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Thursday, 24 March 2011

जापान का जज्बा: भाग-3

बडे ही कम समय की पूर्व सूचना पर मुझे मुंबई से जापान के लिये निकलना पडा। सोमवार की रात डेढ बजे की फ्लाइट थी और दिन का वक्त वीसा वगैरह हासिल करने में, जापान का विशेष फोन लेने में और विदेशी करंसी का हिसाब किताब करने में निकल गया। जापान के फुकूशिमा डाईची परमाणु संयंत्र से रेडिएशन होने की खबर लगातार आ रही थी। मुझे दफ्तर के लोगों ने और शुभचिंतकों ने सलाह दी कि मैं जापान निकलने से पहले एंटी रेडीएशन कपडे खरीद लूं। मुझे भी ये जरूरी लगा लेकिन मैं उन कपडों को खरीद नहीं सका। पहली बात तो ये कि एंटी न्युक्लयर रेडीएशन कपडे इतनी आसानी से मुंबई के खुले बाजार में, मेडीकल स्टोर्स में या फिर अस्पतालों में उपलब्ध नहीं हैं। दूसरा उस जगह को खोजने का इतना वक्त मेरे पास नहीं था जहां ये कपडे मिल पाते। लिहाजा मैने फैसला किया कि बिना एंटी रेडीएशन कपडों के ही मैं जापान जाऊंगा और मुमकिन हुआ तो टोकियो में ही ये कपडे खरीद लूंगा। वहां उनके उपलब्ध होने की ज्यादा गुंजाइश है।

टोकियो में स्थानीय समय के मुताबिक रात के करीब 9 बजे हम पहुंचे। जापान की धरती पर कदम रखने के कुछ ही मिनटों बाद हिंदी और मराठी चैनलों के लिये लाईव और वाक थ्रू का सिलसिला शुरू हो गया। होटल में चैक इन कर सोते सोते रात के 1 बज गये। अगले दिन सुबह वहां के अंग्रेजी अखबार The Japan Times  के पहले पन्ने पर छपी खबर ने होश उडा दिये। अखबार में Tokyo Metropolitan Government  के गवर्नर शिंतारो इशीहारा का बयान छपा कि बीते दिन की सुबह यानी कि जिस शाम हम टोकियो पहुंचे वहां सामान्य से 20 गुना ज्यादा रेडीएशन पाया गया था...लेकिन राहत की बात ये थी कि ये रेडिएशन कुछ देर में ही कम भी हो गया और इस रेडीएशन से इंसान की सेहत को तुरंत किसी तरह का खतरा नहीं था। हम समझ गये कि यहां रेडिएशन का जोखिम उठाना ही होगा। खैर रेडिएशन के बारे में चिंता करने के लिये मेरे पास ज्यादा वक्त नहीं था। मेरा दिमाग पर फिक्र हावी थी ज्यादा से ज्यादा खबरों को भेजने की, जापान में बसे भारतियों तक पहुंचकर उनसे बात करने की और उत्तर-पूर्वी जापान के उस सेंदई शहर की ओर जाने की तैयारी करने की जहां सुनामी ने सबसे ज्यादा विध्वंश किया था।

टोकियो में एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिये हमने लोकल ट्रेनों का सहारा लिया। पहली रात एयरपोर्ट से होटल पहुंचते वक्त हमें ये पता चल गया था कि टैक्सियां टोकियो में बेहद महंगी हैं और अगर 5 दिनों के टोकियो सफर के दौरान अगर हम टैक्सियों का इस्तेमाल करते तो भारत से लाए सारे डॉलर 3 दिनों में ही टैक्सी का किराया चुकाते चुकाते खत्म हो जाते, हमारी जेब खाली हो जाती और हमें अपने दफ्तर से और डॉलर आपात हालत में मंगाने पडते। लोकल ट्रेनें टैक्सियों के मुकाबले बेहद सस्ती और जल्द से जल्द एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने वाला माध्यम थीं। कुछ स्टेशनों पर सिर्फ जापानी में ही ट्रेन रूट और किराये के बारे में जानकारी दी गई थी और कुछ पर अंग्रेजी, चीनी और कोरियाई भाषा में भी जानकारी उपलब्ध थी। जहां पर अंग्रेजी में जानकारी नहीं दी गई थी वहां हमें थोडी दिक्कत आई लेकिन जैसा कि पहले मैं बता चुका हूं कि जापानी बेहद मददगार थे हमें कोई न कोई मिल जाता था जो हमें मंजिल तक आसानी से पहुंचने का रास्ता बता देता। ज्यादातर जापानी अच्छी अंग्रेजी नहीं जानते लेकिन हमने जिनसे भी बात की उन्होने टूटी फूटी अंग्रेजी में मदद करने की हमारी पूरी कोशिश की।

मैं सुनामी और भूकंप के बाद टोकियो के जनजीवन पर असर से जुडी खबरें फाईल कर रहा था लेकिन मुझे सेंदई इलाके में जाने की तैयारी भी करनी थी जहां सबसे ज्यादा तबाही मची थी। सवाल था कि सेंदई पहुंचे कैसे?  रेल पटरियां पूरी तरह से उखड चुकीं थीं, सडकें टूट चुकीं थीं और सेंदई उस फुकूशिमा डाईची परमाणु संयंत्र से होकर पहुंचना था जहां भूकंप के बाद फैल रहे रेडीएशन से निपटने की जद्दोजहद जारी थी। जापान सरकार ने फुकूशिमा से 30 किलोमीटर के दायरे में किसी के भी प्रवेश पर पाबंदी लगा दी थी। मैने बस सेवा के बारे में पता किया। बसें लंबा चक्कर घूमकर सेंदई से कई किलोमीटर दूर एक जगह तो जा रहीं थीं लेकिन वहां के लिये अगले हफ्तेभर तक आरक्षण उपलब्ध नहीं था। अगर कार लेकर जाते तब भी लाखों येन का खर्च आता और दूसरी दिक्कत ये थी कि वहां से वापस लौटने में दिक्कत होती क्योंकि सेंदई और आसपास के इलाकों में पेट्रोल की आपूर्ति पूरी तरह से ठप थी। कई पेट्रोल पंप सुनामी की लहरें बहा ले गईं थीं। वहां से फोन या इंटरनैट के माध्यम से भारत संपर्क करना भी मुश्किल था क्योंकि सभी मोबाइल टावर नष्ट हो चुके थे और हमारे पास सैटेलाइट फोन नहीं था। ज्यादातर जापानी टीवी चैनलों के स्थानीय पत्रकार ही सेंदई तक पहुंचकर वहां से रिपोर्टिंग कर रहे थे। कुछेक विदेशी चैनलों के पत्रकार सेना के हेलिकॉप्टरों के जरिये वहां पहुंचे थे।

सेंदई कैसे पहुंचा जाये मैं इस उधेडबुन में था कि दफ्तर से फोन पर निर्देश आया कि वहां नहीं जाना है। फुकूशिमा डाईची परमाणु संयंत्र में फिरसे आग लगने और रेडीएशन बढने की खबर आने लगी थी और हमारे चैनल ने तय किया कि मैं सेंदई जाने के चक्कर में रेडिएशन का शिकार होने की रिस्क न लूं। सेंदई में पहले से मौजूद पत्रकार भी इस खबर के आने पर वहां से निकल गये।

फुकूशिमा प्लांट में लगी आग से जापान पर फिर एक बार न्यूकिलयर से तबाही का खतरा मंडरा रहा था...वैसी तबाही का खतरा जैसी 1945 में हिरोशिमा और नागासाकी शहरों में मची थी। मैने भारत वापस लौटने से पहले हिरोशिमा जाकर एक रिपोर्ट फाईल करने की सोची। जिस शहर के बारे में बचपन से इतिहास की किताबों में पढता आया था उसे सामने से देखने की लालसा थी। वो शहर देखना था जहां विश्व का पहला एटम बम गिराया गया। मैं बुलैट ट्रेन जिन्हे की जापान में शिंकाइजेन नाम से जाना जाता है के जरिये करीब टोकियो से 600 किलोमीटर का सफर तय करते हुए 4 घंटे में हिरोशिमा पहुंच गया। हिरोशिमा स्टेशन से पकडी गई ट्राम ने सीधा उस स्मारक के सामने उतारा जिसे वहां Atom Bomb Dome कहा जाता है। ये एक गुंबद वाली बडी इमारत थी जो कि एटम बम गिराये जाने से पहले हिरोशिमा के सासंकृतिक और वाणिज्यिक केंद्र के तौर पर जानी जाती थी। अमेरिकी लडाकू विमान की ओर से गिराया गया एटम बम इसी इमारत के पास आकर गिरा था। इमारत में मौजूद सारे लोग तुरंत ही पिघल कर मारे गये। यही हश्र इस इमारत से 2 किलोमीटर के दायरे में आनेवाले तमाम लोगों का हुआ। हिरोशिमा शहर नष्ट हो गया। बाद में जब हिरोशिमा शहर का पुनर्निमाण होने लगा तो इस इमारत को भी गिराकर यहां नई इमारत खडी करने का प्रस्ताव रखा गया लेकिन कई लोगों ने इसका विरोध किया। उनका मानना था कि हिरोशिमा में एटम बम से बर्बाद हुईं तमाम इमारतों को फिरसे बना लिया गया है लेकिन इस एक इमारत को जस का तस रखा जाये ताकि आनेवाली पीढियों को परमाणु हथियारों से लडी जानेवाली जंग के खौफनाक और अमानवीय चेहरे का अंदाजा हो सके। आज ये जगह दुनियाभर के परमाणु विरोधियों का तीर्थ बन चुकी है और हर वक्त यहां पर्यटकों का तांता लगा रहता है।

हिरोशिमा पर एटम बम से हमले के चंद सालों बाद ही ये शहर फिर एक बार उठ खडा हुआ और जापान के सबसे बडे औद्योगिक शहरों में एक बनकर उभरा। आज देखकर नहीं लगता कि ये वही हिरोशिमा है जो एटम बम से हुई तबाही के कारण विश्व के इतिहास के काले पन्नो में नजर आता है। हिरोशिमा एक मिसाल है जापानियों के जज्बे की, उनकी सकारात्मक सोच की और तकनीक का इस्तेमाल कर नई ऊचाईयों को छूने की जिद की। इसी वजह से मैं ये मानता हूं कि सुनामी से तबाह हुए जापान को फिर एक बार शान से उठ खडा होने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। जापान से वापस लौटते वक्त मैं सोच रहा था कि जापानियो जैसा अनुशासन, मिलनसार और मददगार स्वभाव और सकारात्मक सोच अगर सभी भारतवासी भी रखने लगें तो हमारे देश की सूरत कुछ अलग ही होगी।

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