Search This Blog

Monday, 25 November 2013

"द सीज "- 26/11 के 10 सच।


26 नवंबर 2008 को मुंबई में जो आतंकी हमला हुआ था, उसे 5 साल पूरे हो रहे हैं। इन 5 सालों में उस हमले को लेकर तमाम किताबें लिखीं गईं, कई डॉक्यूमेंट्रिज बनाईं गईं, जांच रिपोर्ट्स वगैरह तैयार की गईं, लेकिन वो हमला इतना बडा था कि उससे जुडी तमाम बातों का अब तक पूरी तरह से खुलासा नहीं हो पाया है। यही वजह है कि हमले के 5 साल बाद भी उसे लेकर नई बातें सामने आ रहीं हैं, नये खुलासे हो रहे हैं। इसी कडी में 2 अंग्रेजी पत्रकारों की एक किताब सामने आई है- द सीज। इस किताब को पढने के बाद कम से कम 10 ऐसे सच सामने आते हैं, जिनका या तो अब तक खुलासा नहीं हुआ था या जिनपर ज्यादा गौर नहीं किया गया। अद्रीयान लेवी और कैथी स्कॉट क्लार्क नाम के दो अंग्रेजी पत्रकरों की ओर से लिखी गई ये किताब उन लोगों के बयान पर आधारित है जो 26-11 के हमले के दौरान ताज होटल में फंसे थे। पत्रकारों ने आतंकियों से लोहा लेने वाले पुलिसकर्मियों और एनएसजी कमांडोज से भी बातचीत की। दोनो पाकिस्तान में उन सभी आतंकियों के घर भी पहुंचे जो मुंबई हमले में शामिल थे।किताब में अमेरिकी खुफिया अधिकारियों से मिली जानकारी भी शामिल की गई। इस पूरी कसरत का निचोड ये निकला कि कई ऐसे तथ्य सामने आये जो अब तक किसी को पता नहीं थे या जिनपर अब तक गौर नहीं किया गया था। किताब का शुरूवाती हिस्सा कुछ बोरियत भरा लग सकता है जिसमें लेखकों ने ताज में फंसे लोग हमले से पहले दिनभर क्या कर रहे थे इसका ब्यौरा दिया है।

1-आतंकी हमले के महज घंटेभऱ बाद पुलिस के हाथ एक ऐसा सुनहरा मौका आया जो उसी रात ताज होटल के ऑपरेशन को खत्म कर सकता था। रात करीब 10 बजकर 50 मिनट होटल के अंदर घुसे चारों आतंकवादी एक साथ एक ही वक्त में होटल की पांचवीं मंजिल पर रूम नंबर 551 में दाखिल हुए। ये आतंकवादियों की ओर से की गई एक बडी गलती थी जिसका पुलिस इस्तेमाल कर सकती थी। डीसीपी नागरे पाटिल ने सीसीटीवी पर जब चारों को एक साथ देखा तो उन्होने तुरंत ही आधुनिक हथियारों से लैस असॉल्ट फोर्स को अपने पास भेजने का संदेश भेजा, लेकिन असॉल्ट फोर्स होटल की भूल भुलैया में नागरे पाटिल को खोज ही नहीं पायी। 10 मिनट बाद चारों आतंकवादी कमरा नंबर 551 से निकल कर 6वीं मंजिल पर चले गये और उन्होने आगजनी शुरू कर दी। पुलिस आतंकियों को घेरने का एक बहुत बडा मौका चूक गई। करीब रात 3 बजे तक डीसीपी नागरे पाटिल सीसीटीवी में सभी आतंकियों की हरकत देखते रहे, लेकिन वे कुछ नहीं कर सकते थे। आखिरकर आतंकियों ने उनके सीसीटीवी रूम पर ही हमला बोल दिया और उन्हें होटल से बाहर निकलना पडा।

2-हमले से महीनों पहले पुलिस को खुफिया जानकारी मिली थी कि आतंकी मुंबई के 5 सितारा होटलों को निशाना बना सकते हैं। इसके मद्देनजर इलाके के डीसीपी विश्वास नागरे पाटिल ने ताज होटल की सुरक्षा का जायजा लिया था और वहां पुलिस की सुरक्षा भी मुहैया कराई थी...लेकिन ताज होटल के प्रबंधन को होटल की 5 सितारा चकाचौंध के बीच वर्दी और बंदूकधारी पुलिसकर्मी खटक रहे थे। इसलिये जैसे ही डीसीपी नागरे पाटिल छुट्टी पर गये, ताज के प्रबंधन ने उनकी ओर से लगाई गई सुरक्षा को दरकिनार कर दिया।
होटल पर हमले का सबसे पहला खुफिया अलर्ट साल 2006 में आया था। उस अलर्ट के मुताबिक एक पाकिस्तानी जिहादी संगठन मुंबई के कई पांच सितारा होटल पर हमले की योजना बना रहा है जिसमें ट्राईडेंट-ओबेरॉय और ताज का भी नाम है। उस पहले अलर्ट के बाद उस जैसे 25 अलर्ट और भी आये जो कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने भारतीय एजेंसियों को दिये थे। कुल 26 में से 11 अलर्ट में ये बताया गया था कि आतंकी एक साथ कई ठिकानों पर हमला करने की तैयारी कर रहे हैं। 6 अलर्ट में ये साफ किया गया था कि आतंकी समंदर के रास्ते हमला करने पहुंचेंगे। आईबी को 2 ऐसे अलर्ट भी मिले जिनमें तारीखों के साथ जिक्र था कि आतंकी ताज महल होटल पर हमला कर सकते हैं। ये तारीखें थीं 24 मई 2008 और 11 अगस्त 2008। हालांकि दोनो तारीखों को हमले नहीं हुए।
ताज को लेकर बार बार आ रहे खुफिया अलर्ट्स ने स्थानीय डीसीपी विश्वास नागरे पाटिल को चिंतित कर दिया। इन तमाम अलर्ट्स के मद्देनजर उन्होने 12 अगस्त 2008 को ताज के सुरक्षा प्रमुख सुनील कुडीयाडी के साथ 9 घंटे तक मीटिंग की और बताया कि किस तरह से होटल की सुरक्षा व्यवस्था कमजोर है। डीसीपी पाटिल ने होटल की सुरक्षा मजबूत करने के लिये कुल 26 उपाय बताये जिनमें अहम दरवाजों पर हथियारबंद पुलिसकर्मियों की मौजूदगी भी शामिल थी। होटल ने इन सुरक्षा उपायों को सिरे से खारिज कर दिया, लेकिन 20 सितंबर 2008 को जब पाकिस्तान के इस्लामाबाद में एक 5 सितारा होटल पर आतंकी हमला हुआ तो ताज के प्रबंधन को डीसीपी पाटिल की बातों की गंभीरता समझ में आई। अक्टूबर के दूसरे हफ्ते तक पाटिल की ओर से सुझाये गये कुछ उपायों पर ताज होटल ने अमल किया...लेकिन ये सिर्फ कुछ दिनों तक ही रहा। डीसीपी पाटिल कुछ दिनों के लिये जैसे ही छुट्टी पर गये सबकुछ जस का तस हो गया।होटल के उत्तरी दरवाजे पर कोई सुरक्षा नहीं थी। मुख्य दरवाजे पर तैनात पुलिसकर्मियों को भी होटल ने हटवा दिया ये कहकर कि वे हरदम जंग की तैयारी जैसा माहौल नहीं बर्दाशत कर सकते। ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी होटल से खाने की मांग करते थे और ताज के प्रबंधन को ये अखर रहा था।

3-मुंबई के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर हसन गफूर ने ताज में मौजूद पुलिसकर्मियों के एक तरह से हाथ बांध दिये थे। उनका आदेश था कि एनएसजी के पहुंचने तक कुछ नहीं करना है। यहां तक कि जब शुरूवात में पास के नेवी नगर से मरीन कमांडोज की एक टुकडी पहुंची तो गफूर ने उसे दिशानिर्देश देने के लिये भी डीसीपी नागरे पाटिल को साथ जाने से रोक दिया।
एनएसजी को दिल्ली से पहुंचने में वक्त लगने वाला था। इसलिये तब तक आतंकियों को घरेन के लिये मार्कोस यानी मरीन कमांडोज बुलाये गये। इन मरीन कमांडोज को होटल की भौगौलिक जानकारी और आतंकियों की हलचल के बारे में बताने वाले किसी गाईड की जरूरत थी। चूंकि डीसीपी पाटिल हमले के शुरूवाती कुछ मिनटो के बाद ही होटल पहुंच गये थे और आतंकियों से उनका सामना हो चुका था इसलिये वे मार्कोस के गाईड बनने को तैयार हो गये...तभी उन्हें पुलिस कमिश्नर हसन गफूर का फोन आया। गफूर ने पाटिल को हिदायत दी- तुम ऊपर नहीं जाओगे। मैं दोहरा रहा हूं। तुम ऊपर नहीं जाओगे। मार्कोस खुद ऊपर जायेंगे। तुम नीचे ही ताज की घेरेबंदी करोगे।गफूर का मानना था कि उस वक्त हालात जंग जैसे थे और मुंबई पुलिस अत्याधुनिक हथियारों से लैस आतंकियों से लडने के काबिल नहीं थी। ये काम एनएसजी ही कर सकती थी।
ज्वाइंट कमिश्नर लॉ एंड आर्डर भी ताज चेंबर्स में छुपे मेहमानों को निकालने के लिये ताज की सिक्यूरिटी टीम के साथ अंदर दाखिल होना चाहते थे, लेकिन कमिश्नर गफूर ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया। कुछ देर बाद आतंकी ताज चेंबर्स की तरफ आये और उन्होने कई लोगों की हत्या कर दी।

4-एनएसजी का मानना है कि जब वो 27 नवंबर की सुबह मुंबई पहुंची तो पुलिस और खुफिया एजेंसियों की ओर से उसे सही सही नहीं बताया गया कि शहर में और खासकर ताज में कुल कितने आतंकवादी हैं। एनएसजी को बताया गया कि आतंकवादियों की संख्या 20 हो सकती है जबकि रात में ही अजमल कसाब से पूछताछ में ये साफ हो गया था कि सिर्फ 10 आतकंवादी आये हैं और उनमें से सिर्फ 4 ही ताज होटल में हैं।
आतंकी अजमल कसाब को हमले की पहली रात ही गिरगांव चौपाटी पर हुए एनकाउंटर में जिंदा पकड लिया गया था। रात में 2 बार उससे लंबी पूछताछ हुई। पहली पूछताछ अस्पताल में एसीपी तानाजी घाडगे ने की, जिसके बाद उसे क्राईम ब्रांच लाया गया। क्राईम ब्रांच में ज्वाइंट कमिश्नर राकेश मारिया ने दोबारा उससे पूछताछ की। दोनो पूछताछ में कसाब ने बता दिया था कि कुल 10 आतंकवादी आये थे, वे कैसे आये थे, किस तरह के हथियार उनके पास थे और किसे क्या जिम्मेदारी दी गई थी।
हालांकि कसाब ने सबकुछ बता दिया था, लेकिन पूरी जानकारी एनएसजी तक नहीं पहुंची।

5-वैसे तो हवाई जहाज से दिल्ली और मुंबई की दूरी महज 2 घंटे की है, लेकिन एनएसजी को मुंबई पहुंचते पहुंचते पूरी रात बीत गई। जैसे तैसे विमान का इंतजाम करके एनएसजी कमांडोज को मुंबई तो ले आया गया लेकिन मुंबई हवाई अड्डे से तुरंत उन्हें दक्षिण मुंबई जहां 3 अलग अलग ठिकानों पर आतंकी कहर बरपा रहे थे, उन्हें लाने का कोई इंतजाम नहीं था।
27 नवंबर की सुबह साढे पांच बजे एनएसजी जवानों का विमान मुंबई पहुंचा...लेकिन उन्हें तब झटका लगा जब वादे के मुताबिक उन्हें हवाई अड्डे से आतंकी हमले के ठिकानों तक पहुंचाने के लिये कोई वाहन नहीं आया। वहीं दूसरी ओर साथ आये होम सेक्रेटरी को रिसीव करने के लिये सफेद एंबेसेडर कारें आ पहुंचीं थीं। विमान से असलहा उतारने और स्थानीय बसों का इंतजाम करने में कई और कीमती घंटे बर्बाद हुए। इस दौरान आतंकी ताज के कीचन वाले इलाके तक पहुंचकर कई लोगों की जान ले चुके थे।

6-भले ही 26-11 का हमला आतंकवादियों की टीम वर्क का नतीजा हो, लेकिन हमले के दौरान एटीएस ने आंतकियों की पाकिस्तान में बैठे उनके आकाओं से जो बातचीत रिकॉर्ड की उससे एक दिलचस्प हकीकत सामने आती है। ताज में मौजूद चारों आतंकवादी न केवल आपस में झगड रहे थे बल्कि पाकिस्तान से आ रहे निर्देशों पर अमल भी नहीं कर रहे थे।
ताज में मौजूद उमर नाम का आतंकी गुस्से में बंधक बनाये गये लोगों की पिटाई कर रहा था। उमर का साथी अब्दुल रहमान कराची से फोन पर हैंडलर वसी के साथ था। वसी उमर को फोन पर कुछ निर्देश देना चाहता था, लेकिन उमर फोन पर आने में आनाकानी कर रहा था। इस वजह से अब्दुल रहमान और उमर के बीच गाली गलौच भी हो गई। अब्दुल रहमान ने उमर को गधा और बेवकूफ कहा। वसी ने अब्दुल रहमान से कहा कि वो उमर को आग लगाने का निर्देश दे, लेकिन उमर सुनने को तैयर नहीं था। वो बंधकों को लात और घूसों से पीटने में ही लगा रहा। एक बार वो कुछ पलों के लिये फोन पर आया भी, लेकिन फिर उसने फोन वापस अब्दुल रहमान को थमा दिया।

7-होटल के भीतर जो 4 आतंकी दाखिल हुए थे उनमें से एक आतंकी खुद अपनी ही गोली से घायल हो गया था। ये आतंकी था अबू अली।
अबू अली ने जब ताज होटल में घुसकर अपनी एके-47 राईफल से फायरिंग करनी शुरू की तो एक गोली फर्श से टकराकर बाऊंस हुई और अबू अली के पैर में जाकर लगी। एटीएस ने आतंकियों की उनके हैंडलर से जिस बातचीत को रिकार्ड किया उससे ये बात सामने आई। अली हैंडलर वसी से कहता है- मेरे लिये दुआ करो। अपने पैर की वजह से मैं वो नहीं कर पा रहा हूं जो दिल में है। चलते वक्त दर्द होता है। जो काम अकेले मेरा था वो सभी को मिलकर करना पड रहा है। मेरा पैर मेरा साथ नहीं दे रहा। अल्लाह से दुआ करो कि हम उन्हें नाच नचायें

8-पाकिस्तान अब तक इस बात से इंकार करते आया है कि मुंबई पर हमला करने वाले आतंकवादियों को सरकारी मदद मिली, लेकिन ये किताब पाकिस्तान की केंद्रीय जांच एजेंसी एफआईए के सूत्रों के हवाले से बताती है कि हमले को पाक एजेंसियों का आधिकारिक सहयोग मिला था।
अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद पाकिस्तान की फेडरल इनवेस्टीगेटिव अथॉरिटी ने अपने देश में हमलों की जांच शुरू की। हालांकि, पाकिस्तान ये कहता रहा कि भारत ने इस मामले में पुख्ता सबूत नहीं दिये हैं जो कि कुछ हद तक सच है, जांच से जुडे एफआईए के कुछ अफसर निजी तौर पर ये मानते हैं कि जिस पैमाने पर ऑपरेशन बॉम्बे को अंजाम दिया गया, वो बिना आधिकारिक जानकारी और मंजूरी के नहीं हो सकता.

9-दाऊद गिलानी उर्फ डेविड कॉलमैन हेडली आतंकी संगठन लष्कर ए तैयबा के लिये काम करता था, लेकिन उसके रिश्ते पाकिस्तान सरकार और वहां के आला राजनेताओं से भी थे। इस बात का खुलासा हुआ हेडली के पिता की मौत होने पर। 26-11 के हमले के एक महीने के बाद हेडली के पिता सय्यद सलीम गिलानी की लाहौर में मौत हो गई। हेडली उस वक्त देश से बाहर था, लेकिन पाकिस्तान के प्रधानमंत्री गिलानी परिवार से अपनी संवेदनाएं जताने के लिये उनके घर आये।हेडली की ओर से अपने दोस्त को भेजे गये एक ईमेल से ये बात सामने आई।

10- धवार पार्क-वो जगह जहां 26 नवंबर 2008 की शाम पाकिस्तान से आये 10 आतंकवादी उतरे थे। मछुआरों की बस्ती के पास मौजूद इस जगह को लैंडिंग पॉइंट के तौर पर इस्तेमाल करने की सलाह आईएसआई के एक डबल एजेंट ने दी थी। हेडली ने बाद में आकर इस जगह की तस्वीरें लीं और यहां का जीपीआरएस लोकेशन नोट किया।


इन खुलासों से ये साफ होता है कि सुरक्षा एजेंसियों के सामने कई ऐसे मौके आये जब आतंकियों पर काबू पाया जा सकता था और जान ओ माल के नुकसान को काफी कम किया जा सकता था...लेकिन किसी की लापरवाही, किसी की ढिलाई, किसी की कडे फैसले न ले पाने की कमजोरी और किसी की बेवकूफी ने मुंबई के दुश्मनों को उनके मंसूबों में कामियाब कर दिया। 5 साल बाद ताज और ट्राईडेंट आज फिर गुलजार हैं, सीएसटी रेल स्टेशन पर मुसाफिरों की चहल पहल भी पहले जैसी ही है, लेकिन उन तारीखों के दौरान इन इमारतों में जो नरसंहार हुआ था वो इसके इतिहास का हमेशा के लिये काला हिस्सा बन गया है

Monday, 11 November 2013

डाईबिटीज: 200 साल जीने का वरदान !!!

बधाई हो। अब तुम 200 साल जी सकते हो। ये प्रतिक्रिया थी मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर और मेरे मित्र डी.शिवानंदन की जब उन्हें ये पता चला कि मैं भी डाईबिटिक हूं। उनके लफ्ज सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ और लगा कि शायद वो कोई व्यंग कर रहे हैं। जो डाईबिटीज आज दुनिया के तमाम शहरी इलाकों में हौवा बन चुकी है और जिसे लोग साईलेंट किलर मानते हैं उसके होने से किसी की उम्र कैसे बढ सकती है? शिवानंदन ने बात को स्पष्ट किया। उनका कहना था कि डाईबिटिज होने के बाद इंसान को अपनी जिंदगी में जिस अनुशासन की जरूरत पडती है अगर उस पर सख्ती से अमल किया जाये तो इंसान की उम्र और बढ सकती है। डाईबिटीज से होने वाले नुकसान को तो रोका ही जा सकता है उम्र के साथ आनेवाली दूसरी बीमारियों से भी बचा जा सकता है।

करीब सालभर पहले ही डाईबिटिज ने मुझे अपनी गिरफ्त में लिया है। चूंकि मेरे माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी, वगैरह तमाम रक्त संबंधभी डाईबिटिक हैं तो मैं भी मानसिक तौर पर तैयार था कि एक न एक दिन मुझे भी डाईबिटीज होना ही है...लेकिन डाईबिटज इतनी जल्दी हो जायेगी इसका अंदाजा न था...लगा था और 8-10 साल बाद होगी। मेरी तरह ही उसी दौरान दफ्तर के 4-5 और भी हमउम्र सहकर्मियों को डाईबिटीज होने की खबर मिली...कुछ मुंबई के थे, कुछ नोएडा के। भारत में डाईबिटीज के बढते आंकडे जो आये दिन हम अखबरों में पढ रहे थे, वे सभी अब आसपास ही नजर आने लगे। डाईबिटीज कितनी व्यापक हो चुकी है इसका अंदाजा तब आया जब लोगों से इस मुद्दे पर बात करने पर पता चला कि लगभग हर दूसरा व्यकित डाईबिटीज का डॉक्टर है और उसके पास शुगर को कंट्रोल में रखने या डाईबिटीज पूरी तरह से खत्म कर देने का नुस्खा है। कोई खुद डाईबिटीज से ग्रस्त निकलता या किसी के घर में किसी न किसी को डाईबिटीज होती। कोई कहता कि कच्ची भिंडी को रातभर पानी में भिगो कर सुबह पानी पी लीजिये, कुछ दिनों में डाईबिटीज गायब। किसी की सलाह थी कि करी पत्ते को उबाल कर उसका पानी पीजिये, डाईबिटीज खत्म हो जायेगी। करेला, जामुन और नीम के रस पीने की भी सलाह दी गई। हो सकता है कि इन तमाम उपायों से शुगर काबू में रहे, लेकिन इनसे डाईबिटीज खत्म हो जायेगी, ये मानना बेवकूफी है। आज तक ऐसी कोई मिसाल सामने नहीं आई है। डाईबिटीज शरीर में होने वाला वो बिगाड है, जिसकी मरम्मत नहीं हो सकती।

डाईबिटीज से ग्रस्त होने का मतलब है कि अपनी जीवन शैली, रहन-सहन और आदतों में भारी परिवर्तन करना। अगर शिवानंदन के मामले को केस स्टडी के तौर पर देखें तो उन्होने डाईबिटिक होने के बाद अपनी जिंदगी में कई बडे फेरबदल किये और अपने आप को अनुशासित किया। 63 साल के शिवानंदन डाईबिटीज की गिरफ्त में साल 1998 में आये जब वो मुंबई क्राईम ब्रांच के मुखिया थे। ये वो दौर था जब अंडरवर्लड मुंबई शहर पर हावी था। कोई ऐसा दिन न बीतता था जब गैंगस्टर किसी की हत्या न करते हों। ऐसे हालात में शिवानंदन पर काम का दबाव और तनाव बढ गया। रात रात भर जाग कर गैंगस्टरों को खत्म करने की रणनीति बनाना, वारदात के ठिकानों का मुआयना करना, अदालती मामलों का अध्ययन करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गई थी। न नींद मिल पाती थी और न वक्त पर खाना मिल पाता था और नतीजतन हो गई डाईबिटीज। डाईबिटीज ग्रस्त होने के बाद शिवानंदन ने अपनी जो दिनचर्या अपनाई उसके मुताबिक वे दिन में 5 बार खाना खाते हैं, लेकिन पांचों बार खाने की मात्रा काफी कम रहती है।हर बार खाने के बीच 3 घंटे का अंतर रहता है। रात का खाना वे सोने से 2 घंटे पहले 8 बजे ही कर लेते हैं। आमतौर पर वे शाकाहारी खाना खाते हैं। हफ्ते में 5 दिन वे 1 घंटे के लिये व्यायामशाला जाते हैं और 2 दिन घंटेभर तक पैदल चलते हैं। डाईबिटीज होने के बाद से उन्होने अपना वजन बरकरार रखा है। 15 साल पहले भी उनका वजन 82 किलो था और आज भी 82 किलो ही है। शिवानंदन के मुताबिक न तो वे शराब के शौकीन हैं और न ही उन्हें सिगरेट की आदत है। उन्होने कॉल्ड ड्रिंक्स से भी परहेज रखा है। वे शुगर कंट्रोल करने वाली गोलियां नियमित रूप से लेते हैं, जिसके अलावा डाईबिटीज को लेकर वे दूसरा कोई नुस्खा नहीं अपना रहे। शिवानंदन का कहना है कि वे अब हमेशा अपने आप को खुश रखने की कोशिश करते हैं और जीवन के प्रति सकारात्मक नजरिया रखते हैं।इस बात को शिवानंदन बडे गर्व से बताते हैं कि डाईबिटीज होने के बाद उन्होने जो जीवनशैली अपनाई है उससे वे कभी बीमार नहीं पडे, कभी अस्पताल में भर्ती नहीं होना पडा और अब भी पूरी तरह से तंदुरूस्त हैं।


शिवानंदन की अपनाई हुई जीवन शैली तो उनके लिये काम करती दिख रही है, लेकिन कितने युवा डाईबिटिक उनके जैसी लाईफस्टाइल अपनाने को तैयार होंगे? कईयों के लिये उनकी तरह जीना तो शायद जीने की परिभाषा में भी फिट न बैठता हो। नहीं चाहिये ऐसा 200 साल जीने का वरदान..लीवर सडे तो सडे, किडनी बेकार हो रही हो तो हो जाये, आंखों से रोशनी कम हो रही हो तो हो जाये, ब्लड प्रेशर बढता हो तो बढे, दिल में दर्द होता हो तो हो। हैप्पी वर्लड डाईबिटीज डे !!!. 

Saturday, 2 November 2013

'साहेब' का अधूरा ख्वाब: महाराष्ट्र के बाहर शिवसेना।


इस महीने शिवसेना प्रमुख बालासाहब ठाकरे के निधन की पहली बरषी है। जाने से पहले 86 साल के ठाकरे का एक सपना तो पूरा हो गया कि महाराष्ट्र के विधान भवन पर भगवा लहराये। 1995 में उनकी पार्टी बीजेपी के साथ मिलकर एक बार सत्ता में आ पायी। 80 के दशक में हिंदुत्व का मुद्दा अपनाने के बाद बालासाहब को उम्मीद थी कि पार्टी महाराष्ट्र के बाहर भी अपने पैर पसारेगी और एक राष्ट्रीय पार्टी की शक्ल ले लेगी, लेकिन इस दिशा में कदम अधूरे मन से उठाये गये नजर आते हैं।
शिवसेना की ओर से हिंदुत्व का मुद्दा अपनाने और बालासाहब की निजी छवि ने महाराष्ट्र के बाहर भी खासकर उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान और जम्मू-कश्मीर में कई युवाओं को आकर्षित किया। शिवसेना ने भी इस बात को प्रदर्शित किया कि वो गैर मराठियों के लिये खुली है और इसी के मद्देनजर साल 1993 में दोपहर का सामना नामक हिंदी सांध्यदैनिक निकाला और 1996 में मुंबई के अंधेरी स्पोर्ट्स कॉम्प्लैक्स में उत्तर भारतीय महासम्मेलन का आयोजन किया।
अगर महाराष्ट्र के बाहर किसी राज्य में शिवसेना को अधिकतम कामियाबी मिली तो वो राज्य था उत्तर प्रदेश, जहां पार्टी ने 1991 के चुनाव में एक विधानसभा सीट जीती। अकबरपुर सीट से एक स्थानीय बाहुबली नेता पवन पांडे शिवसेना का विधायक चुन लिया गया। शिवसेना ने उस दौरान लखनऊ, मेरठ, वाराणासी, अकबरपुर, बलिया और गोरखपुर के स्थानीय निकाय चुनावों में भी तगडी मौजूदगी हासिल की। बहरहाल, ये कामियाबी ज्यादा वक्त तक टिकी नहीं। पवन पांडे जो उत्तर प्रदेश में शिवसेना का सबसे मजबूत चेहरा बनकर उभरा था, अगला चुनाव हार गया। उत्तर प्रदेश का कुख्यात अपराधी श्रीप्रकाश शुक्ला पहले पवन पांडे के साथ ही काम करता था। जब मायावती मुख्यमंत्री बनीं तो उन्होने अपने उन सियासी दुश्मनों को निशाना बनाना शुरू किया जिनका आपराधिक रिकॉर्ड था। चूंकि पवन पांडे खुद एक आपराधिक इमेज का शख्स था इसलिये मायावती की मुहीम से खुद को बचाने के लिये उसे उत्तर प्रदेश छोडकर भागना पडा। पांडे की गैर मौजूदगी ने यूपी में शिवसेना के विस्तार को प्रभावित किया। यूपी से भागने के बाद पांडे मुंबई में आकर बस गया और नवी मुंबई के जुईनगर में उसने एक डांस बार खोला पर मुंबई में भी पांडे की कथित आपराधिक गतिविधियां जारी रहीं और पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। उसकी संजय निरूपम से भी अनबन हो गई जिन्हें शिवसेना ने राज्यसभा सांसद और अपने उत्तर भारतीय कार्यक्रम का प्रभारी बना दिया था। आपराधिक मामले में पांडे की गिरफ्तारी से निरूपम को उसे पार्टी से निकाल फैंकने का एक मौका मिल गया। पांडे के निकाले जाने से शिवसेना य़ूपी में बुरी तरह से लडखडा गई। हालांकि शिवसेना ने 90 के दशक में यूपी में 3 बार विधान सभा चुनाव लडा लेकिन बाल ठाकरे कभी खुद वहां चुनाव प्रचार के लिये नहीं गये। ठाकरे के उत्तर प्रदेश न जाने के पीछे हमेशा ये कारण बताया गया कि खुफिया जानकारी के मुताबिक उनकी जान को खतरा है। ठाकरे एकमात्र बार लखनऊ गये थे बाबरी कांड से जुडी एक अदालती कार्रवाई में पेश होने के लिये। शिवसेना से निकाले जाने के बाद पवन पांडे बहुजन समाजवादी पार्टी से जुड गया। हालांकि, बीजेपी नेताओं ने कभी खुले तौर पर ये बात नहीं कही, लेकिन उन्हें डर था कि अगर शिवसेना महाराष्ट्र के बाहर बढी तो उसके वोटर कट सकते हैं।
यूपी के विपरीत दिल्ली में शिवसेना आज तक एक भी विधानसभा सीट नहीं जीत पायी है, लेकिन पार्टी की दिल्ली इकाई अक्सर खबरों में रही है। जब बाल ठाकरे ने पाकिस्तानी खिलाडियों के खिलाफ अपने बैन का ऐलान किया तो जनवरी 1999 में शिवसैनिकों ने दिल्ली के फिरोज शाह कोटला मैदान की पिच खोद डाली। शिवसैनिकों ने शांति प्रक्रिया के तहत शुरू की गईं भारत-पाकिस्तान के बीच बसों की हवा निकाल दी। साल 2000 में अजय श्रीवास्तव जो कि भारतीय विद्यार्थी सेना (शिवसेना की छात्र इकाई जिसके प्रमुख राज ठाकरे हुआ करते थे।) से जुडे थे एकाएक मशहूर हो गये जब उन्होने इनकम टैक्स विभाग की ओर से आयोजित की गई नीलामी में दाऊद इब्राहिम की संपत्ति पर बोली लगई। पिछले साल शिवसैनिकों ने यासीन मल्लिक पर हमला कर दिया जब अफजल गुरू को फांसी दिये जाने के बाद वो दिल्ली आये। शिवसैनिकों ने दिल्ली में ही एक पाकिस्तानी सूफी गायिका के कार्यक्रम में भी तोडफोड की। हालांकि, दिल्ली के शिवसैनिकों की इस तरह की गतिविधियों को अखबारों और टीवी चैनलों पर जगह तो मिली लेकिन इसका कोई चुनावी फायदा पार्टी को नहीं मिला। जयभगवान गोयल, अजय श्रीवास्तव और मंगतराम मुंडे शिवसेना की दिल्ली इकाई के संस्थापक सदस्य थे, लेकिन ये आपस में ही लडते रहते थे। यूपी की तरह ही ठाकरे कभी भी चुनाव प्रचार के लिये दिल्ली नहीं आये।। मार्च 1999 में उनका सम्मान करने के लिये दिल्ली के ताल कटोरा स्टेडियम में एक रैली आयोजित की गई थी, लेकिन ठाकरे उसमें भी शरीक नहीं हुए और अपने बेटे उदध्व को भेज दिया। उस वक्त तक उदध्व शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष भी नहीं बने थे। बार बार गुजारिशों के बावजूद बालासाहब ठाकरे के दिल्ली न आने से उनके कार्यकर्ता हतोत्साहित हुए। दिल्ली के शिवसैनिकों की एक बडी तादाद भारतीय विद्यार्थी सेना की सदस्य थी, लेकिन जब राज ठाकरे ने शिवसेना छोडकर अपनी अलग पार्टी बनाना तय किया तो इन शिवसैनिकों को भी पार्टी में अपना कोई भविष्य नजर नहीं आया। हालांकि, दिल्ली के ये शिवसैनिक राज ठाकरे के साथ उनकी नई पार्टी में शामिल नहीं हो पाये क्योंकि राज ठाकरे ने अपनी नई पार्टी एमएनएस को महाराष्ट्र तक सीमित रखा है। अजय श्रीवास्तव अब शिवसेना के सक्रीय सदस्य नहीं हैं और जयभगवान गोयल ने भी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ अनबन के बाद शिवसेना छोड दी है।
शिवसेना के लिये गुजरात में उस वक्त एक मौका था जब शंकरसिंह वाघेला ने बीजेपी से बगावत की। बीजेपी से निकलने के बाद वाघेला ने खुद की एक पार्टी बनाई, लेकिन उससे पहले उन्होने शिवसेना से एक पेशकश की। वाघेला ने ठाकरे को संदेश भिजवाया कि वो अपने समर्थकों के साथ शिवसेना में शामिल होना चाहते हैं, लेकिन ठाकरे ने उनकी ये पेशकश ठुकरा दी क्योंकि वो बीजेपी से अपने रिश्ते नहीं बिगाडना चाहते थे। ठाकरे को इस बात की शंका भी थी कि गुजरात में शिवसेना कोई झंडे गाड पायेगी क्योंकि शिवसेना के जन्म के बाद शुरूवाती सालों तक उसकी इमेज गुजराती विरोधी रही थी।
दिल्ली की तरह ही शिवसेना की राजस्थान विधानसभा में भी कोई मौजूदगी नहीं है। बहरहाल, 2010 के पिछले स्थानीय निकाय चुनावों में पार्टी को नागौर नगर निगम में 2 और गंगानगर नगर निगम में 7 सीटें मिलीं। हाल ही में उदयपुर विश्वविद्यालय के छात्रसंघ चुनाव में शिवसेना की युवा इकाई युवा सेना का उम्मीदवार अध्यक्ष चुना गया। जयपुर और भरतपुर विश्वविद्यालयों के छात्रसंघ चुनावों में भी युवा सेना ने कुछेक सीटें जीतीं। हालांकि, शिवसेना 1998 से राजस्थान में विधान सभा चुनाव लड रही है, लेकिन बाल ठाकरे एक बार भी वहां चुनाव प्रचार के लिये नहीं गये। साल 2003 के चुनाव में सिर्फ एक बार उदध्व ठाकरे प्रचार के लिये् आये थे। शिवसेना के हिंदुत्ववादी एजेंडे ने कुछ समर्थक जम्मू में भी जुटाये। शिवसेना का एक उम्मीदवार पिछले नगर निगम के चुनाव में पार्षद चुना गया।
हालांकि, शिवसेना का इरादा एक बहुराज्यीय पार्टी बनने का है, लेकिन मौजूद वक्त में वो अपने घरेलू मैदान महाराष्ट्र में खुद के पैर टिकाये रखने के लिये संघर्ष कर रही है।राज ठाकरे की पार्टी एमएनएस, शिवसेना के राज्य में अस्त्तिव पर सीधा हमला कर रही है। एमएनएस की ओर से साल 2009 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में जो नुकसान पहुंचाया गया उससे तो सियासी समीक्षक ये मान बैठे कि शिवसेना का अस्तित्व खतरे में है। बहरहाल साल 2012 के बीएमसी चुनाव जीतकर शिवसेना ने इन समीक्षकों को ये संदेश दे दिया कि अभी उसका अंत उतना निकट नहीं है जितना वो मान रहे हैं। शिवसेना इस बार दिल्ली और राजस्थान के विधान सभा चुनाव लडने जा रही है, लेकिन अगल साल होने जा रहे लोकसभा और महाराष्ट्र विधान सभा के चुनावों के नतीजे ही शिवसेना का भविष्य तय करेंगे।

'Saheb's Unfulfilled Dream: Shiv Sena Outside Maharashtra.



This month will see the first death anniversary of Shiv Sena supremo Balasaheb Thackeray.  Before departing at the age of 86 years, he had seen at least one of his dreams fulfilled-saffron flag at Maharashtra’s legislative assembly. Shiv Sena managed to attain power once in 1995 by winning assembly elections in partnership with BJP. After adopting the ideology of Hindutwa in the decade of 80s Bal Thackeray also hoped to see his party spreading out of Maharashtra and eventually becoming a national party, but the efforts in this direction were half hearted.

Shiv Sena’s adoption of Hindutwa ideology & Bal Thackeray’s personal charisma appealed to numerous youngsters outside Maharashtra, especially in Hindi speaking states like Uttar Pradesh, Delhi, Rajasthan & Jammu & Kashmir. Shiv Sena also displayed it openness for non Maharashtrians by launching a Hindi newspaper “Dopahar Ka Saamana” in 1993 and organizing “Uttar Bhartiya Mahasammelan” at Mumbai’s Andheri Sports Complex in 1996.

The maximum success of Shiv Sena outside Maharashtra was seen in Uttar Pradesh, where the party was able to win one assembly seat in 1991. A local ganglord Pawan Pande got elected as MLA from Akbarpur seat on Shiv Sena’s ticket. Shiv Sena also made strong presence in corporations of Lucknow, Meerut, Varanasi, Akbarpur, Baliya & Gorakhpur. However, the success didn’t continue for long. Pawan Pande who was the key for Shiv Sena’s operations in Uttar Pradesh lost his seat in the next elections. Notorious gangster of Uttar Pradesh Shriprakash Shukla belonged to his gang. When Mayawati became Chief Minister of U.P, she started targeting her political opponents who were having criminal records. Pande being a history sheeter & boss of gangters like Shukla had to run away from U.P to escape Mayawati’s tirade. Pande’s absence affected Shiv Sena’s progress in U.P. After escaping from U.P, Pande settled in Mumbai & opened a dance bar in Juinagar area of Navi Mumbai. However, in Mumbai also Pande was booked for his notorious activities & was arrested. He also had differences with Sanjay Nirupam whom Shiv Sena had made Rajya Sabha MP & relied upon for expansion in North India. Nirupam got an opportunity to sack Pande from the party on the basis of his criminal record. With sacking of Pande, Shiv Sena crippled in Uttar Pradesh. Although, Shiv Sena contested assembly elections thrice in U.P in the decade of 90s, Bal Thackeray never personally went to the state for political campaign. He never visited Uttar Pradesh on the pretext that there was intelligence input indicating threat to his life. The only time he visited Lucknow was to attend a court hearing in Babri demolition case. Pawan Pande joined BSP after getting booted out from Shiv Sena. Although, BJP leaders were never vocal about it, but they feared that growth of Shiv Sena outside Maharashtra could damage the voters’ base.

Unlike UP, Shiv Sena never managed to win a single seat in Delhi assembly, but the party’s state unit was often in news for its activities. When Bal Thackeray announced his ban against playing of Pakistani cricketers in India, his party workers dug up pitch of Phiroze Shah Kotla Maidan in January 1999. Shiv Sena workers also punctured tyres of buses plying between India & Pakistan which were launched by the governments of both the countries to foster peace efforts. In year 2000 Ajay Shrivastava who belonged to Bhartiya Vidyarthi Sena (Student’s wing of Shiv Sena which was then headed by Raj Thackeray) became famous by bidding on Dawood Ibrahim’s property in an auction organized by the Income Tax Department. Last year Shiv Sainiks attacked Yaseen Mallik when he came to Delhi after hanging of Afzal Guru & also vandalised a programme of Pakistani sufi singer. Although, such activities by Shiv Sainiks of Delhi attracted good news space in television channels & newspapers, they were never able to fetch votes for the party. Jaibhagwan Goyal, Ajay Shrivastava & Mangatram Munde were some of the founding members of party’s Delhi state unit. However, they fought amongst themselves. Like UP, Bal Thackeray also never visited Delhi for political campaigning. In March 1999 a grand rally was organised in Talkatora stadium of Delhi to felicitate Bal Thackeray, but instead of coming himself, Bal Thackeray chose to send his son Uddhav. Uddhav was not even the working president of the party at that time. Bal Thackeray’s avoidance to visit Delhi inspite of repeated requests led to discouragement of state party workers. Shiv Sena’s adherence to Marathi issue on and off post 2004 also led to disillusionment of workers in Delhi. A large number of Shiv Sainiks in Delhi belonged to Bhartiya Vidyarthi Sena of Raj Thackeray, but when Raj Thackeray chose to quit Shiv Sena & raise his own party, his followers in Delhi too didn’t see any sense in continuing with Shiv Sena. However, they were unable to follow Raj because Raj chose to confine activities of his new party MNS only within the state of Maharashtra. Ajay Shrivastava ceased to be an active member of the party & Jaibhagwan Goyal also left Shiv Sena due to differences with senior leadership in Mumbai.

There was an opportunity for Shiv Sena in the state of Gujarat when Shanker Singh Waghela revolted from BJP. After defecting from BJP Waghela established his own political party, but before that he made an offer to Shiv Sena. Waghela sent a message to Bal Thackeray that he wished to join Shiv Sena alongwith his supporters. However, the offer was declined by Bal Thackeray who didn’t want to disturb Shiv Sena’s relation with ally BJP. Moreover, Thackeray was sceptical that his party will do well in Gujarat as Shiv Sena had acquired an anti Gujarati image during the initial years of its formation.

Like Delhi, Shiv Sena has no presence in Rajasthan’s legislative assembly also. However, during last local self government elections in 2010 party was able to win 2 seats in Nagor municipal council & 7 seats in Ganganagar municipal council. Recently Shiv Sena’s youth wing got a boost when it won the presidentship of students’ council in Udaipur University. It also managed to win student council seats in Jaipur & Bharatpur universities. Although, Shiv Sena has been fighting assembly elections in Rajasthan since 1998, Bal Thackeray never visited the state to address any political rally. It was only in 2003 elections that Uddhav Thackeray came for the campaigning. Shiv Sena’s Hindutwa rhetorics attracted some followers in Jammu also. A Shiv Sena candidate got elected as a corporator during last civic elections in Jammu.


Although, Shiv Sena aspires to be a multistate party, it is struggling to keep itself strong at the home turf-Maharashtra. MNS of Raj Thackeray is directly threatening the survival of party in the state. Damage done by MNS during 2009 assembly & parliamentary elections led the political experts to conclude that Shiv Sena’s very existence is in danger. However, Shiv Sena managed to do the damage control by retaining Mumbai municipal corporation in 2012. Although, Shiv Sena is now fielding candidate’s in Rajasthan & Delhi assembly elections, results of assembly & parliamentary elections next year in Maharashtra will truly indicate the party’s future.