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Thursday, 3 September 2015

ऑपरेशन कॉम्प्लैक्स: लावारिस लाश मिलने पर इस हद तक जाती है ब्रिटेन की पुलिस!

लैंकशायर पुलिस के अधिकारी ग्राहम कोट्स और अल यूसुफ मुंबई पुलिस के अधिकारी के साथ।

शीना बोरा की हत्या 2012 में हुई और 3 साल बाद ही उसकी हत्या का पता लग पाया। ऐसा क्यों हुआ इसके पीछे एक कारण ये भी है कि रायगढ पुलिस ने उसी साल अपने इलाके में मिली एक लावारिस लाश की तहकीकात नहीं की। न तो पुलिस ने बैग में बंद जली हुई लाश मिलने पर हत्या का मुकदमा दर्ज किया और न ही उसके अंगों के सैंपल जांच के लिये जे.जे.अस्पताल भेजने के बाद उसकी रिपोर्ट हासिल करने की सुध रखी। रायगढ पुलिस की ये लापरवाही एक मिसाल है कि हमारे देश में पुलिस लावारिस लाशों के मिलने पर उनकी जांच में कितनी दिलचस्पी लेती है। इस मामले ने मुझे याद दिला दी ब्रिटेन की पुलिस के ऑपरेशन कॉम्प्लैक्स की। उस ऑपरेशन से ये पता चलता चलता है कि ब्रिटेन की पुलिस किसी लावारिस शव के मिलने पर उसकी तहकीकात के लिये किस हद तक जा सकती है, फिर चाहे उसके लिये कितना भी पैसा, कितने भी लोग और कितना भी वक्त क्यों न लगाना पडे।

26 जुलाई 2002 को ब्रिटेन के लैंकशायर नाम के कस्बे से सटे ग्रामीण इलाके में एक महिला अपने कुत्ते को टहला रही थी। अचानक कुत्ता सडक के किनारे झाडियों में पडी हड्डियों के कुछ टुकडों को खींचने लगा। उस महिला ने जब करीब जाकर देखा तो उसके होश उड गये। वहां एक पूरा नरकंकाल पडा था।खबर मिलने के बाद लैंकशायर पुलिस ने मामले की जांच शुरू की। शव की शिनाख्त हो सके, ऐसी कोई निशानी शव के पास से नहीं मिली। शव को ग्लासगो यूनिवर्सिटी के ह्यूमन आईडेंटीफिकेशन यूनिट के पास फोरेंसिक जांच के लिये भेजा गया। जांच रिपोर्ट से पता चला कि ये कंकाल एशियाई मूल के किसी आदमी का है, जिसकी उम्र 40 साल के करीब है, जिसका कद 5 फुट 6 इंच लंबा है। जांच में ये भी पता चला कि उसके सिर पर भारी चीज से हमला करके उसे मारा गया था। पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज किया और अनुमान लगाया कि ये किसी गैरकानूनी अप्रवासी का शव हो सकता है।

सबसे पहले लैंकशायर पुलिस ने पूरे ब्रिटेन में मारे गये शख्स की पहचान तलाशने की कोशिश की। पुलिस की टीमें अलग अलग शहरों में गईं और वहां एशियाई लोगों की बस्तियों में जाकर पूछताछ की क्या उनके बीच का कोई गुमशुदा है। ये सिलसिला करीब 9 महीने तक चला, लेकिन वहां लैंकशायर पुलिस को कोई कामियाबी नहीं मिली। इसके बाद पुलिस ने तय किया कि वो उन एशियाई देशों में भी टीमें भेजेगी जहां से मारे गये शख्स के आने की संभावना थी। एक लावारिस लाश की पहचान का पता लगाना और फिर उसके कातिल को पकडना एक बेहद पेचीदा काम था और इसी के मद्देनजर पुलिस ने अपने इस मिशन को नाम दिया ऑपरेशन कॉम्प्लैक्स। इस ऑपरेशन के तहत 2 अधिकारियों की टीम जिनके नाम ग्राहम कोट्स और अलताफ युसुफ थे भारत आये।

सितंबर 2003 में भारत आकर उन्होने मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर डॉ.सत्यपाल सिंह जो तब क्राईम ब्रांच के ज्वाइंट कमिश्नर थे से मुलाकात की। दोनो अधिकारियों की टीम अपने साथ मारे गये शख्स का क्ले मॉडल और कंप्यूटर स्केच भी लाई थी। उन अधिकारियों की गुजारिश पर सत्यपाल सिंह ने एक प्रेस कंफ्रेंस रखी, जिसमें दोनो ब्रिटिश अधिकारियों ने भारत की जनता से अपील की कि अगर किसी को मृत शख्स के बारे में जानकारी हो तो वे उनसे संपर्क करें। एक लावरिश लाश की जांच के लिये ब्रिटेन की पुलिस इतना सिर खपायेगी, ये जानकर मुंबई के पुलिस के अधिकारी भी हैरान थे और कुछ के चेहरों पर दोनो ब्रिटिश अधिकारियों का मजाक उडाने वाली मुस्कराहट भी थी। मुंबई के अलावा गुजरात और पंजाब की पुलिस से भी इन अधिकारियों ने इसी तरह की मदद मांगी। पंजाब में उन्होने क्रिकेटर विरेंद्र सहवाग के जरिये मदद की अपील करवाई जो कि उस वक्त इंग्लैंड में काउंटी क्रिकेट खेलते थे।

लैंकशायर पुलिस के इन अधिकारियों से मेरी अच्छी दोस्ती हो गई थी और वे स्टार न्यूज पर ऑपरेशन कॉम्प्लैक्स को दिये गये कवरेज से प्रभावित थे। साल 2005 में अल यूसुफ नाम का अधिकारी फिर एक बार वापस भारत आया और इस बार उसने सिर्फ मुझसे मुलाकात की। यूसुफ ने कहा कि ब्रिटेन में भारतीय मूल के लोगों में स्टार न्यूज काफी लोकप्रिय है और अगर मैं फिर एक बार अपने साप्ताहिक क्राईम शो रेड अलर्ट में ऑपरेशन कॉम्प्लैक्स के बारे में जानकारी दूं तो उन्हें मदद मिल सकती है क्योंकि मारे गये शख्स की अब तक पहचान नहीं हो सकी है। ब्रिटेन के एक छोटे से कस्बे की पुलिस एक लावारिस लाश की तहकीकात के लिये इतनी मेहनत कर रही है, ये बात हमारे लिये चौंकाने वाली भी थी और दिलचस्प भी।मैने रेड अलर्ट में पूरे ऑपेरशन की जानकारी दी और लावारिस शव का पूरा ब्यौरा दिया। हमारी ओर से मिले सहयोग से खुश होकर लैंकशायर पुलिस ने मुझे एक पत्र भी भेजा।
 
लैंकशायर पुलिस की ओर से जीतेंद्र दीक्षित को भेजा गया पत्र।

ऑपरेशन कॉम्प्लैक्स को शुरू हुए 12 साल बीत चुके हैं। मेरी हाल ही में अधिकारी अल यूसुफ से बात हुई तो उसने बताया कि ऑपरेशन कॉम्प्लैक्स अब भी जारी है। लाश की पहचान अब तक नहीं हुई है। कई मामलों में भारतीय पुलिस और ब्रिटेन की पुलिस में तुलना करना गलत होगा क्योंकि वहां कि पुलिस फोर्स को कई ऐसी सुविधाएं मिली हुईं हैं, जिनसे कि हमारी पुलिस वंचित है, लेकिन कोई लावारिस लाश मिलने पर उसकी जांच कैसे की जाये, ये सीख तो उनसे ली ही जा सकी है। लैंकशायर पुलिस का ऑपेरेशन कॉम्प्लैकस प्रशंसनीय भी है और प्रेरणादायी भी।  

1 comment:

prakash Hindustani said...

ब्रिटेन की पुलिस की सक्रियता वाकई गंभीर है।