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Saturday, 27 December 2014

जब समंदर से मुझे घृणा हो गई थी - संस्मरण।

समंदर से मुझे प्यार है और मेरी अब तक की जिंदगी में ये किसी न किसी तरह से मुझसे जुडा रहा है। मैं अरब सागर के किनारे बसे शहर मुंबई में पैदा हुआ, पला-बढा। समंदर के साथ मेरी पहली याद तब से जुडी है जब बचपन में अक्सर रविवार के दिन मां-बाप मुझे गिरगांव चौपाटी घुमाने ले जाया करते थे। इसी गिरगांव चौपाटी के सामने खडे ऐतिहासिक विल्सन कॉलेज में मैने 5 साल गुजारे। बतौर टीवी पत्रकार पिछले 15 सालों से यहीं समंदर किनारे अनंत चतुर्दशी के दिन सुबह से रात तक गणपति विसर्जन कवर करता आया हूं। साल 2007 तक साप्ताहिक छुट्टी की शामें अक्सर मुंबई के मनोरी बीच पर सूर्यास्त देखते हुए गुजरतीं थीं। मनोरी, तुलनात्मक रूप से मुंबई का सबसे खूबसूरत और साफ सुथरा समुद्र तट है और मैं अब भी अक्सर यहां दोस्तों और सहकर्मियों के साथ आते रहता हूं। समु्द्र के प्रति लगाव ने मुझे इसकी गहराई में झांकने के लिये भी उत्साहित किया। यही वजह रही कि साल 2008 में मैने आस्ट्रेलिया से पंजीकृत डाईविंग स्कूल से पेशेवर स्कूबा डाईविंग (गोताखोरी) का कोर्स किया। समुद्र के भीतर छुपी खूबसूरत, रंगबिरंगी दुनिया ने मुझे इतना प्रभावित किया कि बीते 6 सालों के भीतर मैं विश्व के कई बेहतरीन डाईविंग लोकेशंस पर गोताखोरी कर चुका हूं। आज जिस समंदर से मुझे इतना प्यार है उसी से मुझे अबसे ठीक 10 साल पहले यानी दिसंबर 2004 के बाद कुछ सालों के लिये नफरत हो गई थी, घृणा हो गई थी।


26 दिसंबर 2004 की दोपहर मैं चैन्नै पहुंचा। चैन्नै में सबसे ज्यादा तबाही मशहूर मरीना बीच पर हुई थी। पुलिस वालों ने मरीना बीच की तरफ जाने वाले सारे रास्ते बंद कर दिये थे। खुशकिस्मती से मेरा कैमरामैन वेंकट तमिल जानता था। पुलिसवालों से तमिल में बहस करते करते वो हमें बीच तक पहुंचाने में कामियाब रहा। मरीना बीच किसी शहरी इलाके से सटा भारत का सबसे लंबा बीच है। बंगाल की खाडी पर मौजूद इस बीच के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंचने के लिये 13 किलोमीटर का सफर करना पडता है। दुनियाभर के पर्यटकों की यहां भरमार रहती है। यही मरीना बीच उस दोपहर नर्क में तब्दील हो गया था। सुबह 6.20 मिनट पर आई सुनामी की 7 मीटर ऊंची लहरों ने जो तबाही मचाई थी, उसके निशान हर ओर बिखरे पडे थे। मछुआरों की उलटी पडीं नावें, कबाड में तब्दील हो चुकी कारें, खानपान के स्टॉलों के बिखरे पडे टुकडे, लोगों के ढेरों जूते चप्पल कुदरत के कहर की कहानी कह रहे थे। उस सुबह सुनामी की लहरें यहां 206 लोगों को निगल गईं थीं, जिनमें ज्यादातर जॉगिंग करने वाले लोग, रेत पर क्रिकेट खेल रहे बच्चे, चंद पर्यटक और मछुआरे थे।

शाम होते होते सुनामी की भयावहता की तस्वीर लगभग पूरी तरह से साफ हो चुकी थी। मैं 2 हफ्तों तक तमिलनाडु में रहा और इस दौरान कई दिल पसीजने वाली कहानियां सामने आईँ। भारत में सुनामी की वजह से सबसे ज्यादा नुकसान तमिलनाडु में हुआ था और तमिलनाडु में सबसे ज्यादा मौतें समुद्र तट से सटे नागापट्टनम जिले में हुईं थीं। भारत में सुनामी की वजह से करीब 18000 लोग मारे गये थे। इनमें से 8 हजार लोग तमिलनाडु से थे। इन 8 हजार में से अकेले नागापट्टनम में ही 5 हजार लोगों की मौत हुई। मछुआरों की बस्तियों से दूर दूर तक इंसानी शवों के सडने की बदबू आ रही थी। उनकी गलियों में इतनी लाशें पडीं थीं कि पैर रखने के लिये जगह ढूढनी पडती और ध्यान देना पडता था कि किसी शव पर पैर न पड जाये। जिस समुद्र से मछुआरों का पेट भरता था, जिसकी वो पूजा करते थे, वही आज उनके लिये राक्षस बन गया था। उनसे सबकुछ छीन लिया था। कहीं पूरा का पूरा परिवार बह गया तो कहीं किसी का पति, किसी का बच्चा, किसी के बुजुर्ग मां-बाप को सुनामी की लहरें अपने साथ ले गईं। हजारों लोगों की लाशें भी बरामद नहीं हुईं। भारतभर में अब भी करीब साढे 5 हजार लोग सुनामी के बाद से लापता हैं।

चैन्नै से 70 किलोमीटर दूर कलपक्कम परमाणु केंद्र है। केंद्र के पास ही उसमें काम करने वाले अधिकारियों की कॉलनी है। सुनामी ने इस कॉलनी को पूरी तरह से तबाह कर दिया था। यहां मैं अभिजीत नाम के एक शख्स से मिला, जिसकी आँखों के सामने सुनामी की लहरें उसके पिता को बहा ले गईं। अभिजीत ये मानने को तौयार नहीं था कि उसके पिता की सुनामी में मौत हो गई होगी। उसने पिता की तस्वीर के साथ सैकडों पोस्टर छपवाये और दिनरात कलपक्कम के इर्द गिर्द के इलाको में उन्हें चिपकाने लगा जिसमें लोगों से अपील की गई थी कि अगर कोई उसके पिता को देखे तो उससे संपर्क करे। इस बीच ये अफवाह उड गई कि सुनामी से कलपक्कम परमाणु केंद्र को भी नुकसान पहुंचा है और रेडिएशन फैलने की आशंका पैदा हो गई है। इसने आसपास के इलाके के लोगों को खौफजदा कर दिया। इसके बाद परमाणु केंद्र के ओर से मीडिया को बुलाया गया। हमें परमाणु केंद्र के अंदर ले जाया गया और वो जगह दिखाई गई जहां सुनामी की लहरों ने नुकसान पहुंचाया था। वैज्ञानिकों ने हमें ये समझाने की कोशिश की कि सुनामी से नुकसान सिर्फ परमाणु केंद्र की समुद्र की ओर वाली दीवार के कुछ हिस्से को ही हुआ था। वहां रेडिएशन फैलने का कोई खतरा नहीं था।

इसी तरह चैन्नै से कलपक्कम के रास्ते में एक मगरमच्छ फार्म बनाया गया है, जहां दुनिया भर की कई प्रजातियों के बडे बडे मगरमच्छ और घडियाल रखे गये हैं। अफवाह उडी की सुनामी की वजह से यहां के सारे मगरमच्छ भाग गये हैं और वे आसपास की बस्तियों में हमला कर सकते हैं। फार्म के प्रबंधन ने हमें बुलाकर बताया कि ये बात सही थी कि सुनामी का पानी आ जाने की वजह से मगरमच्छ अपने अपने तालाबों से निकल भागे थे, लेकिन जल्द ही फार्म के कर्मचारियों ने उन्हें पकड पकड कर फिरसे कैद कर लिया और अब मगरमच्छों से लोगों को कोई खतरा नहीं था। भारतीय पुरातत्व में रूचि रखने वालों के पसंदीदा प्राचीन शहर महाबलीपुरम में भी सुनामी ने काफी कहर बरपाया था। कई लोग यहां भी समुद्र में समा गये, जिनमें से कई पर्यटक थे। उस दौरान यहां एक दिलचस्प खबर ये आई कि सुनामी की वजह से यहां कुछ प्राचीन मूर्तियां बाहर निकल आईं जो कि तब तक समुद्र की रेत की नीचे दबीं हुईं थीं।


हालांकि मैने मार्च 2011 में जापान में आई सुनामी भी कवर की है, लेकिन दिसंबर 2004 में हिंद महासागर में आई सुनामी उससे हर मायने में काफी बडी थी। 2004 की सुनामी को अब भी दुनिया के अब तक दर्ज इतिहास में सबसे बडी कुदरती आपदा माना जाता है। इंडोनेशिया के करीब समुद्र के भीतर आये भूंकप से पैदा हुई सुनामी लहरों ने 14 देशों के करीब 2 लाख 30 हजार लोगों की जान ले ली। कहीं इन लहरों की ऊंचाई 6 मीटर थी तो कहीं 30 मीटर तक। सुनामी ने बता दिया था कि कुदरत जब चाहे तब इंसानी दिमाग और ताकत को चंद पलों में ही नेस्तानाबूद कर सकती है। सुनामी के बाद समुद्र से मेरी घृणा क्षणिक थी, क्योंकि उस नरसंहार के लिये पूर्णत: कुदरत को दोष देना भी गलत है। इंसानों की लालच और अंधी सोच भी इसके लिये बडी हद तक जिम्मेदार है। समुद्र की सीमाओं को हम पाट पाटकर छोटा कर रहे हैं। वहां ऊंची ऊंची इमारते बना रहे हैं। ऐसे में यही सवाल उठता है कि समुद्र हमारे घर में घुस रहा है या हम उसके घर में ?

1 comment:

राजेश कुमार said...

बहुत बढिया है आपका समुद्री सफर। मरीना बीच सही में बहुत शानदार। वहां मैं भी घुडसवारी की और सैर का आनंद लिया। इस सफर यात्रा के साथ आपने जो सवाल उठाया है वह बहुत ही महत्वपूर्ण है। समुद्र हमारे घर में घुस रहा है या हम उसके घर में ? सभी लोगों को इस बारे में सोचना होगा। प्रकृति की देन है ये समुद्र। इसके बिना जीवन की कल्पना करना कठिन है। बहुत बढिया है।