Monday, 6 March 2017

न्यूज चैनलों की बदलती भाषा और विषय चयन !


(हाल ही में मुंबई के मशहूर के.सी.कॉलेज की ओर से आयोजित किये गये एक परिसंवाद में मीडिया के बदलते स्वरूप पर बोलने का मौका मिला। पेश है परिसंवाद में व्यक्त किये गये विचार-

मीडिया की भाषा और विषय चयन पर बोलने से पहले मैं एक मूलभूत बात स्पष्ट करना चाहूंगा कि भारत में जब दूरदर्शन और आकाशवाणी का एकाधिकार था तब देश के नागरिकों को संबोधित किया जाता था, उनके मद्देनजर सामग्री तय की जाती थी। नागरिक इस शब्द पर गौर कीजिये। नागरिक की जगह आज उपभोक्ता ने ले ली है। निजी न्यूज चैनलों की सामग्री बाजार के नियमों पर आधारित होती है। क्या दिखाना है, कितना दिखाना है, कैसे दिखाना है ये सबकुछ एक बाजार को ध्यान में रखकर तय किया जाता है। पत्रकारिता को बाजारीय समीकरणों से प्रभावित होना चाहिये या नही, ये बहस का अलग विषय है...लेकिन वस्तुस्थिति यही है कि चाहे समाचार चैनल हों, खेल के चैनल हों या मनोरंजन चैनल हों सभी पर बाजार का प्रभाव है।

अब पहले बात करते हैं चैनलों के विषय चयन की। जैसा कि मैने अभी कहा कि कौनसे विषय़ पर सामग्री दिखानी है ये बाजार तय करता है तो आप पूछेंगे कि टेलिविजन चैनलों का बाजार क्या है। 1990 के दशक के मध्य में जब निजी चैनलों का दौर शुरू हुआ तब केबल टीवी की पहुंच सिर्फ शहरी इलाकों तक थी। इसलिये तमाम न्यूज चैनलों का बाजार था शहरी इलाकों के , मध्यम वर्गीच परिवारों के युवा दर्शक जिनकी उम्र 18 साल से लेकर 35-40 साल के बीच हो। जो लोग इस बाजार का हिस्सा थे वे क्या देखना पसंद करते हैं, उनकी क्या सोच है, उनके क्या सपने हैं, उनका रहनसहन कैसा है, उनकी क्या चिंताएं हैं इसपर न्यूज चैनल अपनी सामग्री तय करते थे। बीते 2 सालों में हिंदी समाचार चैनलों के बाजार में विस्तार हुआ है। केबल टीवी और डीटीएच की पहुंच अब भारत के गांव गांव तक हो गई है। इस वजह से अब ग्रामीण इलाकों को भी समाचार चैनलों के बाजार में शामिल कर लिया गया है। आपने देखा होगा कि हिदी न्यूज चैनल आज तक ने एक कार्यक्रम शुरू किया गांव आज तक। ये इसी बदले हुए बाजार का असर है। ग्रामीण इलाके को बाजार में शामिल किये जाने से पहले समाचार चैनलों पर किसानों की चर्चा अक्सर तब ही होती थी, जब किसानों की आत्महत्या पर राजनेता बयानबाजी करते थे या फिर जब सब्जी और अनाज के दाम बढ जाते थे...लेकिन अब ग्रामीण इलाके का कवरेज धीरे धीरे व्यापक हो रहा है, बढ रहा है।

90 के दशक के मध्य से लेकर अब तक न्यूज चैनलों का विषय चयन भी बडा दिलचस्प रहा है। 90 के दशक में जब निजी न्यूज चैनलों का दौर शुरू हुआ तब देश में काफी राजनीतिक उठापटक चल रही थी। खूब नाटकीयता थी, खूब कहानियां निकलतीं थीं। 13 दिन और तेरह महीने में सरकारें गिरतीं थीं। चंद्रास्वामी, टीएन सेशन, अटलबिहारीवाजपेयी, एल.के अडवानी, प्रमोद महाजन जैसे नाम टीवी पर छाये रहते थे। केंद्र और कई राज्यों में बार बार मध्यावधि चुनाव होते थे। इस वजह से समाचार चैनलों का पूरा फोकस राजनीतिक खबरों पर रहता था। ये दौर इस दशक की शुरूवात तक चला...लेकिन इन 6-7 सालों में इतनी राजनीतिक कवरेज हो गई कि लोग उनसे ऊबने लगे। राजनीति से अलग अब कुछ और दिखाने की जरूरत होने लगी।

साल 2001 से राजनीति की जगह अपराध लेने लग गया...हालांकि आम धारणा ये बन गई कि दोनो के बीच अब ज्यादा फर्क नहीं रह गया। समाचार चैनलों पर अपराध से जुडी खबरों के हावी होने के पीछे 2 कारण थे। पहला कि संगठित अपराध उस वक्त अपने चरम पर थे। मुंबई में गैंगवार हो रहा था। दाऊद इब्राहिम, छोटा राजन, अरूण गवली, अश्विन नाईक, अबू सलेम के गिरोह न केवल एक दूसरे के शूटरों को मार रहे थे, बल्कि मुंबई के बडे फिल्मकारों और कारोबारियों भी अपना निशाना बना रहे थे। छोटा राजन के लोग मुंबई बमकांड के आरोपियों की हत्या कर रहे थे, तो वहीं छोटा शकील के लोग मुंबई दंगों के आरोपी शिवसैनिकों पर गोलियां बरसा रहे थे। शायद ही कोई ऐसा दिन होता था जब मुंबई में गोली नहीं चलती थी। उसी दौरान छोटा शकील की फिल्म फाईनेंस करने के आरोप में भारत के सबसे बडे हीरा कारोबारी भरत शाह की गिरफ्तारी हुई, जिसने बॉलीवुड और अंडरवर्लड के रिश्तों पर सामग्री तैयार करने के लिये न्यूज चैनलों को खूब मौका दिया। उसी दौरान महाराष्ट्र का बहुचर्चित तेलगी घोटाला भी सामने आया जिसमें कई बडे पुलिस अधिकारी जेल गये। हालांकि, ये आपराधिक गतिविधियां मुंबई से जुडी थीं लेकिन इन्हे राष्ट्रीय समाचार चैनलों में खूब जगह मिलती थी।

गिरोहों की ओर से किये जा रहे संगठित अपराध के अलावा आतंकी हमलों का सिलसिला भी शुरू हो गया। संसद पर हमला, अक्षरधाम पर हमला, कोलकाता के अमेरिकन सेंटर पर हमला, मुंबई के घाटकोपर इलाके में एक बस में बम विस्फोट, गेटवे औफ इंडिया और मुंबादेवी मंदिर के बाहर हुए बम धमाके उस दौरान राष्ट्रीय न्यूज चैनलों में छाये रहे।

आतंकवाद और अंडरवर्लड की खबरों में ड्रामा था, बदला था, साजिश थी, सस्पेंस था, एक्शन था। उनमें हीरो भी थे और विलेन भी जिनकी समाचार चैनलों को हमेशा कहानियां सुनाने के लिये तलाश रहती है। यही वजह थी कि समाचार चैनलों ने उन्हें खूब जगह दी और ये खबरें देखीं भी भरपूर गईं। कई समाचार चैनलों ने अपराध के लिये विशेष शो शुरू किये जैसे स्टार न्यूज ने रेड अलर्ट, सनसनी और शूटआउट जैसे कार्यक्रम शुरू किये तो वहीं आज तक ने जुर्म और वारदात जैसे कार्यक्रम शुरू किये। इंडिया टीवी ने एसीपी अर्जुन नाम का क्राईम शो शुरू किया।

करीब 5-6 साल तक हिंदी समाचार चैनलों पर अपराध की खबरों का दौर चला। आज भी हिंदी चैनलों पर क्राईम शो चलते हैं और अपराध की खबरों को प्रमुखता मिलती है, लेकिन वैसी नहीं जैसी उस दौर में मिलती थी। उसके बाद आया वो दौर जिसे मैं हिंदी न्यूज चैनलों का सबसे घृणित दौर मानता हूं। ये वो दौर था जब हिंदी न्यूज चैनलों की विश्वसनीयता, उनकी परिपक्वता और यहां तक कि उनकी आवश्यकता पर भी सवाल उठने लगे।

साल 2005-06 के आसपास गंभीर खबरें हिंदी न्यूज चैनलों से गायब होने लगीं। उनकी जगह ले ली अग्रेजी की टैबलॉयड स्टाईल की पत्रकारिता ने। अंधविश्वास, भूत-प्रेत, नाग-नागिन, उडनतश्तरी, सैक्स रैकेट, फैशन शो, फिल्मी गपशप जैसी खबरें पूरी तरह से हिंदी चैनलों पर हावी हो गईं। आपको याद होगा कि एक दिन किसी गांव के एक आदमी ने खुद के बारे में भविष्यवाणी कर दी थी कि आज शाम को मैं मरने वाला हूं और उसके बाद तमाम समाचार चैनलों ने उस गांव में सुबह से ही डेरा जमा लिया। चैनल पर सिर्फ उसी व्यकित से जुडी खबरें चल रहीं थीं और उसके भजन-कीर्तन करते हुए तस्वीरें बार बार दिखाई जा रहीं थीं। मुझे याद है उस दिन चैनल पर दूसरी कोई खबर नहीं चली। शाम को जब खुद के बताये वक्त पर वो आदमी नहीं मरा तो चैनलों ने बताना शुरू किया – ढोंगी की पोल खुली। समाचार चैनलों पर इस तरह की सामग्री का विरोध भी शुरू हो गया। कहा जाना लगा कि टीवी पत्रकारिता के नाम पर ये पत्रकारिता के साथ मजाक है। कईयों ने कहा कि समाचार चैनलों को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से दिये जाने वाले लाईसेंस रद्द करके उन्हें मनोरंजन की श्रेणी वाले लाईसेंस दिये जाने चाहिये। मुझे याद है कि जेवियर्स कॉलेज में राजनीतिशास्त्र पढाने वाली प्रतिभा नेथानी एक समाचार चैनल के दफ्तर उसकी ओर से दिखाई जाने वाली सामग्री का विरोध करने के लिये मोर्चा लेकर पहुंच गईं और अदालत में जनहित याचिका दायर करने की भी तैयारी कर रहीं थीं।

खैर इससे पहले कि हिंदी समाचार चैनलों के खिलाफ कोई जनांदोलन शुरू हो पाता, न्यूज चैनलों ने अपना फोकस बदलना शुरू कर दिया। टैबलाईड स्टाईल पत्रकारिता से फिर एक बार उनका रूख गंभीर खबरों की तरफ हुआ। इस बार विषय थे भ्रष्टाचार और सिस्टम की खामियां। मुंबई में 26 नवंबर 2008 का आतंकी हमला, दिल्ली में लोकपाल के लिये अन्ना हजारे का अनशन, निर्भयाकांड, टूजी घोटाला, कोयला घोटाला इत्यादि ने समाचार चैनलों का कवरेज भ्रष्टाचार और प्रशासनिक व्यवस्था से जुडी खबरों की तरफ मोडा। मीडिया के इस बदले हुए रूख का तत्कालीन विपक्षी पार्टियों ने केंद्र और दिल्ली की राजनीति में भरपूर फायदा उठाया।

अब बात करते हैं कि इस वक्त समाचार चैनल किस तरह के विषयों पर फोकस करते हैं। ये सोशल मीडिया का दौर है। सोशल मीडिया एक तरह से समाचार चैनलों के लिये चुनौती बनकर उभरा है। 24 घंटे के न्यूज चैनलों की एक उपयोगिता ये भी मानी जाती है कि कोई भी बडी खबर वो हमें तुरंत बता देते हैं, जिसे चैनल ब्रेकिंग न्यूज के तौर पर पेश करते हैं...पर अब ये काम सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर होने लगा है। कई बडी खबरें ट्वीटर और फेसबुक के मार्फत ब्रेक हुईं हैं। इसके अलावा चैनल पर कौनसी सामग्री दिखाई जानी है इसका एक पैमाना अब ये भी हो गया है कि ट्वीटर पर कौनसा विषय ट्रेंड कर रहा है। एक बात ये भी गौर करने वाली है कि टीवी स्क्रीन और मोबाइल स्क्रीन एक दूसरे के पूरक की भी भूमिका निभा रहे हैं। दर्शक टीवी पर कोई खबर देखता है, फिर ट्वीटर या फेसबुक पर अपने विचार व्यक्त करता है। उसी तरह न्यूज चैनल ये देखते हैं कि ट्वीटर और फेसबुक पर लोग किस विषय में ज्यादा रूचि ले रहे हैं। इसी बात के मद्देनजर कई न्यूज चैनल अपनी खबरों का हैशटैग तैयार करके दर्शकों को उन्हें ट्वीट करने के लिये कहते हैं और फिर कई दर्शकों के विचार टीवी स्क्रीन पर भी दिखाये जाते हैं।

टीवी एक तस्वीरों और ध्वनि का यानी कि ऑडियो विजुअल माध्यम है। अगर कोई रोचक सीसीटीवी फुटेज आता है या मोबाईल कैमरे से शूट की हुई कोई तस्वीरें आतीं हैं तो उन्हें भी समाचार चैनलों पर जगह मिलती। जबसे मोबाईल फोन में कैमरे आने लगें हैं और सीसीटीवी कैमरों का इस्तेमाल बढा है तबसे इनके आधार पर खबरें भी चैनलों पर खूब दिखाईं जा रहीं हैं।

समाचार चैनल के विषय चयन पर और भी काफी कुछ कहा जा सकता है लेकिन हमारे पास समय सीमित है, इसलिये अब मैं समाचार चैनलों की भाषा पर बात करूंगा।

आज हिंदी समाचारों की भाषा कैसी है।
आज हिंदी समाचारों की भाषा सरल है, सनसनीखेज है, आक्रमक है, आम बोलचाल वाली है और संक्षिप्त है। बीते 2 दशकों में हिंदी न्यूज चैनलों की भाषा में भी काफी बदलाव हुआ है और ये पूरी मीडिया में हो रहे बदलावों का एक हिस्सा है।

साल 2000 में आज तक न्यूज चैनल शुरू करने के लिये दिल्ली में हमारी ट्रेनिंग हो रही थी। आज तक के तत्कालीन संपादक कमर वाहिद नकवी ने उस ट्रेनिंग के दौरान हमें बताया कि आज तक चैनल में उस भाषा उसका इस्तेमाल होना चाहिये जो हिंदी फिल्मों में इस्तेमाल होती है। दिलचस्प बात ये है कि उस वक्त और बडी हद तक आज भी हिंदी फिल्मों में जिस भाषा का इस्तेमाल होता है वो पूरी तरह से हिंदी नहीं होती। उसमें उर्दू या फिर कहें हिंदुस्तानी का बडा प्रभाव रहता है। तो कैसी है ये भाषा। मिसाल के तौर पर अदालत से जुडे शब्दों को लीजिये –

इस भाषा में-
न्यायलय को अदालत
सश्रम कारावास को कैदे बामशक्कत
अपराध को गुनाह
आदेश को हुक्म
शपथपत्र को हलफनामा
भारतीय दंड संहिता को ताजीराते हिंद
धारा को दफा
अभियुक्त को मुलजिम
उत्तर को जवाब
और
हत्या को खून    कहते हैं

अगर आम बोलचाल के शब्दों की बात करें तो
राजनीति को सियासत
विशेषज्ञ को जानकार
राज्य को सूबा
यात्रा को सफर
सेना को फौज
दुर्घटना को हादसा
उदाहरण को मिसाल
मार्ग को राह या रास्ता कहते हैं।

ये वो भाषा थी जिसका आज तक ने कई सालों तक इस्तेमाल किया और आज भी एक हद तक कर रही है। समाचार चैनलों में भाषा की शुद्धता से ज्यादा जोर इस बात पर दिया जाता है कि क्या दर्शक खबर को आसानी से समझ पा रहा है।

एक मिसाल- अगर मैं ये कहूं कि ऊपरी उपस्कर भंग हो जाने के कारण लोकल ट्रेनें देरी से चल रहीं
हैं तो कितने लोग समझ पायेंगे  लेकिन अगर मैं कहूं कि ओवरहेड वायर टूट जाने की वजह से लोकल ट्रेने देरी से चल रहीं हैं तो सभी समझ लेंगे।
अखबार तो सिर्फ शिक्षित लोग ही पढ सकते हैं, लेकिन टीवी अनपढ आदमी भी देख सकता है। इसलिये चैनलों की भाषा वो होती है जो अनपढ या कम पढा लिखा व्यकित भी समझ जाये। भाषा की शुद्धता को यहां ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता।
मैंने अंग्रेजी माध्यम से पढाई की है और जब मैं तीसरी कक्षा में था तबसे हिंदी सिखाई जाने लगी। शिक्षिका ने सुझाव दिया कि हिंदी अच्छी करने के लिये हिंदी अखबार पढो। घर में नवभारत टाईम्स आता था और मैं उसे रोज पढने लगा। आज कोई माता-पिता या शिक्षक बच्चे को ये नहीं कह सकता कि हिंदी सीखने के लिये न्यूज चैनल देखो। वैसे अब तो नवभारत टाईम्स से भी हिंदी गायब हो गई है। हिंदी समाचार चैनलों में हिंदी शुद्ध नहीं है या तो उनमें अग्रेजी हावी हो गई है या फिर क्षेत्रीय भाषाओं के शब्द। इसके पीछे एक कारण ये है कि कई समाचार संमूह अपने अलग अलग भाषाई चैनलों के लिये एक ही बहुभाषी रिपोर्टरों की टीम रख रहे हैं। उदाहरण के तौर पर किसी एक समाचार संस्थान के हिंदी और मराठी चैनल दोनो हैं तो वो वैसे रिपोर्टर की नियुकित करेगा जो कि दोनो ही भाषाएं बोल ले...लेकिन कैमरे पर भले ही ये रिपोर्टर अपनी मातृभाषा ठीक बोल लें, लेकिन दूसरी भाषा में बोलते वक्त वैसा नहीं होता। मसलन अगर किसी मराठी भाषी रिपोर्टर को अगर हिंदी में खबर देनी है तो वो कह देता है – महानगरपालिका के बाहर जीजामाता नगर के रहिवासियों ने गोंध़ड किया। रहिवासी और गोंध़ड- मराठी के शब्द हैं। यहां रहिवासी की जगह निवासी होना चाहिये था और गोंध़ड की जगह हंगामा होना चाहिये था। इसी तरह से कोई समाचार समूह अपने अंग्रेजी और हिंदी चैनलों के लिये एक ही रिपोर्टिंग टीम रखते हैं, जिनके कुछ सदस्य कैमरे पर अच्छी अंग्रजी बोलते हैं, लेकिन टूटी फूटी हिंदी।
वैसे समाचार चैनलों पर हिंदी और अंग्रेजी का अच्छा मेल हो गया है। ब्रेकिंग न्यूज अंग्रेजी के इन दो शब्दों का जितना इस्तेमाल अंग्रेजी चैनलों ने किया है, उतना ही हिंदी चैनलों ने भी। जब कोई बडी खबर आती है तो लाल पट्टी पर खबर भले ही देवनागरी में लिखी जाये, लेकिन ऊपर रोमन में लिखा देंखेंगे ब्रेकिंग न्यूज। बडी दुर्घटना के वक्त आप चैनल पर सुनेंगे भीषण एक्सीडैंट।

भाषा की शुद्धता को अहमियत देने वाले लोग हिंदी चैनलों की भाषा को खिचडी भाषा भी बोल सकते हैं तो वहीं उदारवादी लोग इसे हिंदी की प्रगतिशीलता भी मान सकते हैं।

एक और बदलाव बीते एक डेढ दशक में देखने मिला है। पहले समाचार चैनलों की भाषा मुहावरेदार होती थी, काव्यात्मक होती थी जो अब नहीं है। फटाफट खबरों या 5 मिनट में पचास खबरों के इस जमाने में भाषा की सुंदरता पेश करने के अवसर ओझल हो गये हैं।

तो ये थे समाचार चैनलों के विषय चयन और भाषा पर मेरे विचार। वक्त के साथ साथ हिंदी चैनल की सामग्री और उनकी भाषा दोनो लगातार बदल रहे हैं। खुशी की बात ये है कि चाहे जिस भी रूप में हो, लेकिन हिंदी ने अपनी पहचान कायम रखी है।

Thursday, 8 December 2016

एक महीने बाद : नोटबंदी, नरेंद्र मोदी और नजरिया।

बात 2007 की है। गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजे आ गये थे। बीजेपी फिर एक बार भारी बहुमत से जीती थी। नरेंद्र मोदी नतीजे वाली शाम जीत के बाद चुनाव क्षेत्र मणिनगर में अपनी पहली जनसभा संबोधित करने जा रहे थे। मंच के ठीक सामने की ओर अपना कैमरा लगाकर मैं कवरेज कर रहा था। स्थानीय नेताओं के भाषणों के बाद मोदी जैसे ही माईक के सामने बोलने के लिये खडे हुए वहां मौजूद भीड बडी देर तक तालियां बजाती रही और मोदी की वाहवाही के नारे लगाती रही। चंद मिनटों बाद ये शोर थम गया। सभा में मौजूद लोग शांत हो गये कि अब मोदी को सुनते हैं...लेकिन मोदी कुछ नहीं बोले...करीब 30-40 सेकंड तक मौन रहे और अपने सामने  मौजूद भीड को निहारते रहे।...फिर उन्होने पहली लाईन कही – “ये मेरे मौन की विजय है”। सभास्थल फिर एक बार तालियों की गडगडाहट और नारों से गूंज उठा। मोदी की इस अदा ने उस वक्त मुझे भी उनका प्रशंसक बना दिया। उस चुनाव के दौरान जो कुछ भी हुआ था उसे जानकर मोदी का ये कहना कि “ये मेरे मौन की विजय है” के मायने मैं समझ रहा था।

ये वाकई में मोदी के मौन की विजय ही थी। मोदी उस वक्त कईयों के निशाने पर थे। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी अपनी सभा में मोदी को “मौत का सौदागर” बोलकर उनपर सीधा हमला कर रहीं थीं। खुद बीजेपी के केंद्रीय और राज्य के आला नेता उनके खिलाफ अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे थे। बीजेपी में मोदी से नीचे के कद के लोगों का एक वर्ग भी उनका विरोध कर रहा था। 2002 के दंगों की कहानियां उछाल कर मीडिया भी उन्हें आडे हाथों ले रही थी...लेकिन मोदी मौन रहे। उन्होने न तो सोनिया पर पलटवार किया, न तो अपनी पार्टी के नेताओं से बहस की और न मीडिया में अपने खिलाफ हो रहे कवरेज पर प्रतिक्रिया दी। मोदी सभाओं में सिर्फ अपने कामों को गिनाते गये और भविष्य की योजनाओं का बताते गये। बाकी सभी नकारात्मक बातों पर मौन रहे और इसी मौन को अपनी जीत का आधार बताकर मोदी ने अपनी विजय सभा में कहा – “ये मेरे मौन की विजय है”।

मोदी की उस सभा के बाद मैं उनसे बडा प्रभावित हुआ (भक्त नहीं बना) मैंने सोचा कि मोदी की इस सियासी रणनीति को हम अपने निजी जीवन में भी अपना सकते हैं। नकारात्मक बातों को नजरअंदाज करके अपना काम करते जाओ। 7 साल बाद 2014 में जब मोदी प्रधानमंत्री बने तब भी मैंने उनके सियासी सफर को प्रेरणादायक पाया। अपने शुरूवाती “मन की बात” कार्यक्रम में मोदी ने एक बात कही जो मुझे अच्छी लगी – “जीवन में कुछ बनने की नहीं बल्कि कुछ करने की इच्छा होनी चाहिये”। प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी के कई कार्यक्रम मुझे अच्छे लगे और सोशल नेटवर्किंग साईट्स के जरिये मैने उनकी प्रशंसा भी की जैसे जनधन खाते, बेटी बचाओ, स्वचछ भारत अभियान, योगा डे इत्यादि। 2005 में मैने श्रीश्री रविशंकर का आर्ट औफ लिविंग का कोर्स किया था लेकिन बाद में ज्यादा दिनों तक प्रैक्टिस नहीं कर सका। योग के प्रति फिर एक बार रूचि जगी जब मोदी ने पहली बार योगा डे मनाने का ऐलान किया। इस बात ने भी प्रभावित किया कि मोदी खुद सुबह 4 बजे उठकर योग करते हैं। उस दौरान मै योग के बारे में और ज्यादा जानकारी जुटाने लगा और खुद भी रोजाना योग करना शुरू कर दिया। ये आदत आज भी कायम है।

मोदी में इतनी सारी सकारात्मक बातें देखकर और उनकी कुछ नीतियां खुद अपनाकर भी अपनेआप को मैं खुशनसीब मानता हूं कि मैं उनका भक्त नहीं बना। एक चीज जो मेरी समझ में आई है कि दुनिया में ज्यादातर लोगों का दूसरे व्यकित या वस्तु को देखने का नजरिया This OR That का होता है। लोग यो तो किसी व्यकित या वस्तु को पूरी तरह से अच्छा या फिर पूरी तरह से बुरा समझ लेते हैं। मुझे लगता है कि किसी को आंकने का ये अन्यायपूर्ण नजरिया है। सही नजरिया  This AND That का है। कोई व्यकित या वस्तु में कुछ अच्छा भी हो सकता है और कुछ बुरा भी यानी good AND bad न कि सिर्फ good OR bad.

दिक्कत ये है कि आज मोदी को लेकर कई लोग this AND that का नजरिया अपनाने के बजाय this OR that का नजरिया अपना रहे हैं। यही वजह है कि देश में मोदी के अंधभक्त और अंधविरोधियों के 2 तबके उभर आये हैं। अंधभक्तों का तबका मोदी के व्यकितत्व और नीतियों में कोई बुराई नहीं देखता और अंधविरोधी लोग मोदी में कोई अच्छाई नहीं देखते। ये दोनो ही तबके मोदी के व्यकितत्व का गलत आंकलन कर रहे हैं।

मैं मोदी के व्यकित्तव को This AND That के नजरिये से देखता हूं। यही वजह है कि मोदी के शख्सियात और उनकी कई नीतियों का कायल होने के बावजूद जिस तरह से उन्होने देश में नोटबंदी लागू की है उसका मैं विरोध करता हूं। आज नोटबंदी को एक महीने पूरे हो रहे हैं और इस महीनेभर में मैने लोगों की तकलीफें देखीं हैं। खुद अपना पैसे हासिल करने के लिये लोगों को घंटों और दिनों तक अपना कामधंदा छोडकर कतार में खडे देखा है, बीमार पडकर गिरते देखा है, रोते देखा है, पुलिस की लाठियां खाते देखा है, शादी ब्याह टलते देखा है, बेमौत मरते देखा है, 2 हजार की नोट पाकर छुट्टे के लिये लोगों को झगडते देखा है। नोटबंदी को लेकर अब आर्थिक विश्लेषक जो राय दे रहे हैं उसका सार मुंबईया जुबान में यही है – “चार आने की मुर्गी बारह आने का मसाला”। लोगों ने कालेधन को सफेद करने के नये तरीके ढूंढ लिये हैं। खुद मोदी की पार्टी बीजेपी के नेता लाखों-करोडों के कालेधन के साथ पकडे जा रहे हैं। आंतकवादी के कोई हौसले पस्त नहीं हुए। देश पर आर्थिक मंदी की तलवार लटक रही है।


ये बात सही है कि जिस तरह से मैं मोदी के व्यकितत्व को सिर्फ Good OR Bad के नजरिये से नहीं देखता, उसी तरह नोटबंदी के फैसले को भी नहीं देखता...लेकिन फिलहाल महीनेभर के अनुभव के बाद नोटबंदी में good कम और bad ज्यादा नजर आ रहा है।

Thursday, 1 September 2016

हमारा सिर बचाने के लिये अपना सिर गंवाती पुलिस !

पुलिस क्या है ? समाज के बीच से समाज की सुरक्षा के लिये चुने गये चंद लोगों की एक संस्था। किसी पुलिसकर्मी की हत्या, समाज की आत्मा पर आघात है। आज पुलिसकर्मी हमारे कश्मीर को भारत से जोडे रखने के संघर्ष में भी मारा जा रहा है और मुंबई में ट्राफिक नियमों पर अमल करवाने के लिये भी। दोनो मामलों में मैं समानताएं देखता हूं। भारत माता की तस्वीर में जहां माता का सिर दिखता है नक्शे में उस जगह पृष्ठभूमि में कश्मीर होता है। मुंबई में जिन पुलिसकर्मी विलास शिंदे की हत्या हुई वो हेलमेट पहनने वाले नियम पर अमल करवा रहे थे। हेलमेट पहनने का वो नियम जो वाहन चालक की सिर की सलामती के लिये बनाया गया था। लोग हेलमेट पहनकर दुपहिया चलायें तो उनका सिर सलामत रहे। दोनो मामलों की तुलना का उद्देश्य इतना ही है कि आज पुलिस कहीं देश के शरीर का सिर बचाने के लिये जान दे रही है तो कहीं नागरिकों का सिर बचाने के लिये अपना सिर फोडवा रही है। दुखद है कि हम मौजूदा हो हल्ले के चंद दिनों बाद विलास शिंदे जैसे शहीदों को भूल जायेंगे और उनका नाम भी सिर्फ ड्यूटी पर मारे गये पुलिसकर्मियों के आंकडे में सिमट कर रह जायेगा, जैसा कि कश्मीर में मरने वाले पुलिसकर्मियों के साथ होता रहा है। ऐसा न हो इसके लिये हमें सतत सोचना होगा न कि अगले विलास शिंदे की हत्या पर ! पुलिस की खराब छवि, भ्रष्टाचार, लापरवाही वगैरह पर हर कोई घंटों बोल सकता है...लेकिन अति सामन्यीकरण से बाहर निकल देखने पर पता चलता है कि सभी वैसे नहीं है जैसा कि उन्हें देखा जाता है। पुलिस अपनी कहानी नहीं सुना सकती...लेकिन क्या पुलिस की आवाज उसे जन्म देने वाले समाज के दूसरे अंग नहीं बन सकते। छोटा बच्चा जब भूख से रोता है तब मां उसे दूध पिलाती है, लेकिन हमारी पुलिस समाज का ऐसा बच्चा है जिसे रोने की भी इजाजत नहीं है। (www.jitendradiary.blogspot.com)

Tuesday, 23 August 2016

मुंबई पुलिस के इतिहास का वो काला अगस्त !

बबन जाधव के साथ
स्वतंत्र भारत की मुंबई पुलिस के इतिहास में 2 काले अगस्त आये हैं। 11 अगस्त 2012 को मुंबई के आजाद मैदान के बाहर जो कुछ भी हुआ उसकी यादें अभी भी ताजा हैं। उस दोपहर पुलिसकर्मियों पर हमला किया गया, कईयों को दंगाईयों ने पीटपीट कर अधमरा कर दिया, पुलिस के वाहन जलाये गये और महिला पुलिसकर्मियों की इज्जत पर हाथ डालने की कोशिश हुई...वाकई पुलिस के लिये बेहद शर्मिंदगी का दिन था ! ....लेकिन अबसे 34 साल पहले भी 1982 में अगस्त के महीने में ही एक ऐसा वक्त आया था जब मुंबई पुलिस बहुत बुरे दौर से गुजरी। उस दौरान मुंबई पुलिस के कर्मचारियों के एक वर्ग ने बगावत का ऐलान कर दिया था।
11 अगस्त 2012 को आजाद मैदान के बाहर जो कुछ हुआ उसे तो मैने खुद देखा, लेकिन 19 अगस्त 1982 को जो कुछ हुआ उसकी कहानी सुनाई मुझे बबन जाधव ने। बबन जाधव अब उन गिनेचुने जिंदा बचे पुलिसकर्मियों में रह गये हैं जो उस पुलिस बगावत में शामिल हुए थे। बबन जाधव से मेरी दोस्ती साल 2003 में हुई थी जब बैन लगने के बाद पकडे गये सिमी के सदस्यों को कुर्ला कोर्ट में पेश किया जा रहा था और तब जाधव कोर्ट की सुरक्षा के प्रभारी थे। हाल ही में कई सालों बाद मेरी उनसे ठाणे में मुलाकात हुई।

“मुझे गणपति के त्यौहार के मौके पर उठाकर जेल में डाल दिया। अगर गुनाह मेरा था तो मेरे घरवालों को सरकारी घर से निकाल कर क्यों सडक पर फैंक दिया ? उनपर केस क्यो बना दिया? दाऊद इतना बडा अपराधी है लेकिन क्या उसकी सजा उसके घरवालों को जेल में भेजकर दी गई ?...लेकिन मुझ पुलिसवाले के किये की सजा मेरे घरवालों को मिली। तब मेरी 3 महीने की बेटी थी, 70 साल की बूढी मां थी...उनको घर से निकाल दिया गया”।
- बबन जाधन जब उस दौर को याद करते हैं तो उनकी आंखें गुस्से से लाल हो जातीं हैं। उस दौर में पुलिसकर्मियों की यूनियन हुआ करती थी “मुंबई पोलीस कर्मचारी संघटना” जिसके जाधव सदस्य थे।

“बंड(बगवात)  क्यों हुआ था? मैने जाधव से पूछा।
“मैं उसको बंड नहीं मानता। वो हमारा आंदोलन था। हम चाहते थे कि हमें सम्मानजनक तरीके से नौकरी करने मिले। हमें आईपीएस अफसरों के घरों में नौकरों का काम करवाया जाता था...सब्जी-भाजी खरीदने भेजा जाता, कुत्ते घुमवाये जाते थे, बर्तन मंजवाये जाते थे...ये सब क्या पुलिस का काम है? हमें छुट्टियां नहीं लेने दी जातीं थीं। हमारा वेतन बडा ही कम था। यही नहीं हमारे सरकारी पुलिस क्वार्टर छीनकर उसे एक निजी बिल्डर को देकर वहां टॉवर बनाने की साजिश थी। इसी वजह से हमें आंदोलन पर उतरना पडा”।

पुलिसकर्मियों के इस आंदोलन के संकेत उस साल 15 अगस्त को ही मिल गये थे जब कई पुलिसकर्मी काले फीते बांधकर डयूटी पर आये। आंदोलन का असली असर 19 अगस्त को दिखा। बताया जाता है कि उस वक्त के 22000 पुलिसकर्मियों में से 9500 पुलिसकर्मी आंदोलन में शामिल हुए थे। मुंबई में कई जगह पर पथराव हुआ, लोकल ट्रेनों को रूकवाकर मोटरमैनों को बाहर निकाल दिया गया, ट्रेनों के रूकने से गुस्साये मुसाफिरों ने स्टेशनों तोडफोड शुरू कर दी। पुलिसकर्मियों के इस आंदोलन में मिल मजदूर भी शामिल हो गये जो कि खुद बीते 7 महीने से हडताल पर थे। पुलिस हडताल पर है ये जानकर अपराधियों के भी हौसले बुलंद हो गये और उन्होने बेखौफ होकर लूटपाट शुरू कर दी जिसमें सबसे ज्यादा नुकसान वर्ली के सेंचुरी बाजार को पहुंचा। वर्ली नाके पर सबसे ज्यादा हिंसा हुई। हिंसा कर रही भीड से निपटने के लिये फौज ने फायरिंग की जिसमें 2 मिल मजदूरों और एक पुलिसकर्मी की मौत हो गई। नायगांव इलाके में भी एक युवा की मौत हुई।

उस वक्त मुंबई के पुलिस कमिश्नर जूलियो रिबैरो थे, जिन्होने अपनी आत्मकथा मैं ब्यौरा दिया है कि कैसे इस आंदोलन से निपटा गया। बागी पुलिसकर्मियों से निपटने के लिये फौज बुलाई गई और साथ ही वफादार पुलिसकर्मियों की मदद ली गई। पुलिस यूनियन के 22 नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। 92 पुलिसकर्मियों को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। पुलिस यूनियन पर पाबंदी लगा दी गई और आगे भी किसी तरह की पुलिस यूनियन बनाये जाने पर रोक लग गई।

हडताली पुलिसकर्मियों की कई मांगे जायज थीं, लेकिन पुलिस यूनियन के कई नेताओं ने भी अति कर दी थी। यूनियन के नेता वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से बदमीजी करते थे और उनसे मारपीट करने तक को तैयार रहते थे। वे पुलिस फोर्स का अनुशासन नहीं मानते थे और न ही वर्दी पहनते थे। एक पुलिसकर्मी जो कि ओशो का भक्त था उसने मांग कर दी कि पुलिस की वर्दी का रंग खाकी के बजाय गेरूआ कर दिया जाये। ज्यादातर यूनियन के नेता सामान्य ड्यूटी पर हाजिर नहीं रहते थे और अपनी मनमानी करते थे। उस दौरान पुलिस यूनियन के नेता एस.डी.मोहिते को तत्कालीन मुख्यमंत्री ए.आर.अंतुले ने काफी सिर चढा रखा था और उनकी ओर से यूनियन को दफ्तर खोलने की जगह भी दी गई थी।


जब मैने बबन जाधव से यूनियन नेताओं की इन ज्यादतियों के बारे में सवाल पूछा तो जाधव ने माना का कि उस दौरान अनुशासनहीनता हुई थी लेकिन ऐसा करने वाले चंद लोग ही थे, आंदोलन में शामिल सभी पुलिसकर्मी नहीं। जाधव का आज भी ये मानना है कि तमाम सरकारी महकमों में पुलिस महकमा सबसे ज्यादा शोषित महकमा है और उसे अपना दर्द सरकार तक पहुंचाने के लिये एक संगठन की जरूरत है। 

Saturday, 18 June 2016

मुंबई और रंगभेद : हम काले हैं तो...


“ऐ कल्लू मामा !”
“तेरा क्या होगा कालिया !”
“निग्रो है निग्रो !”
“ऐ ब्लैक मैंबो !”
“ओय काले भैंसे !”
ये कुछ ऐसे शब्द हैं जो मुंबई में पढाई, कारोबार या पर्यटन के लिये आने वाले हर अफ्रीकी नागरिक को आये दिन सुनने पडते हैं। रंगभेद समाज की नजर का वो दोष जो इंसान की कीमत उसकी चमडी के रंग से आंकता है। दुनिया भले ही इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में पहुंच गयी है लेकिन रंगभेद अब भी बरकरार है। इसे देखने के लिये यूरोप या अमेरिका जाने की जरूरत नहीं है। हाल ही में दिल्ली और गोवा में भी रंगभेद से जुडी घटनाएं हुईं। भारत के सबसे आधुनिक शहर मुंबई में भी ये खुलेआम नजर आता है। मुंबई में बडे पैमाने पर अफ्रीकी देश जैसे नाईजीरिया, केन्या, घाना, युगांडा, कैमरून, तंजानिया, सोमालिया और इथियोपिया के छात्र मैनेजमेंट, इंजानियरिंग, मास कॉम्यूनिकेशंस जैसे विषयों की पढाई करने के लिये मुंबई आते हैं और यहां लगभग सभी के साथ ऐसे अनुभव हुए हैं जो उनके शरीर के रंग से जुडे हैं। हाल ही में मेरी मुलाकात चंद दक्षिण अफ्रीकी छात्रों से हुई और उनकी आपबीती सुनने के बाद मुझे दुख भी हुआ, शर्मिंदगी भी हुई और गुस्सा भी आया। ये बात सही है कि हाल के सालों में अफ्रीकी देशों से आये नागरिकों की ओर से किये गये गुनाहों की तादाद बढी है, कई अफ्रीकी गैरकानूनी तरीके से भारत में रह रहे हैं, मुंबई और आसपास तो इनकी बस्तियां भी बन गईं हैं...लेकिन ये सिर्फ सिक्के का एक ही पहलू है। समस्या है सभी काले लोगों को एक ही चश्में से देखे जाने की।

27 साल के सानी अमद की चमडी का रंग उनके लिये जिंदगी असामान्य और मुश्किलोंभरी बना देता है। नाईजीरिया के लागोस शहर से आनेवाले सानी ने बी.एम.एम की पढाई के लिये भारत को चुना क्योंकि यहां अंतरार्ष्ट्रीय दर्जे की शिक्षा मिलती है, वीजा आसानी से मिल जाता है, पढाई के लिये फीस कम है और रहने के लिये घर का किराया भी सस्ता है। 2014 में सानी के कारोबारी पिता ने उसे भारत भेजा। सानी को मुंबई के एन.एन.कॉलेज में दाखिला तो आसानी से मिल गया लेकिन काफी मशक्कत के बाद मुंबई से दूर खारघर में उसे किराया का घर मिल पाया। इन दो सालों में सानी को कई कडवे अनुभवों का सामना करना पडा...कई बार उसे महसूस कराया गया कि वो औरों से अलग है...सिर्फ अपने शरीर के रंग की वजह से।
हाल ही में अचानक सानी के घर पुलिस आ धमकी।पता चला कि मकान मालिक के साथ कांट्रेक्ट की तारीख करीब हफ्तेभर पहले पूरी हो चुकी थी, लेकिन सानी ने उसे रिन्यू नहीं करवाया जिसकी वजह से हाऊसिंग सोसायटी के लोगों ने सीधे पुलिस में शिकायत कर दी। सानी को इस बात का दुख है कि पुलिस के पास जाने से पहले सोसायटी ने एक बार भी उससे बातचीत नहीं की। कांट्रेक्ट इसलिये रिन्यू नहीं हो सका था क्योंकि मकान मालिक देश के बाहर था।

कॉलेज के शुरूवाती दिन भी सानी के लिये मुसीबत भरे थे। क्लास के बाकी छात्र उसका मजाक उडाते थे और उसे अलग थलग रखते थे...लेकिन सानी का कहना है कि धीरे धीरे उनके व्यवहार में सानी के प्रति नरमी आई। सानी का कहना है – “सभी भारतीय एक जैसे नहीं हैं। मैं वो गलती नहीं करूंगा जो कई भारतीय अफ्रीकियों के बारे में करते हैं...सभी को एक जैसा समझते हैं। मुझे कई अच्छे भारतीय भी मिले”।

सानी की सहपाठी मास कम्यूनिकेशंस की पढाई कर रहीं चिनवे माडुआको 2 साल पहले नाईजीरिया से मुंबई आईं थीं...लेकिन इन 2 सालों में कोई भारतीय चिनवे का दोस्त नहीं बन सका। क्लास के बाकी छात्र मिलकर चिनवे का मजाक उडाते हैं और कोई उससे बात नहीं करता। क्लास खत्म होने के बाद जहां बाकी छात्र कैंपस में मौजमस्ती और गपशप करते हैं तो वहीं चिनवे चुपचाप घर चली आती है। कॉलेज आते जाते हुए भी उसका मजाक उडाया जाता है। चिनवे के मुताबिक – जब मैं चलती हूं तो मेरे कानों में “काली”...”निग्रो” जैसे शब्द सुनाई देते हैं। मैं समझ जातीं हूं कि मुझपर कमेंट किया जा रहा है। पहले मैं इससे विचलित हो जाती थी लेकिन अब तो ये रोज की बात हो गई है।
जिस वक्त मैं चिनवे से बात कर रहा था उसी वक्त उसे उसकी एक अफ्रीक सहेली का फोन आया जो चिनवे की तरह ही मुंबई में पढाई कर रही थी। उसकी सहेली को बिना कोई कारण बताये मकानमालिक ने रातोंरात घर खाली करने को कह दिया। हाउसिंग सोसायटी वालों ने मकानमालिक पर दबाव डाला था कि वो इमारत में किसी अफ्रीकी को नहीं देखना चाहते। अब उसके सामने सवाल था कि वो कहां रहे। वो काफी रो रही थी। चिनवे के मुताबिक अफ्रीका से आये छात्रों के लिये मुंबई में किराये का घर हासिल करना टेढी खीर है। कोई अफ्रीकन छात्रों को आसानी से घर देने को तैयार नहीं होता। घर मिल भी जाये तो भी इस बात का डर बना रहता है कि कभी भी उन्हें निकलने के लिये कहा जा सकता है।

ब्रेवायो नाम के एक छात्र के मुताबिक मुंबई में हर कदम पर उसे रंगभेद का सामना करना पडता है। बाजार में खरीददारी करते वक्त, सार्वजनिक वाहन में सफर करते वक्त, घर ढूंढते वक्त, हाउसिंग सोसायटी से एनओसी लेते वक्त, कॉलेज में एडमिशन लेते वक्त और पुलिस और इमीग्रेशन से जुडे काम पडने पर।

इन छात्रों का मानना है कि उनसे बुरे बर्ताव के पीछे उनका रंग तो है ही, साथ ही उनके देशों से आये चंद लोग आपराधिक वारदातों को अंजाम देते है जिनकी वजह से सभी को शक की नजर से देखा जाता है। हाल के सालों में कई ऐसे मामले सामने आये हैं जिनमें अफ्रीकी नागरिकों को आपराधिक मामलों में पकडा गया। किसी पर ड्रग्स की तस्करी का आरोप लगा, तो किसी पर ऑनलाईन ठगी की। कोई चोरी और लूटपाट के आरोप में पकडा गया तो कोई गैरकानूनी तरीके से भारत में रहने के आरोप में। रिटार्यड एसीपी शमशेरखान पठान मुंबई के पायधुनी पुलिस थाने के सीनियर इंस्पेक्टर (थाना प्रभारी) रह चुके हैं। पायधुनी मुंबई के उन इलाकों में है जहां बडी तादाद में अफ्रीकी नागरिक रहते हैं। पठान के मुताबिक - “अफ्रीकी अपराधियों से निपटना पुलिस के आसान नहीं है। सबसे बडी दिक्कत इनकी पहचान स्थापित करने की होती है। जो अफ्रीकी गलत इरादे से भारत आते हैं वो आपना पासपोर्ट जला देते हैं, जिससे ये पता करना मुश्किल हो जाता है कि वो किस देश से आये हैं। देश का पता चल भी जाये तो उन्हें डीपोर्ट करना भी महंगा काम है। एक अफ्रीकी को डीपोर्ट करने पर 1 लाख रूपये से ऊपर का खर्चा आता है। ये लोग बडे हिंसक भी होते हैं और कई बार पुलिस के लिये इन्हें संभाल पाना मुश्किल हो जाता है। मुंबई के पायधुनी, डोंगरी, मोहम्मद अली रोड, मसजिद बंदर और मुंबई के पास मीरा रोड, भायंदर और नवी मुंबई में अफ्रीकी नागरिकों की बस्तियां हैं”। पठान का कहना है कि पुलिस सभी काले अफ्रीकियों को शक की नजर से देखती हैं, लेकिन उनके मुताबिक वास्तव में सिर्फ 5 या 10 फीसदी अफ्रीकी ही आपराधिक गतिविधियों में पाये लिप्त पाये जाते हैं।
चिनवे के मुताबिक उसके देश नाईजीरिया में कई भारतीय बसे हैं जो वहां बेफिक्र होकर कारोबार करते हैं, घूमते-फिरते हैं। वहां भारतियों को सम्मान की नजर से देखा जाता है, उनके साथ अच्छा बर्ताव होता है। ऐसे में चिनवे को ये सवाल सता रहा है कि फिर उसके साथ भारत में बुरा सलूक क्यों होता है ?

अब भी दुनिया में किसके साथ कहां कैसा व्यवहार होगा, ये अब भी बडी हद तक उसकी चमडी के रंग पर निर्भर करता है, लेकिन भारत में रंगभेद का होना दुखद है।

अंग्रेज हम भारतियों के साथ रंगभेद करते थे क्योंकि वो गोरे थे और हम गेंहुए रंग के। अब हममें से कई लोग वही सलूक अफ्रीकी नागरिकों के साथ उनके रंग की वजह से कर रहे हैं। अंग्रेजों की गुलामी से तो भारत आजाद हो गया लेकिन हम अब भी रंग के गुलाम बने हुए हैं। 

Monday, 28 March 2016

डिलाईल रोड का भूषण फंस गया पाकिस्तान में !

मुंबई के रहने वाले कुलभूषण जाधव का नाम इस वक्त खबरों में है। कुलभूषण को भारत के लिये जासूसी के आरोप में पाकिस्तानी एजेंसियों ने पकडा है। कुलभूषण का नाम भले ही पहली बार खबरों में आया हो, लेकिन उनका परिवार पहले भी खबरों में रह चुका है। कुलभूषण के बचपन के दोस्तों, उसके सहपाठियों और पडोसियों से मिली जानकारी के आधार पर उसके परिवार की जो तस्वीर उभरती है, वो यहां पेश है।



डिलाईल रोड से नाता।
कुलभूषण के पिता सुधीर जाधव और चाचा सुभाष जाधव दोनो ही मुंबई पुलिस में बतौर एसीपी रैंक पर रिटायर हुए। दोनो ही पुलिस में थे और दोनो ही एक ही पद से रिटायर हुए, लेकिन दोनों की सोच में बडा फर्क था और दोनो की एक दूसरे से अनबन थी। कुलभूषण के पिता सुधीर जाधव की इमेज बडे ही ईमानदार पुलिस अधिकारी थी। उनके पुलिसिया करियर में कभी विवाद नहीं हुआ। डिलाईल रोड में जहां आज क्राईम ब्रांच की यूनिट 3 का दफ्तर है, उसी के ऊपर पुलिस क्वाटर्स में पहली मंजिल पर सुधीर जाधव का घर था। सुधीर जाधव का मराठी के सांस्कृतिक, सामाजिक और कलाजगत से जुडे लोगों से अच्छी दोस्ती थी और ये लोग अक्सर पूजा इत्यादि जैसे पारिवारिक समारोह में शिरकत करने के लिये उनके घर आते थे। कुलभूषण अपने माता-पिता और बहन के साथ यहीं रहता था।

कुलभूषण के चाचा यानी कि सुधीर जाधव के भाई सुभाष जाधव उनके घर के ठीक सामने एक निजी इमारत पृथ्वीवंदन सोसायटी में रहते थे। सुभाष जाधव वही एसीपी हैं जिनकी तस्वीरें 28 सितंबर 2002 को सलमान खान की कार एक्सीडैंट मामले में गिरफ्तारी के बाद टीवी चैनलों पर दिखाईं गईं थीं जिसमें वो सलमान के साथ किसी आरोपी की तरह नहीं बल्कि पारिवारिक सदस्य की तरह आत्मीयता से पेश आते नजर आ रहे थे। एक एसीपी की ओर से एक आरोपी के साथ किये गये इस बर्ताव को लेकर उस वक्त काफी विवाद हुआ था।...पर 2002 से 10 साल पहले यानी कि 1992-93 में सुभाष जाधव की ऐसी इमेज नहीं थी। उस दौरान बतौर इंस्पेक्टर सुभाष जाधव की पोस्टिंग दक्षिण मुंबई के एल.टी.मार्ग थाने में हुई थी। इस थाने की हद में देश का सोने-चांदी का सबसे बडा करोबारी इलाका जवेरी बाजार आता है। जवेरी बाजार में सुभाष जाधव की दहशत भी थी और इज्जत भी। बताया जाता है कि जाधव जब भी यहां किसी चोर को पकडते थे तो उसकी जमकर पिटाई करते थे, फिर हाथ में बेडियां बांधकर उसे जवेरी बाजार की जुम्मा मसजिद से मुंबादेवी मंदिर की ओर जाने वाली सडक पर घुमाते थे। चोर को कहते थे कि वो लगातार बोलता चले – “मैं चोर हूं। मैं चोर हूं”। जैसे ही कथित चोर ये बोलना बंद करता पीछे चल रहे सुभाष जाधव उसे अपना डंडा दिखाते और आरोपी फिर चिल्लाने लग जाता – “मैं चोर हूं”। आज की तरह मोबाईल कैमरे और सोशल नेटवर्किंग साईट्स का वो जमाना नहीं था, नहीं तो सुभाष जाधव अपने इस दबंग और सिंघम स्टाईल के फिल्मी इंसाफ के लिये बडी मुसीबत में फंस जाते। जाधव की ये खूंखार इमेज ऐसी थी कि जब भी वो जवेरी बाजार से पैदल राउंडअप के लिये निकलते थे तो भीडभरी सडक पर सन्नाटा पसर जाता था। सुभाष जाधव ने अपनी स्टाईल में कई कथित चोरों की जवेरी बाजार में परेड करवाई लेकिन कभी मुसीबत में नहीं फंसे लेकिन जब उनका तबादला बांद्रा पुलिस थाने के सीनियर इंसपेक्टर के तौर पर हुआ तब चोरी के आरोप में पकडे गये एक युवक को लेकर विवाद में फंस गये। उस दौरान ज्वाइंट कमिश्नर लॉ एंड ऑर्डर वाय.सी.पवार थे। पवार के पास शिकायत आई थी कि युवक की गिरफ्तारी सही नहीं थी। इस मामले को लेकर पवार ने सुभाष जाधव को काफी खरी खोटी सुनाई और अपशब्दों के साथ उनकी बेइज्जती की। जाधव काफी देर तक सुनने के बाद जब पवार के केबिन से निकले तो उन्होने तत्कालीन पुलिस कमिश्नर एम.एन.सिंह के पास पवार की शिकायत कर दी। उस शिकायत के बाद सिंह और पवार के बीच जो विवाद हुआ वो अलग कहानी है। चंद महीने बाद पवार रिटायर हो गये और सुभाष जाधव का बांद्रा में ही बतौर एसीपी प्रमोशन हो गया।

कुलभूषण जाधव के चचेरे भाई यानी कि सुभाष जाधव के बेटे हैं राईबन और माणिक। इनके दोनो के दोस्तों में विलासराव देशमुख के बेटे का भी शुमार था। राईबन लंबे वक्त तक कानून की पढाई करने के बाद चंद साल पहले ही वकील बना है। माणिक कानूनी पचडों में फंस चुका है और अपने पिता को भी परेशानी में डाल चुका है।


ठिकाना छूटा, दोस्ताना नहीं।
रिटायरमेंट के बाद कुलभूषण के पिता सुधीर जाधव ने डिलाईल रोड का आधिकारिक घर छोड दिया और पवई में फ्लैट लेकर रहने लगे। सुभाष जाधव ने रिटायरमेंट के बाद शिवाजी पार्क में घर खरीदा और डिलाईल रोड का घर किराये पर उठा दिया। हालांकि कुलभूषण के परिवार का ठिकाना अब डिलाईल रोड नहीं था लेकिन उसका मन इसी इलाके से जुडा था जहां उसका बचपन बीता और जहां उसके बचपन के दोस्त थे। कुलभूषण को उसके दोस्त “भूषण” कहकर पुकारते थे और उम्र से छोटे युवकों के लिये वो “भूषण दादा” था। भूषण फुटबॉल का शौकीन था और पास के मैदान में अक्सर दोस्तों के साथ फुटबॉल खेलता था। दोस्तों का साथ उसके लिये सबकुछ था। जब बतौर नेवी अफसर एनडीए में उसकी पासिंग आउट परेड हुई तो वो डिलाईल रोड के अपने सभी दोस्तों को साथ ले गया। ड्यूटी ज्वाइन करने के बाद भी छुट्टियां मिलने पर वो डिलाईल रोड ही आ जाता था और अपने पुराने दोस्तों के साथ वक्त गुजारता था। एक बार ट्रेनिंग के दौरान जब भूषण को छुट्टी मिली तो उसने अपने तमाम दोस्तों को कश्मीर घूमने के लिये आमंत्रित किया और वहां उनके साथ मिलकर खूब मस्ती की।

चलो दोस्तों, फौज में चलें...
भूषण के दोस्त शुभ्रतो मुखर्जी के मुताबिक उसमें देशभकित की भावना काफी मजबूत थी और इसी वजह से उसने नेवी का करियर चुना ताकि वो देश सेवा कर सके। जब भी छुट्टियों में वो अपने दोस्तों से मिलने आता तो नेवी में अपनी नौकरी के रोमांचक किस्से सुनाता और दोस्तों को भी प्रेरित करता कि वे भी मिलिट्री में भर्ती हों।

हिम्मत सिर्फ लडकर ही दिखाई नहीं जाती !
भूषण नेवी की नौकरी करता था यानी कि एक ऐसे संगठन में जिसका ताल्लुक जंग से है और जहां काम करने के लिये हिम्मत चाहिये...लेकिन भूषण की हिम्मत नेवी की नौकरी के बाहर भी झलकती थी। भूषण के एक दोस्त तुलसीदास के मुताबिक एक बार जब भूषण को छुट्टी मिली तो वो डिलाईल रोड अपने दोस्तों से मिलने आया। वो अपने दोस्तों के साथ मोहल्ले में टहल रहा था, तभी उसकी नजर फुटपाथ पर पडी एक बूढी भिखारी महिला पर पडी। महिला के सिर पर जख्म था, जिसमें कीडे लग गये थे और वो दर्द के मारे बुरी तरह से कराह रही थी। बाकी लोगों को महिला से आ रही बदबू और उसके सिर में लगे जख्म को देखकर घिन आ रही थी और कोई उसके करीब तक नहीं जा रहा था। भूषण का दिल उस महिला की हालत देखकर पसीज गया। उसने तुरंत महिला को अपने हाथों से उठाया और अपनी गाडी में डालकर अस्पताल पहुंचा दिया। भूषण की ओर से दिखाई गई इस हिम्मत से इलाके के लोगों में उसके प्रति सम्मान और बढ गया।

कहीं सरबजीत न बन जाये भूषण...

जबसे भूषण के पाकिस्तान में पकडे जाने की खबर आई है तबसे उसके दोस्त बेचैन हैं और ईश्वर से उसकी सलामती की प्रार्थना कर रहे हैं। जासूसी के आरोप में दुश्मन मुल्क में पकडे जाने पर क्या हश्र होता है ये सरबजीत के मामले में दुनिया देख चुकी है जिसे पाकिस्तान की जेल में पीटपीटकर मार डाला गया। अब भूषण के दोस्त सरकार से यही गुजारिश कर रहे हैं कि वो अपनी पूरी ताकत झोंक दे ताकि उसे सही सलामत वापस उसके वतन लाया जा सके। (www.jitendradiary.blogspot.com)

Monday, 22 February 2016

संजय तू बातों से मानेगा या…? मुन्नाभाई की कहानी, जेलर की जुबानी।


अंग्रेजी हूकूमत के दौर में बनाई गई मुंबई की आर्थर रोड जेल अपनी चारदीवारी के बीच एक इतिहास समेटे है। अगर बीते डेढ दो दशक की ही बात करें तो आर्थर रोड जेल में ऐसी शख्ससियतें कैदी बनकर आ चुकीं हैं जो कि मुंबई में खूनखराबे, आतंक और खौफ के लिये जिम्मेदार रहीं। ऐसे लोगों से जेल में सामना होता था महाराष्ट्र जेल की डीआईजी स्वाती साठे का जो कि 2 बार इस कुख्यात आर्थर रोड जेल की सुपिरिंटेंडेंट रह चुकीं हैं। स्वाती साठे के कार्यकाल में अरूण गवली, अबू सलेम, मुस्तफा दोसा, याकूब मेमन, अजमल कसाब, अश्विन नाईक जैसे खतरनाक नाम तो उनके कैदी बने ही साथ ही गैरकानूनी हथियार रखने के गुनहगार फिल्मस्टार संजय दत्त को भी सबसे लंबे वक्त तक उन्होने ही जेल में देखा।

Swati Sathe, DIG (Prisons), Maharashtra.

एक फिल्मी हस्ती जो ऐशोआराम की जिंदगी जी रहा हो, जो महंगी विदेशी शराब पीता हो, जिसका खाना सात सितारा रेसतरां में होता हो, जो चलते वक्त लाखों के कपडे, घडी और चैन से लदा हुआ होता हो, उसे अगर अचानक जेल की कांटोभरी जिंदगी जीने के लिये कह दिया जाये तो इस बदलाव से वो कैसे संघर्ष करता है, ये स्वाती साठे ने करीब से देखा है संजय दत्त में।

जेल ऐसी जगह है जहां भ्रष्टाचार के लिये खूब जगह है।कैदी जेल में सुख सुविधाएं पाने के लिये जेल अधिकारियों को मोटी कीमत देने को तैयार रहते हैं। संगठित अपराध के गिरोह का तो एक पूरा सिस्टम काम करता है जेल के स्टाफ को “खुश” करने में ताकि गिरोह के सदस्यों को जेल “जेल” न लगे, उन्हें मनपसंद खाना मिले, शराब मिले, ड्रग्स मिले, मोबाइल फोन मिले। जेल में होने वाले भ्रष्टाचार के कई मामलों का आये दिन मीडिया के मार्फत खुलासा होते रहता है। कई बार कोई सख्त अफसर आया जो रिश्वत नहीं लेता तो उसके खिलाफ डर का इस्तेमाल किया जाता है। उसे जान से मारने से लेकर तबादला करवा देने तक का डर दिखाया जाता है। जो डर जाता है वो चुप बैठता है। स्वाती साठे की इमेज चुप बैठने वाले अफसरों में नहीं थी। उनके कार्यकाल के दौरान आर्थर रोड जेल में किसी गैंगस्टर के बजाय उनका खौफ होता था। अपनी सख्त और ईमानदार छवि की वजह से साठे ने जेल महकमें में अपनी अलग पहचान बनाई थी। इन्हीं नो नॉनसेंस स्वाती साठे से सामना हुआ था संजय दत्त का।


बात तब की है जब टाडा अदालत में संजय दत्त को 6 साल जेल की सजा सुनाये जाने के बाद उन्हें आर्थर रोड जेल में लाया गया। संजय दत्त 1993 में पहले भी इस जेल के कैदी रह चुके थे।चूंकि आर्थर रोड जेल ऐसे कैदियों की जेल है जिनके खिलाफ मुकदमा चल रहा हो इसलिये सजायाफ्ता होने के कारण संजय दत्त को इस जेल से दूसरी जगह भेजा जाना था...लेकिन जब तक संजय दत्त के लिये दूसरी जेल मुकर्रर हो तब तक उन्हें कुछ वक्त के लिये यहीं रखने का फैसला किया गया। संजय दत्त को जेल में लाये जाने के बाद नियम के मुताबिक जेल का वो यूनिफॉर्म पहनने को कहा गया जो कि हर कैदी पहनता है। ये यूनिफॉर्म सफेद रंग की थी जिसकी कीमत बाजार में लगभग 100 रूपये की होगी। खुद को 6 साल जेल की सजा सुनाये जाने के बाद संजय दत्त सदमें में थे।आंखें डबडबा रहीं थीं, ऐसे में जब उन्हें ये यूनिफॉर्म पहनने को कहा गया तो वो अपना आपा खो बैठे। दत्त ने चिल्लाकर कहा कि वो यूनिफॉर्म नहीं पहनेंगे। जेल के कर्मचारी उन्हें विनम्रता से समझाने लगे कि नियमों के मुताबिक ये जरूरी है...लेकिन दत्त जिद पर अड गये...नहीं पहनूंगा...नहीं पहनूंगा...नहीं पहनूंगा। निचले दर्जे के जेल अधिकारी हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे कि वो इतने बडे फिल्मस्टार के साथ सख्ती से पेश आयें जिसकी बहन प्रिया दत्त केंद्र और राज्य की सत्तासीन कांग्रेस पार्टी की सांसद भी थी।


जेल अधिकारी स्वाती साठे के केबिन में पहुंचे और बताया कि संजय दत्त यूनिफॉर्म नहीं पहन रहा है।कोई बात सुनने के लिये तैयार नहीं है।स्वाती साठे ने तय किया कि इस मामले को अब वे अपने हाथ में लेंगीं। वे तुरंत संजय दत्त के बैरक में पहुंचीं। साठे का चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ था। संजय दत्त भी स्वाती साठे के मिजाज से परिचित थे। स्वाती साठे को अपने बैरक में देख उनके भी हाव भाव बदल गये। स्वाती साठे ने दत्त की आंख में आंख डालकर उनकी ओर अपनी छडी दिखाते हुए कहा – संजय तू बातों से मानेगा या लातों से ? इस सवाल के साथ वो कुछ पलों तक दत्त का चेहरा देखतीं रहीं। दत्त ने अपनी नजरें झुका लीं। उन्हें उम्मीद नहीं की थी कि उनके साथ जेल में ऐसा भी हो सकता है। स्वाती साठे ने आगे कुछ नहीं कहा और बैरक से बाहर चलीं गईं। संजय दत्त ने खामोश रहते हुए यूनिफॉर्म पहन ली।

#Bombayphile - Company of Woman : David Headley's Secret Girlfriend

Have you watched Ram Gopal Verma's 1998 movie Satya? Urmila Matondar plays the role of Singer Vidya, who is jolted when she learns that ...