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Thursday, 21 May 2009

डायरी 26 नवंबर 2008 (भाग-1)

(26 मई को मुंबई पर हुए आतंकी हमले के 6 महीने पूरे हो रहे हैं। उसीपर आज से 8 भागों में ये लेख)
26 नवंबर की काली रात

26 नवंबर की रात करीब 9.30 बजे होंगे। मैने मोहम्मदअली रोड से सीएसटी रेल स्टेशन के सामने प्रेस क्लब में अपने एक सूत्र से मुलाकात करने के लिये टैक्सी पकडी। टैक्सी कुछ ही मीटर आगे बढी होगी कि तभी एक खबरी का फोन आया – कोलाबा के लिओपोल्ड कैफे में फायरिंग चल रही है। लगता है कि किन्ही ग्रुप्स में झगडा हुआ है, जिसके बाद 2 लोग सब पर फायरिंग कर रहे हैं। अब तक 100 राउंड फायर हो चुके हैं

50 राउंड फायर की बात सुनकर मेरा माथा ठनका। आमतौर पर मुंबई में गैंगवार के चलते हुए शूटआउट्स में भी इतनी गोलियां नहीं चलीं। मामला गैंगवार का नहीं लगता।मैने तुरंत दफ्तर में फोन करके ओबी वैन और एक रिपोर्टर को लिओपोल्ड कैफे की ओर रवाना करने को कहा और टैक्सीवाले को भी वहीं चलने का निर्देश दिया।

खबर को कन्फर्म करने के लिये मैं स्थानीय डीसीपी विश्वास नागरे पाटिल को फोन लगाने लगा, लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो पा रहा था। टैक्सी जब क्रॉफर्ड मार्केट के पास एमआरए मार्ग पुलिस थाने के पास पहुंची तो मैने देखा कि कई हथियारबंद पुलिसकर्मी दौडते हुए की एक वैन में बैठ रहे हैं। मुझे लगा कि शायद इन्हें भी कोलाबा की फायरिंग वाले मामले के लिये भेजा जा रहा है।

एमआरए मार्ग से कुछ मीटर आगे ही सीएसटी रेल स्टेशन था...मुझे वहां से पटाखों की आवाज सुनाई देने लगी। जैसे जैसे टैक्सी आगे बढी ये आवाज भी तेज होने लगी। जैसे ही मैं सीएसटी के मुख्य दरवाजे के पास से गुजरा तो वहां का मंजर देख कर दंग रह गया। सैकडों लोग बेतहाशा भाग रहे थे। कुछ सडक किनारे लेटे हुए थे। चीख पुकार मची थी। समझ में आ गया कि पटाखों की आवाज दरअसल फायरिंग की आवाज थी। उसी वक्त एक दोस्त ने फोन करके बताया कि नरीमन पॉइंट पर होटल ओबरॉय में भी फायरिंग हो रही है। मेरा शक पुख्ता हो गया था। मुंबई शहर पर आतंकियों ने हमला किया है और आतंकी भीडभाड वाले और शहर के अहम ठिकानों को अपना निशाना बना रहे हैं।

रीगल सिनेमा से लिओपोल्ड कैफे की तरफ जानेवाली सडक पूरी तरह जाम थी। इसलिये मैने टैक्सी रीगल सिनेमा के पास ही छोड दी और लिओपोल्ड कैफे की ओर पैदल दौड पडा। लिओपोल्ड के बाहर हाहाकार मचा हुआ था। कैफे के बाहर काफी भीड जमा थी। सडक पर खून ही खून था। लोगों के चप्पल जूते पडे हुए थे। कुछ लोग रो रहे थे तो कुछ सरकार और पुलिस को गालियां दे रहे थे। कुछ लोग लाशें और घायलों को निकाल रहे थे। कैफे के अंदर का मंजर और भी भयानक था। फर्श पर खून से सने खाली कारतूस पडे हुए थे। टेबल-कुर्सीयां, शराब और कोल्ड ड्रिक की बोतले और प्लेटें यहां-वहां बिखरी पडीं थीं। दीवारों पर गोलियों के निशान थे। इस लिओपोल्ड कैफे में एक बार पहले भी अपने कुछ दोस्तों के साथ आ चुका था। बडी रौनक हुआ करती थी यहां, लेकिन उस वक्त का मंजर देखकर यकीन नहीं हुआ कि ये वही लिओपोल्ड कैफे है।

इस दौरान मेरा रिपोर्टर सचिन भिडे और कैमरामैन वहां पहुंच चुके थे।पहले मैने वहां मौजूद कुछ चश्मदीदों से बात की और पूछा कि क्या वो आंखों देखी हमारे कैमरे पर बता सकेंगे।उनकी मंजूरी के बाद हमने उनकी बाईट्स ली और साथ ही एक वाक थ्रू के जरिये वहां का हाल बयां किया। चश्मदीदों ने बताया कि हमला करनेवाले 2 लोग थे, जिनकी उम्र 22-23 साल के करीब होगी। उनके पास बैग थे और दोनों ही एके-47 जैसे दिखनेवाले हथियारों से फायरिंग कर रहे थे। वो खासकर गोरे पर्यटकों को अपना निशाना बना रहे थे। फायरिंग करने के बाद दोनो शूटर ताज होटल की ओर भागे।

ताज होटल की ओर भागे हैं...मतलब की वहां भी दोनो इसी तरह का कत्लेआम कर रहे होंगे। मैं भी अपने कैमरामैन के साथ ताज की तरफ दौडा जो कि लिओपोल्ड कैफे के पिछवाडे की गली में ही है। ओबी वैन को भी मैनै ताज की ओर ही लगाने को कहा क्योंकि अब तक जो कुछ भी शूट किया गया था उसे नोएडा अपलिंक भी करना था। पुराने ताज के अपोलो बंदर की तरफ वाले कोने पर मुझे अपनी ओबी वैन खडी मिली। मैने तुरंत ओबी वैन पर अपना टेप दिया और कैमरामैन के साथ ताज टॉवर के मेन गेट की तरफ भागा मेन गेट के बाहर सन्नाटा था..न तो वहां हमेशा मौजूद रहने वाले सिख दरबान थे और नही किसी तरह की चहल पहल थी। मुझे आशंका थी कि अगर आतंकवादी यहां पहुंचे होते तो यहां भी लिओपोल्ड कैफे या सीएसटी की तरह कोहराम मचा होता, लोग भाग दौड रहे होते..लेकिन यहां तो बिलकुल शांति थी। मेन गेट के बाहर कुछ दूरी पर एक पुलिस वैन जरूर खडी थी, जिसमें से लगातार वायरलैस की बातचीत सुनाई दे रही थी। यहां आतंकी हमला हुआ है या नहीं इसी उधुडबुन में मैने ताज टॉवर के मेनगेट का कांच का दरवाजा खोला और दरवाजा खोलते ही मेरे होश उड गये। होटल का रिसेप्शन एरिया खून से सना था। हर ओर लाशें ही लाशें पडीं थीं। पुराने ताज को नये ताज से जोडने वाले गलियारे में भी 2 लाशें पडीं थीं। नीचे मारे जानेवालों में 3 लोग होटल के कर्मचारी ही थे। जिन्होने सफेद रंग की यूनीफॉर्म पहन रखी थी। इसके अलावा कुछ विदेशी मेहमानों के शव पडे थे। साफ हो गया कि ये उन्ही आतंकियों की करतूत है मैने तुरंत अपने कैमरामैन को कहा रोल करना शुरू करो...पर कैमरामैन ने कहा कि अब उसके पास टेप नहीं है। जल्दबाजी में वो दफ्तर से एक ही टेप लेकर निकला था, जिसे हम लिओपोल्ड कैफे की वारदात को शूट करने के बाद ताज के दूसरे कोने पर खडी ओबी वैन पर छोड आये थे...मैने कैमरा मैन और सचिन भिडे को कहा कि वे दोनो मेन गेट के बाहर ही रूकें मैं टेप लेकर आता हूं। इसी बीच मुझे कई फोन आये जिसमें चश्मदीदों के अलावा परिचित पुलिस वालों के भी फोन थे। उनसे मुझे पता चला कि सीएसटी के आसपास और होटल ओबरॉय की ओर भी फायरिंग हो रही है।

ओबी से टेप लेकर मैं ताज की पुरानी बिल्डिंग के किनारे किनारे दौडकर वापस लौट ही रहा था कि अचानक मेरे पीछे एक जोरदार धमाके की आवाज आई। आतंकियों ने इमारत की ऊपरी मंजिल से मेरी ओर हथगोला फैंका था। मैंने थोडी और तेज रफ्तार से आगे भागा..लेकिन 5 से 6 सेकंड के भीतर उन्होने फिर एक हथगोला फैंका इसी के साथ 3 राउंड फायर की आवाज भी सुनाई दी। हालांकि हथगोले के छर्रे मुझे नहीं लगे, लेकिन उनके विस्फोट से पैदा होनेवाली गर्मी मेरी पीठ ने महसूस की। मेरी लिये ये उस रात का सबसे डरावना वाकया था। मैं शायद आतंकियों का निशाना बनने से बाल बाल बचा था। खैर तभी मुझे नोएडा स्टूडियो से फोन आया और पूरी मुंबई में हो रही फायरिंग की वारदातों पर फोनों देने को कहा गया। काम के दबाव के आगे डर, दुख और गुस्से जैसे भाव अपने आप ही दब गये। दिमाग में बस एक ही बात थी कि शहर में एक बडी घटना हुई है और एक कडे व्यवसायी कि तरह इसके कवरेज में पूरी जान लगा देनी है और सबसे बेहतर कवरेज करना है। मुंबई का ब्यूरो चीफ होने के नाते मेरे ऊपर दोहरी, जिम्मेदारी थी। मुझे न केवल ताज में हुए आंतकी हमले की रिपोर्टिंग करनी थी, बल्कि साथ साथ अपने सारे रिपोर्टरों को भी कॉर्डिनेट करना था। सभी रिपोर्टरों को तुरंत वापस ड्यूटी पर आने के लिये कहा गया..वैसे ज्यादातर रिपोर्टर जो कि दफ्तर से घर के रास्ते में थे, हमले की खबर सुनते ही खुद ब खुद वापस दफ्तर की ओर लौट पडे।

1 comment:

aditya gupta said...

are saab ye kitab milegee kahan.