक अजय श्रीवास्तव ने नागपाडा इलाके की जयराजभाई लेन में 2 दुकाने खरीदीं। उसी साल 20 सितंबर को फिरसे तीसरी नीलामी हुई। उस नीलामी में दिल्ली के ही एक व्यापारी पीयूष जैन ने दाऊद की ताडदेव इलाके की एक संपत्ति खरीदी। इन दोनो ही लोगों ने संपत्ति के पैसे तो चुका दिये लेकिन आज तक संपत्ति का कब्जा हासिल नहीं कर सके हैं।

दिल्ली के शिवसैनिक अजय श्रीवास्तव पेशे से वकील हैं।1999 में श्रीवास्तव पहली बार तब चर्चा में आये थे जब उन्होने पाकिस्तान के साथ क्रिकेट मैच खेले जाने के विरोध में फिरोजशाह कोटला मैदान की पिच खोद डाली थी। अजय श्रीवास्तव ने संपत्ति तो खरीद ली, लेकिन उसके बाद उनका सामना हुआ दाऊद इब्राहिम की बहन हसीना पारकर से। हसीना पारकर ने संपत्ति का कब्जा देने से इंकार कर दिया। अजय श्रीवास्तव ने कब्जा हासिल करने के लिये मुंबई के स्मॉल कॉसेस कोर्ट में अर्जी दायर की। 10 साल तक चले मुकदमें के बाद साल 2010 में फैसला उनके पक्ष में ही आया लेकिन इसके बावजूद हसीना कब्जा छोडने को तैयार नहीं हुई।
भले ही कोर्ट की चारदीवारी में अजय श्रीवास्तव दाऊद के खिलाफ मुकदमा जीत गये हों, लेकिन दाऊद गिरोह के लिये ये उसकी नाक का सवाल था।हसीना पारकर ने स्मॉल कॉसेस कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील कर दी। हसीना पारकर की पिछले साल हार्ट अटैक से मौत हो गई, लेकिन अब उसके बच्चे मुकदमा आगे चला रहे हैं। कुल मिलाकर बीते 15 सालों से अजय श्रीवास्तव कब्जा हासिल करने के लिये दिल्ली से मुंबई का चक्कर काट रहे हैं। इस बीच उत्तर प्रदेश से पुलिस ने छोटा शकील गिरोह के कुछ शूटरों को गिरफ्तार किया जिनसे पूछताछ में पता चला कि उन्हें अजय श्रीवास्तव को अपना निशाना बनाना था। अजय श्रीवास्तव का कसूर था कि उसने दाऊद की संपत्ति पर बोली लगाने की हिम्मत की। इसके बाद दिल्ली पुलिस ने अजय श्रीवास्तव को सुरक्षा मुहैया करा दी। श्रीवास्तव का कहना है कि उन्होने अंडरवर्लड के खौफ के खिलाफ संदेश देने के लिये दाऊद की संपत्ति खरीदी थी। उन्होने मुंबई पुलिस को भी पेशकश की वे उनकी खरीदी हुई संपत्तियों का कब्जा ले ले और उस जगह अपनी चौकी बना दें, लेकिन मुंबई पुलिस ने दिलचस्पी नहीं दिखाई।

वैसे श्रीवास्तव के कुछ पुराने साथी जो अब उनसे अलग हो चुके हैं दबी जुबान से ये भी आरोप लगाते हैं कि उन्होने दाऊद की संपत्ति सिर्फ पब्लिसिटी की खातिर खरीदी थी। श्रीवास्तव की असली मंशा थी कि ऐसा करके वे शिवसेना में अपना कद बढा पायेंगे, लेकिन संपत्ति खरीदने के बाद जब वे मातोश्री बंगले पर बाल ठाकरे से मिलने पहुंचे तो ठाकरे ने उनसे मिलने से इंकार कर दिया।

दाऊद की संपत्ति को नीलामी में खरीदने वाले शख्स पीयूष जैन भी आज तक उसका कब्जा हासिल नहीं कर सकें हैं। जोश में आकर पीयूष जैन ने संपत्ति खरीद तो ली लेकिन उसके बाद डर के मारे उनकी हालत खराब हो गई। संपत्ति खरीदने के बाद पीयूष जैन ने दिल्ली में रहना छोड दिया और अब एक दूसरे शहर में रहने के लिये चले गये हैं। संपत्ति पर कब्जा हासिल करने किलेय पीयूष जैन ने कोई कोर्ट केस भी नहीं किया लेकिन जब उनसे मैने पूछा किया संपत्ति हासिल करने के लिये आपने क्या किया तो उनका जवाब था कि जब अटलबिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे तो मैने उनको खत लिखकर गुहार लगाई थी कि वे संपत्ति पर कब्जा हासिल करने में उनकी मदद करें।

अलग अलग केंद्रीय जांच एजेंसियों ने दाऊद इब्राहिम की करीब 12 संपत्तियों को जब्त कर रखा है और आज की तारीख में बाजार में उनकी कीमत 100 करोड के करीब आंकी जा रही है। सूत्रों के मुताबिक दाऊद के पास कई बेनामी संपत्तियां भी हैं जिनकी कोई आधिकारिक जानकारी इन जांच एजंसियों के पास नहीं है। ऐसी संपत्तियों की देखभाल का काम पहले दाऊद की बहन हसीना पारकर करती थी और अब उसका छोटा भाई इकबाल कासकर करता है।

14 साल बाद फिर एक बार दाऊद की संपत्ति की नीलामी तो हो रही है। हो सकता है कि फिर एक बार कोई न कोई हौसला जुटाकर बोली लगाने के लिये नीलामी में पहुंच जाये...लेकिन उसके आगे उस संपत्ति पर कब्जा हासिल करने के लिये उसे खुद ही दाऊद के रिश्तेदारों से कानूनी लडाई लडनी होगी। बीते हए मामले यही बताते हैं कि पुलिस और सरकार इसमें कोई मदद नहीं करेगी।


(इस विषय का वीडियो यहां देखें- https://www.youtube.com/watch?v=pwGiMOTAKWs )

Saturday, 14 November 2015

7 समानताएं पेरिस और मुंबई हमलों के बीच !


मुंबई में हुआ आतंकी हमला भी नवंबर में हुआ था और पेरिस  में हुआ हमला भी नवंबर में हुआ है लेकिन महीने की समानता के अलावा अगर हम बारीकी से गौर करें तो पाएंगे कि पेरिस और मुंबई के हमलो के बीच करीब 7 समानताएं है।

१)  Crowded Locations.
पहली समानता यह है कि दोनों शहरों में आतंकियों ने भीड़ भाड़ वाले इलाको  को चुना था अपने टारगेट के तौर पैर।   मुंबई में हुए हमले का सबसे बड़ा टारगेट था CST  रेलवे स्टेशन जहां पर अजमल कसाब और उसके साथी इस्माइल  ने  ट्रेन पकड़ने के लिए आए मुसाफिरों  पर अंधाधुंध गोलियां बरसाई।   अकेले CST रेलवे स्टेशन पर ही 56 लोगों की मौत हो गई जिसमें रेलवे मुसाफिर भी थे और पुलिस कर्मचारी भी।

२) Eating Places
पेरिस  और मुंबई के हमलो के बीच दूसरी समानता ये है कि दोनों ही  हमलो में  खाने पीने के  रेस्टोरेंट्स को आतंकियों ने अपना निशाना बनाया जैसे कि मुंबई में उतरे आतंकियों के पहले गुट ने सबसे पहले कोलाबा इलाके के इस मशहूर लियोपोल्ड  कैफ़े में अंधाधुंध फायरिंग की जिस में की 11 लोग मारे गए।

३) Multiple Targets
तीसरी समानता यह है कि आतंकियों ने एक ही शहर मे हमला करने के लिए एक से ज्यादा ठिकाने चुने।फ्रांस में आतंकियों ने 6 अलग-अलग ठिकानों पर हमला किया जबकि मुंबई में  भी आतंकियों ने ७ ठिकानो पर हमला किया था।

४) Fidayeens
चौथी समानता यह है कि पेरिस और मुंबई दोनों ही शहर के हमलो में शामिल आतंकवादी फिदाइन थे यानी कि वो मरने के लिए तैयार होकर ही आए थे। अजमल कसाब ने जो अपना बयान दिया था उसमे उसने बताया था कि उन्हें उनके  handler ने निर्देश दिए थे कि जब तक मारे ना जाओ तब तक मारते रहो, लड़ते रहो।

५) Hostages
पांचवी  समानता।दोनों ही हमलो में आतंकियों ने कई लोगों को बंधक बना लिया था और उन्हें चुन-चुन कर मारा गया जैसे कि Trident होटल में घुसे दो आतंकियों ने तमाम लोगों को बंधक बनाया था।   उन्हें एक कतार में खड़ा किया गया और फिर चुन-चुन कर उन्हें गोली मार दी गई।

६) Sophisticated Weapons
मुंबई और पैरिस के हमलो के बीच छठवीं समानता यह है कि दोनों हमलो में एक ही जैसे हथियारों का इस्तेमाल हुआ।मुंबई में भी आतंकी अपने साथ AK-47 जैसे हथियार लेकर आए थे और पेरिस में भी  AK 47  का इस्तेमाल हुआ जिससे की मिनटों में तमाम लोगों को ढेर किया जा सकता है।

७) Number of attackers
दोनों शहर में हुए हमलो के बीच सातवीं समानता यह है कि दोनों ही हमलो में आतंकियों की संख्या लगभग बराबर ही रही। जब मुंबई में हमला हुआ था तो पाकिस्तान से 10 आतंकी यहां पर आए थे और पेरिस के हमले में भी आठ आतंकी शामिल हुए।

कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि पेरिस में हुआ आतंकी हमला उतना ही बड़ा था जितना कि 26 नवंबर 2008 को मुंबई में हुआ हमला। दोनों ही हमने अपने अपने देशों के सबसे बड़े आतंकी हमले थे पर इतिहास में काली स्याही से दर्ज किए जाएंगे।

Saturday, 7 November 2015

सफरनामा: बाली, इंडोनेशिया (Travelogue-Bali, Indonesia)


बीते हफ्ते इंडोनेशिया के बाली में हुई माफिया छोटा राजन की गिरफ्तारी के सिलसिले में बाली जाना हुआ। एक क्राईम रिपोर्टर की नजर से बाली में छोटा राजन से जुडा एक ब्लॉग मैं पहले ही लिख चुका हूं। छोटा राजन के पकडे जाने के बाद कुछ दिनों तक बाली का जिक्र भारतीय मीडिया में होता रहा, लेकिन इंडोनेशिया का ये प्रांत एक बेहद खूबसूरत पर्यटन स्थल भी है जो दुनियाभर से पर्यटकों को अपनी ओर खींचता है। मेरा ये ब्लॉग एक घुम्मकड की नजर से है और उन लोगों के लिये है जो भविष्य में बाली घूमने की हसरत रखते हैं।

बाली में दाखिल होते वक्त...
अगर बाली में लैंड करते वक्त आप विमान की खिडकी वाली सीट पर बैठे हैं तो समझिये कि आप खुशनसीब हैं। बाली के नुआरा राय एयरपोर्ट का रनवे बिलकुल समुद्र से सटा हुआ है और जैसे जैसे विमान नीचे उतरता है आप को लगेगा कि विमान पानी पर लैंड करने जा रहा है। मुझे और बाकी के सहयात्रियों को ये बेहद रोमांचक अनुभव लगा। हवाई अड्डा ज्यादा बडा नहीं हैं। विमान से उतरने के चंद पलों बाद ही आप इमीग्रेशन की कतार में खडे हो जाते हैं। भारतियों के लिये बाली में आना उतना ही आसान है जितना भारत के किसी एक शहर से दूसरे शहर में पहुंचना। बाली में भारतियों के लिये पहले से वीजा लेने की जरूरत नहीं है और न ही वीजा के लिये एक पैसा देना पडता है। इमीग्रेशन पर 30 दिनों का टूरिस्ट वीजा का ठप्पा लगवाइये और बेधडक आगे बढ जाईये। यहां एक तख्ती जरूर आपको दिखाई देगी कि गलत वीजा पर बाली में दाखिल होने वालों को 5 साल तक की कैद होगी।

शहर के भीतर...
जब आप कार में बैठकर एयरपोर्ट से शहर में दाखिल होते हैं तो आपको पहली नजर में शायद ये लगेगा ही नहीं कि आप किसी दूसरे देश में आये हैं। कभी आप महसूस करेंगे कि आप दक्षिण भारत के किसी शहर में हैं तो कहीं आपको बाली गोवा के जैसा लगेगा...लेकिन थोडा गौर से देखने पर फर्क मालूम पडने लग जाता है। सडक पर वाहनों की आवाजाही बेहद अनुशासित है। यहां भी भारत की तरह सडक की बायीं ओर से वाहन चलते हैं। सडकें भीडभरी न होने पर भी शहर के भीतर कोई भी वाहन 30 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से ज्यादा नहीं चलाता। ।भारत की तरह यहां भी कई दुपहिया वाहन चालक आपको ट्रैफिक नियम तोडते दिख जायेंगे। यहां भी दुपहिये पर सवार दोनों लोगों को हेलमेट पहनना जरूरी है और इस नियम पर सख्ती से अमल होता है। सिटी बसें सडक पर बिलकुल नजर नहीं आयेंगी और न ही यहां लोकल ट्रेनें और मेट्रो रेल चलतीं हैं। हर किसी के पास खुद की गाडी है। बुझी हुई सिगरेट के टुकडों के अलावा यहां सडकों पर और किसी तरह की गंदगी नहीं दिखाई देगी। हमारे देश के चौक चौबारों पर नेताओं और राजनेताओं की प्रतिमाएं लगीं दिखतीं हैं लेकिन बाली के चौराहों पर आपको रामायाण, महाभारत और पौराणिक पात्रों जैसे कृष्ण, अर्जुन, गरूड की प्रतिमाएं जगह जगह दिखाई देंगीं। कई इमारतों के दरवाजे भी आपको भारतीय शैली में बनाए दिखाई देंगे।

नकद नारायण।
अगर मैं ये कहूं कि मैने बाली में पानी की एक बोतल 5 हजार रूपये में खरीदी तो शायद आपको लगेगा कि मुझे ठग लिया गया। दरअसल इंडोनिेशिया की करंसी का नाम भी भारत की तरह ही रूपया है लेकिन इस रूपये का मूल्य भारतीय रूपये की तुलना में काफी कम है। एक अमेरीकी डॉलर में आपको 13100 इंडोनिशियाई रूपये से लेकर 13600 इंडोनेशियाई रूपये तक मिल सकते हैं। मेरी सलाह है कि बाली में उतरने पर एयरपोर्ट पर करंसी एक्सचेंज कराने के बजाय शहर के भीतर करंसी एक्सचेंज कराएं जहां आपको डॉलर का ज्यादा मूल्य मिलेगा। इंडोनेशियाई करंसी की इस हालत के मद्देनजर आपको हर चीज यहां हजार या लाख में खरीदनी पडेगी। मसलन अगर आपने इंडोनेशियाई करंसी में अगर 1 लाख रूपये का खाना खाया है तो इसका मतलब आपने 7 या 8 अमेरीकी डॉलर खर्च किये हैं। वैसे एक पर्यटन के ठिकाने के तौर पर बाली तुलनात्मक रूप से काफी सस्ता है बस खर्च करते वक्त हजार और लाख जैसे शब्दों को ज्यादा गंभीरता से मत लीजिये।

जुबान और शाहरूख खान।
तुम पास आये...यूं मुसकुराए...तुम ने न जाने क्या सपने दिखाये...”- फिल्म कुछ कुछ होता है का ये गीत बाली में बेहद लोकप्रिय है। ये बात हमें तब पता चली जब कार में सफर करते वक्त मेरे सहकर्मी गणेश ठाकुर ने अपने मोबाईल पर ये गाना लगाया तो हमारा स्थानीय ड्राईवर गदेय भी साथ गुनगुनाने लगा। हमें ये देखकर बडा ताज्जुब हुआ। उसने हमें बताया कि शाहरूख का ये गाना बाली में बेहद लोकप्रिय है और लोग मतलब न जानते हुए भी इसकी प्यारी धुन की वजह से इसको गुनगुनाते हैं। उसकी इस बात की पृष्टि कई और बालीवासियों ने भी की। बाली के लोग शाहरूख खान को काफी पसंद करते हैं। वैसे बाली में भाषा एक छोटी सी समस्या है। ज्यादातर लोगों को अंग्रेजी समझ नहीं आती और जिनको आती है उनको टूटीफूटी ही आती है। बेहतर होगा कि बाली पहुंचने से पहले थोडे-बहुत बाली के शब्द सीखकर जायें। वैसे ज्यादा घबराने की बात नहीं है कामचलाऊ अंग्रेजी हर कोई समझ ही लेता है।

धरम-करम।
इंडोनेशिया एक मुसलिम देश है, लेकिन बाली उसका एक हिंदू बहुल प्रांत है। यहां 83 फीसदी हिंदू हैं और बाकी लोगों में मुसलिम, इसाई और बौद्ध धर्म को मानने वाले लोग हैं। इनके बीच किसी भी तरह की सांप्रदायिक कटुता बाली में नजर नहीं आती है। जगह जगह पर हिंदू मंदिर और धर्म के प्रतीक दिखाई देंगे। बाली के हिंदू बडे धार्मिक हैं और आमतौर पर दिन में तीन बार पूजा करते हैं। सुबह सुबह घरों-दुकानों के बाहर फूलों से सजी थाली लेकर लोग पूजा करते नजर आयेंगे। अक्सर कार ड्राईवर छोटी सी एक पूजा की थाली अपने कार के डैश बोर्ड पर भी रख लेते हैं, जहां हम भगवान की मूर्ति लगाते हैं। उस थाली से चावल की एक अलग तरह की महक पूरी कार में फैल जाती है। आपको ये महक पसंद भी आ सकती है और कई लोग इससे परेशान भी हो सकते हैं। आमतौर पर लोगों को देवी देवताओं से जुडे संस्कृत के मंत्र कंठस्थ हैं। हमारे ड्राईवर ने हमें गायत्री मंत्र से लेकर शिव स्तोत्र तक पढकर सुनाया। शुक्रवार के दिन यहां भी नमाज के लिये कई सडकें बंद कर दी जातीं हैं।

गुनाह और पुलिस।
बाली एक शांतिपूर्ण जगह है और यहां अपराध लगभग न के बराबर हैं। ज्यादातर अपराधी जो पकडे जाते हैं वो ड्रग्स के गुनाहों से जुडे होते हैं। पर्यटकों के साथ लूटपाट, ठगी वगैरह जैसी वारदातें यहां नहीं होतीं। एक वक्त था जब बाली पुरूष वेश्यावृत्ति यानी जिगैलो के लिये जाना जाता था, जिनकी ज्यादातर ग्राहक ऑस्ट्रेलिया और यूरोप से अकेले आने वाली महिलाएं होतीं थीं। मसाज की आड में वेश्यावृत्ति यहां भी होती है। होटल से शाम को बाहर निकलते वक्त हल्की आवाज में गुड मसाज?” “गुड गर्ल?” बुदबुदाते हुए दल्ले आपके पीछे लग जायेंगे...लेकिन एक बार आपने आवाज कडक करके मना कर दिया तो आपको तंग नहीं करेंगे।
बाली में जगह जगह पर पुलिस की मौजूदगी है। ज्यादातर पुलिसकर्मी मिलनसार हैं। आम पुलिसकर्मी को आप हथियारों या फिर लाठी के साथ भी नहीं देखेंगे।
भले ही वैसे अपराध के मामले में बाली सुरक्षित हो, लेकिन आतंकवाद यहां भी अपना रंग दिखा चुका है। साल 2002 में यहां के 2 नाईट क्लबों में इमाम समुद्र नाम के आतंकी ने बम धमाके किये थे, जिनमें पश्चिमी देशों से आये 100 से ज्यादा पर्यटक मारे गये। साल 2005 में भी जिंबारन और कुटा बीच पर बम धमाके हुए थे जिनमें कई लोगों की मौत हो गई। आतंकवाद का शिकार होने के बावजूद आज भी बाली में सुरक्षा व्यवस्था भारत जैसी नजर नहीं आती और ये एक चिंता की बात है।(कहने का मतलब ये भी नहीं कि भारत में आतंकवाद से निपटने के संतोषजनक इंतजाम हैं)

खानपान।
बाली की सबसे लोकप्रिय डिश है नासी गोरेंग (Nasi Goreng) । ये डिश हलके फ्राई किये हुए चावल के साथ तैयार की जाती है और इसे चिकन, अंडा, मछली, केकडा, गोश्त या सब्जी के साथ पेश किया जाता है। नासी गोरेंग को इंडोनेशिया की राष्ट्रीय डिश माना जाता है। जिस तरह से भारत में शाम के वक्त जगह जगह चाट वगैरह के ठेले खुल जाते हैं उसी तरह से यहां शाम को सी फूड से बनाई गई चाट बेची जाती है। वैसे बाली के लोग तले हुए खाने के बजाय उबाला गया खाना ज्यादा पसंद करते हैं और यहां की कई स्थानीय डिश भारतियों को स्वादहीन या खराब लगें।
यहां पर कई भारतीय रेस्तरां भी हैं जैसे गणेश, सितारा, क्वींस ऑफ इंडिया वगैरह जहां भारतीय शैफ खाना तैयार करते हैं। ये रेस्तरां भारतियों के अलावा यूरोपियन पर्यटकों में भी खासे लोकप्रिय हैं।
 
नासी गोरेंग- इंडोनेशिया की राष्ट्रीय डिश।
बिंतांग और बाली हाई यहां की सबसे लोकप्रिय बियर हैं और इनकी यहां वही हैसीयत है जो भारत में किंगफिशर की। यहां की एक विशेष प्रकार की कॉफी भी दुनियाभर में मशहूर है और जो काफी महंगी आती है। उसे लुवाक कॉफी कहते हैं और ये बिल्ली जैसे एक जानवर के मल से बनाई जाती है। (हमने नहीं पी)

सैर सपाटा
बाली की सबसे बडी खासीयत यहां के खूबसूरत और साफसुथरे बीच हैं। लगभग सभी बीचों पर वॉटर स्पोरट्स का इंतजाम है जैसे स्कूबा डाईविंग, अंडर सी वॉक, पैराग्लाईडिंग, जेट स्की वगैरह। दक्षिण बाली का नूसा दुआ बीच खास इसी के लिये जाना जाता है। कुटा बीच पर शाम के वक्त सैकडों लोग सूर्यास्त देखने के लिये जुटते हैं। जिंबारन बीच नाईट लाईफ के लिये जाना जाता है। सानूर बीच शहर से सटा हुआ है जहां स्थानीय पर्यटक ज्यादा दिखाई देते हैं।

अक्टूबर में यहां का अधिकतम तापमान 30-35 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है। नवंबर के आखिर तक बारिश का मौसम शुरू होता है, लेकिन वैसी बारिश नहीं होती जैसी कि हम मुंबई में देखते हैं।
बाली के देनपसार से करीब घंटेभर की दूरी पर उबुद नाम की जगह है। यहां का वानर वन (मंकी फोरेस्ट) काफी मशहूर है जिसमें कई प्रजातियों के बंदर देखने मिलते हैं। ऊबुद थोडा ऊंचाई पर है और यहां मौसम ठंडा रहता है। खरीददारी, अध्यात्म, योगा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिये भी उबुद जाना जाता है।
हवाई अड्डे के करीब कृष्णा नाम का एक मार्केट है जहां बाली के कपडे, खिलौने और स्म़ृति चिन्ह पर्यटकों को ठीकठाक दामों पर मिल जाते हैं। लोग बाली से वापस लौटते वक्त अक्सर यहां खरीददारी करने के लिये कुछ देर रूकते हैं।

आम लोग।
बाली के ज्यादातर लोग शांतिप्रिय और भोले भाले हैं, पर्यटकों का सम्मान करते हैं और किसी तरह के विवाद से बचते हैं। ये भारतियों को काफी पसंद करते हैं और उन्हें अपने से ऊंचा समझते हैं क्योंकि इन्हें लगता है कि भारतीय उनके आराध्य भगवानों के देश से आये हैं।

Thursday, 5 November 2015

How Chhota Rajan Was A Sitting Duck in Bali For 11 Days !


Although,  I wanted to write this blog earlier,  I was waiting for Chhota Rajan to be deported from Indonesia. I did not want to give any idea to his enemies on how easy it was to kill him in Bali. For 11 days that Chhota Rajan spent in the custody of Bali police he was a sitting duck for his adversaries. It would not have been a big challenge for the shooters of Chhota Shakeel to bump him off and I'm saying this on the basis of my observations during those 5 days which I had spent in Bali. There was absolutely nil security to him considering his stature in the underworld and the magnitude of threat to his life. Cops in Bali in general had no idea of how big Chhota Rajan was a criminal in India & this was reflected in the behaviour meted out to him by Bali cops.

In India wide security arrangements are being made for him. Arthur Road prison's highly secured Anda Cell is being readied for his arrival, as per reports dialysis machine is to be installed so that he is not required to go to hospital. Videoconferencing facility is arranged so that he is not taken out for physical presence in court. His cell is to be guarded by numerous armed cops. Compare this with the scene at Bali & you will be shocked to know how loosely one of India's most wanted gangster & publicised as an "asset" for Indian intelligence agencies against Dawood was kept.

Scenario Outside Lockup:
At Bali Chhota Rajan was kept in the lockup of police headquarters located at Polda Bali of Denpasar area. There is no security check at the time of entry into the police hqs. No entry is made of the vehicles entering the premises. Vehicles could be parked just 20 metres close to the lockup where Chhota Rajan is kept. At a time only 3 cops guard the lockup & they are without any weapons. It was surprising to see that some cops had brought their kids also while on duty & were playing with them. On Thursdays & Fridays relatives of inmates are allowed to meet them through a small window adjacent to the lockup.

Scenario Inside Lockup:
There are total 3 cells in the lockup of area approx 300 sqft each . One cell is for female prisoners & other 2 are for male ones. There were total 43 prisoners including Chhota Rajan. Most of the criminals were locals arrested for narcotics trade & other crimes. Sunlight couldnt penetrate the lockup & cells were dimly lit. A television set was kept inside the cells.

While being taken around:
Chhota Rajan was being taken out briefly from the lockup for 2 reasons-one for medical treatment and secondly for interaction with Bali Police officers in the adjacent building which is few yards away. On 28th October he was taken to Trijata Police Hospital which is about a kilometre away from Polda Bali. As per my colleague Ganesh Thakur who was the only journo to get his visuals at the hospital, only 3 unarmed cops accompanied him there. Fourth person was his local lawyer Franciscus Passar.
After this he was taken out on 29th October to be interrogated by Bali Police officers in tha adjacent room. This time also only 3 unarmed policemen accompanied him while he walked in and out of the adjacent building. 4 days later on 2nd November he was taken out again to face the CBI led team arrived from India in the same building. Again, there were just 3 unarmed cops for his security while being taken to and fro. ( It was only on his last day in Bali that is today that he was escorted with 10 armed guards to Bali airport for deportation to India.)

So the above was just a general assesment of the negligible security which Chhota Rajan got in Bali. Now my further writing is purely hypothetical & based on imagination.


Dawood's henchman Chhota Shakeel had been desperately searching Rajan since he survived an attack by Shakeel's shooters at Bangkok in September 2000. Earlier this year, Shakeel was successful in tracing out Rajan's hideout in Australia. Rajan escaped on the basis of a last moment tip supposedly by Indian intelligence agencies. Now, when the news of Chhota Rajan's arrest broke out and his visuals were being shown live right from the lockup, the question is were 11 days not enough for Shakeel to send shooters to Bali? Visa is not an issue for most of Asian visitors in Indonesia. Secondly, he could have outsourced the job by hiring shooters locally. In peaceful Bali it would have been difficult to get shooters or weapons, but this seems possible in capital Jakarta which is just 2 hrs flight or 10 hrs drive from Bali and where criminals gangs are very much active.
The shooters of Shakeel would have met with very little resistance if they intended to target Rajan while in lockup or at the time of being taken out. True, that the lockup is inside the police hqs and more number of cops with weapons would have been rushed in but I believe the response time by cops would have allowed the shooters to do their job.

Chhota Rajan was being served prison food in the lockup. Sometimes he also shared food that came from homes of fellow inmates. It was only on Nov 1 that he got Indian food for himself after First Secretary from Indian embassy Sanjivkumar Agrawal met him in the lockup. But before that it was not difficult for anybody to conspire for a poison laced food for him.

It is either that Chhota Shakeel dropped the plan of killing Rajan after his arrest or he overestimated the security of Bali Police.


By the way Bali is not immune to terrorist attacks. In 2002 two night clubs were bombed by a terrorist named Imam Samudra in which more than 100 foreign tourists were killed. Another bombing took place in a night club at Jimbaran beach in 2005. Still looking at the general security scenario in Bali and attitude of cops it seems that no lessons have been learnt. Especially, for an Indian who sees so many things done in the name of security, the experience in Bali is surprising.