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Thursday, 19 June 2014

केदारनाथ : डर के आगे आस्था है !


बीते हफ्ते केदारनाथ से लौटा। साढे 11 हजार की ऊंचाई पर इस बात की रिपोर्टिंग करने गया था कि बीते एक साल में वहां क्या क्या बदला है? क्या मंदिर में फिर से शिवभक्तों का तांता लगने लगा है? सरकारी इंतजाम क्या हैं? पुनर्निमाण का काम कितना हुआ है और क्या केदारनाथ में फिर पहले जैसी रौनक लौट सकेगी? गुप्तकाशी के पास फाटा नामक के कस्बे से मैं सिर्फ 8 मिनट में ही हेलिकॉप्टर के जरिये पहुंच गया। वहां एक रात गुजारने के बाद मैने पैदल ही वापस उतरना तय किया। उतरते वक्त कई तरह के भाव मन में थे- आश्चर्य के, दुख के, गुस्से के, प्रशंसा के और उम्मीद के।

डर के आग आस्था है।
बीते साल केदारनाथ में जो तबाही मची उसकी दिल दहला देने वाली तस्वीरें पूरी दुनिया ने टेलिविजन के जरिये देखीं। उन तस्वीरों को देखकर ऐसा लगा कि प्रकृति की ओर से किये गये इतने बडे नरसंहार के बाद शायद अब लोग केदारनाथ नहीं आयेंगे। जान सबसे बडी चीज है...लेकिन ऐसा हुआ नहीं। केदारनाथ में इन दिनों रोजाना 1 हजार के करीब लोग दर्शन करने आ रहे हैं। 700 लोग पैदल 21 किलोमीटर की चढाई करके और 300 के करीब लोग हेलिकॉप्टर से। ज्यादातर लोग भकितभाव से वहां आये थे, कुछ लोग जिज्ञासा के कारण वहां पहुंचे ये देखने के लिये कि किस तरह से तबाही हुई थी, कुछ लोग अपनी ज्योत्रिलिंगों की यात्रा पूरी करने के लिये आये थे, जैसे एक सज्जन ने 11 ज्योत्रिलिंगों के दर्शन करने लिये थे, सिर्फ यहीं के दर्शन बचे थे इसलिये वे डरावनी तस्वीरों को देखने के बावजूद और खतरों को नजरअंदाज करते हुए यहां पहुंचे।
सभी ज्योत्रिलिंगों में केदारनाथ ज्योत्रिलिंग की यात्रा सबस कठिन है। अगर हेलिकॉप्टर से सफर के पैसे नहीं हैं तो 21 किलोमीटर की पैदल चढाई करनी पडती है। चढाई का रास्ता भी सरल नहीं है। कहीं सीधी चढाई है, कहीं बर्फ पर चलना पडता है तो कहीं ऊबड-खाबड पथरीला रास्ता है। केदारनाथ की वादियों में मौसम अचानक ही बदल जाता है। देखते देखते धूप की जगह बारिश और ओले ले लेते हैं। मई-जून जैसे महीनों में भी रात के वक्त तापमान शून्य से नीचे चला जाता है। अक्सर ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। उत्तराखंड में एक कहावत है- मुंबई का फैशन और केदारनाथ का मौसम कभी भी बदल जाता है। इन तमाम दुष्वारियों के बावजूद मैने देखा कि 80 साल तक की बूढी महिलाएं भी पैदल केदारनाथ के दर्शन करने पहुंच रहीं थीं। वैसे अब चढाई से पहले सभी श्रद्धालुओं को सेहत की जांच करवाना जरूरी है। डॉक्टर की ओर से फिटनेस प्रमाणपत्र मिलने के बाद ही केदारनाथ तक जाने की इजाजत मिलती है।

केदारनाथ में कितने मरे ?
केदारनाथ में मरने वालों का आंकडा अब भी एक रहस्य है और सरकार जो आंकडा दे रही है उस पर विवाद है। सरकार के मुताबिक केदारनाथ त्रासदी में पौने 4 हजार लोग मारे गये।आप सोचेंगे कि सरकार इस आंकडे पर कैसे पहुंचीं। दरअसल उस तबाही में जो लोग लापता हुए ऐसे पौने 4 हजार लोगों के रिश्तेदारों को सरकार ने डेथ सर्टिफिकेट जारी किये। सरकारी आंकडे के साथ पेंच ये है कि उस हादसे में कई पूरे के पूरे परिवार बह गये, जिनका कोई नहीं बचा जो सरकार के पास डेथ सर्टिफिकेट के लिये आवेदन करता। कई मामलों में लापता लोगों के रिश्तेदारो ने डेथ सर्टिफिकेट लेने की जरूरत नहीं समझी। जिन लोगों ने हादसे को अपनी आंखों से देखा उनका भी मानना है कि मरने वालों की तादाद सरकारी अनुमान से कहीं ज्यादा हो सकती है।

केदारनाथ की तबाही में लापता लोगों को मृत माना जायेगा, उत्तराखंड सरकार की इस नीति का कई लोगों ने गलत फायदा उठाने की भी कोशिश की। मुआवजे के लालच में कई ऐसे लोगों के रिश्तेदार भी डेथ सर्टिफिकेट मांगने के लिये आये जो कि केदारनाथ की तबाही के महीनों पहले ही लापता हो गये थे।
बहरहाल अब तक उन सभी पौने 4 हजार लोगों के शव भी नहीं मिले हैं जिन्हें सरकार मृत मान रही है। चश्मदीदों के मुताबिक अब भी हजारों शव केदारनाथ से लेकर गौरीकुंड के बीच बडे बडे पत्थरों और मलबे के ढेरों में दबे पडे हैं।

एक साल बाद क्या है हाल ?
अगर ये कहें कि सालभर में उत्तराखंड सरकार ने कुछ नहीं किया तो नाइंसाफी होगी। पिछले साल की तबाही को देखकर लगा था कि फिरसे यहां यात्रा शुरू होने में कई साल लग जायेंगे, लेकिन यात्रा शुरू हो गई है और यहां आने वालों को कोई खास असुविधा भी नहीं हो रही है। नेहरू इंस्टीट्यूट और माउंटेरियंग की मदद से केदारनाथ धाम के पुननिर्माण का काम किया जा रहा है। मंदिर के पीछे से गुजरने वाली मंदाकिनी नदी की धारा को बदला जा रहा है ताकि उसमें फिरसे बाढ आने पर केदारनाथ कस्बे को कोई नुकसान न पहुंचे। एक बडा हेलिपैड बनाया जा रहा है जिसपर एक साथ कई बडे हेलिकॉप्टर उतर सकते हैं। पैदल यात्रा के मार्ग को दुरूस्त किया जा रहा है। सारा काम उत्तराखंड पुलिस के एक डीआईजी जी.एस.मर्तोलिया की देखरेख में हो रहा है।
जो यात्री केदारनाथ पहुंचे रहे हैं उनके तीनों वक्त के खाने और चायपान का मुफ्त इंतजाम गढवाल मंडल की ओर से किया जा रहा है। खाना सादा लेकिन स्वादिष्ट और शुद्ध होता है। खाने के बाद बर्तन आपको खुद साफ करके वापस लौटाने हैं। रात को सोने के लिये टेंट की व्यवस्था है। मुसाफिरों को स्लीपिंग बैग दिये जाते हैं। सुबह नहाने के लिये गर्म पानी भी उपलब्ध रहता है। गौरीकुंड से लेकर केदारनाथ तक करीब 5 कैंप बनाये गये हैं जहां यात्री रूककर आराम कर सकते हैं, खा, पी सकते हैं। रास्तेभर जगह जगह पर पुलिस की मौजूदगी रहती है। हर कैंप में डॉक्टरों की एक टीम भी तैनात रहती है जो बीमार मुसाफिरों की मुफ्त जांच करती है और उन्हें दवा देती है।
चाहे सरकारी कर्मचारी हो या गैर सरकारी स्वयंसेवक, जो भी यहां दिखा, दिल से काम करता दिखा। हर कोई यही कहता कि इस बहाने वो भोलेनाथ की सेवा कर रहा है। इन तमाम लोगों ने बीते सालभर में जो कुछ भी किया है या जो कुछ कर रहे हैं मुझे वो प्रशंसनीय लगा।

मंदिर के इर्द-गिर्द है एक बहुत बडा कब्रिस्तान।
पिछले साल जब सैलाब आया तो केदारनाथ मंदिर के इर्द-गिर्द बनीं तमाम इमारतें धाराशायी हो गईं। सैकडों लोग उनके मलबे में दब गये। सरकारी टीमों ने बाद में ऊपर ऊपर जो भी लाशें नजर आईं उनका तो अंतिम संस्कार कर दिया लेकिन मलबे के भीतर अब भी सैकडों शव दबे पडे हैं। वहां मौजूद पंडों ने मंदिर से महज 200 मीटर के दायरे में मुझे कई ऐसे ठिकाने दिखाये जहां से शवों के सडने की बदबू अब भी आ रही थी और जहां इंसानी हड्डियां पडीं थीं। मैं जिस दिन केदारनाथ से निकला उसी दिन गरूडचट्टी नाम की जगह से बडे पैमाने पर शव बरामद हुए, जिसके बाद सरकार ने फिरसे शवों को खोजने के लिये एक अभियान शुरू कर दिया।

मंदिर को बचाने वाला पत्थर
केदारनाथ में शिवमंदिर के बाद अब दूसरा सबसे बडा आकर्षण उस मंदिर को बचाने वाला एक बडा पत्थर बन गया है जो मंदाकिनी नदी में बाढ आने पर पहाडों से बहकर नीचे आया और ठीक शिवमंदिर के पीछे आकर रूक गया। इसी पत्थर की वजह से बाढ का पानी मंदिर की नींव को नुकसान नहीं पहुंचा सका। लोग इसे एक चमत्कारिक पत्थर मानते हैं और इसके भी दर्शन करते हैं।
मंदिर के इर्द गिर्द साधुओं की भीड लगी रहती है जिनमें से कई गांजे का कश लगा रहे होते हैं। शाम की आरती के वक्त माहौल देखते ही बनता है। मंदिर में घंटे बज रहे होते हैं और उसी वक्त बाहर मौजूद तमाम साधु एक साथ अपने अपने डमरू बजा रहे होते हैं।

सरकार और पंडों में विवाद
मैं जैसे ही केदारनाथ हेलिपैड पर उतरा तो ये जानकर कि मैं पत्रकार हूं तमाम पंडों ने मुझे घेर लिया और बताने लगे कि सरकार उनके साथ नाइंसाफी कर रही है। केदारनाथ के जिन मकानों को बाढ में नुकसान पहुंचा है, सरकार ने उनपर चिन्ह लगा दिये हैं। ज्यादा क्षतिग्रस्त भवन, कम क्षतिग्रस्त भवन और क्षतिग्रस्त भवन, इन 3 श्रेणियों में सभी इमारतों को बांटा गया है। सरकार चरणबद्ध तरीके से खतरनाक हो चुकी इन इमारतों को गिराना चाहती है, लेकिन स्थानीय पंडे इसका विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार के इस कदम से उनके सिर छुपाने का ठिकाना छिन जायेगा।

लुआनी गांव की कहानी
केदारनाथ से लौटते वक्त मैं लुआनी गांव गया। इस गांव मैं पिछले साल भी तबाही के बाद गया था। गांव के 16 मर्द जो कि केदारनाथ में पंडे का काम करते थे, तबाही में लापता हो गये। कई ऐसे परिवार थे जिनमें कोई भी मर्द न बचा। गांव में मैं 11 महीने के सौम्य नाम के एक बच्चे से मिला। हंसते और किलकारियां मारते सौम्य को ये नहीं पता कि उसके पिता दुनिया में उसके आने से पहले ही चल बसे। पिछले साल पिता संदीप बगवाडी के तबाही में मारे जाने के 7 दिनों बाद उसका जन्म हुआ था। संदीप और उनके बडे भाई बाढ में बह गये थे। परिवार में अब दोनो की विधवाएं उनकी बूढी मां, एक 5 साल की बच्ची और लडका सौम्य है। सरकार ने विधवाओं को सवा 5 लाख रूपये का मुआवजा तो दिया है, लेकिन बगवाडी परिवार इस आर्थिक मदद को नाकाफी पाता है। लुआनी गांव को किसी गैर सरकारी संगठन ने गोद भी नहीं लिया है।


बहरहाल, केदारनाथ में जो कुछ भी देखा और जो कुछ भी अनुभव किया उसके बाद यही पंकित बार बार दिमाग में घूम रही है- डर के आगे आस्था है। जर्मन अर्थशास्त्री कार्ल मार्कस की कही एक बात याद आ रही है- Religion is the opium of masses यानी धर्म लोगों का नशा है और नशे के प्रभाव में इंसान को जोखिम, खतरे और दुख की परवाह नहीं होती।

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