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Saturday, 8 May 2010

कसाब का मुकदमा: क्या दिखा? क्या छुपा?

न तो जज ने अजमल कसाब को फांसी की सजा सुनाकर अपनी कलम की निप तोडी और न ही कसाब अदालत में चिल्लाया – जज साब मैं बेकसूर हूं। ऐसा कुछ भी नहीं हुआ जो आप फिल्मों में किसी को फांसी की सजा सुनाये जाते वक्त देखते हैं...लेकिन इसके बावजूद 26-11-2008 को हुए मुंबई हमले का मुकदमा ड्रामें से भरपूर है। अदालत से जुडे हर शख्स के किस्से बडे दिलच्सप हैं।

जज तहिलयानी

उज्जवल निकम भले ही अब ये बात कबूल न करें, लेकिन जब 26-11 के मुकदमें की सुनवाई के लिये जज तहिलयानी की नियुक्ति हुई तो निकम चिंतित हो गये थे।

चिंता इसलिये थी क्योंकि तहिलयानी की अदालत में निकम एक मामले में बहुत बडा झटका झेल चुके थे। ये मामला था कैसेट किंग गुलशन कुमार की हत्या का। तहिलयानी के फैसला सुनाने के कुछ दिन पहले ही निकम चंद पत्रकारों से कहते पाये गये –तहिलयानी साब की इमेज अक्विटल मांइंडेड (आरोपियों को बरी कर देने वाले) जज की है। पता नहीं क्या होगा? उस मामले में निकम का डर सही भी निकला। 18 में से सिर्फ एक आरोपी रऊफ दाऊद मर्चंट को छोडकर सभी आरोपियों को तहिलयानी ने बरी कर दिया। उज्जवल निकम के लिये ये एक करारा झटका था। इसी मामले से उस वक्त निकम की बनी ये इमेज भी टूटी थी कि उज्जवल निकम को कोई भी मुकदमा सौंपों तो जीत पक्की। फैसले की शाम दुखी उज्जवल निकम को उनके कुछ खास पत्रकारों ने ये कहते हुए दिलासा दी – छोडिये न निकम साब। सचिन क्या हर मैच में सेंचुरी मारता है? अमिताभ बच्चन की क्या हर फिल्म हिट होती है ?...आप एक मुकदमा हार गये तो क्या फर्क पडता है।

26-11 के मामले में फिर एक बार निकम का सामना जज तहिलयानी से हुआ। जज तहिलयानी के इस फैसले से कि कसाब को फांसी दी जाये उज्जवल निकम की वाहवाही तो हुई, लेकिन साथ ही उन्हें 2 आरोपियों के बरी हो जाने की टीस भी झेलनी पडी।



तहिलयानी बडे ही मिलनसार शख्स हैं। कोर्ट के गंभीर माहौल को अक्सर वे हलका करने की कोशिश करते थे..कभी निकम की खिंचाई कर देते तो कभी कसाब या पत्रकारों पर कोई चुटकी लेते। कई बार उन्होने कुछ पत्रकारों के साथ सख्ती भी दिखाई और कुछ अखबारों को नोटिस भी भेजा, लेकिन आमतौर पर मीडियाकर्मियों की जरूरतों का वे पूरा ख्याल रखते थे। फैसला सुनाये जाने के पहले एक अंग्रेजी अखबार ने खबर छाप दी कि जज तहिलयानी फैसला तैयार करने में इतने व्यस्त थे कि महीनेभर तक उन्होने अपनी पत्नी तक से बात नहीं की। इसपर जज तहिलयानी ने खबर लिखने वाली रिपोर्टर की भरी अदालत में क्लास ले ली और कहा कि तुम्हारी खबर से मेरी फैमिली में प्रोब्लम हो गया। मेरे नाते रिश्तेदारों के फोन आ रहे हैं और मुझे उन्हें सफाई देनी पड रही है।


उज्जवल निकम

निकम अगर अब वकालत का पेशा छोडकर टीवी पत्रकार बनना चाहें तो उन्हें कोई दिक्कत नहीं होगी। भारत का कोई सरकारी वकील जिसे पूरी तरह से इलेक्ट्रोनिक मीडिया की नब्ज पता है तो वो हैं उज्जवल निकम। पिछले 15 सालों में निकम ने इतनी बार टीवी कैमरों का सामना किया है कि अब वे टीवी के तकनीक शब्दों से भलीभांति परिचित हो गये हैं और अक्सर अदालत के बाहर मीडिया को संबोधित करने से पहले उनसे सुना जा सकता था – ऐ मैं पहले हिंदी में बाईट दूंगा। मैं टिकटैक नहीं दूंगा...लाईव के लिये टाईम नहीं है फोनो या फिर डिफर्ड लाईव ले लो...मेरे होटल के बाहर ओ.बी.वैन खडी करने की जगह ज्यादा नहीं है..वगैरह। निकम लगभग सभी टीवी पत्रकारों को उनके नाम से जानते हैं।



कई बार पत्रकारों से उनकी नोंकझोंक भी होती। अदालत में जब कसाब को फांसी की सजा दिये जाने पर वे अपनी दलीलें दे रहे थे तो उन्होने कसाब को न जाने कौन कौनसा जानवर बना डाला...कसाब सांप है..कसाब पागल कुत्ता है... कसाब घोडा है..कसाब गधा है..कसाब मगरमच्छ है...फिर कहा कि कसाब की तुलना इन जानवरों से करना, इन जानवरों के अपमान करने जैसा है। निकम की ये दलीलें सुनकर कोर्ट में मौजूद तमाम युवा पत्रकार हंसने लगे। निकम ने गुस्से में उनकी ओर देखते हुए कहा – सर ये लोग इमैच्योर हैं। सिर्फ हंसते रहते हैं...



निकम के साथ उनके पुलिसिया ड्राईवर सौदे पिछले 15 सालों से है। जब भी निकम टीवी चैनलों को बाईट देने के लिये आते तो सौदे सीना तानकर उनके पीछे खडा हो जाता। निकम के साथ टीवी पर दिखना सौदे को पसंद है। फैसला सुनाये जाने वाले दिन एक दिलचस्प वाक्या हुआ। सौदे नया सूट-बूट पहनकर अदालत आया। हालांकि सौदे ड्राईविंग सीट पर था, लेकिन उस दिन वो पीछे की सीट पर बैठे निकम से ज्यादा स्मार्ट लग रहा था...सौदे को पता था कि आज पूरी दुनिया उज्जवल निकम को लाईव दिखाएगी और निकम के बगल में खडा होने पर वो भी सभी को दिखेगा ही। हमेशा पुलिस की वर्दी में रहने वाला सौदे जब सूट बूट में आया तो वहां मौजूद फोटोग्राफरों ने उसकी तस्वीरें लेनी शुरू कर दीं। वहां मौजूद डीसीपी वर्के और एसीपी मराठे ने जब ये देखा तो उन्होने तुरंत सौदे को बुलाया और सभी के सामने उसकी क्लास ले ली। उसका सूट उतरवा लिया गया और कहा गया कि इसकी शिकायत पुलिस कमिश्नर के पास की जायेगी। सौदे गिडगिडा कर सफाई देने लगा कि उसकी शादी की सालगिरह थी इसलिये वो वर्दी के बजाय सूट में आया था। वहां मौजूद पत्रकारों को सौदे पर हंसी भी आई और दया भी।



फैसले वाले दिन सभी चैनल उज्जवल निकम का लाईव इंटर्वयू दिखाना चाहते थे। एक अनार सौ बीमार वाले हालात पैदा हो गये। उज्जवल निकम एक और हिंदी, अंग्रेजी और मराठी के मिलाकर चैनल करीब 20 थे। इस समस्या से निपटने के लिये निकम ने अपने होटल पर फैसले के चंद दिनों पहले सभी चैनलों की एक बैठक बुलाई और तय किया कि अदालत का फैसला आने के बाद वे सभी चैनलों को 15 मिनट का समय लाईव करने के लिये देंगे। फैसले वाले दिन वे दोपहर से लगातार देर रात तक एक चैनल से दूसरे चैनल पर लाईव देते रहे। लगभग एक जैसे सवाल और एक जैसे जवाब..लेकिन निकम के चेहरे को देखकर लग रहा था कि न तो वे ऊबे हैं और न ही कोई थकान है। हर लाईव में वही एनर्जी। इस बीच उन्होने 15 मिनट के कुछ ब्रेक का समय भी अपने लिये रख छोडा था ताकि वे कुछ खा-पी सकें, फोन कर सकें और वे काम कर सकें जिन्हें रोका नहीं जा सकता।


अजमल कसाब

अजमल कसाब को पहली बार मैने तब देखा था जब दक्षिण मुंबई के सेशंस कोर्ट में वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये आर्थर रोड जेल से उसकी पेशी हुई थी। उस वक्त जेल के भीतर विशेष अदालत नहीं बनी थी। सीएसटी स्टेशन पर गोलियां चलाते हुए अगर उसकी तस्वीरें और सीसीटीवी का वीडियो न देखा होता तो यकीन करना मुश्किल हो जाता कि यही वो शख्स है जिसने 26 नवंबर 2008 की रात मुंबई में अपने साथियों के साथ कहर बरपाया था। वो एक मध्यमवर्गीय परिवार का आम किशोर दिख रहा था। शक्ल भोली भाली लग रही थी और जज की हर बात का जवाब वो बहुत ही सभ्यता से जी हुजूर कहकर देता था।

कसाब से अगली बार सामना आर्थर रोड जेल की अदालत में हुआ। इस बार उसके चेहरे से भोलापन गायब था। वो एक एक कर खुद ही अपने गुनाहों का कबूल कर रहा था। उसे देखकर घृणा हो रही थी। उसके चेहरे पर न तो कोई झिझक थी और न ही अपनी करतूतों के लिये कोई शर्मिंदगी। इसके बाद मैं तब अदालत गया जब वो अपने इकबालिया बयान से पलट गया। उसने अदालत को बताया कि मुंबई पुलिस ने उसे 26-11 के पहले ही पकड कर रखा था और वो बेकसूर है। ये झूठी कहानी सुनाते वक्त उसकी आंखों में शरारती हंसी साफ दिखाई दे रही थी। हमें अंदाजा हो गया था कि बचाव पक्ष के किसी वकील ने उसे अच्छे से सबकुछ रटाया है।



कसाब का अगला रूप पत्रकारों ने फैसला सुनाये जाने के आखिरी दिन देखा, जब वो मौत की सजा सुनाये जाने पर रोने लगा। वो फिदायीन जो धर्मांधता के वशीभूत होकर मुंबई में नरसंहार करते हुए अपनी जान देने आया था, आज उसे खुद अपनी मौत से डर लग रहा था...अपने किये पर पछतावा हो रहा था।



मुझे जेल अधिकारियों ने बताया कि पहचान परेड के लिये जब कुछ गवाह पुलिसकर्मी जेल में आये थे तो कसाब की सुरक्षा का खास ध्यान रखना पडता था। जेल अधिकारियों को डर था कि कहीं ये पुलिसकर्मी ही भावनाओं के बेकाबू हो जाने पर कसाब की हत्या न कर दें। एक पुलिसकर्मी तो कसाब को देखते ही आपा खो बैठा। वो कसाब पर हमला करने जा ही रहा था कि जेलकर्मियों ने उसे पकड लिया। बडी मुश्किल से वो काबू में आया। वो पुलिसकर्मी बार बार ये चिल्ला रहा था- भले ही मुझे फांसी दे दो..लेकिन मैं इसे जिंदा नहीं देखना चाहता।


मीडिया

इस मुकदमें को कवर करना मीडिया के लिये भी एक बडी चुनौती थी। पुलिस की ओर से मुकदमा शुरू होने से पहले सभी चैनलों, पत्रिकाओं और अखबारों से उन पत्रकारों के नाम मंगवाये गये जिन्हें कि मुकदमें के कवरेज की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। मुंबई पुलिस की स्पेशल ब्रांच ने ऐसे सभी पत्रकारों की खुफिया जांच की और उनकी ओर से मंजूरी मिलने के बाद विशेष पास दिये गये। मुकदमें के पहले दिन हडकंप मच गया। अदालत में बैठने की जगह पत्रकारों की संख्या से कम थी जिसकी वजह से पुलिस ने कई पत्रकारों को अदालत में जाने ही नहीं दिया। पुलिस के इस व्यवहार का पत्रकारों ने कडा विरोध किया। जब बात जज तहिलयानी तक पहुंची तो उन्होने अदालत में और कुर्सियों का इंतजाम करवाया लेकिन साथ ही ये भी कहा कि अदालत में पत्रकारों का प्रवेश पहले आओ, पहले पाओ वाले फार्मूले पर होगा।

अदालत तक पहुंचना भी काफी पेचीदा था। पत्रकार अदालत के बाहर सडक पर लाईन लगाकर खडे रहते। फिर एक एक कर उन्हें छोडा जाता। मोबाईल फोन समेत कोई भी इलेक्ट्रोनिक सामान भीतर ले जाने की इजाजत नहीं थी। यहां तक कि पुलिस कलम भी रखवा लेती। पत्रकारों को पुलिस की ओर से कलमें दी जातीं। पहले घेरे में पुलिसकर्मी मेटल डिटेक्टर से पत्रकारों के पूरे शरीर की जांच करते। यहां तक कि जूते तक उतरवा कर देखे जाते कि कहीं उसमें तो कुछ आपत्तीजनक नहीं रखा है। बायोमेट्रीक कार्ड के जरिये पत्रकारों की कंप्यूटर में एंट्री होती। इसके बाद अगला घेरा भारत-तिब्बत सीमा पुलिस का होता। यहां जांच के बाद ये पुलिसकर्मी अपनी ओर से एक दूसरा पास देते और भीतर जाने वाले पत्रकार की रजिस्टर में एंट्री करते। तीसरा और आखिरी घेरा कोर्टरूम के ठीक बाहर होता। यहां भा.ति.सी.पु की मौजूदगी में मुंबई पुलिस के जवान फिर एक बार मेटल डिटेक्टर से पत्रकारों की तलाशी लेते और फिर उन्हें अदालत के भीतर जाने दिया जाता।

जैसे ही अदालत की कार्रवाई खत्म होती सारे टीवी पत्रकार पूरी ताकत के साथ मुख्य गेट की ओर दौड लगाते। सभी को अपने चैनल पर सबसे पहले खबर दिखाने की जल्दी रहती(हालांकि सभी चैनल पर खबर उतरने में सिर्फ कुछ सेकंदों का ही फासला रहता) शुरूवात में तो पुलिसकर्मी पत्रकारों की ये रेस देखकर घबरा जाते कि क्या हो गया...लेकिन चंद दिनों में ही उन्हें पूरा खेल समझ में आ गया।

अदालत में कुछ पत्रकार अपने गले पर उंगली फेर कर कसाब को छेडने की कोशिश करते तो वहीं कसाब इन शरारतों से बेफिक्र होकर महिला पत्रकारों को निहारता रहता।


कसाब के वकील

पूरे मुकदमें के दौरान 3 लोगों ने कसाब की वकालत की। पहले तो मुंबई के वकीलों ने फरमान जारी कर दिया कि कोई भी वकील उसका मुकदमा नहीं लडेगा..लेकिन जब सरकार ने कसाब को वकील देना तय किया तो एडवोकेट अंजली वाघमारे का नाम सामने आया। कसाब की वकालत लेने पर वाघमारे को काफी विरोध झेलना पडा। एक पुलिस अफसर की पत्नी होकर कसाब का केस लेने पर भी लोग उसे धिक्कार रहे थे। वर्ली में वाघमारे का घर हमले में शहीद हुए तुकाराम ओंबले के घर से बस कुछ ही फासले पर था। आखिर में वाघमारे को अपने आप ही केस से हटना पडा क्योंकि पता चला कि वो हमले में घायल हुए एक शख्स की भी वकील है।

वाघमारे के हटने के बाद ये केस दिया गया एडवोकेट अब्बास काजमी को। काजमी ने भी कसाब का केस लेकर मुसीबत मोल ली। मुंबई के मुसलमानों ने भी ऐलान किया था कि हमले के दौरान मारे गये 9 आतंकियों के शव को मुंबई में दफन नहीं होने देंगे, ऐसे में एक मुंबई का मुसलमान वकील कसाब को फांसी के फंदे से बचाने की जिम्मेदारी ले रहा था। काजमी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुए और उन्हें मुंबई के मशहूर इस्लामिक जिमखाना के प्रबंधन से भी बर्खास्त कर दिया गया। काजमी ने एक लंबे वक्त तक बिना किसी अडचन के मुकदमा चलाया लेकिन मुकदमें के खात्मे से चंद महीने पहले उनकी जज के साथ कहासुनी हो गई। जज ने काजमी को अदालत को गुमराह करने के आरोप में मुकदमें से हटा दिया। काजमी ने भी इसे अपना अपमान माना और बॉम्बे हाईकोर्ट में तमाम आरोपों के साथ विशेष अदालत के जज तहिलयानी के खिलाफ अदालत की अवमानना की अर्जी दायर की है।



काजमी के बाद कसाब का केस गया एडवोकेट के.पी.पवार के पास। पवार के कार्यकाल के दौरान कोई विवाद नहीं हुआ। हमें ताज्जुब हुआ कि पावर की कसाब के वकील के तौर पर नियुकित के वक्त न तो किसी राजनीतिक दल ने विरोध किया और न ही किसी धार्मिक संगठन ने।



विशेष अदालत ने फैसला तो सुना दिया है, लेकिन कसाब के फांसी के फंदे पर लटकने में अभी काफी वक्त है। इस दौरान बस यही मनाईये कि आतंकी कहीं किसी बडे राजनेता का अपहरण कर या कोई हाईजैकिंग कर उसे छुडा न ले जायें। भारत में कुछ भी हो सकता है।



जीतेंद्र दीक्षित

वरिष्ठ संपादक एवं ब्यूरो प्रमुख

स्टार न्यूज एवं स्टार माझा।

7 comments:

Kehta Hai Dil said...

It was really a highly informative and detailed story, an insider to the coverage of the trial of Kasab. Thanks to you for giving such minute information which helped me in visualizing the scenes and also the environment. But the last line written by you is really very important. The need of the hour is to hang him at the earliest because no one knows what can happen, aise bhi the terror masterminds must have made plans to take revenge for the conviction of kasab. In the past also we have seen the prolonged cases of conviction like Afsal Guru.
But thanks for the insider to the 26/11 trial. U r the best....

honesty project democracy said...

ज्यादातर लोगों की जमीर मर चुकी है ,जिसे किसी भी तरह जिन्दा करने की जरूरत है / अगर हम सब एकजुट होकर ईमानदारी से प्रयास करें तो, मुश्किल काम तो है ,पर ना मुमकिन नहीं /

Mithilesh dubey said...

bahut khub , aapne bahut aisi baten batayi jo bahut kam logono ko hee pata hoga , aapka abhar

अजित त्रिपाठी said...

हा हा हा हा बहुत बढ़िया सर।
मज़ा आ गया...सच में। उज्जवल निकम तो वास्तव में पक्के पत्रकार बनते जा रहें हैं..केस की हार जीत तो अपनी जगह है लेकिन कसाब का मामला जितने दिन भी चला उज्जवल निकम के जलवे थे...। हमेशा कि तरह इस लेख को भी आपने बहुत अच्छा लिखा है...मज़ा आ गया....।

अजित त्रिपाठी said...

हा हा हा हा बहुत बढ़िया सर।
मज़ा आ गया...सच में। उज्जवल निकम तो वास्तव में पक्के पत्रकार बनते जा रहें हैं..केस की हार जीत तो अपनी जगह है लेकिन कसाब का मामला जितने दिन भी चला उज्जवल निकम के जलवे थे...। हमेशा कि तरह इस लेख को भी आपने बहुत अच्छा लिखा है...मज़ा आ गया....।

रंजन said...

रोचक..

लोगो ने मुझे कुफ्र बना दिया said...

देखिए भाई साहब कसाब जैसे जितने भी आंतकवादी है उनको देश की जनता के हवाले कर देना चाहिए क्योंकि भारत का जो कानून और उसके रखवाले है वो अब कोई भी निर्णय लेने में सक्षम नहीं है अत. इन दोषियों को जनता के सपूर्द कर देना चाहिए क्योकि जो लोग मरे है किसी नेता या अधिकारी के घर के नहीं थे।
रजनीश
tripathirajnish04@gmail.com