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Saturday, 31 August 2013

राज ठाकरे के नाम खुला खत।


श्रीमान राज ठाकरे,
कथित आतंकी यासीन भटकल की बिहार से गिरफ्तारी पर आपकी ओर से की गई टिप्पणी चौंकाने वाली नहीं थी। आपके लिये भाषाई-क्षेत्रीय सियासत खेलने और अपने विरोधियों पर चुटकी लेने का ये एक और मौका था। आपने काफी तीखे शब्दों में ये भी सवाल किया कि आखिर ऐसे समाजविरोधी तत्व बिहार से ही क्यों पकडे जाते हैं? आपको अपराध और अपराधियों पर बात करते देखकर और स्वयं एक दशक से ज्यादा वक्त से अपराध पत्रकारिता करने के बाद मुझे लगा कि आपके बयान का विश्लेषण किया जाना चाहिये, खास करके इसलिये क्योंकि आप अर्धसत्य के जरिये सियासी फायदा हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं मैं ये मानता हूं कि बिहार ने सालों साल से अराजकता देखी है, कानून और व्यवस्था का वहां मजाक बनाया गया और ये राज्य अपहरणकर्ताओं, हत्यारों और लुटेरों के लिये स्वर्ग के तौर पर बदनाम हो गया था। बहरहाल, मैं आपकी इस बात से असहमत हूं कि ज्यादातर गुनहगार बिहार या फिर उसके पडोसी उत्तरभारतीय राज्यों से आते हैं। मुझे याद है साल 2007 में आपकी ओर से दिया गया एक बयान जब आपने ताजा ताजा मराठीवाद के मुद्दे को अपनी पार्टी की फिलोस्फी के तौर पर अपनाया था। नये साल की पूर्व संध्या पर मुंबई के जे.डबलू मैरियट होटल के बाहर कुछ बदमाशों ने एक लडकी का यौन शोषण किया था। इससे पहले कि पुलिस आरोपियों को पकड पाती, आपने प्रेस के सामने ऐलान कर दिया, कि लडकी के साथ दुष्कर्म करने वाले सभी उत्तरभारतीय हैं। खुशनसीबी से सभी आरोपी अगले ही दिन पकड लिये गये और ठाकरेजी वे सभी यहीं के थे, आप ही की जुबान बोलते थे। जाहिर है उसके बाद आपका कोई बयान नहीं आया क्योंकि ऐसा करने का मतलब था आपको अपने लफ्ज वापस लेने पडते और शायद एक नई नवेली पार्टी के मुखिया का ऐसा करना तब ठीक नहीं होता। जरा 5 साल पीछे मुडकर देखिये कि आपकी पार्टी के कितने कार्यकर्ता और पदाधिकारियों पर गंभीर अपराधों के मामले दर्ज हुए हैं, जिनमें महिलाओं के खिलाफ अपराध भी शामिल हैं। आप ये कहकर उन सभी ये पल्ला नहीं झाड सकते कि ये तो विरोधी पार्टियों की ओर से दर्ज कराये गये राजनीतिक मामले हैं।

क्या आपको पता है कि दाऊद इब्राहिम किस राज्य से है? मैने अब तक आपकी ओर से उसके खिलाफ कोई बयान नहीं सुना। दाऊद मैक्सीकन माफिया के बाद दुनिया का सबसे बडा संगठित आपराधिक गिरोह चला रहा है। दाऊद ने 12 मार्च 1993 के एक दिन में ही जितने लोगों की हत्या की (257), वो लगभग यासीन भटकल की ओर से देशभर में कराये गये धमाकों में मारे गये लोगों की संख्या के बराबर है। दाऊद भारत का सबसे बडा दुश्मन है। दाऊद मुंबई का सबसे बडा दुश्मन है। दाऊद क्या आपके शब्दों के तीरों का निशाना सिर्फ इसलिये नहीं बनता क्योंकि वो आप ही की जुबान बोलता है?... क्योंकि आप और वो एक ही मिट्टी से उपजे हैं? दाऊद की ही तरह अरूण गवली, अश्विन नाईक, विजय पालांडे जैसे और भी हैं जिन्होने इस शहर को कलंकित किया।...तो क्या ये साफ नहीं होता कि आप सिर्फ आधूरे सच का प्रचार कर रहे हैं और हकीकत को तोड मरोड कर लोगों के सामने पेश कर रहे हैं।

26 नवंबर 2008 की रात जब सीएसटी रेल स्टेशन पर पाकिस्तान से आया अजमल कसाब अपने साथी के साथ लोगों पर गोलियां बरसा रहा था, तब उसके टार्गेट की एक ही पहचान थी-इंडियन।उनकी गोलियों से मरने वालों में हिंदू भी थे, मुसलमान भी और अलग अलग भाषाओं में बात करने वाले लोग भी, लेकिन हत्यारों की नजर में सभी सिर्फ इंडियन थे। जब हमारा दुश्मन हमें एक देख सकता है तो हम खुद एक क्यों नहीं रह सकते?

ठाकरेजी, ये वक्त राष्ट्र को एक दिखने का है, एक दूसरे से अलग दिखने का नहीं। आप सहीं हैं जब आप ये कहते हैं कि कई और राजनेता भी हैं जो नफरत की सियासत खेलते हैं, लोगों की भावनाएं भडकाते हैं और सिर्फ आप ही को दोष न दिया जाये...लेकिन आपको अपने आप से ये सवाल पूछना चाहिये कि क्या आप भी उन्ही राजनेताओं की भीड का हिस्सा बनना चाहते हैं ?

मुझे यकीन है कि आप में अपनी राजनीतिक बिरादरी से उठकर अलग रहने की काबिलियत है। आप देश के सबसे विकसित शहर मुंबई से हैं। मैं कई ऐसे मराठी परिवारों को जानता हूं जहां बीते विधानसभा चुनाव में बेटे ने आपकी पार्टी को वोट दिया और पिता ने आपकी प्रतिदवंद्वी शिवसेना को। जाहिर है युवा वर्ग को झुकाव आपकी ओर नजर आ रहा है। अपने प्रति युवाओं के इस आकर्षण का उपयोग आप रचनात्कमक विचारों पर अमल करवाने के लिये कर सकते हैं। मैने आपकी उस मुहीम का समर्थन किया था जिसमें आपने मुंबई की दुकानों और प्रतिष्ठानों पर मराठी में बोर्ड लगाने की मांग की थी। दक्षिण भारतीय शहरों और दुनिया के जापान, मलेशिया, कुवैत, जर्मनी और इटली जैसे देशों के सफर के दौरान मैने गौर किया कि हर जगह स्थानीय भाषा को ही तरजीह दी जाती है...फिर मुंबई में मराठी को क्यों नहीं? उस नजरिये से आप बिलकुल सही थे। (हालांकि मुझे ये नहीं मालूम कि आपकी उस मुहीम से मराठी भाषिकों के जीवनस्तर और जीवन शैली पर कितना फर्क पडा।)

पिछले साल अगस्त में आजाद मैदान पर दुए दंगे के बाद आपने एक सार्वजनिक मंच से ऐलान किया- मैं सिर्फ महाराष्ट्र धर्म को मानता हूं। सुनकर खुशी हुई कि आपने अपने चचा बाल ठाकरे की तरह खुद को सिर्फ एक धर्म विशेष को मानने वाले के नेता के तौर पर सीमित नहीं रखा, लेकिन उसी सभा में आपने ये बात भी जता दी कि आप भाषा के आधार पर सियासत करते रहेंगे। मेरा हमेशा ये मानना रहा है कि भाषा इंसान के लिये है, इंसान भाषा के लिये नहीं है। भाषा की उपयोगिता यही है कि वो एक दूसरे के विचार पहुंचा सके। भाषा का अस्तित्व इसीलिये है क्योंकि वो लोगों को जोडती है फिर चाहे वो हिंदी हो, मराठी हो, अंग्रेजी हो या फिर मूक, बधिरों की सांकेतिक भाषा हो। भाषा का इस्तेमाल लोगों को जोडने के माध्यम के तौर पर होना चाहिये, तोडने के लिये नहीं।

...और अगर आपको इस ब्लॉग को पढने के बाद लग रहा है कि ये किसी परप्रांतीय ने लिखा है तो बता दूं कि मेरी पैदाइश मुंबई में ही हुई, मैं इसी शहर में पला-बढा, मुझे मराठी भाषा से प्यार है और 10वीं कक्षा तक जिन 3 भाषाओं की मैने पढाई की उनमें से मराठी एक थी। मेरा 2 साल का बेटा मेरे परिवार से पांचवी पीढी का मुंबईकर है।

आपका,

जीतेंद्र दीक्षित।

An Open Letter to Raj Thackeray.




Mr.Raj Thackeray,
It wasn’t a surprise when you recently made remarks on the arrest of alleged terrorist Yaseen Bhatkal from Bihar. It was another opportunity for you to play a linguistic-regional card & taunt your opponents. You emphatically raised a question on why all such anti social elements are being arrested from Bihar? Being a crime journalist for over a decade tempted me to analyze & respond to your statement, especially because you are attempting to gain political mileage out of this premise. I agree that the state of Bihar has seen years of misgovernance, chaotic law & order situation & had been infamous as breeding ground for kidnappers, killers & robbers. However, I reject your viewpoint that most of the criminals hail from Bihar or its neighbouring north Indian states. I remember your statement in 2007 when you had recently adopted the issue of “Marathi Manoos” as the political philosophy for your party Maharashtra Navnirman Sena (MNS). On new year’s eve a girl was molested by hooligans outside J.W.Marriott Hotel in Mumbai. Before the cops could arrest the accused, you jumped the gun & announced that the culprits are “outsiders”. However, very soon the accused were arrested & they turned out from our very own state. Obviously, after those arrests there was no reaction from you as that would have meant retracting your statement, which wasn’t good for the leader of a newly born party. Just look 5 years back. You will find that some of your own party workers & office bearers have been accused of several crimes, including those of crime against women. You cant discard them all as political cases filed by the rivals.

Do you know, Dawood Ibrahim is from which state? I haven’t heard any statement against him by you so far. He is running the world’s second largest organised crime gang after the Mexican mafia. The number of people (257) killed by Dawood Ibrahim in one single day of 12 March 1993 is almost equal to the causalities caused by Yaseen Bhatkal through various blasts across India. He is Mumbai’s biggest enemy. He is India’s biggest enemy. Are you sparing Dawood from your verbal assaults just because you & he have a common mother tongue & both belong to the same soil? There are others like Dawood who have brought disgrace to our city Mumbai like Arun Gawli, Ashwin Naik, Vijay Palande & so on. So doesn’t it become clear that you are propagating half truths & presenting facts selectively?

On the night of 26/11/2008 when Ajmal Kasab & his accomplice were killing people at CST railway station, they focussed only on one identity of their target-“Indian”.
Among the casualities were Hindus, Muslims & people speaking different languages, but for their killers, they were just Indians. When our enemy can see us with a unified identity, why cant we display the same cohesion?
Mr.Thackeray, the time for the nation is to be cohesive and not divisive. You are right when you say that there are many other politicians who play divisive politics & make people hate each other on emotional grounds, but the question you should ask yourself is whether you want to be part of the same clan?

I believe you have the potential to be different from other members of your political fraternity. You belong to India’s most progressive city & people here are not gullible. I know few Marathi families where son voted for you & his father voted for your rival outfit Shiv Sena. Certainly, you have a youth appeal & it could be utilised for constructive ideas. I supported your campaign for displaying Marathi sign boards on shops & establishments in Mumbai. During my travel to South Indian states & various countries like Japan, Malaysia, Kuwait, Germany & Italy, I have observed that local language is given preference & in that perspective your campaign made sense (Although, I don’t know how much it helped in raising the living standards & life style of Marathi people)

In August last year after Azad Maidan riots in Mumbai you announced from a public platform- “I only believe in Maharashtra Dharma.”. It was good to know that you delimited yourself from being leader of people belonging to just one particular faith unlike your uncle Bal Thackeray. However, in the same public meeting you re-emphasised your adherence to linguistic politics. I firmly believe that language is for humans & humans are not for language. A language is good only due to its ability to make people communicate with each other. The reason for existence of language is its ability to connect people whether it is Marathi, Hindi, English or sign language used by deaf and dumb. The language must be a medium for uniting people & not dividing them.

…and after reading this if you think that these views are of an outsider, I must tell you that I am born & brought up in Mumbai, I love Marathi language & Marathi was one of the 3 languages I learnt till class 10. My son is the fifth generation Mumbaikar.

Yours truly,
Jitendra Dixit.